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संदेश

सुरों की साधिका - लता दीदी

  कभी किसी खामोश रात में दूर कहीं से एक स्वर आया— “आएगा आने वाला…” और सचमुच आया… एक ऐसा स्वर, जिसने सुरों को आवाज़ दी, आवाज़ को पहचान दी, और पहचान को भारत की आत्मा बना दिया। फिर जिंदगी ने पूछा— ये कैसा सफर है? हम मुस्कुराकर कह उठे— “अजीब दास्तां है ये…” क्योंकि कुछ आवाज़ें सुनी नहीं जातीं, वे सीधे दिल में उतरती हैं। कभी प्रेम ने सिर झुकाया,  कभी विरह ने आँखें भिगोईं, कभी किसी ने चुपके से कहा— बस कुछ पल और… तो आपकी आवाज़ ने समय को थाम लिया— “लग जा गले…” और उन दो शब्दों में न जाने कितने बिछड़ते रिश्ते अपना घर पा गए। प्रेम जब दुनिया से डरने लगा, तो आपके स्वर ने मधुबाला के अधरों से इतिहास को चुनौती दी— “प्यार किया तो डरना क्या…” और प्रेम सिर्फ कहानी नहीं रहा, एक साहस बन गया। फिर किसी ने पूछा— क्या साथ केवल पास रहने का नाम है? आपकी आवाज़ आई— “तू जहाँ जहाँ चलेगा, मेरा साया साथ होगा…” और लगा… कुछ लोग शरीर से दूर होकर भी हमारी जिंदगी से कभी दूर नहीं होते। कुछ रिश्ते दिखाई नहीं देते, फिर भी हर कदम पर साथ चलते हैं। कभी बारिश आई… खिड़की पर बूंदें उतरीं, हवा में मिट्टी की खुशबू घुली और मन...
हाल की पोस्ट

जिसे हम रोज देखते रहे और कभी समझ नहीं पाए....

  सुबह के ठीक सात बजे थे। आँगन में रखी पुरानी लकड़ी की कुर्सी पर रामदीन रोज की तरह बैठे थे। सफेद कुर्ता-पायजामा, आँखों पर थोड़ा नीचे खिसका हुआ चश्मा और हाथ में अखबार। सामने तुलसी का पौधा था, जिसके पास रखा छोटा-सा पानी का लोटा हर सुबह की तरह अपनी जगह पर रखा था। रसोई से अनिता की आवाज आई— “पिताजी, आपकी चाय रख दी है।” रामदीन ने अखबार से नजर हटाए बिना कहा— “हाँ बहू, रख दे।” उसी समय रिया स्कूल की ड्रेस पहनकर भागती हुई आई। “दादाजी, मेरी पानी की बोतल कहाँ है?” रामदीन ने अखबार नीचे किया। “कल जहाँ रखी थी, वहीं होगी।” रिया ने इधर-उधर देखा। “नहीं है।” रामदीन धीरे से कुर्सी से उठे, कमरे में गए और अलमारी के ऊपर रखे बैग के पीछे से बोतल निकालकर ले आए। “ये रही।” रिया हँसते हुए बोली— “आपको सब पता रहता है दादाजी!” रामदीन भी मुस्कुरा दिए। “तुम लोगों की चीजें कहाँ रहती हैं, ये पता रखना ही तो मेरा काम है।” रिया बोतल लेकर भाग गई। तभी अमित तैयार होकर नीचे आया। “पापा, बिजली का बिल आज भर देना। कल आखिरी तारीख है।” रामदीन ने चाय की तरफ हाथ बढ़ाते हुए कहा— “हाँ बेटा, भर दूँगा।” “और पापा, बैंक में जो कागज रखे ह...

मुझे लगा, तू व्यस्त होगा....

सुबह के करीब नौ बजे थे। राघव ऑफिस जाने की जल्दी में था। एक हाथ में चाय का कप था और दूसरे हाथ में मोबाइल। मोबाइल की स्क्रीन पर लगातार नोटिफिकेशन आ रहे थे। ई-मेल। ऑफिस के मैसेज। क्लाइंट के कॉल। आज एक बड़ी मीटिंग थी और राघव किसी भी हालत में देर नहीं करना चाहता था। तभी फोन बजा। स्क्रीन पर नाम था— माँ। राघव ने फोन की तरफ देखा। उसने कॉल उठाने के लिए उंगली बढ़ाई, लेकिन तभी लैपटॉप पर एक जरूरी मैसेज आ गया। उसने फोन साइलेंट कर दिया। “बाद में कर लूँगा…” उसने खुद से कहा। कुछ देर बाद फिर फोन आया। इस बार भी वही नाम। माँ। राघव ने फोन उठाया। “हाँ माँ?” दूसरी तरफ से कुछ क्षण तक कोई आवाज नहीं आई। फिर माँ बोली— “बेटा… निकल गया क्या?” “बस निकल रहा हूँ माँ।” “अच्छा…” “कुछ काम था?” “नहीं।” थोड़ी देर चुप्पी रही। फिर माँ ने धीरे से कहा— “मुझे लगा, तू व्यस्त होगा।” राघव ने घड़ी देखी। “हाँ माँ, आज थोड़ा काम ज्यादा है।” “तो रख बेटा। देर हो जाएगी।” “शाम को बात करता हूँ।” “हाँ।” फोन कट गया। राघव ने मोबाइल जेब में रख लिया। उसे लगा, माँ ने बस यूँ ही फोन किया होगा। लेकिन वह नहीं जानता था कि माँ ने फोन इसलिए नहीं किया...

“मैं ठीक हूँ”

    वह दोस्त जो हर बार कहता था— “मैं ठीक हूँ” रात के करीब साढ़े ग्यारह बज रहे थे। समीर अपने कमरे की खिड़की के पास बैठा था। सामने शहर अपनी पूरी रफ्तार में भाग रहा था। सड़क पर गाड़ियाँ थीं, कुछ खिड़कियों में रोशनी थी, कुछ बालकनियों में लोग फोन पर बात कर रहे थे। लेकिन उसके कमरे में सन्नाटा था। उसने लैपटॉप बंद किया और जाने क्यों अपना पुराना फोन उठा लिया। फोन की स्क्रीन पर उंगली कुछ सेकंड रुकी रही। फिर उसने एक पुरानी चैट खोली। राघव। नाम देखते ही उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आई। चैट बहुत लंबी थी। सालों पुरानी। ऊपर स्क्रॉल किया तो उसे कॉलेज के दिनों के संदेश दिखाई देने लगे। छोटी-छोटी बातें। कभी किसी फिल्म पर बहस। कभी चाय के पैसे को लेकर झगड़ा। कभी बिना किसी कारण रात के दो बजे— “जाग रहा है?” और फिर उसी चैट में कुछ साल बाद के संदेश थे। समीर के। “भाई, बहुत परेशान हूँ।” “आज पापा से झगड़ा हो गया।” “समझ नहीं आ रहा बिजनेस संभालूँ या छोड़ दूँ।” और राघव के जवाब— “पहले सो जा। सुबह बात करेंगे।” “गुस्से में फैसला मत लेना।” “तू कर लेगा।” फिर समीर की नजर एक दूसरी लाइन पर जाकर रुक गई। हर कुछ संदे...