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लोकमाता अहिल्या बाई होल्कर 

प्रस्तावना

भारतीय इतिहास अनेक वीर रानियों और महारानियों की अद्भुत गाथाओं से भरा पड़ा है। लेकिन एक रानी ऐसी भी हैं जिनकी महानता इतिहास के पन्नों में कहीं दबकर रह गई। उनके बारे में लोग बहुत कम जानते हैं। यह कहानी एक ऐसी महान रानी की है जिन्हें जनता ने सम्मानपूर्वक लोकमाता और कॉटन क्वीन कहा। यह महान रानी थीं अहिल्याबाई होल्कर


जन्म और प्रारम्भिक जीवन

अहिल्याबाई का जन्म 1725 ई. में महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के चौंडी (जामखेड़) नामक गाँव में हुआ था। उनके पिता मांकोजी राव शिंदे उस गाँव के पाटिल (मुखिया) थे।उस समय समाज में लड़कियों की शिक्षा का प्रचलन नहीं था, लेकिन फिर भी उनके पिता ने उन्हें घर पर ही पढ़ना-लिखना सिखाया।अहिल्याबाई किसी राजघराने में पैदा नहीं हुई थीं, फिर भी एक साधारण कन्या से महारानी बनने तक का उनका सफर बहुत ही अद्भुत और प्रेरणादायक रहा।


मराठा साम्राज्य और होल्कर राज्य की स्थापना

औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगलों की शक्ति कमजोर होने लगी और दक्कन क्षेत्र में मराठाओं का प्रभाव बढ़ने लगा।मराठाओं के नाममात्र के राजा सतारा में रहते थे, जबकि वास्तविक सत्ता पेशवा के हाथों में होती थी जो पुणे से शासन चलाते थे। पेशवा की अनुमति से मराठा सरदार उत्तर भारत में भी अपने राज्य स्थापित कर रहे थे। मालवा और राजस्थान के कई क्षेत्रों पर मराठों का अधिकार हो गया। इन्हीं क्षेत्रों में से एक मालवा की जागीर पेशवा बाजीराव ने अपने सेनापति मल्हार राव होल्कर को 1730 ई. में दी। मल्हार राव ने इंदौर को अपनी राजधानी बनाकर होल्कर राज्य की स्थापना की।


अहिल्याबाई का विवाह

मल्हार राव होल्कर का एकमात्र पुत्र खंडेराव था, लेकिन वह अपने पिता की तरह पराक्रमी नहीं था और राजकाज में उसकी अधिक रुचि भी नहीं थी। इसलिए मल्हार राव ऐसी पुत्रवधू चाहते थे जो भविष्य में राज्य को संभाल सके। एक बार जब मल्हार राव चौंडी गाँव से गुजर रहे थे, तब उन्होंने गाँव के शिव मंदिर में एक छोटी बालिका को मधुर स्वर में आरती करते हुए देखा। वह बालिका अहिल्या थी। उसके शांत स्वभाव और तेजस्वी व्यक्तित्व से प्रभावित होकर मल्हार राव ने उसके पिता मांकोजी राव शिंदे से उसकी शादी अपने पुत्र खंडेराव से करने का प्रस्ताव रखा। इस प्रकार 8 वर्ष की आयु में अहिल्याबाई का विवाह खंडेराव होल्कर से हो गया और एक साधारण ग्रामीण कन्या होल्कर राज्य की बहू बन गई।


ससुराल जीवन और प्रशासनिक अनुभव

ससुराल आने के बाद अहिल्याबाई ने अपने मधुर व्यवहार से परिवार के सभी सदस्यों का दिल जीत लिया।उन्होंने अपनी सास से घर-परिवार के कार्य सीखे और ससुर मल्हार राव होल्कर से राज्य संचालन की शिक्षा प्राप्त की। कुछ समय बाद उन्हें एक पुत्र मालेराव और एक पुत्री मुक्ताबाई का जन्म हुआ। अहिल्याबाई के प्रभाव से उनके पति खंडेराव के स्वभाव में भी परिवर्तन आया और उन्होंने राज्य के कार्यों में रुचि लेना शुरू कर दिया।


जीवन की पहली बड़ी त्रासदी

1754 ई. में भरतपुर के राजा महाराजा सूरजमल जाट के विरुद्ध कुम्हेर के युद्ध में खंडेराव वीरगति को प्राप्त हो गए।

उस समय अहिल्याबाई की आयु केवल 29 वर्ष थी। पति की मृत्यु से दुखी होकर वह सती होना चाहती थीं, लेकिन उनके ससुर मल्हार राव ने उन्हें रोकते हुए कहा —“बेटी, अब तू ही मेरा बेटा है। यदि तू भी चली गई तो मुझे कौन संभालेगा?” इसके बाद अहिल्याबाई ने सती होने का विचार त्याग दिया और राज्य के कार्यों में पूरी लगन से लग गईं।


सत्ता की जिम्मेदारी

1766 ई. में मल्हार राव होल्कर का भी निधन हो गया। इसके बाद अहिल्याबाई ने अपने पुत्र मालेराव को राजगद्दी सौंप दी। लेकिन दुर्भाग्य से मालेराव भी अधिक समय तक जीवित नहीं रहे और 1767 ई. में मात्र 22 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। अपने इकलौते पुत्र की मृत्यु से अहिल्याबाई को गहरा आघात पहुँचा, लेकिन उन्होंने अपने व्यक्तिगत दुख को अलग रखकर प्रजा के हित के लिए राज्य की बागडोर अपने हाथों में ले ली।


षड्यंत्र और राज्य की रक्षा

उस समय होल्कर राज्य के एक अधिकारी चन्द्रचूड ने पेशवा के विश्वासपात्र राघोबा को पत्र लिखकर होल्कर राज्य पर अधिकार करने के लिए उकसाया।अहिल्याबाई को इस षड्यंत्र का पता चल गया। उन्होंने घोषणा कर दी कि राज्य की सत्ता अब उनके हाथ में है।उन्होंने सेनापति तुकोजी राव होल्कर के सहयोग से सेना तैयार की और यहाँ तक कि महिलाओं की सेना भी बनाई।उन्होंने राघोबा को संदेश भेजा कि यदि उनकी सेना शिप्रा नदी पार करेगी तो युद्ध होगा। अहिल्याबाई की दृढ़ता देखकर राघोबा ने आक्रमण का विचार त्याग दिया और इस प्रकार अहिल्याबाई ने अपनी बुद्धिमत्ता से राज्य की रक्षा कर ली।


कुशल शासन व्यवस्था

अहिल्याबाई के शासनकाल में राज्य में शांति और समृद्धि थी।

उन्होंने

  • डाकुओं और पिंडारियों का आतंक समाप्त किया

  • भील और गोंड जैसी जनजातियों को संरक्षण दिया

  • यात्रियों की सुरक्षा के लिए उन्हें मार्गों का रक्षक बनाया

उन्होंने मार्गों के किनारे

  • छायादार वृक्ष लगवाए

  • कुओं का निर्माण कराया

  • यात्रियों के लिए धर्मशालाएँ बनवाईं।


महेश्वर को राजधानी बनाना

अहिल्याबाई ने इंदौर का राजमहल छोड़कर महेश्वर में एक साधारण घर में रहना शुरू किया।

उनका घर हमेशा गरीबों और पीड़ितों के लिए खुला रहता था। लोग अपनी समस्याएँ लेकर उनके पास आते थे और वह परिवार के बड़े सदस्य की तरह उनकी समस्याएँ सुनकर समाधान करती थीं।

महेश्वर उनकी नई राजधानी बन गई और यह नगर कला, साहित्य और स्थापत्य के लिए प्रसिद्ध हो गया।


महेश्वरी साड़ी उद्योग

अहिल्याबाई ने महेश्वर में कपड़ा उद्योग की स्थापना की, जो आज महेश्वरी साड़ी के लिए पूरे भारत में प्रसिद्ध है।

इसी कारण उन्हें कई बार कॉटन क्वीन भी कहा जाता है।


धार्मिक और सांस्कृतिक योगदान

अहिल्याबाई बचपन से ही धार्मिक प्रवृत्ति की थीं।

उन्होंने पूरे भारत में अनेक धार्मिक कार्य करवाए।

उन्होंने

  • हिमालय से दक्षिण भारत तक अनेक तीर्थस्थलों का जीर्णोद्धार कराया

  • मंदिरों की मरम्मत करवाई

  • कुएँ और धर्मशालाएँ बनवाईं

उन्होंने कई प्रसिद्ध मंदिरों का पुनर्निर्माण कराया, जैसे—

  • बद्रीनाथ

  • द्वारका

  • सोमनाथ

  • काशी विश्वनाथ मंदिर

काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण उन्होंने 1780 ई. में करवाया था, जिसे 1669 में औरंगजेब ने नष्ट कर दिया था


मृत्यु

लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर ने अपने जीवन में 100 से अधिक मंदिर और 30 से अधिक धर्मशालाएँ तथा कुएँ बनवाए।

13 अगस्त 1795 को यह महान शासिका इस संसार से विदा हो गईं, लेकिन उनकी कीर्ति और आदर्श आज भी जीवित हैं।


निष्कर्ष

अहिल्याबाई होल्कर केवल भारत ही नहीं बल्कि विश्व में प्रसिद्ध थीं। उनकी तुलना इंग्लैंड की क्वीन एलिज़ाबेथ और डेनमार्क की क्वीन मार्गरेट प्रथम जैसी महान महिलाओं से की जाती है।

कठिन परिस्थितियों में होल्कर राज्य को स्थिरता और समृद्धि देने वाली लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर का नाम मध्यप्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे भारत के इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय है।

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