चिट्ठी वाला डाकिया
वह बूढ़ा डाकिया
अब भी उसी पगडंडी पर चलता है,
बस उसके थैले में
चिट्ठियाँ कम
और स्मृतियाँ अधिक हैं।
चिट्ठी वाला डाकिया
वह बूढ़ा डाकिया
अब भी उसी पगडंडी पर चलता है,
बस उसके थैले में
चिट्ठियाँ कम
और स्मृतियाँ अधिक हैं।
बरगद की छाँव में
एक चौपाल हुआ करती थी...
कुछ चारपाइयाँ,
एक पुराना हुक्का,
और शाम होते ही
पूरा गाँव वहाँ बैठ जाया करता था।
कागज़ की नाव...
आज बरसों बाद...
बारिश हुई।
मैं खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया।
सामने सड़क पर
पानी बह रहा था।
एक छोटा-सा बच्चा
अपने दोनों हाथों से
कागज़ की नाव बनाकर
उसे पानी में छोड़ रहा था।
वह उसके पीछे-पीछे दौड़ रहा था...
और मैं...
अपनी जगह खड़ा रह गया।
जहाँ एक शिक्षक बच्चों को पढ़ाने आया था...
और बच्चों ने उसे जीवन पढ़ा दिया...
भाग - 1
गाँव के बच्चे - स्कूल की जान।
पहली घंटी
सुबह का समय। हल्की धूप खेतों पर उतर रही है। ओस की बूँदें अभी तक गेहूँ की बालियों से लिपटी हुई हैं। गाँव के बाहर पीपल के पेड़ पर बैठे तोते शोर मचा रहे हैं। दूर कहीं बैलों की घंटियाँ सुनाई देती हैं। और उसी कच्ची पगडंडी पर... एक युवक कंधे पर बैग टाँगे धीरे-धीरे गाँव की ओर बढ़ रहा है। वह है— नये मास्टरजी।
उन सभी कलाकारों को...
जो रंगों से चित्र बनाते रहे,
स्वरों से मौन को आवाज़ देते रहे,
मंच पर हँसी बाँटते रहे,
और अपने भीतर के आँसुओं को
तालियों की गूँज में छिपाते रहे।
कला सीखी नहीं जाती...
वह महसूस की जाती है।
और जो जितना अधिक महसूस करता है...
वह उतना ही बड़ा कलाकार बनता है।
लेकिन शायद...
उतना ही बड़ा उसका एकांत भी होता है।
"जीवन में कुछ रास्ते ऐसे होते हैं, जहाँ भीड़ बहुत होती है... लेकिन हर व्यक्ति अकेला चलता है। बारहवीं के बाद की उम्र भी कुछ ऐसी ही होती है।"