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अनंत साहित्य

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चिट्ठी वाला डाकिया

 चिट्ठी वाला डाकिया



वह बूढ़ा डाकिया
अब भी उसी पगडंडी पर चलता है,
बस उसके थैले में
चिट्ठियाँ कम
और स्मृतियाँ अधिक हैं।

पुरानी चौपाल

 


गाँव के बीचों-बीच

बरगद की छाँव में
एक चौपाल हुआ करती थी...

कुछ चारपाइयाँ,
एक पुराना हुक्का,
और शाम होते ही
पूरा गाँव वहाँ बैठ जाया करता था।

कागज़ की नाव

 कागज़ की नाव...



आज बरसों बाद...

बारिश हुई।

मैं खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया।

सामने सड़क पर
पानी बह रहा था।

एक छोटा-सा बच्चा
अपने दोनों हाथों से
कागज़ की नाव बनाकर
उसे पानी में छोड़ रहा था।

वह उसके पीछे-पीछे दौड़ रहा था...

और मैं...

अपनी जगह खड़ा रह गया।

बरगद





गाँव के बीचों-बीच खड़ा वह पुराना बरगद...
आज भी वहीं है।
बस अब उसके चारों ओर दुनिया बदल गई है।
कहते हैं—उसे दो सौ साल हो गए।
पर उसकी जड़ों में आज भी
कई पीढ़ियों की साँसें बसी हैं।

खामोशी से दूर हो जाते हैं...

खामोशी से दूर हो जाते हैं.....
 

जो लोग सचमुच मन से जुड़े होते हैं,
वे हर छोटी बात पर शिकायत नहीं करते।

दिल पर कितनी भी चोट क्यों न लगे,
अक्सर मुस्कुराकर उसे अपने भीतर ही रख लेते हैं।
कभी यूँ ही हँसते-हँसते कह देते हैं—
"ये बात... थोड़ी-सी चुभी थी।"

और फिर उसी क्षण बात बदल देते हैं,
मानो कुछ हुआ ही न हो।
क्योंकि उन्हें विश्वास होता है
कि अपने लोग बिना कहे भी समझ लेंगे।