अध्याय 1
पीपल की छाँव
गाँव के छोर पर एक पुराना पीपल का पेड़ था। इतना पुराना कि गाँव के सबसे बूढ़े आदमी भी उसकी उम्र ठीक-ठीक नहीं बता सकते थे।
कोई कहता—मेरे दादा के समय से है।
कोई कहता—अरे, हमारे दादा भी इसके नीचे बैठा करते थे।
और रामदीन हमेशा हँसकर कहता—तुम लोगों के दादा की उम्र तो पता नहीं, लेकिन पीपल उनसे ज़रूर बड़ा है।
रामदीन...गाँव की सबसे छोटी और सबसे मशहूर दुकान का मालिक था। दुकान इतनी छोटी थी कि उसमें एक बार में चार आदमी खड़े हो जाएँ तो पाँचवें को दरवाज़े से बाहर ही रहना पड़ता। लकड़ी की पुरानी अलमारियाँ थीं। एक तरफ़ दाल के डिब्बे। दूसरी तरफ़ साबुन, तेल और माचिस। छत से बिस्कुट के पैकेट लटकते रहते। और सामने... एक पुरानी लकड़ी की गद्दी। यही रामदीन की दुनिया थी।
सुबह सूरज निकलने से पहले ही दुकान खुल जाती। रामदीन झाड़ू लगाता। पीपल के नीचे पानी का छिडक़ाव करता। फिर गद्दी पर बैठकर चाय पीता। पहला ग्राहक अक्सर कोई सामान लेने नहीं आता था।
वह आता था...बात करने।
- रामदीन, चाय पी?
- नहीं।
- तो बना ले।
- तेरे लिए?
- अपने लिए बना... मैं भी पी लूँगा।
रामदीन हँस पड़ता।चूल्हे पर पानी चढ़ जाता। और पाँच मिनट बाद... दुकान के सामने गाँव की पहली बैठक शुरू हो जाती।
रामदीन की दुकान पर सामान कम बिकता था...खबरें ज़्यादा मिलती थीं। किसके खेत में इस बार गेहूँ अच्छा हुआ। किसकी लडक़ी की शादी तय हुई। किसके बेटे को शहर में नौकरी मिली। किसका लडक़ा परीक्षा में पास हुआ। किसके घर नया ट्रैक्टर आया। किसकी बहू नाराज़ होकर मायके चली गई। किसके यहाँ बच्चा हुआ। गाँव में कुछ भी हो... रामदीन की दुकान तक पहुँचे बिना नहीं रहता। और मज़े की बात यह थी कि रामदीन को कोई खबर पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। खबरें खुद चलकर उसके पास आती थीं।
एक दिन सुबह हरिया किसान दुकान पर आया।
-रामदीन, दो किलो चीनी देना।
रामदीन ने डिब्बा उठाया। फिर अचानक बोला—तेरी लडक़ी की शादी पक्की हो गई?
हरिया चौंका।
- तुझे कैसे पता?
रामदीन मुस्कुराया।
- कल तेरी बीवी आई थी।
- उसने बताया?
- नहीं।
- फिर?
रामदीन ने चीनी तौलते हुए कहा—
- चीनी तीन किलो ले गई थी।
हरिया हँस पड़ा।
- अरे वाह!
रामदीन बोला—गाँव में शादी से पहले चीनी बढ़ जाती है... और शादी के बाद उधार।
दोनों हँस पड़े। दोपहर में स्कूल से लौटते बच्चे दुकान के सामने जमा हो जाते। किसी को टॉफी चाहिए। किसी को पाँच रुपये का बिस्कुट। किसी को पेंसिल। और किसी को... बस रामदीन से बात करनी होती।
सबसे छोटा बच्चा अक्सर पूछता—रामदीन काका, आज कहानी सुनाओ।
रामदीन कहता—पहले टॉफी खरीद।
बच्चा जेब टटोलता। -पैसे नहीं हैं।
- तो कहानी भी नहीं है।
बच्चा मुँह लटका लेता। रामदीन कुछ देर उसे देखता... फिर टॉफी निकालकर उसके हाथ में रख देता।
- जा...आज कहानी उधार।
बच्चा खिलखिलाता हुआ भाग जाता। रामदीन की एक पुरानी कॉपी थी। मोटी। पीले पड़े पन्नों वाली। उसमें गाँव के लोगों का उधार लिखा रहता था। लेकिन उस कॉपी में सिर्फ़ पैसे नहीं लिखे थे। उसमें गाँव की छोटी-छोटी कहानियाँ भी थीं। किस दिन किसने कितना उधार लिया। किसने कब चुका दिया। किसने बेटी की शादी के समय सामान लिया। किसने फसल खराब होने पर छह महीने बाद पैसे दिए। और कुछ नामों के सामने... रामदीन ने कभी रकम लिखी ही नहीं।
बस लिख दिया था—जब हो तब देना।
एक दिन गाँव का मास्टरजी दुकान पर बैठे थे। उन्होंने वह कॉपी देख ली।
पूछा—रामदीन, यह क्या है?
रामदीन बोला—गाँव का हिसाब।
मास्टरजी ने पन्ने पलटे। फिर बोले—यह हिसाब नहीं है रामदीन...
- फिर?
- यह तो गाँव का इतिहास है।
रामदीन कुछ क्षण चुप रहा। फिर हँसकर बोला—इतिहास तो बड़े लोग लिखते हैं मास्टरजी।
मास्टरजी ने कॉपी बंद की। और बोले—बड़े लोग इतिहास लिखते हैं... लेकिन गाँव का असली इतिहास...तुम जैसे लोग याद रखते हैं।
रामदीन ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने बस पीपल की ओर देखा। पत्तियाँ हवा में हिल रही थीं।
शाम को दुकान के सामने फिर चार आदमी बैठे थे। एक किसान। एक बुज़ुर्ग। एक नौजवान। और रामदीन। बात चल रही थी गाँव की सडक़ की। नौजवान कह रहा था—अब गाँव बदलना चाहिए।
बुज़ुर्ग बोले—बदलना चाहिए... लेकिन इतना नहीं कि गाँव ही पहचान में न आए।
रामदीन चुपचाप सुन रहा था। फिर उसने कहा—गाँव बदलता रहे... बस इतना ध्यान रहे कि बदलते-बदलते लोग एक-दूसरे को पहचानना न छोड़ दें।
कुछ पल के लिए सब शांत हो गए। पीपल की पत्तियाँ फिर हिलीं। और दुकान के ऊपर टँगा पुराना बल्ब जल उठा।
उस रात रामदीन ने दुकान बंद की। शटर आधा गिराया। फिर अचानक पीछे मुड़ा। पीपल के तने पर हाथ रखा।
और धीरे से बोला—कल मिलते हैं।
जैसे...वह पेड़ नहीं, उसका कोई पुराना दोस्त हो। क्योंकि रामदीन जानता था— दुकान उसकी थी। लेकिन...
पीपल की छाँव पूरे गाँव की थी।
और उस छाँव के नीचे...
अभी बहुत-सी कहानियाँ जन्म लेना बाकी थीं।
अध्याय - 2
उधार की कॉपी
रामदीन की दुकान पर एक बात बड़ी मशहूर थी—यहाँ उधार माँगने वाले को कभी शर्म नहीं आती थी। क्योंकि रामदीन उधार देते समय ऐसा चेहरा बनाता था, जैसे सामने वाला कोई एहसान नहीं, बल्कि अपना हक़ माँग रहा हो। बस एक शर्त थी। उधार लेते समय रामदीन कहता—
- पैसे जब हों तब दे देना...लेकिन हिसाब मत भूलना।
और सामने वाला हँसकर कहता—तुम्हें तो सब याद रहता है।
रामदीन जवाब देता—पैसे भूल जाऊँ तो चलेगा...आदमी नहीं भूलना चाहिए।
उसकी पुरानी कॉपी दुकान की सबसे सुरक्षित चीज़ थी। कभी वह उसे गद्दी के नीचे रखता। कभी अनाज के बोरे के पीछे। और जब कोई ग्राहक पूछता—रामदीन, मेरी पुरानी उधारी कितनी है?
तो वह कॉपी निकालकर बड़े गौर से पन्ने पलटता। फिर चश्मा नाक पर चढ़ाकर कहता—
- तेरी?
- हाँ।
- तेरी तो बहुत है।
सामने वाला घबरा जाता।
- कितनी?
रामदीन मुस्कुराता—इतनी कि गिनते-गिनते चाय ठंडी हो जाएगी।
दुकान पर बैठे लोग हँसने लगते। एक दिन शंभू आया।
- रामदीन, मेरा हिसाब बता।
रामदीन ने कॉपी खोली। कुछ देर पन्ने पलटे।
फिर बोला—सत्ताईस रुपये।
शंभू ने जेब से पचास का नोट निकाला।
- ले।
रामदीन ने पैसे लिए और बीस रुपये वापस कर दिए।
शंभू बोला—तीन रुपये कहाँ गए?
रामदीन ने कहा—तीन रुपये तेरे नहीं हैं।
- क्यों?
- पिछली बार तेरी लडक़ी के लिए पेंसिल ली थी।
- उसके पैसे तो मैंने दिए थे!
रामदीन ने कॉपी दिखाई।
- हाँ...
- लेकिन उस दिन तूने दस रुपये दिए थे। पेंसिल सात की थी।
शंभू हँस पड़ा।
- तू तीन रुपये भी याद रखता है?
रामदीन ने कहा—पैसे का हिसाब भूल जाऊँ तो दुकान कैसे चलेगी?
फिर कॉपी बंद करके बोला—लेकिन रिश्ते का हिसाब रखने लगूँ... तो गाँव कैसे चलेगा?
शंभू कुछ नहीं बोला। बस मुस्कुराकर चला गया।
दोपहर में गाँव की जमुना काकी आईं। उन्होंने चावल का छोटा पैकेट लिया। तेल लिया। माचिस ली। और जाते-जाते बोलीं—
- रामदीन, लिख लेना।
रामदीन ने पूछा—कहाँ?
- कॉपी में।
रामदीन ने सामान गिना। फिर बोला—काकी, तुम्हारा तो पहले से ही बहुत लिखा है।
काकी ने तुरंत कहा—तो मिटा दे।
रामदीन हँस पड़ा। - इतना आसान नहीं है।
-क्यों?
- तुम्हारे नाम के आगे उधार नहीं लिखा।
- फिर?
रामदीन ने कॉपी खोलकर एक पन्ना दिखाया।
वहाँ लिखा था—जमुना काकी — पति के जाने के बाद अकेली। महीने का सामान घर पहुँचा देना। हिसाब बाद में।
काकी कुछ क्षण उस पन्ने को देखती रहीं।
फिर बोलीं—तूने यह क्यों लिखा?
रामदीन ने सहजता से कहा—ताकि मैं भूल न जाऊँ।
काकी ने धीरे से कहा—बेटा... आदमी उधार भूल सकता है...
उनकी आवाज़ थोड़ी धीमी हो गई।
- लेकिन कोई अपना ध्यान रखे... यह कैसे भूल जाए?
रामदीन ने दूसरी तरफ़ देख लिया। उसे लगा... पीपल की छाँव अचानक कुछ और गहरी हो गई है।
शाम को मास्टरजी आए। उन्होंने फिर वही कॉपी माँगी।
- दिखा रामदीन।
रामदीन बोला—आज क्या पढऩा है?
मास्टरजी ने हँसकर कहा—आज गाँव पढऩा है।
रामदीन ने कॉपी उनके सामने रख दी। मास्टरजी पन्ने पलटते रहे। एक पन्ने पर लिखा था—
- हरिया — बेटी की शादी।
दूसरे पर—रघु — बैल बीमार।
तीसरे पर—सलीम — दुकान का माल जल गया।
चौथे पर—कमला — बेटे की फीस।
मास्टरजी ने सिर उठाया।
- रामदीन...
- हूँ?
- तूने इन सबके आगे तारीख़ क्यों नहीं लिखी?
रामदीन मुस्कुराया।
- क्योंकि मुझे तारीख़ नहीं... वजह याद रखनी थी।
मास्टरजी चुप हो गए।
तभी दुकान के बाहर से आवाज़ आई—
- रामदीन काका!
दस-बारह साल का सोनू दौड़ता हुआ आया।
- काका, पाँच रुपये की टॉफी देना।
रामदीन ने पूछा—पैसे?
सोनू ने जेब उलट दी। खाली।
- कल दूँगा।
रामदीन ने कहा—तेरा उधार पहले से है।
सोनू उदास हो गया।
- कितना?
रामदीन ने कॉपी खोली। कुछ लिखने का अभिनय किया।
फिर बोला—बहुत बड़ा हिसाब है।
सोनू घबरा गया।
- कितना?
रामदीन ने एक टॉफी निकालकर उसके हाथ में रख दी।
- इतना कि तू बड़ा होकर चुका सके। सोनू खुश होकर भाग गया। मास्टरजी हँस पड़े।
- तू इसे कभी पैसे नहीं वसूल पाएगा।
रामदीन ने कहा—क्यों?
- क्योंकि यह बड़ा होकर शहर चला जाएगा।
रामदीन कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला—जाएगा तो जाने देना। बस इतना याद रहे कि उसके गाँव में पीपल के नीचे एक दुकान हुआ करती थी।
रात को दुकान बंद करने से पहले रामदीन ने कॉपी फिर खोली।
आखिऱी पन्ने पर उसने एक नई बात लिखी—उधार केवल पैसों का नहीं होता।कभी-कभी आदमी किसी के भरोसे का भी उधारदार होता है।
उसने कॉपी बंद की। दीया बुझाया। और पीपल के नीचे से होकर घर की ओर चल पड़ा। पीछे दुकान शांत थी। लेकिन पीपल की पत्तियाँ... जैसे अब भी फुसफुसा रही थीं—
- इस गाँव का हिसाब अभी पूरा कहाँ हुआ है...
अध्याय 3
चिट्ठी और मोबाइल
रामदीन की दुकान पर सुबह का समय सबसे शांत होता था। दूध वाले निकल चुके होते। स्कूल जाने वाले बच्चे अभी घरों से निकले नहीं होते। और किसान खेतों की ओर जा चुके होते। ऐसे समय में रामदीन अपनी गद्दी पर बैठकर चाय पीता और पीपल की पत्तियों की आवाज़ सुनता। उसी समय डाकिया आता था। पुरानी साइकिल... कंधे पर थैला... और चेहरे पर हमेशा वही जल्दी।
रामदीन उसे देखते ही पूछता—आज कुछ आया?
डाकिया कहता—तेरे लिए नहीं। गाँव के लिए पूछ रहा हूँ।
डाकिया हँस देता।क्योंकि वह जानता था... रामदीन की दुकान पर आने वाली हर चिट्ठी थोड़ी देर बाद पूरे गाँव की खबर बन जाती थी।
उस दिन डाकिए ने एक चिट्ठी निकाली।
-हरिया के नाम है।
हरिया उस समय दुकान पर नहीं था।
रामदीन ने कहा—रख जा।
डाकिए ने चिट्ठी गद्दी पर रख दी। दोपहर में हरिया आया। रामदीन ने चिट्ठी उसकी ओर बढ़ाई। हरिया ने उलट-पलटकर देखा।
- किसकी है?
- तेरे बेटे की।
हरिया का चेहरा खिल गया।
- शहर से?
- हाँ।
हरिया ने चिट्ठी हाथ में ली। कुछ पल उसे देखता रहा।
फिर बोला—पढ़ दे।
रामदीन ने चिट्ठी खोली।
उसमें लिखा था—बाबा, मैं ठीक हूँ। नौकरी लग गई है। इस बार छुट्टी में ज़रूर आऊँगा।
हरिया चुप रहा।रामदीन ने पूछा—खुश नहीं हुआ?
हरिया ने धीरे से कहा—बहुत खुश हूँ।
फिर मुस्कुराया। - बस...चिट्ठी थोड़ी छोटी है।
रामदीन हँस पड़ा।
- बेटा नौकरी पर लग गया है। अब चिट्ठी लिखने का समय कहाँ होगा?
हरिया ने चिट्ठी मोड़ी। और जेब में रख ली।
कुछ साल बाद... चिट्ठी लगभग बंद हो गईं। मोबाइल आ गया था। अब खबरें सेकंडों में पहुँचती थीं।
- बेटा शहर पहुँच गया। बेटी की नौकरी लग गई। मामा अस्पताल में हैं। फसल अच्छी हुई।
सब कुछ... एक फोन कॉल में। फिर वीडियो कॉल में। फिर संदेश में। गाँव तेज़ी से बदल रहा था। रामदीन की दुकान पर भी अब लोग सामान लेते हुए मोबाइल पर बात करते रहते। किसी की गर्दन नीचे। किसी की आँखें स्क्रीन पर। किसी के कान में ईयरफोन। रामदीन कभी-कभी मज़ाक करता—
- सामान लेने आए हो या मोबाइल चार्ज करने?
कोई हँस देता। फिर वही स्क्रीन में खो जाता।
एक दिन सोनू, जो अब बड़ा हो चुका था, दुकान पर आया। हाथ में नया मोबाइल था।
रामदीन ने पूछा—क्या कीमत है?
- दस हज़ार।
- इतने में तो आधी दुकान भर जाएगी।
सोनू हँसा।
- काका, इसमें पूरी दुनिया है।
रामदीन ने मोबाइल हाथ में लिया। कुछ देर देखा।
फिर बोला—दुनिया इसमें है?
- हाँ।
-तो फिर लोग बाहर क्यों नहीं निकलते?
सोनू मुस्कुराया।
-समय बदल गया है काका।
रामदीन ने मोबाइल वापस कर दिया।
- समय बदला है...
फिर पीपल की ओर देखते हुए बोला—बस डर यही है कि कहीं लोग भी न बदल जाएँ।
कुछ दिन बाद गाँव के बुज़ुर्ग रघुनाथ दुकान पर बैठे थे। उन्होंने जेब से एक पुरानी चिट्ठी निकाली।
रामदीन ने पूछा—अब भी संभालकर रखी है?
रघुनाथ बोले—हाँ।
- किसकी है?
- मेरे बेटे की।
- कितनी पुरानी?
- बीस साल।
रामदीन ने चिट्ठी को देखा। कागज़ पीला पड़ चुका था। किनारे मुड़ गए थे। स्याही हल्की हो गई थी। लेकिन रघुनाथ की आँखों में... वह चिट्ठी अब भी बिल्कुल नई थी।
उन्होंने कहा—मेरा बेटा अब हर रोज़ फोन करता है।
- अच्छी बात है।
- हाँ।
कुछ पल बाद बोले—लेकिन इस चिट्ठी को हाथ में लेने पर जो लगता है...
वह रुक गए। रामदीन समझ गया।
उसी शाम एक लडक़ा दुकान पर आया।उसने कहा—रामदीन काका, मेरे मोबाइल में नेटवर्क नहीं आ रहा।
रामदीन ने कहा—पीपल के नीचे खड़े हो जा।
लडक़ा खड़ा हो गया।
- आ गया?
- नहीं।
रामदीन बोला—तो थोड़ा ऊपर चढ़ जा।
लडक़ा हँस पड़ा।
- पीपल पर?
- हाँ।
- क्यों?
रामदीन ने कहा—पहले लोग चिट्ठी का इंतज़ार करते थे। अब नेटवर्क का करते हैं।
दुकान पर बैठे सब लोग हँस पड़े।
लेकिन उसी रात... रामदीन देर तक सो नहीं पाया। उसे वह पुरानी चिट्ठी याद आती रही। उसे याद आया— किसी चिट्ठी के आने पर पूरा परिवार कैसे दरवाज़े पर इकट्ठा हो जाता था। कोई पढ़ नहीं पाता था तो पड़ोसी पढ़ता था। एक घर की खबर दूसरे घर तक जाती थी। किसी के बेटे ने शहर से पैसे भेजे— तो चौपाल को पता होता था। किसी की बेटी पहली बार ससुराल से लिखती— तो माँ चिट्ठी छाती से लगा लेती थी। चिट्ठी धीमी थी... लेकिन शायद... उसमें लोगों के बीच थोड़ा अधिक समय था।
अगली सुबह रामदीन ने अपनी दुकान की सफाई करते हुए एक पुराना डिब्बा निकाला। उसमें कई चीज़ें थीं— पुरानी रसीदें। कुछ तस्वीरें। दो-तीन चिट्ठी। और एक छोटी-सी पर्ची। उसने पर्ची खोली। उस पर लिखा था—रामदीन काका, पैसे नहीं हैं। माँ बीमार है। दवा दे देना। पैसे फसल के बाद दे दूँगा।
नीचे नाम था—सलीम।
रामदीन मुस्कुराया।
- अब तो डॉक्टर बन गया होगा।
फिर उसने पर्ची वापस रख दी। उसके चेहरे पर गर्व था। क्योंकि उसे याद था— किसी समय सलीम की माँ की दवा भी इसी दुकान से गई थी।
दोपहर में सलीम सचमुच दुकान पर आया। अब वह शहर में डॉक्टर था। रामदीन उसे देखकर चौंक गया।
- अरे!
सलीम ने झुककर उसके पैर छुए। रामदीन ने तुरंत हाथ खींच लिया।
- ये क्या कर रहा है?
सलीम मुस्कुराया।
- काका...
- हाँ?
- मेरी पहली दवा आपने दी थी।
रामदीन ने हँसकर कहा—अरे, वह तो उधार थी।
सलीम बोला—उधार दवा का था काका... एहसान का नहीं।
रामदीन कुछ नहीं बोला। बस उसकी पीठ थपथपा दी। शाम को पीपल के नीचे फिर चारपाई बिछी। सलीम बैठा था। रामदीन बैठा था। रघुनाथ भी आ गए। थोड़ी देर बाद सोनू भी मोबाइल जेब में रखकर वहीं बैठ गया। आज किसी ने मोबाइल नहीं निकाला। काफी देर तक कोई कुछ नहीं बोला।
फिर रामदीन ने पूछा—तो डॉक्टर साहब...
सलीम हँसा।
- हाँ काका?
- शहर में भी ऐसी कोई जगह है?
- कैसी?
रामदीन ने पीपल की ओर देखा।
- जहाँ लोग बिना किसी काम के > बस बैठ जाएँ।
सलीम ने चारों ओर देखा।
फिर धीरे से बोला—नहीं काका।
रामदीन मुस्कुराया।
- तो फिर...
- क्या?
- गाँव को अभी शहर बनने की जल्दी नहीं करनी चाहिए।
पीपल की पत्तियाँ हवा में हिलीं। और उस शाम... कई साल बाद... दुकान के सामने मोबाइल से ज़्यादा बातों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
अध्याय - 4
दुकान पर आया शहर
उस दिन सुबह से ही गाँव में एक खबर घूम रही थी—रमेश का बेटा वापस आ गया है।
अब इसमें ऐसी कौन-सी बड़ी बात थी? गाँव के लोग आते-जाते रहते थे। लेकिन यह लडक़ा...अमित। पाँच साल से शहर में था। नौकरी करता था। अच्छी तनख्वाह थी। बड़ा शहर था। और गाँव में लोगों ने उसके बारे में इतना ही सुना था कि—
- अब तो बड़ा आदमी बन गया है।
दोपहर के करीब एक चमचमाती कार पीपल के नीचे आकर रुकी। कार से अमित उतरा। जींस। कमीज़। चश्मा। हाथ में मोबाइल। पीछे से उसका सामान उतरा। कुछ बच्चे उसे देखने लगे। एक ने दूसरे से पूछा—
- यही है अमित भैया?
दूसरा बोला—हाँ। शहर से आया है।
रामदीन दुकान के बाहर बैठा सब देख रहा था। अमित ने उसे देखते ही मुस्कुराकर कहा— रामदीन काका!
रामदीन ने आँखें छोटी कीं।
- कौन?
अमित हँसा।
- इतनी जल्दी भूल गए?
रामदीन उठकर उसके पास गया।
- अरे...
उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बोला—तू तो सच में शहर का हो गया रे!
अमित हँस पड़ा।
- क्यों काका?
- पहले तो दूर से ही पहचान में आ जाता था।
- अब?
- अब कपड़ों से पहचानना पड़ रहा है।
दोनों हँस पड़े।
अमित दुकान के सामने बैठ गया।
रामदीन ने पूछा— चाय?
- हाँ।
- चीनी कम?
अमित ने चौंककर देखा।
- आपको याद है?
रामदीन ने चाय चढ़ाते हुए कहा—तेरे बारे में बहुत कुछ याद है।
- क्या-क्या?
- जब तू दस साल का था, तब पाँच रुपये की टॉफी लेकर भाग गया था।
अमित हँसते-हँसते बोला—अरे काका!
- और पैसे?
- दिए थे।
- नहीं दिए थे।
- फिर?
रामदीन ने गद्दी के नीचे से वही पुरानी कॉपी निकाल ली। पन्ना खोला। अमित की आँखें फैल गईं। उसके नाम के आगे लिखा था—
अमित — 5 रुपये — टॉफी।
अमित हँस पड़ा।
- आपने अभी तक रखा है?
रामदीन बोला—तू पाँच रुपये नहीं चुका पाया... और शहर जाकर बड़ा आदमी बन गया।
अमित ने जेब से पाँच रुपये निकाले। रामदीन ने पैसे लेने से मना कर दिया।
- अब नहीं चाहिए।
- क्यों?
- उस पाँच रुपये में तेरे बचपन की कीमत थी।
- उसे पैसे से कैसे चुका देगा?
अमित चुप हो गया।
शाम को अमित फिर दुकान पर आया। इस बार अकेला नहीं था। उसके साथ गाँव के कई लोग बैठ गए। बात गाँव की सडक़ से शुरू हुई। फिर स्कूल पर पहुँची। फिर पानी की समस्या पर। अमित ध्यान से सुन रहा था।
कुछ देर बाद उसने कहा—काका, गाँव में बहुत कुछ बदलना चाहिए।
रामदीन ने कहा—बदलना चाहिए।
- सडक़ अच्छी होनी चाहिए।
- होनी चाहिए।
- हर घर में इंटरनेट होना चाहिए।
- होना चाहिए।
- बच्चों को शहर जैसी शिक्षा मिलनी चाहिए।
- बिल्कुल।
अमित मुस्कुराया।
- तो फिर आप मेरी बात मानते हैं?
रामदीन बोला—बात पूरी तो सुन।
अमित चुप हुआ। रामदीन ने कहा—गाँव को शहर जैसा बनाने में बुराई नहीं है...बस गाँव को शहर बनाते-बनाते लोगों को अजनबी मत बना देना।
अमित कुछ देर तक चुप रहा।
रात को अमित अपने पुराने घर की छत पर बैठा था। सामने वही पीपल का पेड़ दिखाई दे रहा था। उसने मोबाइल निकाला। फिर वापस रख दिया। उसे बचपन याद आने लगा। वही दुकान। वही रामदीन काका। वही टॉफियाँ। वही दोस्तों की लड़ाई। वही बरसात। वही पीपल। उसे अचानक महसूस हुआ— शहर में पाँच साल में उसने बहुत कुछ पाया था।
लेकिन... इन पाँच सालों में उसने कितनी बार ऐसे बैठकर बिना किसी काम के किसी से बात की थी?
उसे याद नहीं आया। अगली सुबह वह फिर दुकान पर पहुँचा।
रामदीन चौंका।
- इतनी सुबह?
अमित ने कहा—काका, एक काम है।
- क्या?
- मैं गाँव के स्कूल के बच्चों के लिए कुछ करना चाहता हूँ।
रामदीन मुस्कुराया।
- शहर ने तुझे कुछ सिखाया?
अमित ने सिर हिलाया।
- हाँ।
- क्या?
अमित ने पीपल की ओर देखते हुए कहा—शहर ने मुझे कमाना सिखाया... गाँव ने मुझे बाँटना।
रामदीन ने उसकी ओर देखा। फिर बिना कुछ कहे चाय का दूसरा कप बना दिया।
दोपहर तक अमित स्कूल चला गया। बच्चों से मिला। प्रधानाचार्य से बात की। कुछ किताबें देने का वादा किया। और जाते-जाते स्कूल के बाहर लगे पुराने पेड़ को देखा। वह मुस्कुराया। उसे लगा... शहर लौटने से पहले शायद वह कुछ छोड़ जाना चाहता है। पैसा नहीं।
- अपना थोड़ा-सा समय।
शाम को फिर वही दुकान।
रामदीन ने पूछा—कब जा रहा है?
अमित बोला—अभी नहीं।
- क्यों?
- सोचा है...
- कुछ दिन और रहूँगा।
रामदीन मुस्कुराया।
- शहर नाराज़ नहीं होगा?
अमित हँसा।
- शहर मेरा इंतज़ार कर लेगा।
फिर कुछ देर बाद उसने धीरे से कहा— लेकिन काका...मुझे लगता है यह पीपल मेरा इंतज़ार करता रहा है।
रामदीन ने पीपल की ओर देखा। हवा चली। पत्तियाँ हिलीं। और दुकान के सामने बैठे सब लोग... बिना कुछ कहे मुस्कुरा दिए।
अध्याय - 5
एक टूटा रिश्ता
गाँव में दो घर ऐसे थे जिनके दरवाज़े आमने-सामने थे... लेकिन पिछले सात साल से उनके बीच कोई आवाजाही नहीं थी। एक घर था गोपाल का। दूसरा नंदू का। कभी दोनों पक्के दोस्त थे। खेती साथ करते थे। एक-दूसरे के सुख-दुख में खड़े रहते थे। शादी-ब्याह हो या बीमारी... दोनों परिवार एक-दूसरे के बिना अधूरे थे। फिर एक छोटी-सी बात ने दोनों के बीच ऐसी दीवार खड़ी कर दी जिसे सात साल भी नहीं तोड़ पाए।
बात केवल खेत की मेड़ की थी।
किसी ने कहा—मेरी जमीन इतनी है।
दूसरे ने कहा—नहीं, मेड़ यहाँ थी।
बात बढ़ी। फिर आवाज़ बढ़ी। फिर घरों के लोग आए। और देखते-देखते... एक छोटी-सी मेड़ दो परिवारों के बीच बड़ी दीवार बन गई। बात अदालत तक पहुँच गई। लेकिन उससे पहले... दोस्ती खत्म हो गई।
अब गाँव में कोई शादी होती, तो गोपाल का परिवार अलग बैठता। नंदू का परिवार अलग। किसी के घर खुशी होती, तो दूसरा घर खिडक़ी बंद कर लेता। बच्चों को भी समझा दिया गया था—उधर मत जाना।
रामदीन सब देखता था। लेकिन उसने कभी किसी से कुछ नहीं कहा। वह जानता था— कुछ रिश्तों को समझाने से नहीं,
- समय देने से जोड़ा जाता है।
एक दिन गोपाल दुकान पर आया। तेल लिया। नमक लिया। और चुपचाप पैसे देने लगा। उसी समय नंदू भी आ गया। दोनों की नजऱें मिलीं। फिर दोनों ने दूसरी तरफ़ देख लिया। रामदीन ने दोनों को देखा। कुछ नहीं कहा। बस... दो कप चाय बना दी।
गोपाल बोला—मेरी चाय नहीं चाहिए।
रामदीन ने कहा—पैसे नहीं माँग रहा।
- तो?
- चाय है।
नंदू भी चुप रहा। दोनों अलग-अलग तरफ़ खड़े रहे। रामदीन ने चाय दोनों के सामने रख दी। कुछ देर तक सिर्फ़ पीपल की पत्तियों की आवाज़ थी। फिर रामदीन ने अचानक अपनी पुरानी कॉपी निकाली।
गोपाल ने पूछा—अब क्या है इसमें?
रामदीन ने पन्ने पलटे। एक जगह रुक गया।
- देख।
उस पन्ने पर लिखा था—गोपाल — 12 रुपये।
दूसरे पन्ने पर—नंदू — 8 रुपये।
गोपाल हँस पड़ा।
- इतना पुराना हिसाब?
रामदीन बोला—बहुत पुराना।
नंदू ने पूछा—कब का?
- तुम दोनों की दोस्ती के पहले साल का।
दोनों चुप हो गए।रामदीन ने आगे पढ़ा—गोपाल ने नंदू के लिए तेल लिया। नंदू ने गोपाल के लिए बीज। हिसाब बाद में।
- देखो...
रामदीन धीरे से बोला—तुम दोनों का हिसाब इस कॉपी में कभी पूरा नहीं हुआ।
गोपाल ने कहा—क्यों?
रामदीन मुस्कुराया।
- क्योंकि तुम दोनों पैसे से ज़्यादा एक-दूसरे पर भरोसा करते थे।
दोनों चुप रहे।
रामदीन ने पूछा—मेड़ कितने हाथ की थी?
गोपाल बोला—चार हाथ।
नंदू बोला—साढ़े तीन।
रामदीन हँस पड़ा।
- सात साल से लड़ रहे हो... और आज भी मेड़ की लंबाई पर सहमत नहीं हो।
दोनों के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।
रामदीन ने कहा—एक बात बताऊँ?
दोनों चुप रहे।
- खेत की मेड़ चार हाथ की थी...लेकिन तुम लोगों ने उसके बीच सात साल की दूरी खड़ी कर ली।
हवा थोड़ी तेज़ चली। पीपल के पत्ते सरसराए।
तभी दुकान के बाहर से एक बच्चा आया।
उसने कहा—काका, ये नंदू चाचा के पोते की कॉपी है।
फिर उसने दूसरी कॉपी गोपाल को दी।
- और ये गोपाल चाचा की पोती की।
दोनों बच्चों की कॉपियाँ गलती से बदल गई थीं। गोपाल ने कॉपी नंदू को दी। नंदू ने दूसरी कॉपी गोपाल को। दोनों ने एक-दूसरे के हाथ से कॉपी ली। सिर्फ़ एक पल के लिए... लेकिन सात साल बाद...
- उनके हाथ फिर मिले थे।
नंदू ने धीरे से कहा—गोपाल..
गोपाल ने उसकी ओर देखा।
- हाँ?
- कल खेत चलोगे?
गोपाल कुछ क्षण चुप रहा।
फिर बोला—चलूँगा।
- मेड़ देखने?
गोपाल मुस्कुराया।
- नहीं... चाय पीने।
दोनों हँस पड़े। रामदीन चुपचाप अपनी गद्दी पर बैठा रहा। उसने कॉपी खोली। गोपाल और नंदू के पुराने हिसाब के सामने
एक नई लाइन लिखी—आज से हिसाब फिर शुरू। इस बार दोस्ती का।
उसने कलम बंद की। और पीपल की ओर देखा।
जैसे कह रहा हो—एक रिश्ता और बच गया।
अध्याय - 6
बरसात का दिन
उस साल बारिश कुछ ज़्यादा ही हुई। सुबह से बादल घिरे थे। दोपहर तक रास्ते की मिट्टी दलदल बन गई। और शाम होते-होते... गाँव के बाहर वाला छोटा नाला उफनने लगा।
रामदीन दुकान के बाहर खड़ा होकर पानी देख रहा था। पीपल की जड़ों तक पानी आ गया था। उसने दुकान का सामान ऊपर रखना शुरू किया। तभी हरिया दौड़ता हुआ आया।
- रामदीन!
- क्या हुआ?
- नाले का पानी बढ़ रहा है।
- कहाँ तक?
- स्कूल के पीछे तक पहुँच गया।
रामदीन ने दुकान बंद करने की बजाय सबसे पहले सामने रखी बोरी उठाई।
- चल।
कुछ ही देर में गाँव के लोग नाले के पास पहुँच गए। किसी ने मिट्टी की बोरियाँ लाईं। किसी ने फावड़े। किसी ने रस्सी। कोई बच्चों को घर भेज रहा था। कोई बूढ़ों को सुरक्षित जगह पहुँचा रहा था। और सबसे आगे... अमित खड़ा था। शहर से आया लडक़ा आज गाँव के लडक़ों के साथ
कीचड़ में खड़ा था। रामदीन ने उसे देखा।
- जूते खराब हो जाएँगे।
अमित हँसा।
- काका...
- गाँव में रहना है तो जूते भी गाँव वाले होने चाहिए।
रामदीन मुस्कुरा दिया।
तभी आवाज़ आई— नंदू!
- हाँ!
- गोपाल की तरफ़ से बोरी कम पड़ रही है।
नंदू ने तुरंत कहा—मेरे घर से ले आओ।
गोपाल भी वहीं था। उसने नंदू की ओर देखा। कुछ दिन पहले तक दोनों एक-दूसरे से बात नहीं करते थे।
आज... एक दूसरे के खेत की मेड़ बचाने के लिए साथ खड़े थे।
गोपाल ने कहा—नंदू, तू उधर संभाल।
नंदू बोला—और तू इधर।
फिर दोनों काम में लग गए।
बारिश और तेज़ हो गई। पानी अब सडक़ तक पहुँच गया था। गाँव के बच्चों को देखकर रामदीन ने चिल्लाकर कहा— कोई बच्चा नाले के पास नहीं जाएगा!
एक बच्चा बोला—काका, हम मदद करेंगे।
रामदीन ने कहा—तुम्हारा काम मदद करना नहीं...
- तो?
- घर जाकर गरम चाय पीना है।
बच्चे हँस पड़े।
करीब दो घंटे बाद... नाले के किनारे मिट्टी की मजबूत दीवार बन गई। पानी का बहाव दूसरी ओर मुड़ गया। गाँव बच गया। सब लोग थककर
पीपल के नीचे आकर बैठ गए। कपड़े कीचड़ से भरे थे। चेहरों पर थकान थी। लेकिन... सबके चेहरे पर संतोष था।
रामदीन ने दुकान खोली। चूल्हा जलाया। बड़े भगोने में चाय बनाई। एक-एक करके सबको गिलास देने लगा।
हरिया बोला—कितने पैसे?
रामदीन ने घूरकर देखा।
- बारिश में भी हिसाब?
सब हँस पड़े।
नंदू ने कहा—काका, आज चाय उधार लिख देना।
रामदीन ने तुरंत कॉपी निकाली। नंदू डर गया।
- अरे सच में नहीं!
रामदीन ने लिख दिया—आज गाँव ने मिलकर बारिश को उधार कर दिया।
सब फिर हँस पड़े।
अमित चुपचाप बैठा था।
रामदीन ने पूछा—क्या सोच रहा है?
अमित बोला—शहर में ऐसी बारिश होती है तो लोग अपने-अपने घरों में बंद हो जाते हैं।
- यहाँ?
अमित ने चारों ओर देखा।
- यहाँ...
- एक का पानी सबका पानी है।
रामदीन मुस्कुराया।
- इसीलिए तो गाँव है।
रात तक बारिश रुक गई। आसमान साफ़ होने लगा। बच्चे बाहर निकले। कीचड़ में कूदने लगे। बूढ़े हँसने लगे। और पीपल की पत्तियों से बारिश की बूँदें धीरे-धीरे गिरती रहीं। रामदीन ने दुकान का दरवाज़ा बंद करते हुए आसमान की ओर देखा। फिर पीपल के तने पर हाथ रखा।
धीरे से बोला—तूने बहुत बारिशें देखी हैं... लेकिन आज भी गाँव को साथ देखना तुझे अच्छा लगता होगा ना?
हवा चली। पत्तियाँ हिलीं। और रामदीन को लगा... पीपल ने जवाब दिया है।
अध्याय - 7
नई दुकान
गाँव में एक दिन खबर फैली—मुख्य सडक़ पर बड़ी दुकान खुलने वाली है।
दुकान? नहीं... लोग उसे दुकान नहीं कहते थे।मिनी मार्ट कहते थे। बड़ी काँच की खिड़कियाँ। चमकदार बोर्ड। एक ही जगह सब सामान। तेल, साबुन, बिस्कुट, कपड़े, ठंडे पेय... यहाँ तक कि मोबाइल रिचार्ज भी। गाँव के लडक़ों को बड़ा मज़ा आया। वे रोज़ सडक़ से गुजरते हुए
उसकी तैयारी देखते। किसी ने रामदीन से कहा—काका, अब तुम्हारी दुकान का क्या होगा?
रामदीन ने हँसकर पूछा—क्यों?
- वहाँ सब मिलेगा।
रामदीन ने कहा—यहाँ भी सब मिलता है।
लडक़ा बोला—क्या?
रामदीन ने पीपल की ओर देखा।
- यहाँ आदमी भी मिलते हैं।
लडक़ा कुछ समझा नहीं।
कुछ दिनों बाद नई दुकान खुल गई। उद्घाटन के दिन बड़ी भीड़ थी। गुब्बारे लगे थे। लाउडस्पीकर बज रहा था।
बाहर बोर्ड चमक रहा था—सब कुछ एक ही छत के नीचे।
रामदीन अपनी दुकान से दूर खड़ा देख रहा था। उसने पहली बार अपनी छोटी दुकान को ध्यान से देखा। पुरानी लकड़ी। पुराना बल्ब। पुरानी अलमारियाँ। पीछे रखी पुरानी कॉपी। उसे लगा... शायद सचमुच समय बदल गया है।
अगले कुछ दिनों में दुकान पर भीड़ कम हो गई। पहले जो लोग रोज़ आते थे, अब हफ्ते में एक बार आते। बच्चे टॉफी लेने के लिए नई दुकान जाने लगे। किसान भी वहाँ से सामान लेने लगे। रामदीन को बुरा नहीं लगा।
वह समझता था— लोगों को सुविधा चाहिए। और सुविधा गलत नहीं होती।
लेकिन... दुकान के सामने खाली चारपाइयाँ देखकर उसे कुछ अजीब लगता। पहले शाम को जहाँ दस लोग बैठते थे, अब दो लोग भी नहीं आते।
एक शाम अमित आया।
उसने पूछा—काका, दुकान बंद क्यों नहीं कर देते?
रामदीन ने उसकी ओर देखा।
- क्यों?
- काम कम हो गया है।
- तो?
- आप आराम कर सकते हो।
रामदीन हँस पड़ा।
- मैं दुकान चलाता हूँ...
फिर पीपल की ओर देखकर बोला— या दुकान मुझे चलाती है, यह अभी तय नहीं किया।
अमित भी हँस पड़ा।
उसी समय एक बूढ़ा आदमी दुकान पर आया।
उसने कहा—रामदीन, दवा चाहिए।
रामदीन ने पूछा—कौन-सी?
उसने नाम बताया। रामदीन ने अलमारी खोजी। दवा नहीं थी।
बूढ़ा बोला—नई दुकान में मिल जाएगी।
रामदीन ने सिर हिलाया।
- हाँ...
- वहाँ से ले आ।
बूढ़ा चला गया। कुछ देर बाद वापस आया।
रामदीन ने पूछा—मिल गई?
बूढ़े ने कहा—हाँ।
फिर कुछ देर चुप रहा।
- लेकिन वहाँ...
- क्या?
बूढ़ा मुस्कुराया।
- किसी ने पूछा नहीं कि तबीयत कैसी है।
रामदीन चुप हो गया।
धीरे-धीरे... लोगों को फर्क समझ आने लगा। नई दुकान में सामान सस्ता था। वहाँ विकल्प ज्यादा थे। रोशनी ज्यादा थी। जगह बड़ी थी। लेकिन रामदीन की दुकान में... किसी के पास पैसे कम हों तो सामान मिल जाता था। किसी को घर तक सामान चाहिए तो पहुँच जाता था। किसी का बच्चा बीमार हो तो रामदीन खुद पूछने चला जाता था। किसी के घर शादी हो तो उधार खुल जाता था। और किसी का मन खराब हो... तो चाय बन जाती थी।
एक दिन नई दुकान का मालिक रामदीन से मिलने आया।
उसने कहा—काका, आपकी दुकान पुरानी है।
रामदीन हँसा।
- यह तो मुझे भी पता है।
- आप चाहें तो इसे बंद करके मेरी दुकान में काम कर सकते हैं।
रामदीन ने पूछा— काम?
- हाँ।
- क्या करना होगा?
- काउंटर पर बैठना।
रामदीन कुछ देर सोचता रहा।
फिर बोला—वहाँ लोग आते हैं?
- बहुत आते हैं।
- बात करते हैं?
- जरूरत हो तो।
रामदीन मुस्कुराया।
- फिर मेरे बस की नौकरी नहीं है।
वह आदमी हँस पड़ा।
- क्यों?
रामदीन ने कहा—मैंने सारी उम्र सामान नहीं बेचा साहब... मैंने लोगों को जोड़े रखा है।
उस रात रामदीन ने दुकान की पुरानी कॉपी खोली।
कितने नाम थे उसमें। कितनी कहानियाँ। कितने चेहरे। कितने मौसम। उसने आखिऱी पन्ना खोला।
कुछ देर तक खाली पन्ने को देखता रहा।
फिर लिखा—नई दुकान आ गई है। अच्छी है। गाँव को सुविधा मिलेगी।
- लेकिन यह दुकान तब तक रहेगी, जब तक किसी को सामान से पहले किसी अपने की ज़रूरत होगी।
रामदीन ने कॉपी बंद कर दी। बाहर देखा। नई दुकान की चमक दूर तक दिखाई दे रही थी। उसकी अपनी दुकान का बल्ब हल्का-सा टिमटिमा रहा था। लेकिन पीपल... वही था। शांत। पुराना। अपनी जगह पर।
जैसे कह रहा हो—बदलाव से डरना मत... बस अपनी जड़ मत भूलना।
अध्याय – 8
पुरानी दुकान का आखिरी दिन
सुबह रामदीन ने दुकान खोली। लेकिन उस दिन उसके हाथों में पहले जैसी जल्दी नहीं थी। उसने धीरे-धीरे शटर उठाया। अलमारी साफ़ की। पुराने डिब्बे पोंछे। गद्दी झाड़ी। और फिर... पीछे रखी वह पुरानी कॉपी निकाली। काफी देर तक उसे हाथ में लिए बैठा रहा। फिर दुकान के बाहर एक कागज़ चिपका दिया। उस पर लिखा था—अगले महीने से दुकान बंद रहेगी। बस इतना। कोई कारण नहीं। खबर पूरे गाँव में दोपहर तक पहुँच गई।
हरिया आया।
- क्या हुआ?
रामदीन बोला—कुछ नहीं।
- फिर दुकान क्यों बंद कर रहा है?
- उम्र हो गई।
- अरे, उम्र तो मेरी भी हो गई।
रामदीन हँसा।
- तू दुकान चलाएगा?
हरिया चुप हो गया। फिर बोला—नहीं।
रामदीन ने कहा—बस।
शाम को अमित आया। कागज़ पढ़ा। कुछ देर तक चुप रहा।
फिर बोला—काका, आप सच में बंद कर रहे हो?
- हाँ।
- क्यों?
रामदीन ने सामने नई दुकान की ओर देखा।
- अब गाँव में बड़ी दुकान है।
- लेकिन...
- सब सामान वहाँ मिलता है।
अमित बोला—आपको क्या लगता है...
- लोग आपको सिर्फ़ सामान के लिए याद करते हैं?
रामदीन मुस्कुराया।
- नहीं।
- फिर?
रामदीन ने धीरे से कहा—शायद अब लोगों को मेरी ज़रूरत नहीं रही।
अमित के पास इसका कोई जवाब नहीं था।
उस रात गाँव के कुछ लोग पीपल के नीचे जमा हुए।
गोपाल आया। नंदू आया। मास्टरजी आए। जमुना काकी आईं। सलीम आया। और थोड़ी देर बाद... सोनू भी आया।
अब वह बच्चा नहीं रहा था। सब दुकान की ओर देखते रहे।
मास्टरजी ने कहा—तू दुकान बंद कर देगा...
- लेकिन यह जगह?
रामदीन ने पूछा—जगह का क्या?
मास्टरजी बोले—जगह वही रहेगी।
- सवाल यह है कि लोग फिर यहाँ बैठेंगे या नहीं।
जमुना काकी धीरे से बोलीं—रामदीन...
- हाँ काकी?
- तेरी दुकान से मैंने कितनी चीज़ें उधार लीं...
रामदीन हँसा।
- याद मत दिला।
काकी बोलीं—पैसे तो सब चुका दिए।
फिर उनकी आँखें भर आईं।
लेकिन जो अपनापन उधार लिया था... वह आज तक नहीं चुका पाई।
रामदीन कुछ नहीं बोला।
सलीम आगे आया।
काका...
- हाँ डॉक्टर साहब?
- मेरी माँ की दवा याद है?
- हाँ।
- उस दिन पैसे नहीं थे।
- तो?
- आज भी याद है।
रामदीन मुस्कुराया।
- इतनी पुरानी बात?
सलीम ने कहा—कुछ बातें पुरानी नहीं होतीं काका। बस आदमी बड़ा हो जाता है।
फिर गोपाल और नंदू आगे आए।
गोपाल बोला—काका, अगर तुम्हारी दुकान उस दिन बंद होती...
- कौन-सा दिन?
- जिस दिन हमारी दोस्ती वापस आई।
नंदू ने बात पूरी की—तो शायद हम आज भी एक-दूसरे से बात नहीं करते।
रामदीन ने दोनों को देखा।
फिर हँसकर बोला—मेरी दुकान ने कुछ नहीं किया।
तुम दोनों के अंदर दोस्ती बची थी।
गोपाल ने कहा—उसे जगाने वाला कोई तो था।
रामदीन ने अपनी पुरानी कॉपी सबके सामने रख दी।
- ले जाओ।
सब चौंक गए। मास्टरजी ने पूछा—कहाँ?
जिसे जो याद रखना हो, रख लो।
सोनू ने कॉपी उठा ली। उसने पहला पन्ना खोला। फिर दूसरा। फिर तीसरा। हर पन्ने पर कोई नाम था। हर नाम के पीछे एक कहानी। उसने धीरे से पूछा—काका...
- हाँ?
- इसमें मेरा नाम भी है?
रामदीन मुस्कुराया।
- बहुत बार।
- क्या लिखा है?
- सब नहीं बताऊँगा।
सोनू हँस पड़ा।
रात गहरी हो गई। सब लोग चले गए। रामदीन अकेला दुकान में बैठा रहा। उसने आखिऱी बार हर अलमारी को देखा। टॉफियों का डिब्बा। पुराना तराज़ू। माचिस की डिब्बियाँ। चाय का गिलास। और वह गद्दी... जिस पर बैठकर उसने पूरे गाँव को बदलते देखा था। उसने शटर नीचे करना चाहा। लेकिन हाथ रुक गया। बाहर पीपल खड़ा था।
वही पुराना पीपल।
उसने धीरे से कहा—तू तो रहेगा ना?
हवा चली। पत्तियाँ हिलीं। रामदीन मुस्कुरा दिया।
- ठीक है..
- फिर मैं भी कल आऊँगा।
अगली सुबह गाँव वाले आए। दुकान का शटर खुला था। लेकिन सामने एक नया बोर्ड लगा था।
सबने पढ़ा—पीपल की चौपाल
नीचे छोटे अक्षरों में लिखा था—सामान मिले या न मिले...बैठने की जगह हमेशा मिलेगी।
रामदीन गद्दी पर बैठा मुस्कुरा रहा था।
अमित ने पूछा—तो दुकान बंद नहीं हुई?
रामदीन ने कहा—दुकान बंद हुई है बेटा...
- चौपाल नहीं।
और उस दिन... कई साल बाद... पीपल के नीचे पहली बार फिर से चारपाइयाँ बिछीं।
अध्याय - 9
पीपल की छाँव फिर लौट आई
अगली सुबह जब गाँव जागा, तो पीपल के नीचे कुछ बदला-बदला सा था। वही पुराना पेड़। वही चबूतरा। वही मिट्टी की खुशबू। लेकिन चारपाइयाँ फिर से बिछी थीं। एक तरफ़ रामदीन की पुरानी गद्दी थी। और उसके ऊपर... वही पुरानी कॉपी। बस अब दुकान की जगह क छोटा-सा बोर्ड टँगा था— पीपल की चौपाल
सबसे पहले बच्चे आए। उन्होंने चारपाई पर बैठने की कोशिश की।
एक बोला—यहाँ क्या मिलेगा?
रामदीन ने कहा—कुछ नहीं।
बच्चा चौंका।
- फिर दुकान क्यों?
रामदीन हँस पड़ा।
- दुकान नहीं है।
- तो?
- यहाँ लोग मिलेंगे।
बच्चे एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। उन्हें बात समझ नहीं आई। लेकिन वे बैठ गए।
थोड़ी देर बाद अमित आया। उसके हाथ में कुछ किताबें थीं। उसने बच्चों को बुलाया।
- कौन पढ़ेगा?
सब दौडक़र आ गए। रामदीन दूर बैठा देख रहा था। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। उसे लगा... शायद चौपाल की शुरुआत फिर बच्चों से ही होनी चाहिए।
दोपहर में गोपाल और नंदू आए। पहले दोनों अलग-अलग बैठे। फिर पता नहीं कब एक ही चारपाई पर बैठ गए।
गोपाल बोला—चाय?
नंदू ने कहा—तेरी तरफ़ से।
गोपाल हँसा—अरे, अभी से उधार?
रामदीन ने दूर से आवाज़ लगाई—नाम कॉपी में लिख दूँ?
दोनों एक साथ बोले—नहीं!
पूरी चौपाल हँस पड़ी। जमुना काकी भी आईं।
उन्होंने रामदीन से पूछा—दुकान अब नहीं चलेगी?
रामदीन ने कहा—नहीं।
- तो घर का खर्च?
रामदीन मुस्कुराया।
- पेंशन है।
काकी बोलीं—और लोगों का उधार?
रामदीन ने अपनी पुरानी कॉपी उठाई।
- वह तो अब भी है।
काकी ने पूछा—किसका?
रामदीन ने कॉपी बंद कर दी।
- जिसका दिल चाहे, उसका।
काकी हँस पड़ीं।
शाम तक पीपल के नीचे लोग बढ़ते गए। कोई खेती की बात कर रहा था। कोई बच्चों की पढ़ाई की। कोई पुराने दिनों का किस्सा सुना रहा था। कोई बस चुप बैठा था। लेकिन इस बार... उसकी चुप्पी अकेली नहीं थी। पास बैठा कोई न कोई उसकी चुप्पी समझ रहा था।
रामदीन अपनी गद्दी पर बैठा सब देख रहा था।
अमित ने उसके पास आकर पूछा—काका...
- हाँ?
- आपने दुकान क्यों छोड़ी?
रामदीन ने कुछ देर सोचा।
फिर बोला—क्योंकि सामान बेचने वाली दुकानें बहुत खुल गई हैं बेटा।
- और?
- लेकिन...
उसने सामने बैठे लोगों की ओर देखा।
- लोगों को बैठाने वाली जगहें कम हो गई हैं।
अमित मुस्कुराया।
सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था। पीपल की लंबी छाया चबूतरे से आगे सडक़ तक फैल गई। बच्चे खेल रहे थे। बुज़ुर्ग बातें कर रहे थे। और रामदीन की पुरानी कॉपी चारपाई पर खुली पड़ी थी। सोनू ने उसे उठाया। आखिऱी पन्ने पर कुछ लिखा था।
उसने पढ़ा— यह कॉपी आज बंद नहीं हुई।
बस अब इसमें उधार नहीं, यादें लिखी जाएँगी।
नीचे रामदीन की लिखावट थी—
पीपल रहेगा, तो छाँव रहेगी।
छाँव रहेगी, तो लोग बैठेंगे।
और लोग बैठेंगे, तो गाँव जि़ंदा रहेगा।
सोनू ने कॉपी बंद कर दी। फिर उसने अपनी जेब से पेन निकाला।
और आखिऱी पन्ने के नीचे लिख दिया—आज से यह कहानी हम आगे लिखेंगे।
रामदीन ने देखा। कुछ नहीं कहा। बस मुस्कुरा दिया। उसे पता था... उसकी दुकान खत्म हो गई थी। लेकिन उसकी असली विरासत
अब शुरू हुई थी। वह विरासत किसी अलमारी में रखे सामान की नहीं थी।
वह थी— एक-दूसरे के लिए थोड़ा समय निकालने की।
किसी की बात बिना जल्दी किए सुनने की। रूठे को मनाने की। मुश्किल में साथ खड़े होने की।
और... बिना किसी मतलब के एक ही चारपाई पर बैठ जाने की।
रात होने लगी। लोग धीरे-धीरे घर जाने लगे। रामदीन ने आखऱिी चारपाई समेटी। फिर पीपल के तने पर हाथ रखा।
धीरे से बोला—अब तू अकेला नहीं है।
हवा चली। पत्तियाँ हिलीं। दूर कहीं किसी बच्चे की हँसी सुनाई दी। रामदीन मुस्कुराया। और पहली बार उसे लगा—
- दुकान बंद हुई है...लेकिन गाँव की कहानी नहीं।
क्योंकि...
- जब तक किसी गाँव में लोग एक-दूसरे के लिए समय निकालते रहेंगे
- तब तक कोई न कोई पीपल के नीचे चौपाल ज़रूर लगती रहेगी।
।। इति श्री ।।
