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मुझे लगा, तू व्यस्त होगा....





सुबह के करीब नौ बजे थे। राघव ऑफिस जाने की जल्दी में था। एक हाथ में चाय का कप था और दूसरे हाथ में मोबाइल। मोबाइल की स्क्रीन पर लगातार नोटिफिकेशन आ रहे थे। ई-मेल। ऑफिस के मैसेज। क्लाइंट के कॉल। आज एक बड़ी मीटिंग थी और राघव किसी भी हालत में देर नहीं करना चाहता था।

तभी फोन बजा। स्क्रीन पर नाम था—

माँ।

राघव ने फोन की तरफ देखा। उसने कॉल उठाने के लिए उंगली बढ़ाई, लेकिन तभी लैपटॉप पर एक जरूरी मैसेज आ गया। उसने फोन साइलेंट कर दिया।

“बाद में कर लूँगा…”

उसने खुद से कहा। कुछ देर बाद फिर फोन आया। इस बार भी वही नाम।

माँ।

राघव ने फोन उठाया।

“हाँ माँ?”

दूसरी तरफ से कुछ क्षण तक कोई आवाज नहीं आई।

फिर माँ बोली—

“बेटा… निकल गया क्या?”

“बस निकल रहा हूँ माँ।”

“अच्छा…”

“कुछ काम था?”

“नहीं।”

थोड़ी देर चुप्पी रही।

फिर माँ ने धीरे से कहा—

“मुझे लगा, तू व्यस्त होगा।”

राघव ने घड़ी देखी।

“हाँ माँ, आज थोड़ा काम ज्यादा है।”

“तो रख बेटा। देर हो जाएगी।”

“शाम को बात करता हूँ।”

“हाँ।”

फोन कट गया। राघव ने मोबाइल जेब में रख लिया। उसे लगा, माँ ने बस यूँ ही फोन किया होगा। लेकिन वह नहीं जानता था कि माँ ने फोन इसलिए नहीं किया था कि उसे कोई काम था। वह सिर्फ यह जानना चाहती थी कि उसका बेटा ठीक है।


राघव और उसकी माँ का रिश्ता बचपन से ही बहुत गहरा था। पिता का देहांत राघव की कॉलेज की पढ़ाई के समय हो गया था। उस समय घर में पैसे नहीं थे। राघव ने पढ़ाई छोड़कर नौकरी करने की बात कही थी। माँ ने साफ मना कर दिया था।

“तू पढ़ेगा।”

“लेकिन माँ, घर कैसे चलेगा?”

“घर मैं चला लूँगी।”

“कैसे?”

माँ मुस्कुरा दी थी।

“जैसे अब तक चलाया है।”

राघव को बाद में पता चला कि माँ ने अपने गहनों में बची आखिरी चूड़ियाँ बेच दी थीं।

लेकिन जब उसने पूछा तो माँ ने हँसकर कहा था—

“पुरानी हो गई थीं।”

राघव जानता था कि वे पुरानी नहीं हुई थीं। माँ बस अपने बेटे के सपने के सामने अपनी चीजों की कीमत भूल गई थी।

राघव पढ़ा। शहर गया। समय बीतता गया। राघव की नौकरी लग गई, फिर प्रमोशन हुआ और कुछ साल बाद उसकी शादी भी हो गई। फिर अपना फ्लैट। धीरे-धीरे जिंदगी बदलती गई। माँ वहीं रह गई। उसी पुराने घर में। उसी आँगन में। उसी कमरे में जहाँ कभी राघव की किताबें बिखरी रहती थीं।

शुरुआत में राघव रोज फोन करता था। फिर दो दिन में। फिर कभी-कभी। माँ फोन करती तो वह बात करता। लेकिन उसकी बातचीत छोटी होती जा रही थी।

“हाँ माँ।”

“खाना खा लिया।”

“हाँ।”

“काम कैसा चल रहा है?”

“ठीक।”

“थक जाता होगा?”

“थोड़ा।”

“अच्छा।”

और फिर—

“चल माँ, बाद में बात करता हूँ।”

माँ कभी रोकती नहीं थी।

“ठीक है बेटा।”

बस इतना कहती। कभी-कभी वह फोन रखने से पहले कुछ कहने की कोशिश करती।

“राघव…”

“हाँ?”

“कुछ नहीं।”

“बोलो ना।”

“नहीं… रहने दे।”

“ठीक है माँ।”

और फोन कट जाता।

राघव को लगता—

माँ को शायद कोई खास बात नहीं थी।

माँ को लगता—

बेटा शायद सच में बहुत व्यस्त है। दोनों अपनी-अपनी जगह सही थे। बस उनके बीच जो चीज कम होती जा रही थी…

वह थी समय। एक रविवार माँ ने फोन किया। 

“बेटा, इस बार होली पर आ रहा है?”

राघव लैपटॉप पर काम कर रहा था।

“माँ, कोशिश करूँगा।”

“कोशिश?”

“हाँ, काम बहुत है।”

“अच्छा…”

माँ थोड़ी देर चुप रही।

“अगर नहीं आ पाए तो कोई बात नहीं।”

“माँ…”

“सच में।”

“देखता हूँ।”

“ठीक है।”

फोन रखने के बाद माँ रसोई में गई। उसने पहले से खरीदा हुआ बेसन वापस डिब्बे में रख दिया। वह राघव के पसंद के लड्डू बनाने वाली थी।

उसने खुद से कहा—

“शायद नहीं आ पाएगा।”

और फिर धीमे से मुस्कुराई।

“मुझे लगा, वह व्यस्त होगा।”

होली पर राघव नहीं जा पाया। काम सचमुच बहुत था। लेकिन उस शाम उसने माँ को वीडियो कॉल किया। माँ ने नए कपड़े पहने थे।

“अरे माँ! आपने तो नई साड़ी पहनी है।”

“हाँ।”

“कहाँ से ली?”

माँ हँसी।

“पिछले साल वाली है।”

राघव कुछ कह नहीं पाया। माँ ने कैमरा थोड़ा दूर किया।

“देख, तेरे लिए गुजिया बनाई थी।”

“अच्छा?”

“हाँ।”

“खाई?”

“नहीं।”

“क्यों?”

“तू नहीं आया ना…”

राघव मुस्कुराया।

“माँ, मैं अगली बार आऊँगा।”

“हाँ।”

फिर माँ बोली—

“चल अब काम कर।”

“माँ…”

“क्या?”

“तुम अकेली हो?”

माँ ने कुछ पल उसकी तरफ देखा।

फिर मुस्कुराकर बोली—

“अकेली कहाँ हूँ?”

“कौन है?”

“तेरे पापा हैं।”

राघव चुप हो गया। माँ ने दीवार पर लगी पिता की तस्वीर की तरफ देखा।

“बस बातें करती हूँ उनसे।”

फिर उसने बात बदल दी।

“अच्छा, तू खाना खा लेना।”

कुछ महीने ऐसे ही गुजर गए। माँ और बेटे की जिंदगी अपनी-अपनी गति से चलती रही। राघव की जिंदगी तेज थी। बहुत तेज। सुबह ऑफिस। दिनभर मीटिंग। शाम को ट्रैफिक। रात को लैपटॉप। और उसी के बीच कभी माँ का फोन। 

माँ की जिंदगी धीमी थी। सुबह पूजा। थोड़ा घर का काम। दोपहर की चुप्पी। शाम को पड़ोस की दो औरतों से थोड़ी बातचीत। और रात में टीवी की धीमी आवाज। फिर भी माँ खुश रहती थी। कम से कम राघव को ऐसा ही लगता था।

एक दिन राघव को ऑफिस से लौटते समय माँ का फोन आया।

“हाँ माँ?”

“बेटा…”

आवाज कुछ कमजोर थी।

“हाँ?”

“आज थोड़ा चक्कर आया था।”

राघव तुरंत गंभीर हो गया।

“क्या?”

“कुछ नहीं।”

“डॉक्टर को दिखाया?”

“दिखा दूँगी।”

“माँ, अभी जाओ।”

“अरे रात हो गई है।”

“कल सुबह जाना।”

“हाँ।”

कुछ पल चुप्पी रही।

फिर माँ बोली—

“तू परेशान मत होना।”

“माँ, तुम अकेली रहती हो। मुझे कैसे पता चलेगा?”

“मैं ठीक हूँ।”

“फिर भी।”

“अच्छा, तू खाना खा ले।”

राघव चिढ़ गया।

“माँ, हर बात में खाना क्यों ले आती हो?”

माँ कुछ सेकंड चुप रही।

फिर बहुत सहजता से बोली—

“बेटा… माँ हूँ।”

राघव को अपनी आवाज पर पछतावा हुआ।

“सॉरी माँ।”

माँ हँस दी।

“कोई बात नहीं।”

फिर थोड़ी देर बाद बोली—

“मुझे लगा, तू व्यस्त होगा… इसलिए ज्यादा परेशान नहीं किया।”

राघव ने उस वाक्य को सुना। लेकिन उस दिन भी उसका मतलब पूरी तरह समझ नहीं पाया।

अगले दिन माँ डॉक्टर के पास गई। जाँच हुई। डॉक्टर ने कहा कि कमजोरी बहुत बढ़ गई है। कुछ दवाइयाँ दीं।

आराम करने को कहा। माँ घर लौट आई।

राघव को उसने सिर्फ इतना बताया—

“दवाई मिल गई है।”

“रिपोर्ट?”

“ठीक है।”

माँ ने पूरी बात नहीं बताई। क्योंकि उसे डर था कि बेटा सब छोड़कर आ जाएगा। और वह नहीं चाहती थी कि उसके कारण बेटे का काम रुके।

एक रात राघव की पत्नी ने पूछा—

“तुम माँ को अपने पास क्यों नहीं बुला लेते?”

राघव ने कहा—

“माँ आएँगी नहीं।”

“क्यों?”

“उन्हें अपना घर पसंद है।”

पत्नी ने कुछ देर उसे देखा। फिर बोली—

“या शायद उन्हें लगता है कि तुम्हारे पास उनके लिए समय नहीं है।”

राघव चुप हो गया। उसने कोई जवाब नहीं दिया। लेकिन उस रात पहली बार उसने माँ की कही हुई बात को दूसरे अर्थ में सोचा।

“मुझे लगा, तू व्यस्त होगा…”

क्या माँ सच में समझती थी कि वह व्यस्त है?

या वह खुद को यह समझाकर जी रही थी कि उसे बेटे से कुछ माँगना नहीं चाहिए?

कुछ दिनों बाद राघव को अचानक माँ का फोन आया। फोन उठाते ही दूसरी तरफ से पड़ोस की शांति चाची की आवाज आई।

“बेटा…”

राघव का दिल धक से रह गया।

“चाची? माँ कहाँ हैं?”

“बेटा, घबराना मत।”

“क्या हुआ?”

“तुम्हारी माँ की तबीयत ज्यादा खराब हो गई थी। मैं उन्हें अस्पताल ले आई हूँ।”

राघव के हाथ से फोन लगभग छूट गया।

“क्या?”

“डॉक्टर देख रहे हैं।”

“मैं आ रहा हूँ।”

“हाँ बेटा।”

उस रात राघव ने पहली बार अपने ऑफिस के मैसेज नहीं देखे। लैपटॉप बंद किया। टिकट देखी। सुबह की पहली फ्लाइट पकड़ी।

अस्पताल में माँ बेड पर लेटी थी। राघव ने उसे देखा तो उसकी आँखें भर आईं। माँ ने उसे देखते ही मुस्कुराने की कोशिश की।

“अरे… तू आ गया?”

राघव उसके पास बैठ गया।

“हाँ।”

“काम छोड़कर?”

“हाँ।”

माँ ने तुरंत कहा—

“तुझे नहीं आना चाहिए था।”

“क्यों?”

“काम होगा।”

राघव ने उसकी तरफ देखा।

“माँ…”

“हूँ?”

“इस समय भी तुम्हें मेरे काम की चिंता है?”

माँ चुप हो गई। राघव ने उसका हाथ पकड़ लिया। बहुत ठंडा था।

“तुमने मुझे बताया क्यों नहीं कि तबीयत इतनी खराब है?”

माँ ने नजरें झुका लीं।

“ऐसे ही थोड़ा ज्यादा हो गया था।”

“मुझे फोन क्यों नहीं किया?”

माँ ने धीरे से कहा—

“किया था।”

राघव चौंका।

“कब?”

“उस रात।”

“मुझे तो नहीं आया।”

माँ मुस्कुराई।

“शायद फोन नहीं लगा होगा।”

फिर थोड़ी देर बाद बोली—

“फिर सोचा… तू व्यस्त होगा।”

राघव की आँखों से आँसू निकल आए। इस बार उस वाक्य में उसे शिकायत सुनाई नहीं दी। उसे समझौता सुनाई दिया।

जैसे माँ कह रही हो—

“मुझे पता है बेटा, तेरी अपनी जिंदगी है। मैं समझती हूँ। इसलिए मैंने खुद को रोक लिया।”

राघव ने माँ का हाथ अपने माथे से लगा लिया।

“माँ…”

उसकी आवाज काँप रही थी।

“मैं तुम्हारे लिए कभी इतना व्यस्त नहीं था…”

माँ ने हल्की मुस्कान दी।

“अब मत कह।”

“क्यों?”

“क्योंकि माँ सब समझती है।”

राघव रो पड़ा। माँ कुछ दिनों में ठीक हुई। डॉक्टर ने कहा कि अब उसे अकेले नहीं रहना चाहिए। राघव ने उसी दिन फैसला कर लिया।

“माँ, अब तुम मेरे साथ चलोगी।”

माँ ने तुरंत मना कर दिया।

“नहीं।”

“क्यों?”

“मैं अपने घर में ठीक हूँ।”

“नहीं हो।”

“मैं पड़ोस में सबके साथ हूँ।”

“माँ…”

“तेरे घर में मैं क्या करूँगी?”

राघव ने उसकी तरफ देखा।

“मेरे घर में रहोगी।”

“तुम दोनों की अपनी जिंदगी है।”

“और तुम मेरी जिंदगी नहीं हो क्या?”

माँ चुप हो गई। राघव ने उसका हाथ पकड़ा।

“मैंने बहुत साल यह सोचकर निकाल दिए कि तुम ठीक हो।”

“अब मैं अपनी आँखों से देखना चाहता हूँ कि तुम ठीक हो।”

माँ ने धीरे से कहा—

“बेटा, मैं तुम्हें परेशान नहीं करना चाहती।”

राघव की आँखों में आँसू आ गए।

“माँ…”

“हूँ?”

“तुमने पूरी जिंदगी मुझे पालने में बिताई।”

“अब अगर मैं तुम्हें दो वक्त की दवा और एक कप चाय दे दूँ तो क्या मैं परेशान हो जाऊँगा?”

माँ कुछ नहीं बोली।

राघव ने कहा—

“तुमने मेरी हर जरूरत को अपनी जरूरत से पहले रखा।”

“अब मेरी बारी है।”

माँ की आँखें भर आईं।

“लेकिन मेरा घर…”

राघव मुस्कुराया।

“वह घर रहेगा।”

“ताला लगा देंगे।”

“जब मन होगा चलेंगे।”

“और मेरी तुलसी?”

“उसे भी ले चलेंगे।”

“तेरे पापा की तस्वीर?”

“वह भी।”

माँ चुपचाप उसे देखती रही।

फिर धीरे से बोली—

“ठीक है।”

कुछ दिनों बाद माँ राघव के घर आ गई। राघव ने उसके लिए अलग कमरा तैयार किया था। खिड़की के पास एक आरामकुर्सी। पास में छोटी-सी मेज। दवाइयों का डिब्बा। एक रेडियो। और खिड़की के बाहर मिट्टी का गमला। जिसमें उसकी वही तुलसी लगी थी। माँ ने कमरे में कदम रखा। चारों तरफ देखा।

फिर बोली—

“तूने इतना सब कब किया?”

राघव मुस्कुराया।

“जब तुम अस्पताल में थीं।”

माँ ने खिड़की के पास जाकर तुलसी को छुआ।

“यह तो मेरी वाली है।”

“हाँ।”

“कैसे लाई?”

“चोरी करके।”

माँ हँस पड़ी।

कई दिनों बाद उसकी हँसी इतनी खुली थी।

अब राघव की जिंदगी वही थी। ऑफिस। मीटिंग। काम। भागदौड़। लेकिन एक चीज बदल गई थी। घर लौटते समय उसे पता होता था कि कोई उसका इंतजार कर रहा है। कभी माँ दरवाजे पर बैठी मिलती। कभी खिड़की से देखती।

कभी पूछती—

“बहुत थक गया?”

राघव कहता—

“हाँ।”

माँ कहती—

“बैठ।”

वह चाय बनाकर लाती।

“आज अदरक ज्यादा डाल दी।”

राघव कप लेते हुए मुस्कुराता।

“जानती हो माँ, ऑफिस की कॉफी से अच्छी है।”

माँ कहती—

“क्योंकि उसमें कॉफी कम और माँ ज्यादा है।”

दोनों हँस पड़ते।

एक शाम राघव बहुत देर से घर आया। रात के करीब दस बज रहे थे। माँ अभी तक जाग रही थी।

राघव ने कहा—

“माँ, सोई क्यों नहीं?”

“तू आया नहीं था।”

“तुम्हें इंतजार करने की जरूरत नहीं है।”

माँ मुस्कुराई।

“अच्छा?”

“हाँ।”

“फिर खाना खाया?”

राघव ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

माँ उठने लगी। राघव ने रोक दिया।

“तुम बैठो।”

“मैं खाना लगा देती हूँ।”

“मैं लगा लूँगा।”

“तू थका है।”

“और तुम?”

माँ मुस्कुरा दी।

“मैं माँ हूँ।”

राघव कुछ क्षण उसे देखता रहा। फिर उसके पास बैठ गया।

“माँ…”

“हूँ?”

“एक बात पूछूँ?”

“पूछ।”

“तुम इतने साल अकेले कैसे रह लीं?”

माँ ने कुछ देर सोचा।

फिर बोली—

“अकेली कहाँ थी?”

“फिर?”

“तू था।”

राघव की आँखें नम हो गईं।

“लेकिन मैं तो पास नहीं था।”

माँ ने उसकी तरफ देखा।

“पास होने के लिए हर वक्त पास बैठना जरूरी नहीं होता बेटा।”

“माँ…”

“तू अपनी जिंदगी जी रहा था।”

“मैं समझती थी।”

फिर माँ ने धीरे से कहा—

“बस कभी-कभी मन करता था कि तू बिना किसी काम के फोन कर ले।”

राघव की आँखों से आँसू बहने लगे।

“और जब मैं फोन नहीं करता था?”

माँ ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

“तो खुद को समझा लेती थी।”

“क्या कहती थीं खुद से?”

माँ ने कुछ क्षण उसकी तरफ देखा।

फिर बोली—

“मुझे लगा… तू व्यस्त होगा।”

राघव ने माँ का हाथ पकड़ लिया।

“अब अगर कभी ऐसा लगे ना…”

“तो?”

“सीधे मेरे कमरे में आ जाना।”

माँ हँस दी।

“रात के दो बजे?”

“हाँ।”

“सुबह के चार बजे?”

“हाँ।”

“ऑफिस के बीच में?”

“हाँ।”

“मीटिंग में?”

“हाँ।”

माँ ने हँसते हुए कहा—

“पागल हो गया है।”

राघव ने उसका हाथ दबाया।

“बहुत देर से समझदार हुआ हूँ।”

कुछ महीनों बाद माँ की तबीयत काफी बेहतर हो गई। वह सुबह छत पर जाती। तुलसी में पानी देती। राघव के लिए नाश्ता बनाती। कभी उसकी पत्नी के साथ बाजार चली जाती। कभी अपने पुराने घर की बातें करती। अब वह अकेली नहीं थी। और राघव भी शायद पहली बार समझ पाया था कि माँ को अपने पास लाने के लिए उसके पास कोई बड़ी वजह होना जरूरी नहीं था।

माँ होना ही काफी वजह थी।

राघव की पत्नी भी माँ का बहुत ध्यान रखती थी। वह सुबह उनके लिए चाय बनाती और दवाइयाँ समय पर देती।

एक दिन माँ ने उसे रसोई में अकेले काम करते देखा तो धीरे से बोली—

“बहू, तू इतना काम मत किया कर। मैं अब ठीक हूँ, थोड़ा-बहुत कर लिया करूँगी।”

बहू मुस्कुराकर बोली—

“माँ, आप काम करने के लिए नहीं, हमारे साथ रहने के लिए आई हैं।”

माँ ने कहा—

“लेकिन बेटा ऑफिस से थककर आता है। मैं नहीं चाहती कि तुम दोनों को मेरी वजह से परेशानी हो।”

बहू ने उनका हाथ पकड़ लिया।

“आप परेशानी नहीं हैं माँ।”

“फिर?”

“आप इस घर की जिम्मेदारी नहीं, इस घर की रौनक हैं।”

माँ की आँखें भर आईं।

“तू सच कह रही है?”

“हाँ माँ।”

“राघव को तो मेरी वजह से बहुत काम करना पड़ता है।”

बहू हल्के से हँस दी।

“राघव को काम तो पहले भी बहुत करना पड़ता था। अब बस उसे घर आने की जल्दी रहती है।”

माँ ने मुस्कुराकर पूछा—

“सच?”

“हाँ। पहले ऑफिस से लौटकर सीधे कमरे में चला जाता था। अब दरवाजे से ही आवाज लगाता है—‘माँ, चाय मिलेगी?’”

माँ हँस पड़ी।

“वह तो बचपन से ऐसा ही है।”

बहू ने कहा—

“तो फिर उसे बचपन वाली चाय मिलती रहनी चाहिए।”

माँ ने बहू को अपने पास खींच लिया।

“तू बहू नहीं है मेरी बेटी है।”

बहू ने उनके कंधे पर सिर रख दिया।

“और आप मेरी माँ।”

उसी समय राघव दरवाजे पर खड़ा यह सब सुन रहा था। उसने मुस्कुराकर कहा—

“अच्छा, मेरी शिकायतें हो रही हैं?”

माँ ने तुरंत कहा—

“तेरी नहीं, तेरी आदतों की।”

बहू हँसते हुए बोली—

“और आपकी माँ ने बताया कि आप बचपन से ही चाय के लिए परेशान करते हैं।”

राघव ने माँ की तरफ देखा।

“माँ, आपने मेरी सारी पोल खोल दी?”

माँ ने मुस्कुराकर कहा—

“माँ से कुछ छिपता है क्या?”

राघव उनके पास बैठ गया।

“अच्छा, अब दोनों मिलकर मुझे डाँट लो।”

बहू ने चाय का कप उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा—

“डाँटेंगे नहीं, बस इतना कहेंगे कि अब माँ का फोन कभी मत काटना।”

राघव ने माँ की तरफ देखा। फिर गंभीर होकर बोला—

“अब कभी नहीं काटूँगा।”

माँ ने धीरे से कहा—

“मुझे पता है बेटा।”

बहू ने मुस्कुराकर पूछा—

“माँ, अगर राघव फिर कभी कहे कि वह व्यस्त है तो?”

माँ ने राघव की तरफ देखा और हँसते हुए बोली—

“तो मैं कहूँगी—बेटा, पहले अपनी माँ से बात कर, फिर दुनिया का काम करना।”

राघव ने माँ का हाथ पकड़ लिया।

“और अगर आप फिर कहेंगी—‘मुझे लगा, तू व्यस्त होगा’?”

माँ ने उसकी हथेली थपथपाई।

“तो बहू तुझे डाँट देगी।”

बहू ने तुरंत कहा—

“नहीं माँ, मैं तो पहले आपको फोन दूँगी और कहूँगी—‘आपका बेटा व्यस्त नहीं है, बस उसे याद दिलाने की जरूरत है।’”

तीनों हँस पड़े। उस हँसी में माँ का पुराना अकेलापन धीरे-धीरे घुल गया।

एक दिन ऑफिस जाते समय माँ ने उसे आवाज दी—

“राघव!”

“हाँ माँ?”

“आज जल्दी आना।”

राघव ने पूछा—

“क्यों?”

“खीर बनाई है।”

“ठीक है।”

“और सुन…”

“हाँ?”

माँ कुछ क्षण चुप रही।

फिर मुस्कुराकर बोली—

“अगर देर हो जाए तो कोई बात नहीं।”

राघव ने उसके चेहरे को गौर से देखा।

“नहीं माँ।”

“क्या?”

“आज देर नहीं करूँगा।”

माँ मुस्कुराई।

राघव दरवाजे से बाहर निकल गया। कुछ कदम चलकर वह फिर वापस आया।

“क्या हुआ?”

माँ ने पूछा।

राघव ने उसे गले लगा लिया।

“कुछ नहीं।”

“फिर?”

“बस…”

उसने माँ के कंधे पर सिर रख दिया।

“मन किया।”

माँ ने उसके सिर पर हाथ फेर दिया।

“जा अब।”

“हाँ।”

“ऑफिस के लिए देर हो जाएगी।”

राघव दरवाजे की तरफ बढ़ा।

फिर पीछे मुड़कर बोला—

“माँ?”

“हाँ?”

“आज फोन करने की जरूरत नहीं है।”

माँ मुस्कुराई।

“क्यों?”

“क्योंकि मैं खुद फोन करूँगा।”

माँ ने कुछ नहीं कहा। बस उसकी तरफ देखती रही। दरवाजा बंद हुआ। राघव बाहर चला गया। और माँ पहली बार उस घर में अकेली नहीं खड़ी थी।

क्योंकि अब उसे पता था—

उसका बेटा सिर्फ उसकी जरूरत के समय नहीं आएगा। वह उसके बिना किसी वजह के भी आएगा। शायद यही माँ चाहती थी। उसे महंगे तोहफे नहीं चाहिए थे। उसे बड़ा घर नहीं चाहिए था। उसे यह भी नहीं चाहिए था कि बेटा उसके लिए अपनी जिंदगी छोड़ दे। वह बस चाहती थी कि उसकी जिंदगी में उसके लिए एक छोटी-सी जगह बची रहे।

इतनी-सी…

जहाँ वह बिना झिझक कह सके—

“बेटा, आज मेरे पास बैठ जा।”

और बेटा यह सोचकर न देखे कि—

“मेरे पास समय है या नहीं।”

बल्कि बस इतना कहे—

“हाँ माँ… बैठता हूँ।”

क्योंकि माँ का प्यार कभी हमारी जिंदगी पर बोझ नहीं होता। हम ही अपनी जिंदगी की भागदौड़ में उसे बोझ समझने लगते हैं।

और माँ…

वह तो तब भी हमें दोष नहीं देती। वह बस चुपचाप अपने मन को समझा लेती है—

“मुझे लगा, तू व्यस्त होगा…”

लेकिन कभी-कभी उस एक वाक्य के पीछे माँ की बहुत सारी अनकही बातें छिपी होती हैं—

मुझे तेरी याद आ रही थी। मेरा मन घबरा रहा था। आज घर बहुत खाली लग रहा था। मुझे तुझसे बात करनी थी।

मुझे तेरी जरूरत थी। बस माँ कह नहीं पाती। क्योंकि माँ अपने बच्चों से उनका समय माँगते हुए भी डरती है।

उसे डर लगता है कि कहीं उसकी जरूरत…

उसके बच्चे के लिए परेशानी न बन जाए। इसलिए अगर कभी माँ फोन करे और उसके पास कहने को कोई खास बात न हो…

तो फोन मत काटिए।

अगर वह पूछे—

“खाना खाया?”

तो सिर्फ “हाँ” कहकर मत रखिए। कभी उससे भी पूछिए—

“माँ, तुमने खाया?”

अगर वह कहे—

“कुछ नहीं, बस ऐसे ही फोन किया था…”

तो समझिए…

शायद वह सच में किसी काम के लिए फोन नहीं कर रही। शायद उसे बस आपकी आवाज सुननी है। और अगर कभी वह खुद ही कह दे—

“मुझे लगा, तू व्यस्त होगा…”

तो उसे सफाई मत दीजिए। बस इतना कह दीजिए—

“माँ, अगली बार ऐसा मत सोचना।”

क्योंकि जिंदगी की सबसे बड़ी व्यस्तता यही है…

कि हम उन लोगों के लिए समय नहीं निकाल पाते,

जिन्होंने हमारी पूरी जिंदगी… हमारे लिए निकाल दी.....

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