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माँ के हाथ के खाने का स्वाद
मिट्टी के चूल्हे से गैस तक... और स्वाद से यादों तक का सफऱ.....
अध्याय - 1
धुएँ वाली सुबह
सुबह के पाँच बजे थे। पूरा गाँव अभी नींद में था। आँगन की मिट्टी पर रात की ओस मोतियों की तरह चमक रही थी। दूर मंदिर से आरती की हल्की आवाज़ हवा के साथ गाँव में फैल रही थी। पेड़ों पर बैठी चिडि़य़ाँ धीरे-धीरे जाग रही थीं। लेकिन... एक घर ऐसा था जहाँ दिन बहुत पहले शुरू हो चुका था। रसोई में... मिट्टी का चूल्हा जल चुका था। सूखी लकडिय़ाँ धीरे-धीरे सुलग रही थीं। धुएँ की पतली लकीर छप्पर की दरारों से बाहर निकल रही थी। उस धुएँ में लकड़ी की खुशबू थी... और उस खुशबू में... घर होने का एहसास।
रसोई के बीचों-बीच बैठी थी—
माँ।
सिर पर आँचल। चेहरे पर सादगी। आँखों में अपनापन। वह चूल्हे में फूँक मारती... आग तेज़ हो जाती। तवा गरम होता। पहली रोटी फूलती। और पूरा घर... उसकी खुशबू से भर जाता।
नये मास्टर जी....
जहाँ एक शिक्षक बच्चों को पढ़ाने आया था...
और बच्चों ने उसे जीवन पढ़ा दिया...
भाग - 1
गाँव के बच्चे - स्कूल की जान।
पहली घंटी
सुबह का समय। हल्की धूप खेतों पर उतर रही है। ओस की बूँदें अभी तक गेहूँ की बालियों से लिपटी हुई हैं। गाँव के बाहर पीपल के पेड़ पर बैठे तोते शोर मचा रहे हैं। दूर कहीं बैलों की घंटियाँ सुनाई देती हैं। और उसी कच्ची पगडंडी पर... एक युवक कंधे पर बैग टाँगे धीरे-धीरे गाँव की ओर बढ़ रहा है। वह है— नये मास्टरजी।
पुराना छाता
अध्याय- 1
जिस घर की पहचान एक बरामदा था गाँवों में घरों के नाम नहीं होते। उनकी पहचान होती है।किसी घर के सामने पीपल का पेड़ होता है, किसी के आँगन में पुराना कुआँ, किसी के दरवाज़े पर लाल रंग का किवाड़। लोग पता नहीं बताते, केवल एक निशानी बताते हैं और राहगीर बिना भटके वहाँ पहुँच जाता है।
उस गाँव में भी एक घर था। यदि कोई बाहर का आदमी पूछ बैठता—रघुनाथ प्रसाद का घर किधर है?
तो गाँव का सबसे छोटा बच्चा भी मुस्कुराकर कह देता—अरे... वही बड़ा-सा बरामदा वाला घर?
सीधे चले जाइए...जहाँ तुलसी का चौरा दिखे, वहीं।
रंगों के उस पार
रंगों के उस पार
समर्पण
उन सभी कलाकारों को...
जो रंगों से चित्र बनाते रहे,
स्वरों से मौन को आवाज़ देते रहे,
मंच पर हँसी बाँटते रहे,
और अपने भीतर के आँसुओं को
तालियों की गूँज में छिपाते रहे।
भूमिका
कला सीखी नहीं जाती...
वह महसूस की जाती है।
और जो जितना अधिक महसूस करता है...
वह उतना ही बड़ा कलाकार बनता है।
लेकिन शायद...
उतना ही बड़ा उसका एकांत भी होता है।
स्वच्छंदा - सपनों और उम्मीदों के बीच......
"जीवन में कुछ रास्ते ऐसे होते हैं, जहाँ भीड़ बहुत होती है... लेकिन हर व्यक्ति अकेला चलता है। बारहवीं के बाद की उम्र भी कुछ ऐसी ही होती है।"
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