👤

🌟 Anant Sant 🌟

Anant Sant - YouTube Playlists

अनंत साहित्य

चिट्ठी वाला डाकिया

 चिट्ठी वाला डाकिया



वह बूढ़ा डाकिया
अब भी उसी पगडंडी पर चलता है,
बस उसके थैले में
चिट्ठियाँ कम
और स्मृतियाँ अधिक हैं।

पीपल के नीचे वाली दुकान




अध्याय  1
पीपल की छाँव

गाँव के छोर पर एक पुराना पीपल का पेड़ था। इतना पुराना कि गाँव के सबसे बूढ़े आदमी भी उसकी उम्र ठीक-ठीक नहीं बता सकते थे।
कोई कहता—मेरे दादा के समय से है।

पुरानी चौपाल

 


गाँव के बीचों-बीच

बरगद की छाँव में
एक चौपाल हुआ करती थी...

कुछ चारपाइयाँ,
एक पुराना हुक्का,
और शाम होते ही
पूरा गाँव वहाँ बैठ जाया करता था।

कागज़ की नाव

 कागज़ की नाव...



आज बरसों बाद...

बारिश हुई।

मैं खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया।

सामने सड़क पर
पानी बह रहा था।

एक छोटा-सा बच्चा
अपने दोनों हाथों से
कागज़ की नाव बनाकर
उसे पानी में छोड़ रहा था।

वह उसके पीछे-पीछे दौड़ रहा था...

और मैं...

अपनी जगह खड़ा रह गया।

माँ के हाथ के खाने का स्वाद

 
मिट्टी के चूल्हे से गैस तक... और स्वाद से यादों तक का सफऱ.....



अध्याय - 1
धुएँ वाली सुबह
सुबह के पाँच बजे थे। पूरा गाँव अभी नींद में था। आँगन की मिट्टी पर रात की ओस मोतियों की तरह चमक रही थी। दूर मंदिर से आरती की हल्की आवाज़ हवा के साथ गाँव में फैल रही थी। पेड़ों पर बैठी चिडि़य़ाँ धीरे-धीरे जाग रही थीं। लेकिन... एक घर ऐसा था जहाँ दिन बहुत पहले शुरू हो चुका था। रसोई में... मिट्टी का चूल्हा जल चुका था। सूखी लकडिय़ाँ धीरे-धीरे सुलग रही थीं। धुएँ की पतली लकीर छप्पर की दरारों से बाहर निकल रही थी। उस धुएँ में लकड़ी की खुशबू थी... और उस खुशबू में... घर होने का एहसास।
रसोई के बीचों-बीच बैठी थी—
माँ।
सिर पर आँचल। चेहरे पर सादगी। आँखों में अपनापन। वह चूल्हे में फूँक मारती... आग तेज़ हो जाती। तवा गरम होता। पहली रोटी फूलती। और पूरा घर... उसकी खुशबू से भर जाता।

नये मास्टर जी....

जहाँ एक शिक्षक बच्चों को पढ़ाने आया था... 

और बच्चों ने उसे जीवन पढ़ा दिया...



भाग - 1

गाँव के बच्चे -  स्कूल की जान।

पहली घंटी


सुबह का समय। हल्की धूप खेतों पर उतर रही है। ओस की बूँदें अभी तक गेहूँ की बालियों से लिपटी हुई हैं। गाँव के बाहर पीपल के पेड़ पर बैठे तोते शोर मचा रहे हैं। दूर कहीं बैलों की घंटियाँ सुनाई देती हैं। और उसी कच्ची पगडंडी पर... एक युवक कंधे पर बैग टाँगे धीरे-धीरे गाँव की ओर बढ़ रहा है। वह है— नये मास्टरजी।

बरगद





गाँव के बीचों-बीच खड़ा वह पुराना बरगद...
आज भी वहीं है।
बस अब उसके चारों ओर दुनिया बदल गई है।
कहते हैं—उसे दो सौ साल हो गए।
पर उसकी जड़ों में आज भी
कई पीढ़ियों की साँसें बसी हैं।

खामोशी से दूर हो जाते हैं...

खामोशी से दूर हो जाते हैं.....
 

जो लोग सचमुच मन से जुड़े होते हैं,
वे हर छोटी बात पर शिकायत नहीं करते।

दिल पर कितनी भी चोट क्यों न लगे,
अक्सर मुस्कुराकर उसे अपने भीतर ही रख लेते हैं।
कभी यूँ ही हँसते-हँसते कह देते हैं—
"ये बात... थोड़ी-सी चुभी थी।"

और फिर उसी क्षण बात बदल देते हैं,
मानो कुछ हुआ ही न हो।
क्योंकि उन्हें विश्वास होता है
कि अपने लोग बिना कहे भी समझ लेंगे।

पुराना छाता

 


अध्याय- 1
जिस घर की पहचान एक बरामदा था गाँवों में घरों के नाम नहीं होते। उनकी पहचान होती है।
किसी घर के सामने पीपल का पेड़ होता है, किसी के आँगन में पुराना कुआँ, किसी के दरवाज़े पर लाल रंग का किवाड़। लोग पता नहीं बताते, केवल एक निशानी बताते हैं और राहगीर बिना भटके वहाँ पहुँच जाता है।
उस गाँव में भी एक घर था। यदि कोई बाहर का आदमी पूछ बैठता—रघुनाथ प्रसाद का घर किधर है?
तो गाँव का सबसे छोटा बच्चा भी मुस्कुराकर कह देता—अरे... वही बड़ा-सा बरामदा वाला घर?
सीधे चले जाइए...जहाँ तुलसी का चौरा दिखे, वहीं।