"जीवन में कुछ रास्ते ऐसे होते हैं, जहाँ भीड़ बहुत होती है... लेकिन हर व्यक्ति अकेला चलता है। बारहवीं के बाद की उम्र भी कुछ ऐसी ही होती है।"
अध्याय – 1
बारहवीं के बाद का पहला सन्नाटा
मार्च की एक हल्की-सी सुबह थी। रात की ठंडी हवा अभी पूरी तरह गई नहीं थी। सूरज क्षितिज के पीछे से धीरे-धीरे झाँक रहा था। मोहल्ले की गलियों में दूध वाले की साइकिल की घंटी, मंदिर की आरती की आवाज़ और चिड़ियों की चहचहाहट मिलकर एक ऐसा संगीत बना रही थीं, जो हर दिन बजता था... पर आज उसमें भी एक अनकहा बदलाव था। आज शहर के "उच्चतर माध्यमिक विद्यालय" में बारहवीं की अंतिम परीक्षा थी। सफेद कमीज़, नीली सलवार और कंधे पर हल्का-सा झूलता बैग... स्वच्छंदा घर के आँगन में खड़ी थी। माँ ने उसके माथे पर हल्दी और चंदन का छोटा-सा तिलक लगाया।
"भगवान सब अच्छा करेंगे बेटा..."
स्वच्छंदा मुस्कुरा दी।
"मम्मी... भगवान से कहना, बस पेपर आसान आ जाए।"
दोनों हँस पड़ीं।
रसोई के दरवाज़े से पिता ने झाँककर कहा— "पेपर आसान हो या कठिन... मेहनत आसान नहीं होती। जितना पढ़ा है, उतना लिखकर आना।"
स्वच्छंदा ने सिर हिलाया।
उसके बड़े भाई आदित्य ने बाइक की चाबी घुमाई।
"चल छोटी... देर हो जाएगी।"
वह बैग उठाकर बाहर आई।
गेट बंद करते समय उसने एक पल के लिए अपने घर को देखा। उसे पता नहीं था... यह वही सुबह है, जिसके बाद उसका जीवन हमेशा के लिए बदलने वाला है।
स्कूल के बाहर आज किसी मेले जैसा माहौल था। किसी के हाथ में नोट्स थे। कोई आख़िरी बार फ़ॉर्मूले दोहरा रहा था। कोई भगवान को याद कर रहा था। कोई दोस्तों के साथ हँस रहा था, जैसे परीक्षा नहीं, पिकनिक हो।
"अरे स्वच्छंदा... इधर!"
पीछे से आवाज़ आई।
वह मुड़ी। नंदिनी, गौरी, मेघा और कृतिका हाथ हिलाती हुई उसकी ओर दौड़ती आ रही थीं।
"आज के बाद रोज़-रोज़ स्कूल नहीं आना पड़ेगा!" मेघा खुशी से लगभग उछल रही थी।
गौरी ने तुरंत टोका— "पहले पेपर देकर आ जाओ... फिर आज़ादी मनाना।"
कृतिका ने मुस्कुराकर कहा— "आज आख़िरी दिन है... कोई रोएगा तो नहीं?"
सबने एक-दूसरे की ओर देखा... फिर बिना कुछ कहे हँस दीं।
घंटी बजी.....
शायद किसी के पास उस प्रश्न का उत्तर नहीं था। सब अपने-अपने कमरों में चले गए। तीन घंटे बाद... जब अंतिम घंटी बजी... तो किसी ने उत्तर पुस्तिका पहले की तरह जल्दी से नहीं छोड़ी। जैसे हर छात्र कुछ सेकंड और उस कमरे में रुकना चाहता हो। क्योंकि... यह केवल परीक्षा का अंत नहीं था। यह एक पहचान का अंत था।
"बारहवीं का छात्र।"
स्कूल के मैदान में भीड़ थी। कोई सेल्फ़ी ले रहा था। कोई यूनिफ़ॉर्म पर दोस्तों से ऑटोग्राफ लिखवा रहा था। किसी की आँखें नम थीं। स्वच्छंदा भी अपनी सहेलियों के साथ स्कूल की पुरानी इमारत के सामने खड़ी थी। मेघा ने मार्कर निकालकर उसकी कमीज़ पर लिखा—"हमेशा मुस्कुराना।"
नंदिनी ने लिखा— "तू जहाँ होगी, वहाँ हँसी होगी।"
गौरी ने बस दो शब्द लिखे— "हार मत मानना।"
स्वच्छंदा ने पढ़ा... और पहली बार उसकी आँखें भर आईं।
"अरे... अभी से रो रही है?"
कृतिका ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"हम अलग थोड़ी हो रहे हैं।"
स्वच्छंदा ने मुस्कुराने की कोशिश की। लेकिन दिल के किसी कोने में एक आवाज़ उठी—
"क्या सचमुच नहीं?"
घर लौटते समय बाइक पर बैठी स्वच्छंदा ने देखा...वही सड़कें थीं... वही पेड़... वही दुकानें....लेकिन उसे सब कुछ अलग क्यों लग रहा था? क्या सिर्फ़ एक परीक्षा ख़त्म होने से दुनिया बदल जाती है?
या...दुनिया नहीं बदलती...हम बदलने लगते हैं?
शाम को छत पर हल्की हवा चल रही थी। स्वच्छंदा ने स्कूल की यूनिफ़ॉर्म उतारकर सावधानी से मोड़कर अलमारी में रख दी। कुछ क्षण वह उसे देखती रही।
फिर धीरे से बोली—"अब शायद इसे कभी नहीं पहनूँगी..."
एक साधारण-सा वाक्य था। लेकिन उसी क्षण उसने महसूस किया... जीवन का एक पूरा अध्याय बंद हो गया।अगले कुछ दिन ऐसे बीते जैसे समय ने अपनी रफ़्तार खो दी हो। पहले सुबह उठते ही स्कूल जाना होता था।अब सुबह उठकर करना क्या है? पहले हर दिन का उद्देश्य साफ़ था। अब दिन लंबे हो गए थे। और सवाल... उनसे भी लंबे।
एक दिन सभी सहेलियाँ शहर के पुराने तालाब के किनारे मिलीं। बचपन से यह उनकी पसंदीदा जगह थी। कभी यहीं गोलगप्पे खाए थे। कभी नाव देखी थी। कभी भविष्य के सपने गढ़े थे। आज वही जगह थी... लेकिन बातचीत बदल चुकी थी।
नंदिनी बोली—"मैं मेडिकल की कोचिंग जॉइन कर रही हूँ।"
गौरी ने कहा—"मैं कृषि पढ़ना चाहती हूँ... लेकिन फीस का इंतज़ाम हो जाए, तब।"
कृतिका मुस्कुराई— "पापा कह रहे हैं, शायद विदेश भेज दें।"
सबकी नज़र मेघा पर गई। "मैं... शायद मीडिया में जाऊँ।"
फिर सबकी नज़र स्वच्छंदा पर टिक गई।
कुछ पल तक वह चुप रही।
"और तू?"
उसने पानी में पड़ती अपनी परछाईं देखी। फिर बहुत धीरे से बोली—"...मुझे नहीं पता।"
चारों सहेलियाँ चुप हो गईं। क्योंकि उस "मुझे नहीं पता" में केवल उत्तर की कमी नहीं थी... उसमें डर था। भ्रम था।
और एक ऐसी बेचैनी थी, जिसे शब्द नहीं मिल रहे थे।
उस रात...स्वच्छंदा देर तक जागती रही। कमरे की बत्ती बंद थी। खिड़की से आती चाँदनी दीवार पर पड़ रही थी।उसी सन्नाटे में उसे लगा...
जैसे उसके भीतर दो आवाज़ें जन्म ले रही हैं।
पहली आवाज़ बोली—"चल... दुनिया बहुत बड़ी है। कुछ नया करते हैं।"
दूसरी आवाज़ ने तुरंत टोका—
"और अगर असफल हो गई तो?"
"गलत रास्ता चुन लिया तो?"
"पापा की उम्मीदों का क्या होगा?"
"लोग क्या कहेंगे?"
स्वच्छंदा ने तकिए में चेहरा छिपा लिया। उसने पहली बार महसूस किया... मन के भीतर भी युद्ध होते हैं।और सबसे कठिन युद्ध वही होते हैं... जिनमें दोनों सेनाएँ अपनी ही होती हैं। उसके कमरे की दीवार पर बचपन की एक तस्वीर टँगी थी।
उसमें वह बारिश में भीग रही थी।
हाथ फैलाए...
आँखें बंद...
मानो पूरी दुनिया उसकी हो। आज उसने उसी तस्वीर को देखा... और आईने में खुद को। उसे लगा... तस्वीर वाली लड़की और आईने वाली लड़की...
दो अलग-अलग लोग हैं। एक उड़ना जानती थी। दूसरी उड़ने से डरती थी। उसे अभी नहीं पता था...कि असली परीक्षा बोर्ड की नहीं थी। असली परीक्षा तो अब शुरू हुई थी।
जहाँ प्रश्नपत्र कोई नहीं देता...
उत्तर भी कोई नहीं बताता...
और गलत उत्तर की कीमत...
कभी-कभी पूरा जीवन चुकाता है।
अध्याय–2
परिणाम आने से पहले का मौसम
"कुछ मौसम पेड़ों के पत्ते गिरा देते हैं... और कुछ मौसम बच्चों की हँसी।"
अप्रैल की दोपहरें धीरे-धीरे गर्म होने लगी थीं।आम के पेड़ों पर छोटी-छोटी अमियाँ आ चुकी थीं। हवा में धूल कुछ ज़्यादा रहने लगी थी। शाम को मोहल्ले के बच्चे अब भी क्रिकेट खेलते थे, लेकिन स्वच्छंदा कई दिनों से नीचे नहीं उतरी थी।पहले ऐसा नहीं था।उसे मोहल्ले की सबसे चंचल लड़की कहा जाता था।कभी किसी की पतंग पकड़ने छत पर चढ़ जाती, कभी गली के बच्चों के साथ रस्सी कूदने लगती। कभी बिना वजह हँस पड़ती, तो कभी अपनी सहेलियों को लेकर सड़क किनारे लगे अमलतास के पेड़ों के नीचे बैठ जाती।
उसे लोग कहते थे—"इस लड़की के पास दुख आने का रास्ता ही नहीं है।"लेकिन किसी ने यह नहीं देखा... कि दुख कभी दरवाज़ा खटखटाकर नहीं आता। वह चुपचाप भीतर बैठ जाता है।
उस दिन सुबह माँ ने आवाज़ लगाई—"स्वच्छंदा... चाय ठंडी हो जाएगी।"
कमरे के अंदर से हल्की-सी आवाज़ आई—"आ रही हूँ मम्मी..."
माँ ने कप मेज़ पर रखा और कुछ पल दरवाज़े के बाहर खड़ी रहीं।
उन्हें लगा...आवाज़ तो वही है...लेकिन उसमें पहले वाली चमक नहीं रही। स्वच्छंदा आई। हाथ में एक पुरानी डायरी थी। वह चाय पीते-पीते उसी के पन्ने पलट रही थी।
माँ मुस्कुराईं।"क्या देख रही है?"
"कुछ नहीं..."
"दिखा तो।"
स्वच्छंदा ने डायरी आगे बढ़ा दी। पहले पन्ने पर रंग-बिरंगे अक्षरों में लिखा था—
"जब मैं बड़ी हो जाऊँगी..."
नीचे बचपन की लिखावट थी।
"मैं पूरी दुनिया घूमूँगी।"
"मैं नदी के किनारे घर बनाऊँगी।"
"मैं ढेर सारी किताबें लिखूँगी।"
"मैं लोगों की मदद करूँगी।""नंदिनी Calling..."
"हैलो!"
"क्या कर रही थी?"
"कुछ नहीं..."
"मैं कोचिंग देखने गई थी आज।"
"अच्छा?"
"इतनी भीड़ थी..."
नंदिनी कुछ पल चुप रही।
फिर बोली—
"सच बताऊँ?"
"हूँ..."
"मुझे डर लग रहा है।"
स्वच्छंदा चौंकी।
"तुझे?"
"हाँ..."
"तू तो हमेशा सबसे तेज़ रही है।"
नंदिनी हँसी।
"लोगों को यही लगता है।"
कुछ क्षण दोनों चुप रहीं।
फिर नंदिनी ने धीरे से कहा—
"स्वच्छंदा..."
"हूँ?"
"अगर मैं डॉक्टर नहीं बन पाई तो... लोग मुझे वही नंदिनी समझेंगे?"
स्वच्छंदा के पास कोई उत्तर नहीं था।
उसने केवल इतना कहा—
"मुझे नहीं पता..."
फोन कट गया।
लेकिन आज पहली बार उसे एहसास हुआ...
डर केवल उसी के भीतर नहीं था।
हर किसी के भीतर था।
बस... सबकी चुप्पी अलग-अलग थी।
रात के खाने पर पूरा परिवार साथ बैठा था। पिता ने रोटी तोड़ते हुए पूछा— "कॉलेजों की जानकारी देखी?"
"नहीं..."
"देख लिया करो।"
"जी।"
भाई आदित्य ने मोबाइल उठाया। "मैंने कुछ कॉलेज देखे हैं।" उसने स्क्रीन उसकी ओर बढ़ाई।
"यह अच्छा है... इसकी प्लेसमेंट ठीक है..." "यहाँ प्रतियोगिता ज़्यादा है..." "यहाँ फीस ज़्यादा है..
."स्वच्छंदा स्क्रीन देख रही थी। लेकिन शब्द धुँधले पड़ रहे थे। उसे लग रहा था... जैसे हर कॉलेज का नाम नहीं...
एक नया बोझ सामने रखा जा रहा हो।
उस रात... कमरे की बत्ती बंद थी। मोबाइल की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी।
Instagram खोला।
पहली पोस्ट— "New Beginning..."
दूसरी— "Future Doctor..."
तीसरी— "Dream College Loading..."
हर कोई कहीं पहुँचता हुआ दिखाई दे रहा था। और वह? उसे लगा... वह किसी रेलवे स्टेशन पर खड़ी है... जहाँ हर ट्रेन किसी दिशा में जा रही है... सिर्फ़ उसे अपना प्लेटफ़ॉर्म ही नहीं पता। उसने मोबाइल बंद कर दिया। कमरे में फिर अँधेरा था। लेकिन उसके भीतर का अँधेरा... अब थोड़ा और गहरा हो चुका था। उसने खिड़की खोली। रात शांत थी। दूर कहीं किसी मंदिर की घंटी सुनाई दी। हवा का एक झोंका आया। टेबल पर रखी उसकी बचपन की एक ड्राइंग उड़कर ज़मीन पर गिर गई। उसने उठाकर देखी।
चित्र में एक लड़की थी... दोनों हाथ फैलाए...आसमान की ओर दौड़ती हुई। नीचे उसने बचपन में लिखा था—
"मैं पंछी हूँ।" स्वच्छंदा बहुत देर तक उस चित्र को देखती रही।
फिर अनायास उसके होंठों से एक वाक्य निकला—"क्या सचमुच...?"
"कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जिनका उत्तर किताबों में नहीं मिलता। और कुछ उम्र ऐसी होती है जहाँ हर उत्तर, एक नया प्रश्न बन जाता है।"
रिज़ल्ट आने में अभी लगभग बीस दिन बाकी थे। बीस दिन... सिर्फ़ बीस दिन। कैलेंडर पर देखने में यह समय बहुत छोटा लगता था। लेकिन जो बच्चा बारहवीं देकर घर बैठा हो... उसके लिए यही बीस दिन कभी-कभी पूरे साल से भी लंबे हो जाते हैं। सुबह उठो... लोग पूछेंगे—"रिज़ल्ट कब है?" दोपहर में कोई रिश्तेदार फ़ोन करेगा—"आगे क्या सोचा है?" शाम को पड़ोसी मिल जाएगा—"कोचिंग कहाँ लगाई?" और रात... रात किसी से कुछ नहीं पूछती।रात केवल सुनती है... तुम्हारे भीतर चल रही आवाज़ों को।
उस दिन रविवार था। घर में हलवा बना था।
माँ ने कहा— "आज सब साथ में नाश्ता करेंगे।"
स्वच्छंदा रसोई में आई। माँ ने उसके सामने कटोरी रखी।
"तुझे पसंद है न?"
वह मुस्कुरा दी।
"हाँ..."
लेकिन उसने दो चम्मच से ज़्यादा नहीं खाया। माँ ने गौर किया। कुछ कहा नहीं। माएँ अक्सर शब्दों से पहले बदलाव पहचान लेती हैं। दोपहर तक घर में रिश्तेदार आने लगे। मौसी...मौसा...चाचा...चाची... सबके हाथ में फल या मिठाई का डिब्बा था। और लगभग सबके मन में एक ही सवाल। कुछ देर तक बातें होती रहीं।फिर वही क्षण आया। मौसा जी ने चाय का कप रखते हुए पूछा— "तो बिटिया... आगे क्या करना है?"
स्वच्छंदा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा— "अभी सोच रही हूँ..."
"सोच रही हूँ?"
वे हँसे।
"अरे बेटा, सोचने का समय तो बारहवीं से पहले होता है।"
कमरे में बैठे कुछ लोग भी मुस्कुरा दिए। किसी ने बात बदलने की कोशिश नहीं की।
चाची बोलीं— "आजकल तो बच्चे दसवीं से ही तय कर लेते हैं कि डॉक्टर बनना है या इंजीनियर।"
मौसी ने जोड़ दिया—"और देखो शर्मा जी की बेटी...
उसने तो कोटा की कोचिंग भी जॉइन कर ली।"
एक और आवाज़ आई— "लड़की है... समय पर निर्णय लेना चाहिए।"स्वच्छंदा चुप थी।
उसे ऐसा लगा...जैसे कमरे में बैठे लोग उससे बात नहीं कर रहे। वे उसके भविष्य की नीलामी कर रहे हों।
उसी समय पिता ने धीरे से कहा— "अभी रिज़ल्ट आने दो... फिर आराम से बैठकर सोचेंगे।"
उनकी आवाज़ शांत थी। लेकिन स्वच्छंदा ने पहली बार महसूस किया...
पिता की मुस्कान भी आज थोड़ी थकी हुई थी। शाम तक सब चले गए। घर फिर शांत हो गया।माँ बर्तन समेट रही थीं। पिता बरामदे में कुर्सी पर बैठे थे। उनके हाथ में अख़बार था। लेकिन पन्ना पिछले दस मिनट से पलटा नहीं था।स्वच्छंदा धीरे से उनके पास आई।
"पापा..."
उन्होंने मुस्कुराकर देखा। "हाँ बेटा?"
"आप... परेशान हैं?" पिता कुछ क्षण उसे देखते रहे।
फिर हँसने की कोशिश की। "नहीं तो।"
"सच?"
उन्होंने अख़बार मोड़ दिया। बहुत धीरे बोले— "हर पिता थोड़ा-बहुत परेशान रहता है।"
"क्यों?"
"क्योंकि वह चाहता है... जिस रास्ते पर उसकी संतान चले...उसमें गड्ढे कम हों।"
कुछ पल दोनों चुप रहे। फिर उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखा।
"लेकिन रास्ता...तुझे ही चुनना होगा।"
स्वच्छंदा ने पहली बार महसूस किया— पिता उसे धक्का नहीं दे रहे थे। वे बस चाहते थे कि वह गिरे नहीं।
रात को उसने अपनी सहेलियों के ग्रुप में संदेश भेजा—"कल मिल सकते हैं?"
कुछ ही देर में उत्तर आने लगे।
नंदिनी: हाँ।
गौरी: मैं आ जाऊँगी।
कृतिका: शाम पाँच बजे?
मेघा: Done ❤️
अगले दिन वे पाँचों फिर उसी पुराने तालाब पर मिलीं। लेकिन इस बार किसी ने गोलगप्पों की बात नहीं की। सबके हाथ में अपने-अपने भविष्य की चिंता थी।सबसे पहले गौरी बोली—"पापा कह रहे हैं...अगर सरकारी कॉलेज नहीं मिला...तो शायद आगे पढ़ाई मुश्किल हो जाएगी।"उसकी आँखें झुक गईं।
"मैंने पहली बार उन्हें रोते देखा..." चारों सहेलियाँ चुप हो गईं।
कृतिका ने धीरे से कहा— "मेरे घर में सब कह रहे हैं कि विदेश चली जाऊँ।" "तो चली जा।"
मेघा बोली। कृतिका मुस्कुरा भी नहीं सकी। "अगर मैं जाना ही नहीं चाहती तो?" सब उसकी ओर देखने लगीं।
"मुझे डर लगता है... मैं अकेली कैसे रहूँगी?"
मेघा ने पहली बार अपना सच कहा। "तुम लोगों को लगता होगा... मैं हमेशा खुश रहती हूँ।"उसने मोबाइल निकाला। स्क्रीन पर उसकी एक मुस्कुराती हुई तस्वीर थी। उसने तस्वीर बंद कर दी।
"यह मुस्कान फोटो तक रहती है..."धीरे से बोली—"रात में मुझे नींद नहीं आती।"
अब सबकी नज़र स्वच्छंदा पर थी। वह काफी देर तक पानी की लहरों को देखती रही।
फिर बोली— "क्या... सिर्फ़ मुझे ही लगता है कि..." उसकी आवाज़ भर्रा गई।
"...कि हम सब बहुत जल्दी बड़े हो गए?" तालाब की लहरें किनारे से टकराईं। किसी ने उत्तर नहीं दिया।
क्योंकि... उत्तर किसी के पास था ही नहीं। वापसी में स्वच्छंदा अकेली चल रही थी। सड़क के किनारे एक छोटा-सा बच्चा पतंग उड़ा रहा था। पतंग हवा में बार-बार ऊपर उठती... फिर डोर खिंचते ही नीचे आ जाती। वह कुछ देर उसे देखती रही। फिर उसके मन में एक विचार आया— "क्या हम भी ऐसे ही हैं?" "उड़ना चाहते हैं..."
"लेकिन हर बार कोई डोर हमें नीचे खींच लेती है?" उसी क्षण भीतर से दूसरी आवाज़ आई— "या शायद... वही डोर हमें टूटने से भी बचाती है?" वह ठिठक गई। उसे पहली बार समझ आया— जीवन में हर बात का केवल एक उत्तर नहीं होता।
उस रात उसने अपनी पुरानी डायरी खोली। पहली बार उसने एक नया पन्ना लिखा। ऊपर तारीख़ डाली। फिर बहुत देर तक खाली पन्ने को देखती रही। आख़िरकार उसने केवल एक पंक्ति लिखी—
"मुझे कोई रास्ता नहीं चाहिए... मुझे बस इतना जानना है कि क्या मैं अपने रास्ते पर चलने की अनुमति रखती हूँ?"
उसने डायरी बंद कर दी। कमरे की बत्ती बुझा दी। लेकिन उसके भीतर... एक प्रश्न अभी भी जल रहा था।
"दुनिया का सबसे कठिन प्रश्न यह नहीं कि 'तुम क्या बनना चाहते हो?'
सबसे कठिन प्रश्न यह है—'क्या तुम्हें अपने जैसा बनने की अनुमति है?'"
रात के ग्यारह बज चुके थे। पूरा घर सो चुका था। दीवार घड़ी की टिक-टिक अब पूरे घर में सुनाई दे रही थी। रसोई से हल्की-सी बर्तनों की गंध आ रही थी। बाहर सड़क पर लगे बिजली के खंभे की पीली रोशनी खिड़की से कमरे में गिर रही थी। स्वच्छंदा बिस्तर पर लेटी थी।
आँखें बंद थीं...पर नींद कहीं नहीं थी। उसने करवट बदली। तकिया बदला। चादर सिर तक खींच ली। फिर भी...मन नहीं रुका। मन कभी बिस्तर पर नहीं सोता। वह हमेशा भविष्य में जागता रहता है। कुछ देर बाद वह धीरे से उठी।कमरे का दरवाज़ा खोला।बरामदे से होती हुई सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। हर सीढ़ी पर उसके कदमों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। ऊपर पहुँचकर उसने आसमान की ओर देखा। आज चाँद पूरा नहीं था। जैसे किसी ने उसका एक हिस्सा अपने पास रख लिया हो। वह छत की मुंडेर पर बैठ गई। दूर-दूर तक शहर सो रहा था। लेकिन उसे पहली बार लगा... शहर कभी नहीं सोता। हर घर में कोई न कोई जाग रहा होता है। कहीं कोई पिता हिसाब लगा रहा होता है कि अगले महीने की फीस कैसे भरेगा। कहीं कोई माँ भगवान से अपने बच्चे के लिए प्रार्थना कर रही होती है। कहीं कोई लड़का नौकरी के आवेदन भर रहा होता है। और कहीं... कोई लड़की अपनी पहचान खोज रही होती है।हवा का एक तेज़ झोंका आया। उसके खुले बाल चेहरे पर बिखर गए। उसने बाल हटाए। आँखें बंद कीं। और तभी...उसे फिर वही दो आवाज़ें सुनाई दीं। पहली आवाज़...हल्की...मुक्त... जैसे पहाड़ों से उतरती कोई नदी।
"स्वच्छंदा..."
"हाँ?"
"तुझे याद है... तू बचपन में क्या बनना चाहती थी?"
उसने मुस्कुराने की कोशिश की। "हर दिन कुछ और..."
"क्यों?"
"क्योंकि तब डर नहीं था।"
दूसरी आवाज़ आई। धीमी... भारी... जैसे किसी बंद कमरे में रखा लोहे का संदूक।
"अब डरना सीख गई है।"
"हाँ..."
"और डरना ज़रूरी है।"
"क्यों?"
"क्योंकि एक गलती... पूरी ज़िंदगी बदल सकती है।"
पहली आवाज़ हँसी। "लेकिन डरते-डरते जीना भी तो पूरी ज़िंदगी बदल देता है।"
स्वच्छंदा ने दोनों हथेलियों से अपना चेहरा ढक लिया। उसे लगा... जैसे उसके भीतर दो दुनिया बसती हैं। एक दुनिया कहती थी—"उड़..."
दूसरी कहती थी—"रुक..."
एक कहती—"दिल की सुन..."
दूसरी कहती—"दुनिया की सुन..."
और सबसे कठिन बात यह थी... दोनों ही उसे गलत नहीं लग रही थीं। उसी समय नीचे से हल्की-सी आवाज़ आई।
"स्वच्छंदा..." वह चौंक गई। माँ थीं।
"तू यहाँ है?"
"नींद नहीं आ रही थी..."
माँ उसके पास आकर बैठ गईं। कुछ देर दोनों चुप रहीं। रात की हवा उनके बीच से गुजरती रही।
फिर माँ ने पूछा— "कुछ कहना चाहती है?"
स्वच्छंदा ने बहुत देर बाद कहा—"मम्मी..."
"हूँ?"
"...अगर मैं गलत निर्णय ले लूँ तो?"
माँ ने उसकी ओर देखा। "गलत निर्णय?"
"अगर मैंने ऐसा रास्ता चुन लिया...
जिसमें मैं सफल नहीं हुई..."
"...तो?"
"तो..."
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
"...क्या आप लोग मुझसे निराश हो जाएँगे?"
माँ ने बिना कुछ कहे उसका हाथ पकड़ लिया। बहुत देर तक कुछ नहीं बोलीं। फिर धीरे से कहा—
"बेटा...
हमें तेरी असफलता से डर नहीं लगता।"
स्वच्छंदा ने उनकी ओर देखा।
"तो फिर?"
माँ की आँखें भीग गईं।
"हमें डर इस बात का लगता है...
कि कहीं तू अपने डर के कारण... अपनी मुस्कान न खो दे।"
स्वच्छंदा का सिर माँ के कंधे पर टिक गया। कई दिनों से जो आँसू उसकी आँखों में अटके हुए थे...
आज चुपचाप बह निकले। माँ ने उन्हें पोंछा नहीं। कुछ आँसू पोंछे नहीं जाते... उन्हें बह जाने देना चाहिए।
अगली सुबह... पिता दफ़्तर जाने की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने जेब से पुराना चमड़े का बटुआ निकाला। उसमें कुछ नोट गिने। फिर वापस रख दिए। फिर दोबारा निकाले। फिर गिने। स्वच्छंदा दरवाज़े के पीछे खड़ी यह सब देख रही थी। पिता ने उसे नहीं देखा। उन्होंने धीरे से माँ से कहा—
"अगर अच्छे कॉलेज में एडमिशन मिल गया... तो कुछ पैसों का इंतज़ाम और करना पड़ेगा।"
माँ ने केवल इतना कहा—"हो जाएगा।"
"कैसे?"
"जैसे अब तक होता आया है।"
दोनों मुस्कुराए।
लेकिन वह मुस्कान...
थोड़ी थकी हुई थी।
उस दिन पहली बार... स्वच्छंदा को समझ आया... कि उसके सपनों का बोझ केवल उसके कंधों पर नहीं है। उसके पिता भी उसे उठाए हुए हैं। उसकी माँ भी। उसका भाई भी। और शायद...इसीलिए निर्णय लेना इतना कठिन हो जाता है। क्योंकि वह केवल अपना भविष्य नहीं चुन रही होती... वह उन सभी उम्मीदों के बीच रास्ता खोज रही होती है... जो उससे प्रेम भी करती हैं... और अनजाने में उसे बाँध भी देती हैं। शाम को उसने अपनी डायरी फिर खोली। आज उसने केवल एक वाक्य नहीं लिखा। उसने पहली बार अपने मन से प्रश्न किया—
"क्या मैं सचमुच अपने भविष्य से डर रही हूँ... या मैं लोगों की उम्मीदों से डर रही हूँ?"
कलम वहीं रुक गई। क्योंकि...उसके पास अभी भी उत्तर नहीं था। आकाश में बादल घिरने लगे थे। गर्मी की पहली आँधी आने वाली थी। पेड़ों की डालियाँ झुक रही थीं। सूखे पत्ते हवा में उड़ रहे थे। स्वच्छंदा खिड़की पर खड़ी उन्हें देख रही थी। उसे लगा... सूखा पत्ता पेड़ से टूटता ज़रूर है... लेकिन हवा उसे जहाँ चाहे वहाँ नहीं ले जाती। कभी-कभी... वह अपनी दिशा भी चुन लेता है। उसने पहली बार गहरी साँस ली। शायद... बहुत दिनों बाद। और उसी क्षण... उसके भीतर की दोनों आवाज़ें पहली बार एक साथ चुप हो गईं।
अध्याय – 3
जब घर में बातें होने लगती हैं...
और बच्चे चुप होने लगते हैं।
"हर घर में प्रेम होता है।
लेकिन हर घर में प्रेम की भाषा एक जैसी नहीं होती।
कहीं वह आलिंगन बनकर मिलता है...
कहीं सलाह बनकर...
और कहीं-कहीं... दबाव बनकर।"
मई की शुरुआत हो चुकी थी।दोपहर अब पहले जैसी नहीं रही थी। धूप इतनी तेज़ हो गई थी कि आँगन में रखा तुलसी का पौधा भी दोपहर भर झुका रहता। हवा गर्म थी, लेकिन उसके भीतर एक अजीब-सी बेचैनी थी। ऐसा लगता था... जैसे पूरा शहर किसी एक दिन का इंतज़ार कर रहा हो।
रिज़ल्ट का दिन।
लेकिन केवल बच्चे ही रिज़ल्ट का इंतज़ार नहीं कर रहे थे। माता-पिता... रिश्तेदार... पड़ोसी... कोचिंग वाले... कॉलेज... सब इंतज़ार कर रहे थे। जैसे किसी बच्चे के अंक केवल उसके नहीं... पूरे समाज के हों। स्वच्छंदा उस सुबह बहुत जल्दी उठ गई थी। सूरज अभी निकला भी नहीं था। वह चुपचाप रसोई में गई। गिलास में पानी भरा। खिड़की के पास खड़ी होकर बाहर देखने लगी।गली बिल्कुल शांत थी। सिर्फ़ एक बूढ़ा आदमी रोज़ की तरह टहल रहा था। उसे देखकर स्वच्छंदा सोचने लगी—
"कितना अजीब है..." "बचपन में लगता था बड़े लोग कितने निश्चिंत होते होंगे..."
"और अब लगता है..."
"हर उम्र अपने साथ एक नया बोझ लेकर आती है।"
माँ पीछे से आईं।
"इतनी सुबह?"
"नींद खुल गई..."
माँ ने कुछ नहीं पूछा। उन्होंने गैस पर चाय चढ़ा दी। कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं... जहाँ सवालों से ज़्यादा मौन काम करता है। चाय पीते-पीते माँ अचानक बोलीं—
"तुझे याद है..."
"क्या?"
"जब तू पाँच साल की थी..."
"हूँ..."
"तू रोज़ कहती थी...
'मम्मी... मुझे जल्दी बड़ा कर दो।'"
स्वच्छंदा हँस पड़ी।
"हाँ..."
"और आज?"
माँ ने उसकी ओर देखा।
"अगर भगवान कह दें कि फिर से वही पाँच साल की हो जा..."
तो क्या करेगी?"
स्वच्छंदा का चेहरा अचानक शांत हो गया। उसने खिड़की से बाहर देखा। बहुत देर तक। फिर धीमे से बोली—
"...शायद बिना सोचे मान जाऊँ।"
उसी समय बाहर से आवाज़ आई— "राम-राम भाभी!"
शारदा चाची फिर आ गई थीं। हाथ में सब्ज़ियों का थैला था। लेकिन बात सब्ज़ियों की नहीं हुई।
"रिज़ल्ट आने वाला है न?"
"हाँ..."
"अच्छा है..."
फिर उन्होंने मुस्कुराते हुए वही वाक्य कहा... जो पिछले कुछ दिनों में स्वच्छंदा दर्जनों बार सुन चुकी थी—
अब तो ज़िंदगी का असली फैसला होगा।
स्वच्छंदा ने पहली बार सोचा— "क्या सचमुच?"
"क्या जीवन केवल एक रिज़ल्ट से तय हो जाता है?"
सुबह से ही पूरे घर में एक अनकही बेचैनी थी। दीवार पर लगी घड़ी जैसे आज कुछ तेज़ चल रही थी। रिज़ल्ट का समय नज़दीक आ रहा था। स्वच्छंदा के हाथ बार-बार ठंडे हो रहे थे। मोबाइल उसके सामने रखा था।
वेबसाइट खुली हुई थी। रोल नंबर उसने तीन बार जाँचा। उँगली "Submit" पर जाकर रुक जाती। उसे ऐसा लग रहा था... जैसे इस बटन के दूसरी तरफ़ केवल अंक नहीं... उसके आने वाले कई वर्षों का बोझ रखा हो। आख़िर उसने आँखें बंद कीं... और बटन दबा दिया। कुछ क्षण... सिर्फ़ स्क्रीन घूमती रही।
फिर परिणाम सामने था। वह बहुत देर तक स्क्रीन को देखती रही।अंक बुरे नहीं थे...लेकिन... वे उसके सपनों जितने भी नहीं थे। उसकी आँखों के सामने पूरा साल घूम गया— सर्दियों की सुबहें... रात के दो बजे तक पढ़ाई... छूटे हुए त्योहार... दोस्तों की पार्टियाँ... और हर बार खुद से कहा गया एक वाक्य— "बस इस साल मेहनत कर ले..." उसने धीरे से मोबाइल नीचे रख दिया। कमरे में कोई आवाज़ नहीं थी। लेकिन उसके भीतर कुछ टूट चुका था। उसी समय माँ कमरे में आईं। उन्होंने स्क्रीन देखी। फिर स्वच्छंदा का चेहरा। कुछ नहीं पूछा। बस उसके सिर पर हाथ रख दिया। स्वच्छंदा पहली बार फूटकर रो पड़ी।
"मम्मी...
मैंने इतनी मेहनत की थी..."
माँ ने उसे सीने से लगा लिया।
"हाँ बेटा...
हमें पता है।"
इतने में पिता भी आ गए। उन्होंने मोबाइल देखा। फिर बेटी की ओर देखा।
बहुत शांत स्वर में बोले—
"बेटा... परिणाम मेहनत का प्रमाण हो सकता है... लेकिन इंसान की क्षमता का निर्णय कभी नहीं।"
स्वच्छंदा रोते हुए बोली—
"लेकिन सब लोग तो अंकों से ही पहचानेंगे..."
पिता मुस्कुराए।
"कुछ लोग पहचानेंगे..."
"...लेकिन जो लोग तुझे सच में जानेंगे..."
"...वे तेरी मेहनत से पहचानेंगे।"
तभी बड़ा भाई आदित्य भी कमरे में आया। उसने बिना कुछ कहे स्वच्छंदा के सामने उसकी पुरानी ट्रॉफियाँ रख दीं।
वाद-विवाद...चित्रकला... नाटक... भाषण... और बोला—
"इनमें से किसी पर प्रतिशत नहीं लिखा है।"
"लेकिन इनमें हर जगह तुम्हारा नाम लिखा है।"
कमरे में फिर सन्नाटा था। लेकिन इस बार... वह हार का सन्नाटा नहीं था।
वह एक परिवार के साथ खड़े होने का सन्नाटा था। उस शाम स्वच्छंदा ने पहली बार समझा—
कभी-कभी परिणाम उम्मीदों से छोटे होते हैं...
लेकिन अगर परिवार उम्मीद से बड़ा हो...
तो बच्चा टूटता नहीं... संभल जाता है।
अगले दिन आदित्य जल्दी ऑफिस से आ गया उसके हाथ में एक फ़ाइल थी।
"स्वच्छंदा..."
"हाँ भैया?"
"बैठ।"
दोनों बरामदे में बैठ गए। फ़ाइल खोली। अंदर अलग-अलग कॉलेजों के प्रॉस्पेक्टस थे।
सरकारी... निजी.. शहर के... बाहर के...
आदित्य एक-एक करके समझाने लगा।
"यहाँ फीस कम है।" "यहाँ पढ़ाई अच्छी है।" "यहाँ हॉस्टल है।" "यहाँ प्लेसमेंट ठीक है।"
वह पूरे मन से समझा रहा था। उसके चेहरे पर आदेश नहीं... ज़िम्मेदारी थी। लेकिन... स्वच्छंदा को हर पन्ना किसी किताब का नहीं... किसी अदालत का फैसला लग रहा था।
"कुछ पूछना है?"
आदित्य ने पूछा।
स्वच्छंदा ने धीरे से कहा—
"भैया..."
"हाँ?"
"अगर मैं... वह न चुनूँ जो सब चाहते हैं..."
तो?"
आदित्य कुछ पल चुप रहा। उसने फ़ाइल बंद कर दी।
"देख..."
"हूँ?"
"मैं तुझे मजबूर नहीं करना चाहता।"
"फिर?"
"बस..."
उसने गहरी साँस ली।
"...मैं नहीं चाहता कि दस साल बाद तू पीछे मुड़कर यह कहे कि किसी ने मुझे समझाया ही नहीं।"
स्वच्छंदा ने पहली बार महसूस किया— हर सलाह के पीछे दबाव नहीं होता। कई बार...डर छिपा होता है।
शाम को नंदिनी का संदेश आया— "कल मिलना है। ज़रूरी है।"
स्वच्छंदा तुरंत तैयार हो गई। अगले दिन पाँचों सहेलियाँ फिर उसी पुराने बरगद के नीचे मिलीं। लेकिन इस बार...
हँसी सबसे कम थी। मेघा की आँखों के नीचे काले घेरे थे। गौरी बार-बार अपनी उँगलियाँ मरोड़ रही थी। कृतिका बार-बार मोबाइल देख रही थी। नंदिनी बिल्कुल चुप थी।
आख़िर स्वच्छंदा ने पूछा—
"क्या हुआ?"
नंदिनी ने पहली बार अपनी आँखें उठाईं। उनमें आँसू थे।
"मैं..."
उसकी आवाज़ काँप रही थी।
"...मैं डॉक्टर नहीं बनना चाहती।"
चारों सहेलियाँ उसे देखती रह गईं।
"लेकिन..."
"घर में सबने तय कर लिया है।"
"तूने बताया?"
"बताया..."
"फिर?"
"पापा ने कहा..."
वह रुक गई।
बहुत कोशिश के बाद बोली— 'शौक़ बाद में पूरे कर लेना... पहले करियर बना लो।'
बरगद के पत्ते हवा में हिले। किसी ने कुछ नहीं कहा। क्योंकि... वह वाक्य केवल नंदिनी का नहीं था।
वह इस देश के लाखों घरों में हर साल बोला जाता है। स्वच्छंदा बहुत देर तक मिट्टी में एक लकड़ी से गोल-गोल रेखाएँ बनाती रही। फिर उसने धीरे से पूछा—
"अगर..."
"हूँ?"
"...अगर हम सब गलत रास्ता चुन लें तो?"
मेघा मुस्कुराई।
"शायद..."
"...हम रास्ता बदल लेंगे।"
गौरी बोली—
"अगर बदलने की इजाज़त मिली तो..."
और फिर...पाँचों चुप हो गईं। क्योंकि उस चुप्पी में... उनकी पूरी उम्र बैठी थी।
"कई बार बच्चों के कमरे में सन्नाटा इसलिए नहीं होता कि वहाँ कोई नहीं बोल रहा होता...
बल्कि इसलिए होता है क्योंकि वहाँ हजारों अनकहे वाक्य बैठे होते हैं।"
बरगद के नीचे हुई उस मुलाक़ात के बाद पाँचों सहेलियाँ अलग-अलग दिशाओं में चली गईं। सूरज पश्चिम की ओर झुकने लगा था। सड़क पर लंबी होती परछाइयाँ किसी अधूरी कहानी जैसी लग रही थीं। स्वच्छंदा अकेली घर लौट रही थी। आज उसने पहली बार महसूस किया... कि सड़कें भी इंसानों जैसी होती हैं।
हर मोड़ पर वे तुमसे पूछती हैं— "अब कहाँ?"
लेकिन उत्तर... तुम्हें ही देना पड़ता है। घर पहुँची तो दरवाज़ा खुला था। अंदर से माँ की आवाज़ आ रही थी। वे फ़ोन पर किसी से बात कर रही थीं।"हाँ दीदी...
हाँ... देख रहे हैं...
भगवान जैसा चाहेंगे..."
स्वच्छंदा चुपचाप अपने कमरे की ओर बढ़ गई। लेकिन उसके कदम वहीं रुक गए। फ़ोन के दूसरी तरफ़ क्या कहा गया था, यह तो उसे सुनाई नहीं दिया... पर माँ का अगला वाक्य उसने साफ़ सुना—
"बच्ची है अभी... थोड़ा समय तो दीजिए उसे।"
उसका दिल जैसे एक पल को ठहर गया। उसे पहली बार एहसास हुआ... माँ सिर्फ़ उसकी माँ नहीं थीं। वे उसके और दुनिया के बीच खड़ी एक ढाल भी थीं। कमरे में पहुँचकर उसने बैग मेज़ पर रखा। अलमारी खोली। ऊपर वाले खाने में उसकी स्कूल की ट्रॉफियाँ रखी थीं।
वाद-विवाद प्रतियोगिता। नाटक। चित्रकला। भाषण। सांस्कृतिक कार्यक्रम।
हर ट्रॉफी पर उसका नाम लिखा था— "स्वच्छंदा"
उसने एक ट्रॉफी उठाई। धूल की पतली परत उँगलियों पर आ गई। वह मुस्कुराई... फिर अचानक उसकी मुस्कान गायब हो गई।
उसने ट्रॉफी वापस रख दी। कमरे की खिड़की खोल दी। बाहर बच्चे खेल रहे थे। एक छोटी-सी लड़की अपनी साइकिल चलाना सीख रही थी। वह बार-बार गिरती... फिर उठ जाती। उसके पिता पीछे से सीट पकड़े हुए थे। कुछ देर बाद उन्होंने हाथ छोड़ दिया। लड़की को पता भी नहीं चला। वह खुद साइकिल चला रही थी। स्वच्छंदा बहुत देर तक उस दृश्य को देखती रही। उसके मन में एक विचार आया—
"क्या हर पिता को एक दिन हाथ छोड़ना ही पड़ता है?"
"और क्या हर बच्चा उस दिन डरता है?"
शाम को आदित्य उसके कमरे में आया। हाथ में दो कुल्फियाँ थीं।
"चल... छत पर चलते हैं।"
"अचानक?"
"बहुत दिनों से तू हँसी नहीं है।"
दोनों छत पर आकर बैठ गए।
कुछ देर तक केवल कुल्फी खाते रहे।
फिर आदित्य ने पूछा— "याद है... बचपन में तू कहती थी कि तू पहाड़ों में रहेगी?"
स्वच्छंदा हँस पड़ी।
"और तुम कहते थे कि मैं दो दिन में वापस आ जाऊँगी।"
"हाँ..."
दोनों कुछ पल हँसे। फिर आदित्य गंभीर हो गया।
"स्वच्छंदा..."
"हूँ?"
"एक बात पूछूँ?"
"पूछो।"
"तुझे सबसे ज़्यादा डर किस बात का लगता है?"
उसने तुरंत उत्तर नहीं दिया। बहुत देर बाद बोली—
"...लोगों से।"
आदित्य चौंका।
"मतलब?"
"अगर मैं असफल हुई... तो लोग क्या कहेंगे।" "अगर मैं सफल हुई... तो लोग क्या उम्मीद करेंगे।"
"अगर मैंने अलग रास्ता चुना...तो लोग हँसेंगे।" "अगर मैंने वही रास्ता चुना... जो सब चाहते हैं...
तो शायद मैं खुद से दूर हो जाऊँगी।"
उसकी आँखें भर आईं।
"भैया... क्या कोई ऐसा रास्ता नहीं... जहाँ लोग भी खुश रहें... और मैं भी?"
आदित्य ने पहली बार कोई सलाह नहीं दी। उसने सिर्फ़ आसमान की ओर देखा। फिर बहुत धीरे से कहा—
"अगर मुझे इसका उत्तर पता होता न..." "...तो शायद मैं भी आज कुछ और होता।"
स्वच्छंदा ने पहली बार अपने बड़े भाई को... एक बड़े भाई की तरह नहीं... एक इंसान की तरह देखा। जिसके अपने भी अधूरे सपने थे। रात गहरा चुकी थी। सब सो गए थे। लेकिन स्वच्छंदा की आँखों में नींद अभी भी नहीं थी। वह पानी पीने के लिए बाहर निकली। बरामदे से गुजरते हुए उसने देखा— पिता के कमरे की बत्ती जल रही थी। दरवाज़ा थोड़ा खुला था। वह अनजाने में रुक गई। अंदर पिता मेज़ पर बैठे थे। सामने पुरानी डायरी खुली हुई थी।कुछ कागज़। कुछ रसीदें। कुछ पुराने प्रमाणपत्र। वे बहुत देर तक उन्हें देखते रहे। फिर धीरे से एक कागज़ उठाया।उसे देखा...मुस्कुराए... और आँखें बंद कर लीं। उस मुस्कान में खुशी नहीं थी। वह याद थी। बहुत पुरानी। बहुत गहरी। स्वच्छंदा वापस अपने कमरे में आ गई। लेकिन उसका मन वहीं अटक गया।
"पापा क्या देख रहे थे?"
"क्या उनके भी कोई सपने थे?"
"क्या उन्होंने भी कभी कुछ छोड़ दिया था?"
उस रात... पहली बार... उसे अपने पिता के बारे में जानने की इच्छा हुई। अब तक वह उन्हें सिर्फ़ "पापा" मानती आई थी। आज उसे लगा... उनके भीतर भी शायद एक अधूरा युवक अभी तक ज़िंदा है। जिसने कभी... कुछ बनने का सपना देखा होगा। उसने अपनी डायरी खोली।
आज उसने लिखा—
"शायद हर माँ कभी एक बेटी थी।
हर पिता कभी एक बेटा था।
हर बड़ा भाई कभी एक छोटा भाई था।
फिर बड़े होकर हम अपने सपनों की भाषा क्यों भूल जाते हैं?"
कलम रुक गई। लेकिन इस बार... प्रश्न अधूरा नहीं था। उसके भीतर... एक नया अध्याय जन्म ले चुका था।
"कुछ सच इतने देर से सामने आते हैं कि उन्हें सुनने वाला बच्चा... उसी दिन बड़ा हो जाता है।"
उस रात स्वच्छंदा को नींद नहीं आई। पिता के कमरे में रखी वह पुरानी डायरी... वह बार-बार उसकी आँखों के सामने आ रही थी। उसे नहीं पता था... उस डायरी में क्या लिखा है। लेकिन उसे इतना ज़रूर महसूस हो रहा था कि... उसमें केवल शब्द नहीं... किसी जीवन के अधूरे मौसम बंद हैं।
अगले दिन रविवार था। पिता घर पर ही थे। सुबह-सुबह उन्होंने पुरानी लकड़ी की अलमारी खोली। ऊपर रखा लोहे का संदूक नीचे उतारा। उस संदूक पर धूल की मोटी परत जमी थी। माँ मुस्कुराईं।
"इतने साल बाद आज इसकी याद कैसे आ गई?"
पिता भी हल्का-सा मुस्कुराए।
"सोचा...
थोड़ा पुराना सामान देख लूँ।"
संदूक खुला। अंदर कुछ पुराने कपड़े थे। कुछ पीले पड़ चुके कागज़। एक टूटी हुई घड़ी। कॉलेज का पहचान-पत्र। और...नीले कपड़े में लिपटी वही डायरी। स्वच्छंदा दूर खड़ी सब देख रही थी। उसने पहली बार अपने पिता की आँखों में वह चमक देखी... जो वह किसी पुराने दोस्त से मिलने पर आती है।
पिता ने डायरी खोली। पहला पन्ना... दूसरा... तीसरा... और फिर... वे अचानक रुक गए। काफी देर तक उसी पन्ने को देखते रहे। उनकी आँखें पढ़ नहीं रही थीं... याद कर रही थीं।
माँ ने धीरे से पूछा— "क्या लिखा है?"
उन्होंने मुस्कुराने की कोशिश की।
"कुछ नहीं... बस... पुरानी बातें हैं।"
लेकिन उनकी आवाज़ बता रही थी... वहाँ बहुत कुछ लिखा है। थोड़ी देर बाद पिता नहाने चले गए। डायरी मेज़ पर खुली रह गई। स्वच्छंदा कई मिनट तक उसे देखती रही। मन बार-बार कह रहा था—
"मत छू..."
दूसरा मन कह रहा था— "शायद यहीं वह उत्तर हो जिसे तू खोज रही है।"
आख़िर उसने धीरे से डायरी उठाई। पहले पन्ने पर लिखा था—
"यदि कभी मेरा बच्चा यह डायरी पढ़े..."
स्वच्छंदा का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। उसने आगे पढ़ा।
"बेटा...
अगर तू यह पढ़ रहा है...
तो शायद मैं तुझे कभी यह बातें सामने बैठकर नहीं बता पाया।"
उसकी उँगलियाँ काँपने लगीं।
"जब मैं तेरी उम्र का था... तब मैं चित्रकार बनना चाहता था।"
स्वच्छंदा एकदम ठिठक गई। चित्रकार? उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। उसके पिता... जो आज हर बात हिसाब से करते थे... कभी रंगों से जीवन बनाना चाहते थे?
डायरी आगे कह रही थी—
"मुझे खेतों से ज़्यादा कैनवास अच्छे लगते थे।
किताबों से ज़्यादा रंग।
नौकरी से ज़्यादा चित्र बनाना।"
"लेकिन दादाजी ने कहा—
'रंगों से घर नहीं चलता।'"
"उस दिन मैंने पहली बार अपने सारे चित्र बाँधकर संदूक में रख दिए।"
"और फिर... कभी उन्हें बाहर नहीं निकाला।"
स्वच्छंदा की आँखों से आँसू टपक पड़े। उसे अचानक याद आया— बचपन में एक बार उसने पापा से पूछा था—
"आप इतनी अच्छी ड्राइंग कैसे बना लेते हो?"
और पापा ने हँसकर कहा था—"बस... ऐसे ही।"
आज समझ आया... वह "ऐसे ही" नहीं था। वह एक अधूरा जीवन था। डायरी का अगला पन्ना...
और भी भारी था।
"मैं अपने पिता से कभी नाराज़ नहीं रहा।"
"क्योंकि उन्होंने मेरे सपने नहीं मारे थे..."
"उन्होंने अपने डर को बचाया था।"
"उन्हें डर था कि उनका बेटा भूखा न रह जाए।"
"और आज..."
"जब मेरी अपनी बेटी बड़ी हो रही है..."
"तो मुझे डर लगता है कि कहीं मैं भी वही गलती न दोहरा दूँ।"
स्वच्छंदा अब रो नहीं रही थी। वह टूट रही थी। धीरे-धीरे... बिना आवाज़ के। उसी समय पीछे से आवाज़ आई।
"क्या पढ़ रही है?"
स्वच्छंदा घबरा गई। मुड़कर देखा। पिता दरवाज़े पर खड़े थे। कुछ पल दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। कमरे में सन्नाटा था। इतना गहरा... कि दीवार पर लगी घड़ी की टिक-टिक भी भारी लग रही थी।
स्वच्छंदा की आँखों से आँसू फिर बह निकले।
"पापा..."
उसकी आवाज़ टूट गई।
"...आपने कभी बताया क्यों नहीं?"
पिता धीरे-धीरे उसके पास आए। डायरी बंद की। मुस्कुराए। लेकिन इस बार मुस्कान के पीछे छिपना नहीं चाहा।
उन्होंने कहा— "क्योंकि... हर पिता चाहता है... कि उसकी संतान उसके संघर्ष देखे... उसकी हार नहीं।"
स्वच्छंदा ने पहली बार अपने पिता को गले लगा लिया। बचपन के बाद... शायद पहली बार। दोनों कुछ नहीं बोले।
कई रिश्तों में... सबसे सच्ची बातचीत... आँसुओं से होती है। बहुत देर बाद पिता ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—
"स्वच्छंदा..."
"जी..."
"एक बात हमेशा याद रखना।"
"क्या?"
उन्होंने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
"मेरे अधूरे सपनों का बोझ अपने कंधों पर मत रखना।"
"और..."
"अपने सपनों का गला केवल इसलिए मत घोंटना कि दुनिया ताली किसी और बात पर बजाती है।"
उस दिन... पहली बार... स्वच्छंदा को अपने प्रश्न का उत्तर नहीं मिला। लेकिन... उसे यह समझ आ गया... कि उत्तर खोजने में वह अकेली नहीं है। उसके पिता भी... कभी उसी रास्ते से गुज़रे थे। उस रात उसने अपनी डायरी में केवल एक पंक्ति लिखी—
"आज मैंने अपने पिता को पहली बार 'पापा' नहीं... एक सपने देखने वाले लड़के के रूप में देखा।"
और नीचे...
बहुत छोटे अक्षरों में—
"शायद हर पीढ़ी अगली पीढ़ी को सपने नहीं देती...
कभी-कभी केवल अपना डर दे देती है।"
हर पीढ़ी अगली पीढ़ी को विरासत देती है। प्रश्न केवल इतना है—हम अपने बच्चों को विरासत में डर देंगे... या विश्वास? क्योंकि सपने तब नहीं मरते जब रास्ते कठिन होते हैं... सपने तब मरते हैं, जब उन्हें देखने की अनुमति छीन ली जाती है।
अब निर्णय समाज का है—उसे आज्ञाकारी बच्चे चाहिए... या स्वच्छंद इंसान।
॥ इति श्री ॥
