सिंधु नदी: इतिहास, सभ्यता और जल विवाद का व्यापक विश्लेषण
वैदिक काल में सिंधु का महत्व
उद्गम, लंबाई और भौगोलिक प्रवाह
सहायक नदियाँ और जल क्षेत्र
झेलम चिनाब रवि व्यास और सतलुज नामक पांच नदियां सिंध नदी की प्रमुख सहायक नदियां इनके अलावा कुर्रम, स्वाट, गुलम, तोची गिलगिट जैसी कई सहायक नदियां और भी है। नदी का एरिया लगभग 11 लाख 65000 वर्ग किलोमीटर में फैला है जिसका 47 प्रतिशत पाकिस्तान में जबकि 39 प्रतिशत भारत में इसके अलावा चीन में 8 प्रतिशत है कुछ हिस्सा अफगानिस्तान भी जाता है जो लगभग 6 प्रतिशत है।
सिंधु घाटी सभ्यता और प्राचीन नगर
इसके आसपास अनेक सभ्यताएं विकसित हुई हड़प्पा और मोहनजोदड़ो इसी नदी के पास फले फुले। एक रिपोर्ट के मुताबिक आज भी लगभग 30 करोड लोग इस नदी के आसपास रहते हैं और इसी के जरिए अपनी गुजर बसर करते हैं।
ऐतिहासिक पहचान और सांस्कृतिक भिन्नता
इतिहास के हिस्से से देखे तो सिंधु नदी हिंदुस्तान और हिंदुस्तानियों को अब ईरानियन से अलग करने वाली बॉर्डर लाइन के रूप में जानी जाती है जब सिकंदर अपनी सेना के साथ सिंधु नदी को पार करके भारत आया तो उसने यह देखा कि यहां की संस्कृित भाषा कपड़े रहन-सहन खानपान सब यूनान और ईरान देश से बिल्कुल अलग है।
वेद, पुराण और सिंधु का उल्लेख
सिंधु नदी का उल्लेख रामायण महाभारत के साथ ऋग्वेद मेंं में भी मिलता है। खासकर ऋग्वेद में बताई गयी नदियों में से सिंधु नदी को सबसे महत्वपूर्ण नदी के रूप में कई बार बताया गया है।
‘हिंदुस्तान’ नाम की उत्पत्ति
अब आपको जानकर शायद हैरानी होगी आज हम जो खुद को हिंदुस्तानी और देश को हिंदुस्तान नाम से जानते हैं वह भी इसी नदी की देन है सिंधु नदी के नाम के बारे में इतिहास में कहा गया है कि ईरान के लोग स को ह बोलते हैं जिस वजह से वह लोग सिंधु नदी को हिंदू कहते हैं इसी कारण सिंधु नदी को पार करने वाले लोगों को हिंदू कहा जाने लगा इसके बाद पारसी में भी सिंधु को हिंदू कह कर बुलाए जाने लगा इसके आधार पर भारत के लोगों को हिंदू और देश को हिंदुस्तान के नाम से जाना जाने लगा यानी एक तरह से हिंदू सिंधु का दिया हुआ नाम है।
सिंधु जल समझौता और भारत-पाकिस्तान जल विवाद
समझौते पर विवाद और राजनीतिक बहस
जबकि हर आतंकी हमले के बाद भारत की जनता में राजनीतिक पार्टियों इस समझौते को तोडक़र पाकिस्तान को सबक सिखाने की मांग करती है। जम्मू कश्मीर और पंजाब इस समझौते को भारत के हित के खिलाफ बताते है। जम्मू कश्मीर विधानसभा में तो इस समझौते को तोडऩे के लिए काफी पहले प्रस्ताव भी पास किया जा चुका है लेकिन इसके बाद भी भारत-पाकिस्तान को जाने वाले पानी पर कोई रोक नहीं लगाता है।
अंतरराष्ट्रीय नदी जल बंटवारे के सिद्धांत
वैसे इन सब के बीच यह जानना जरूरी है कि आखिर नदी के पानी पर देश कैसे हक जताते हैं या नदी का बंटवारा कैसे होता है । तो बता दे रायपेरियन देश को ही नदी के पानी पर हक होता है यानी वह देश जहां से नदी निकलती हो या जहां से उसका बड़ा हिस्सा बहता हो। किन्हीं दो या तीन देशों से बहने वाली नदियों को लेकर साल 1966 में फिनलैंड में समझौता हुआ था इसे हेलसें की गाइडलाइन कहते हैं इसी के आधार पर सारे इंटरनेशनल वॉटर डिस्प्यूट निपटाए जाते हैं ।
पाकिस्तान में सूखने की आशंका और कारण
ऐसे में कहा जा रहा है कि पाकिस्तान में यह नदी सूख रही है अब जिस पाकिस्तान की खेती का 90 प्रतिशत हिस्सा इस नदी के पानी पर डिपेंड करता है उस नदी के सूखने से पाकिस्तान की क्या हालत होगी आप अच्छे से समझ सकते हैं सुखने का सबसे बडा कारण खेती भी आती है। क्योंकि दुनिया भर का 30 प्रतिशत कॉटन भारत और पाकिस्तान के इस इलाके में होता है जिसे पैदा करने के लिए करीब 737 बिलियन गैलन पानी हर साल इस नदी से लिया जाता है जो की कितना ज्यादा है उसे आप ऐसे समझ सकते हैं कि इतने पानी से पूरी दिल्ली के हर घर में 2 साल से ज्यादा पानी को पहुंचाया जा सकता है ।
कपास, उद्योग और जल दोहन
अब आप सोच रहे होंगे अगर पाकिस्तान में कपास यानी कॉटन उगाने की वजह से नदी सूख रही है तो उसकी खेती बंद कर देनी चाहिए तो ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि पाकिस्तान की कुल इकोनामी ही टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज के दम पर चल रही है जहां कपड़े बनाने के लिए कॉटन सबसे जरूरी है इसके अलावा भी पाकिस्तान की इकोनॉमी में हिस्सेदारी बाकी के इंडस्ट्री भी ऐसी है कि वह इस नदी का पानी इस्तेमाल करने के साथ ही साथ भारी मात्रा में बर्बाद भी करती है इसलिए इस बात का डर है कि आने वाले समय में सिंधु नदी की हालत अगर ऐसी ही रही तो पाकिस्तान में खाने के लाले पड़ जाएंगे क्योंकि वहां पर पहले से आर्थिक बर्बादी का दौर चालू है।
भविष्य की आशंकाएँ और रणनीतिक प्रभाव
इसके अलावा पाकिस्तान के भारत के प्रति खराब रिश्ते की वजह से अगर किसी दिन भारत सरकार सिंधु जल संधि को खत्म करके बाकी की नदियों के पानी को भी सिंधु के जाने से रोक देता है तो ऐसे में सिर्फ सिंधु ही नहीं सुखेगी बल्कि पूरे पाकिस्तान में सूखा पड़ जाएगा और भारत उसे पानी का इस्तेमाल अपनी कश्मीर और आसपास के इलाकों को डेवलप करने में कर लेगा। ऐसा मगर कुछ भी होता है तो पाकिस्तान की आर्थिक तबाही निश्चित है।
मानवता की साझा विरासत के रूप में सिंधु
यह एक ऐसी विरासत है जो ना किसी एक देश की संपत्ति है और ना ही किसी धर्म से जुड़ी हुई है जिस तरह से सिंधु नदी ने सदियों से बिना भेदभाव किए हुए मानवता की सेवा की है आज मानवता का यह फर्ज बनता है कि वह इस महान नदी की ऐतिहासिक विरासत हो बचाए रखने के लिए हर संभव प्रयास कर सके।

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