ब्रह्मपुत्र नदी: सभ्यता, संस्कृति और शक्ति की अनोखी धारा
उद्गम और प्रवाह की यात्रा
भारतीय नदियों के नाम स्त्रीलिंग में होते हैं पर एक नदी अपवाद है। जो भारत ही नहीं विश्व में बड़ी नदियों में शामिल है। जो भारत के साथ अन्य देशों से भी होकर गुजरती है। अपने 2900 किलोमीटर लम्बे सफर में यह नदी अनेकों संस्कृति, सभ्यता को समेटे हुुए बहती है। जिसे नदी नहीं नद कहा जाता है। जिसे हम ब्रम्हा के पुत्र के रूप में जानते है।
ब्रह्मपुत्र का उद्गम हिमालय के उत्तर में तिब्बत के पुरंग जिले में स्थित मानसरोवर झील के निकट होता है, आरंभ में यह तिब्बत के पठारी इलाके में, यार्लुंग सांगपो नाम से पूर्व की ओर बहती है, जिसके बाद नामचा बार्वा पर्वत के पास दक्षिण-पश्चिम की दिशा में मुङकर भारत के अरूणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है जहां इसे सियांग कहते हैं।
उंचाई को तेजी से छोड़ यह मैदानों में प्रवेश करती है, जहां इसे दिहांग नाम से जाना जाता है। असम में नदी काफी चौड़ी हो जाती है और कहीं-कहीं तो इसकी चौड़ाई 10 किलोमीटर तक है। आसाम घाटी में बहते हुए इसे ब्रह्मपुत्र और फिर बांग्लादेश में प्रवेश करने पर इसे जमुना कहा जाता है। पद्मा (गंगा) से संगम के बाद इनकी संयुक्त धारा को मेघना कहा जाता है, जो कि सुंदरबन डेल्टा का निर्माण करते हुए बंगाल की खाड़ी में जाकर मिल जाती है। ब्रह्मपुत्र नदी एक बहुत लम्बी (2900 किलोमीटर) नदी है।
खोज, इतिहास और सांस्कृतिक समन्वय
ब्रह्मपुत्र का ऊपरी मार्ग 18 वीं शताब्दी में ही खोजा गया था हालांकि 19वीं शताब्दी तक यह अज्ञात ही था 20वीं शताब्दी में ब्रिटिश खोजकर्ताओं ने तिब्बत में नदी के पहाड़ी दरों की खोज की थी ब्रह्मपुत्र नदी विभिन्न संस्कृतियों और सभ्यताओं के समन्वय की मिसाल है विख्यात लोक गायक भूपेन हजारिका के गीतों में ब्रह्मपुत्र की गहराई को महसूस किया जा सकता है ।
ब्रह्मपुत्र यहां के रचनाकारों और चित्रकारों की रचनाओं का पसंदीदा पात्र रही है यह नागरिकों के लिए जीवन की गति है तो मछुआरों के लिए जिंदगी। खास बात यह है कि ब्रह्मपुत्र पर जल परिवहन ही शेष दुनिया का पूर्वोत्तर में प्रवेश करने का सबसे प्राचीन रास्ता रहा है और मिलन का गवाह भी । जिस तरह अनेक नदियां इसमें समाहित होकर आगे बढ़ी है इस तरह कई संस्कृतियों ने मिलकर एक अलग संस्कृति का आलिंगन भी किया है पूर्वोत्तर का जनजीवन काफी हद तक ब्रह्मपुत्र पर निर्भर है यहां के समाज सभ्यता और संस्कृति पर इसका प्रभाव युगों युगों से प्रचलित लोक कथाओं और लोकगीतों में देखा जा सकता है।
सभ्यताएं, राज्य और वीरता की गाथाएं
ब्रह्मपुत्र घाटी में कामरूप एडम सोनपुर कौटिल्य आदि न जाने कितने ही राज्य पनपे और बने और बिगड़ते रहे इसकी घाटी में प्रवेश कर 600 साल तक शासन किया ब्रह्मपुत्र घाटी में इस सभ्यता नहीं विदेश से आए राजाओं को अपने रंग में रंग कर अपनी माटी से पूरी तरह से समरस करदिया्र।
इसके किनारे जन्मे लचित बड़फुकन मुगल आक्रमणकारियों को असम की सीमा से बाहर खदेड़ते रहे। ब्रह्मपुत्र के किनारो ने अंग्रेजों के अत्याचार भी देखें यह ब्रह्मपुत्र की घाटी का असर था कि इसी शंकर जी माधव देव और दामोदर देव जैसे संत यहां हुए श्रीमंत शंकरदेव ने यहां के लोगों को एकजुट करने के लिए राजावली भाषा बनाई ब्रह्मपुत्र के किनारे ही किसी भी क्षेत्रीय भाषा में पहली रामायण लिखी गई।
आस्था, धर्म और आध्यात्मिक विरासत
ब्रह्मपुत्र के तटों पर शैव वैष्णव बौद्ध जैन सभी पंथ पनपे। पर ब्रह्मपुत्र के किनारे ही मां कामाख्या मंदिर का शक्तिपीठ है धुबरी का प्रसिद्ध गुरुद्वारा दमदमा साहिब भी यहीं है जहां खुद गुरु नानक देव और गुरु तेग बहादुर भी आए।
ब्रह्मपुत्र के किनारे बिहू गीतों की अपनी पहचान है ब्रह्मपुत्र के किनारे बसी बोडो जन जांतिया और गारो जनजातीय अपनी अपनी रंग बिरंगी मान्यताओं रीति रिवाज, अपनी भाषाओं, आस्थाओं और लोक नृत्य से ब्रह्मपुत्र की घाटी को गुंजायमान करती है।
रौद्र रूप: बाढ़ और जनजीवन
तो दूसरी ओर उसका एक रौद्र रूप भी है जब ब्रह्मपुत्र नदी तूफान पर होती है तब पूरे असम में कहर बन जाती है शहर से ग्रामीण क्षेत्र का संपर्क टूट जाता है रोजमर्रा की वस्तुएं शहरों तक नहीं पहुंच पाती है असम की छोटी बड़ी नौकरी ब्रह्मपुत्र में आवागमन करती हैं लेकिन बाढ़ की स्थिति में जनजीवन पूरी तरह से ठप हो जाता है ।
1962 में असम में गुवाहाटी के पास सडक़ और रेल दोनों के लिए सरायगत पुल बनने तक ब्रह्मपुत्र पर कोई पुल नहीं था अब तो इसके समानांतर एक और पुल भी बन गया है इसके बाद साल 1987 में तेजपुर के निकट सडक़ पुल भी बन गया है इस तरह ब्रिज और फ्लाईओवर के बनने से बारिश और बाढ़ के दिनों में लोगों की जिंदगी थोड़ी आसान हुई है ।
सामरिक और पर्यावरणीय चुनौतियाँ
पूर्वोत्तर की लाइफ लाइन कही जाने वाली ब्रह्मपुत्र पर चीन की खास नजर भी है वह ब्रह्मपुत्र की धारा को अपनी ओर मोडऩे का प्रयास करता रहता है इसके अलावा तिब्बत में चीन की सबसे बड़ी पन बिजली परियोजना जाम हाइड्रो पावर स्टेशन भी शुरू हो गई है इसी तरह अरुणाचल प्रदेश में ब्रह्मपुत्र पर लगातार बना रहे बांध भी खतरे का संकेत दे रहे हैं इन बातों के बनने से असम समेत कई देशों पर खतरा बढऩे की संभावना है जानकार बताते हैं कि अरुणाचल प्रदेश के जंगल मजबूत नहीं है और उनके साथ छेड़छाड़ के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं ब्रह्मपुत्र नदी का वैज्ञानिक ढंग से इस्तेमाल करने की जरूरत है हालांकि राज्य सरकार ब्रह्मपुत्र के विकास के लिए नमामि ब्रह्मपुत्र योजना को मूल रूप देने की का प्रयत्न कर रही है लेकिन बावजूद इसके अन्य पहलुओं पर विचार करते हुए कारगर कदम उठाने होंगें।
एकता, उत्सव और जीवनधारा
त्योहारों की अद्भुत मिसाल भी ब्रह्मपुत्र के किनारे ही देखने को मिलती है अलग-अलग संस्कृतियों के बावजूद राष्ट्रीय एकता की तस्वीर भी ब्रह्मपुत्र के तट पर देखने को मिलती है। सदियों से ब्रह्मपुत्र के हमारे लिए कई मायने रहे हैं ब्रह्मपुत्र के बिना इसके किनारे रहने वालों की जिंदगी की कल्पना भी नहीं की जा सकती...

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