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“मैं ठीक हूँ”

 

 



वह दोस्त जो हर बार कहता था— “मैं ठीक हूँ”

रात के करीब साढ़े ग्यारह बज रहे थे। समीर अपने कमरे की खिड़की के पास बैठा था। सामने शहर अपनी पूरी रफ्तार में भाग रहा था। सड़क पर गाड़ियाँ थीं, कुछ खिड़कियों में रोशनी थी, कुछ बालकनियों में लोग फोन पर बात कर रहे थे। लेकिन उसके कमरे में सन्नाटा था। उसने लैपटॉप बंद किया और जाने क्यों अपना पुराना फोन उठा लिया। फोन की स्क्रीन पर उंगली कुछ सेकंड रुकी रही। फिर उसने एक पुरानी चैट खोली।

राघव।

नाम देखते ही उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आई।

चैट बहुत लंबी थी। सालों पुरानी। ऊपर स्क्रॉल किया तो उसे कॉलेज के दिनों के संदेश दिखाई देने लगे। छोटी-छोटी बातें। कभी किसी फिल्म पर बहस। कभी चाय के पैसे को लेकर झगड़ा।

कभी बिना किसी कारण रात के दो बजे—

“जाग रहा है?”

और फिर उसी चैट में कुछ साल बाद के संदेश थे।

समीर के।

“भाई, बहुत परेशान हूँ।”

“आज पापा से झगड़ा हो गया।”

“समझ नहीं आ रहा बिजनेस संभालूँ या छोड़ दूँ।”

और राघव के जवाब—

“पहले सो जा। सुबह बात करेंगे।”

“गुस्से में फैसला मत लेना।”

“तू कर लेगा।”

फिर समीर की नजर एक दूसरी लाइन पर जाकर रुक गई। हर कुछ संदेशों के बाद वह पूछता था—

“और तू बता?”

और राघव का जवाब लगभग हर बार एक जैसा था—

“मैं ठीक हूँ भाई।”

समीर ने स्क्रीन को कुछ देर तक देखा। फिर फोन मेज पर रख दिया।

उस रात पहली बार उसे लगा—

शायद वह इतने सालों से अपने दोस्त की बात सुनता रहा था, लेकिन उसे समझा कभी नहीं।


समीर और राघव की दोस्ती में सबसे खूबसूरत बात यह थी कि दोनों बिल्कुल अलग थे। समीर एक बड़े कारोबारी परिवार से था। उसके पिता का शहर में अच्छा कारोबार था। घर बड़ा था। गाड़ी थी। पैसे की कभी ऐसी चिंता नहीं हुई कि अगले महीने का किराया कैसे जाएगा।

राघव एक छोटे शहर के साधारण परिवार से आया था। उसके पिता सरकारी नौकरी से रिटायर हुए थे। माँ घर संभालती थीं। घर में जरूरत की हर चीज थी, लेकिन अतिरिक्त कुछ नहीं। दोनों की मुलाकात कॉलेज की लाइब्रेरी में हुई थी। पहली बातचीत भी बहुत साधारण थी। समीर ने राघव से उसकी किताब माँगी थी।

राघव ने किताब देते हुए कहा था—

“पढ़कर वापस कर देना।”

समीर हँसा था।

“अगर नहीं की तो?”

“तो अगली बार नहीं दूँगा।”

“इतना भरोसा है कि मैं वापस कर दूँगा?”

राघव ने उसकी तरफ देखा था।

“किताब की बात है। दोस्ती होती तो शायद भरोसा कर लेता।”

समीर को वह बात अच्छी लगी थी। उसे पता नहीं था कि कुछ रिश्ते धीरे-धीरे जिंदगी का हिस्सा बन जाते हैं। कॉलेज के बाद दोनों की राहें अलग हो गईं। समीर पिता के कारोबार में आ गया।

राघव ने नौकरी शुरू कर दी। समीर के लिए शहर में काम के अवसर बहुत थे। राघव को एक छोटी कंपनी में नौकरी मिली। पहली तनख्वाह इतनी नहीं थी कि जिंदगी बदल जाए। लेकिन उसे अपनी कमाई पर गर्व था।

समीर अक्सर उससे पूछता—

“यार, छोड़ दे नौकरी। मेरे साथ काम कर।”

राघव हँसकर कहता—

“तेरे साथ काम करूँगा तो दोस्ती खत्म हो जाएगी।”

“क्यों?”

“क्योंकि तू मालिक बन जाएगा।”

समीर कहता—

“पागल है क्या? दोस्ती में मालिक कौन होता है?”

राघव मुस्कुराता—

“यही बात याद रखना।”

दोनों हँस पड़ते।

समय बीतता गया। समीर की जिंदगी में परेशानियाँ कम नहीं थीं। पैसा था, लेकिन पैसा हर समस्या का समाधान नहीं था। कभी कारोबार में नुकसान हो जाता। कभी पिता से मतभेद हो जाते। कभी किसी साझेदार पर भरोसा गलत साबित हो जाता। कभी घर में कोई ऐसी बात हो जाती जिसे वह किसी और से कह नहीं पाता। ऐसे समय में वह राघव को फोन करता।

“भाई, बात करनी है।”

राघव समझ जाता—

“बोल।”

समीर आधे घंटे तक बोलता रहता। राघव बीच में बहुत कम बोलता। बस सुनता। फिर अंत में दो-चार वाक्य कहता।

“तू अभी भावुक है।”

“कल सुबह फिर देखना।”

“जिस चीज को तू आज दुनिया का अंत समझ रहा है, शायद कल वही सिर्फ एक खराब दिन लगे।”

और समीर शांत हो जाता। कभी-कभी वह मजाक में कहता—

“तूने MBA कहाँ से किया?”

राघव कहता—

“तेरी परेशानियों से।”

समीर हँस देता। एक रात समीर ने फोन किया।

“राघव।”

“हाँ।”

“आज बहुत बुरा हुआ।”

“क्या हुआ?”

समीर ने बताया कि एक बड़ा सौदा हाथ से निकल गया था। काफी पैसा डूब सकता था। वह परेशान था। करीब चालीस मिनट तक दोनों की बात हुई।

अंत में राघव ने कहा—

“भाई, पैसा गया है। तू नहीं गया।”

समीर चुप हो गया।

“सो जा।”

“नींद नहीं आएगी।”

“तो आँखें बंद करके लेट जा। नींद अपने आप आ जाएगी।”

समीर हँसा।

“तू बहुत बेवकूफ है।”

“पता है।”

फोन कट गया।

कुछ मिनट बाद राघव का संदेश आया—

“कल सुबह उठकर सबसे पहले मुझे फोन करना।”

समीर ने जवाब दिया—

“ठीक है।”

उसने फोन रखा और सो गया। सुबह सचमुच उसे सब कुछ थोड़ा आसान लगा।

उस दिन दोपहर में समीर ने राघव को फोन किया।

“अब ठीक लग रहा है।”

“कहा था ना।”

फिर समीर ने पूछा—

“और तू?”

“मैं?”

“हाँ, तू।”

“मैं ठीक हूँ भाई। मुझे क्या हुआ?”

समीर ने ज्यादा नहीं पूछा।

“पक्का?”

“हाँ रे। तू अपनी बता।”

और बात फिर समीर की जिंदगी पर लौट गई। ऐसा न जाने कितनी बार हुआ।

राघव की जिंदगी में भी बहुत कुछ बदल रहा था। लेकिन उसने कभी बताया नहीं। उसकी कंपनी बंद हो गई।

नौकरी चली गई। पहले उसने सोचा—दो महीने में दूसरी नौकरी मिल जाएगी। फिर चार महीने बीत गए।

फिर छह। उसने कई जगह आवेदन किया। कहीं अनुभव कम था। कहीं वेतन बहुत कम। कहीं उम्र को लेकर सवाल हुए।

कहीं उसे कहा गया—

“आप इससे बेहतर नौकरी के लायक हैं।”

और यही वाक्य सबसे ज्यादा चुभता था। क्योंकि वह जानता था कि बेहतर नौकरी उसे कोई दे नहीं रहा था। घर में भी हालात अच्छे नहीं थे। पिता बीमार रहने लगे थे। छोटी बहन की शादी की चिंता थी।

माँ हर बार पूछतीं—

“बेटा, कुछ हुआ?”

वह मुस्कुरा देता।

“हो जाएगा माँ।”

घरवालों के सामने भी वह ठीक रहने की कोशिश करता। धीरे-धीरे बचत खत्म हुई। फिर कुछ सामान बेचना पड़ा। फिर उसने अपने खर्च कम किए। फिर घर से दूर एक छोटे कमरे में रहने लगा ताकि परिवार पर बोझ न पड़े। दिनभर नौकरी की तलाश। शाम को थका हुआ शरीर। रात को खाली कमरे की छत। और फोन में कुछ नाम।

उनमें सबसे ऊपर—

समीर।

कई बार वह फोन उठाता। समीर का नंबर खोलता। फिर बंद कर देता।

उसके मन में आता—

“क्या कहूँगा?”

“मेरी नौकरी चली गई।”

“मेरे पास पैसे नहीं हैं।”

“घर की हालत खराब है।”

“मैं कई जगह हार चुका हूँ।”

उसे डर नहीं था कि समीर उसका मजाक उड़ाएगा। उसे डर था कि समीर उसकी मदद करेगा। क्योंकि कभी-कभी किसी अपने की मदद लेना भी बहुत भारी लगता है। खासकर तब, जब आदमी अपनी नजरों में ही छोटा होने लगा हो।

एक शाम समीर का फोन आया।

“भाई, कहाँ है?”

“घर पर।”

“क्या कर रहा है?”

“कुछ नहीं।”

“चल बाहर मिलते हैं।”

राघव ने कहा—

“आज नहीं।”

“क्यों?”

“थोड़ा काम है।”

“क्या काम?”

“बस है कुछ।”

समीर ने हँसकर कहा—

“तू भी ना... ठीक है।”

फोन कट गया।

राघव देर तक फोन को देखता रहा।

उसकी आँखों में पानी आ गया।

लेकिन उसने खुद को समझाया—

“मैं संभाल लूँगा।”

कुछ महीनों बाद समीर का काम उसे उसी शहर में ले आया जहाँ राघव रहता था।

उसे अचानक याद आया—

“चल, आज राघव से मिलते हैं।”

वह उसके पुराने पते पर पहुँचा। दरवाजे पर ताला था। उसने फोन लगाया।

“कहाँ है?”

“ऑफिस में।”

समीर ने सहजता से पूछा—

“किस ऑफिस में?”

कुछ पल खामोशी रही।

फिर राघव बोला—

“यार, अभी काम में हूँ। बाद में बात करता हूँ।”

फोन कट गया। समीर ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। उसे लगा होगा कि नई नौकरी मिल गई होगी।

उसने सोचा—

“अच्छा है। शायद जिंदगी पटरी पर आ गई।”

और वह वापस चला गया।

करीब दो महीने बाद समीर एक छोटे से औद्योगिक इलाके से गुजर रहा था। एक दुकान के सामने उसकी गाड़ी धीमी हुई। वह किसी चीज के लिए रुका था। और तभी उसकी नजर एक आदमी पर पड़ी। वह कुछ सामान उठाकर अंदर रख रहा था। साधारण कपड़े। थका हुआ चेहरा। झुकी हुई पीठ। समीर की नजर उस चेहरे पर ठहर गई। पहले उसे विश्वास नहीं हुआ।

फिर उसने गाड़ी से उतरकर आवाज दी—

“राघव?”

वह आदमी अचानक रुक गया। उसने पीछे देखा। दोनों की नजरें मिलीं। कुछ सेकंड तक कोई कुछ नहीं बोला। राघव ने मुस्कुराने की कोशिश की।

“अरे... तू?”

समीर उसके पास गया।

“यहाँ क्या कर रहा है?”

“काम।”

“लेकिन तू तो ऑफिस में था।”

राघव ने नजरें चुरा लीं।

“था।”

“अब?”

“अब यहाँ हूँ।”

समीर ने उसके चेहरे को देखा।

“कब से?”

राघव ने जवाब नहीं दिया। समीर की आवाज धीमी हो गई।

“राघव... बात क्या है?”

“कुछ नहीं।”

“मुझे मत बता कि कुछ नहीं।”

“सच में कुछ नहीं।”

समीर ने उसकी आँखों में देखा।

फिर बहुत धीरे से पूछा—

“तू ठीक है?”

इस सवाल पर राघव की आँखें झुक गईं। वही सवाल। जिसका जवाब उसने वर्षों से एक ही दिया था। लेकिन इस बार उसके पास वह जवाब देने की ताकत नहीं थी।

उसके होंठ हिले।

“हाँ...”

फिर आवाज टूट गई।

“मैं...”

वह आगे कुछ नहीं बोल पाया। समीर ने उसका कंधा पकड़ लिया। और अगले ही पल राघव उसके सीने से लग गया।

वह रो रहा था। बहुत देर तक। समीर ने उसे रोने दिया। उसने कोई सवाल नहीं किया। बस उसके कंधे पर हाथ रखा।

कुछ देर बाद राघव ने कहा—

“मुझे माफ कर दे भाई।”

समीर की आँखें भर आईं।

“माफी किस बात की?”

“मैंने तुझसे झूठ बोला।”

समीर ने धीरे से कहा—

“तूने झूठ नहीं बोला था।”

राघव ने उसकी तरफ देखा।

“तूने बस सच नहीं बताया था।”

उस दिन दोनों बहुत देर तक बैठे रहे। राघव ने पहली बार अपनी जिंदगी की सारी परतें खोल दीं। नौकरी जाने से लेकर दूसरी नौकरी न मिलने तक। घर की परेशानियों से लेकर पिता की बीमारी तक। बचत खत्म होने से लेकर उधार लेने तक। लोगों के बदल जाने से लेकर खुद पर भरोसा कम होने तक। उसने बताया कि कितनी रातें ऐसी थीं जब उसे लगता था कि सुबह उठकर फिर वही सवाल सामने होगा—

“अब क्या?”

उसने बताया कि कितनी बार उसने समीर को फोन करने के लिए नंबर खोला था। लेकिन हर बार फोन वापस रख दिया। समीर चुपचाप सुनता रहा।

फिर उसने पूछा—

“तूने मुझे बताया क्यों नहीं?”

राघव ने बहुत देर बाद कहा—

“क्योंकि तू हमेशा अपनी परेशानी मुझे बताता था।”

समीर ने उसकी तरफ देखा।

“तो?”

“मुझे लगता था... तेरी जिंदगी में कम से कम एक आदमी ऐसा होना चाहिए जिसके सामने तू अपनी परेशानी रख सके।”

“और मेरी जिंदगी में?”

राघव मुस्कुराया।

“मैं संभाल लूँगा।”

समीर की आँखों से आँसू निकल आए।

“तू कितना बड़ा बेवकूफ है।”

राघव हँसने की कोशिश करने लगा।

“ये तो तू कॉलेज से कहता आया है।”

“लेकिन इस बार सच में।”

दोनों कुछ देर चुप रहे। उस रात घर लौटकर समीर ने फिर वही पुरानी चैट खोली। अब हर संदेश का अर्थ बदल चुका था। उसने लिखा था—

“भाई, मैं बहुत परेशान हूँ।”

राघव ने जवाब दिया था—

“बता।”

समीर ने लिखा था—

“तू ठीक है?”

राघव—

“मैं ठीक हूँ।”

एक और दिन—

“भाई, आज सब खराब हो गया।”

राघव—

“सब खराब नहीं हुआ। तू बस थका हुआ है।”

और फिर वही—

“और तू?”

“मैं ठीक हूँ भाई।”

समीर की उंगली स्क्रीन पर रुक गई। उसे पहली बार समझ आया कि वह जवाब कितना बड़ा था। वह सिर्फ तीन शब्द नहीं थे। उसके पीछे एक बेरोजगार आदमी था। एक परेशान बेटा था। एक चिंतित भाई था। एक ऐसा इंसान था जो बार-बार हारकर भी सामने वाले को संभाल रहा था। 

और सबसे ज्यादा—

एक दोस्त था, जो अपनी तकलीफ को दोस्ती पर बोझ नहीं बनने देना चाहता था। समीर ने फोन बंद कर दिया। उस रात उसे नींद नहीं आई।

अगली सुबह उसने राघव को फोन किया।

“भाई।”

“हाँ।”

“आज कहाँ है?”

“काम पर।”

“छुट्टी ले।”

“क्यों?”

“मिलना है।”

“क्या हुआ?”

“कुछ नहीं।”

राघव हँसा।

“अब तू भी ‘कुछ नहीं’ बोलने लगा?”

समीर भी हँस पड़ा।

“हाँ। लेकिन आज बात करनी है।”

दोनों मिले।

इस बार समीर ने उसे कोई बड़ा भाषण नहीं दिया। कोई एहसान नहीं जताया। बस कहा—

“चल, फिर से शुरू करते हैं।”

राघव ने पूछा—

“क्या?”

“जो खत्म हो गया, उसे गिनना बंद करते हैं।”

“और आगे?”

“आगे देखते हैं।”

राघव ने कुछ नहीं कहा।

बस सिर हिला दिया।

कई महीने बाद राघव की जिंदगी धीरे-धीरे संभलने लगी। उसे एक ठीक नौकरी मिली। बहुत बड़ी नहीं। बहुत शानदार भी नहीं। लेकिन वह उसकी अपनी थी। उसने पिता का इलाज कराया। बहन की शादी हुई। घर में फिर से हँसी लौटने लगी। समीर भी अपनी जिंदगी में व्यस्त रहा। दोनों की बातचीत फिर रोज नहीं हुई। लेकिन अब एक चीज बदल गई थी।

समीर जब भी पूछता—

“कैसा है?”

राघव अगर कहता—

“ठीक हूँ।”

तो समीर तुरंत पूछता—

“सच वाला ठीक या दोस्त वाला ठीक?”

और राघव हँसकर कहता—

“आज सच वाला।”

फिर दोनों बात करते। कभी दस मिनट। कभी एक घंटे। लेकिन अब “मैं ठीक हूँ” एक पर्दा नहीं था।

वह सिर्फ एक जवाब था।

कई साल बाद एक शाम दोनों उसी पुराने शहर में मिले। सड़क किनारे चाय की दुकान पर बैठे थे। समीर ने पूछा—

“तुझे याद है, तू मुझे कभी अपनी परेशानी क्यों नहीं बताता था?”

राघव मुस्कुराया।

“अब भी पूछ रहा है?”

“हाँ।”

“शायद मुझे लगता था कि दोस्ती में आदमी को मजबूत रहना चाहिए।”

समीर ने चाय का कप नीचे रखा।

“नहीं।”

“तो?”

“दोस्ती में आदमी को सच्चा रहना चाहिए।”

राघव उसकी तरफ देखने लगा।

समीर ने कहा—

“मजबूत तो जिंदगी खुद बना देती है।”

दोनों कुछ देर चुप रहे। सड़क पर लोग आते-जाते रहे। चाय की भाप हवा में घुलती रही। शहर अपनी रफ्तार से चलता रहा। और उस शाम समीर को लगा कि जिंदगी के बारे में उसने बहुत देर से एक बात समझी है।

हर वह आदमी जो मुस्कुराता है, जरूरी नहीं कि उसकी जिंदगी आसान हो।

कुछ लोग इसलिए मुस्कुराते हैं क्योंकि उन्हें रोने की आदत नहीं होती। कुछ इसलिए क्योंकि वे किसी और को परेशान नहीं करना चाहते। कुछ इसलिए क्योंकि उन्हें डर होता है कि अगर उन्होंने सच बोल दिया, तो सामने वाला उनकी कमजोरी देख लेगा। और कुछ लोग इसलिए मुस्कुराते रहते हैं क्योंकि वे खुद टूटते हुए भी किसी अपने को टूटने से बचाना चाहते हैं। समीर ने उस दिन अपनी पुरानी चैट हमेशा के लिए डिलीट नहीं की। उसने उसे रहने दिया। क्योंकि अब वह चैट उसके लिए सिर्फ संदेशों का इतिहास नहीं थी। वह उसकी दोस्ती का आईना थी। एक ऐसी दोस्ती जिसमें एक दोस्त अपनी हर परेशानी लेकर आता रहा...

और दूसरा अपनी हर परेशानी छिपाता रहा। लेकिन आखिरकार दोनों ने एक-दूसरे को एक बात सिखाई—

रिश्ते इसलिए मजबूत नहीं होते कि उनमें कभी मुश्किलें नहीं आतीं।

रिश्ते इसलिए मजबूत होते हैं कि मुश्किल आने पर कोई कहता है—

“चल, इसे भी साथ में पार कर लेते हैं।”

और शायद जिंदगी का सच भी यही है। जिंदगी किसी के लिए आसान नहीं होती। न उस आदमी के लिए जिसके पास बहुत पैसा है। न उसके लिए जिसके पास कम है। न उस आदमी के लिए जो शहर की ऊँची इमारत में रहता है। न उसके लिए जो छोटे से कमरे में। हर किसी की अपनी लड़ाई है। बस फर्क इतना है कि किसी की लड़ाई दिखाई देती है...

और किसी की नहीं।

इसलिए अगली बार जब कोई अपना मुस्कुराकर कहे—

“मैं ठीक हूँ।”

तो शायद सिर्फ इतना पूछ लेना—

“सच बता... ठीक है?”

हो सकता है वह पहली बार सच बोल दे।

और अगर वह फिर भी कहे—

“हाँ, मैं ठीक हूँ।”

तो उसके जवाब को तुरंत सच मान लेने के बजाय बस इतना कह देना—

“ठीक है। जब ठीक न हो, तब भी फोन कर देना। मैं सुन लूँगा।”

क्योंकि हर परेशानी का समाधान हमारे पास नहीं होता। हर दुख हम दूर नहीं कर सकते। हर टूटा हुआ रिश्ता जोड़ नहीं सकते। हर हार को जीत में नहीं बदल सकते। लेकिन किसी की मुश्किल जिंदगी में थोड़ी-सी जगह जरूर बना सकते हैं। कभी एक फोन करके। कभी उसके पास बैठकर। कभी उसकी बात बिना बीच में टोके सुनकर। और कभी सिर्फ उसका हाथ पकड़कर। क्योंकि कई बार इंसान को जिंदगी आसान करने वाला कोई चमत्कार नहीं चाहिए होता।

उसे बस कोई ऐसा चाहिए होता है जिसके सामने वह यह कह सके—

“नहीं भाई... आज मैं ठीक नहीं हूँ।”

और सामने से आवाज आए—

“कोई बात नहीं। आज ठीक रहने की जरूरत भी नहीं है। मैं हूँ।”

शायद जिंदगी का सबसे बड़ा सहारा यही है। किसी का होना।

और शायद इसी वजह से...

जिंदगी आसान नहीं होती।

उसे आसान बनाया जाता है।

कभी किसी की बात सुनकर। कभी उसका बोझ थोड़ा-सा अपने कंधे पर रखकर। और कभी उस दोस्त को यह विश्वास दिलाकर कि—

“तुझे हर बार ‘मैं ठीक हूँ’ कहने की जरूरत नहीं है।”

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