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सुरों की साधिका - लता दीदी

  कभी किसी खामोश रात में दूर कहीं से एक स्वर आया— “आएगा आने वाला…” और सचमुच आया… एक ऐसा स्वर, जिसने सुरों को आवाज़ दी, आवाज़ को पहचान दी, और पहचान को भारत की आत्मा बना दिया। फिर जिंदगी ने पूछा— ये कैसा सफर है? हम मुस्कुराकर कह उठे— “अजीब दास्तां है ये…” क्योंकि कुछ आवाज़ें सुनी नहीं जातीं, वे सीधे दिल में उतरती हैं। कभी प्रेम ने सिर झुकाया,  कभी विरह ने आँखें भिगोईं, कभी किसी ने चुपके से कहा— बस कुछ पल और… तो आपकी आवाज़ ने समय को थाम लिया— “लग जा गले…” और उन दो शब्दों में न जाने कितने बिछड़ते रिश्ते अपना घर पा गए। प्रेम जब दुनिया से डरने लगा, तो आपके स्वर ने मधुबाला के अधरों से इतिहास को चुनौती दी— “प्यार किया तो डरना क्या…” और प्रेम सिर्फ कहानी नहीं रहा, एक साहस बन गया। फिर किसी ने पूछा— क्या साथ केवल पास रहने का नाम है? आपकी आवाज़ आई— “तू जहाँ जहाँ चलेगा, मेरा साया साथ होगा…” और लगा… कुछ लोग शरीर से दूर होकर भी हमारी जिंदगी से कभी दूर नहीं होते। कुछ रिश्ते दिखाई नहीं देते, फिर भी हर कदम पर साथ चलते हैं। कभी बारिश आई… खिड़की पर बूंदें उतरीं, हवा में मिट्टी की खुशबू घुली और मन...

सही समय पर....

  सही समय पर.... ईश्वर कभी जल्दी नहीं करते, और देर से भी नहीं आते, वे बस… सही समय पर अपना कमाल दिखाते हैं। हम घड़ी की सुइयों से अपनी किस्मत नापते रहते हैं, हर गुजरते दिन के साथ थोड़ा और टूटते रहते हैं। कभी लगता है— शायद हमारी प्रार्थना उन तक पहुंची ही नहीं, शायद हमारी पुकार आसमान ने सुनी ही नहीं। लेकिन हम क्या जानें… जिस दरवाजे को हम बंद समझकर लौट रहे हैं, ईश्वर उसी दरवाजे की चाबी बना रहे होते हैं। हम कहते हैं— “अब बहुत देर हो गई…” और ऊपर से कोई आवाज आती है— “देर नहीं हुई, अभी तुम्हारा समय नहीं आया।” हम चाहते हैं फूल आज ही खिल जाए, बारिश आज ही बरस जाए, मंजिल आज ही मिल जाए, और जिंदगी की हर उलझन आज ही सुलझ जाए। लेकिन ईश्वर जानते हैं— किस फूल को कब खिलना है, किस बादल को कब बरसना है, किस इंसान को कब मिलना है, और किस दर्द को कब खत्म होना है। कभी-कभी वे हमारी इच्छा पूरी नहीं करते, क्योंकि हमारी इच्छा से कहीं बेहतर कुछ हमारे रास्ते में रख रहे होते हैं। कभी किसी इंसान को हमसे दूर कर देते हैं, क्योंकि जानते हैं कि उसकी मौजूदगी हमारी मंजिल से दूर कर देगी। कभी हमें रोक देते हैं, कभी अकेला कर ...

हार मानना और हार जाना

  हार जाना इतना बड़ा दुःख नहीं, जितना दुःख है हार मान लेना। गिर जाना कोई अंत नहीं, कभी-कभी तो गिरना भी रास्ते का हिस्सा होता है।

अपने होने का अर्थ

  अपने होने का अर्थ कुछ रिश्ते हिसाब नहीं रखते, वे बस निभाए जाते हैं। जैसे सुबह बिना किसी से पूछे सूरज खिड़की पर आ जाता है, जैसे पेड़ अपनी छाँव का किसी से मूल्य नहीं माँगता । वैसे ही अपने लोगों के लिए किया गया काम कभी बोझ नहीं होता।

चिट्ठी वाला डाकिया

  चिट्ठी वाला डाकिया वह बूढ़ा डाकिया अब भी उसी पगडंडी पर चलता है, बस उसके थैले में चिट्ठियाँ कम और स्मृतियाँ अधिक हैं।

पुरानी चौपाल

  गाँव के बीचों-बीच बरगद की छाँव में एक चौपाल हुआ करती थी... कुछ चारपाइयाँ, एक पुराना हुक्का, और शाम होते ही पूरा गाँव वहाँ बैठ जाया करता था।

कागज़ की नाव

  कागज़ की नाव... आज बरसों बाद... बारिश हुई। मैं खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया। सामने सड़क पर पानी बह रहा था। एक छोटा-सा बच्चा अपने दोनों हाथों से कागज़ की नाव बनाकर उसे पानी में छोड़ रहा था। वह उसके पीछे-पीछे दौड़ रहा था... और मैं... अपनी जगह खड़ा रह गया।

बरगद

गाँव के बीचों-बीच खड़ा वह पुराना बरगद... आज भी वहीं है। बस अब उसके चारों ओर दुनिया बदल गई है। कहते हैं—उसे दो सौ साल हो गए। पर उसकी जड़ों में आज भी कई पीढ़ियों की साँसें बसी हैं।

खामोशी से दूर हो जाते हैं...

खामोशी  से  दूर हो जाते हैं.....   जो लोग सचमुच मन से जुड़े होते हैं, वे हर छोटी बात पर शिकायत नहीं करते। दिल पर कितनी भी चोट क्यों न लगे, अक्सर मुस्कुराकर उसे अपने भीतर ही रख लेते हैं। कभी यूँ ही हँसते-हँसते कह देते हैं— "ये बात... थोड़ी-सी चुभी थी।" और फिर उसी क्षण बात बदल देते हैं, मानो कुछ हुआ ही न हो। क्योंकि उन्हें विश्वास होता है कि अपने लोग बिना कहे भी समझ लेंगे।