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🌟 Anant Sant 🌟

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अनंत साहित्य

आखिरी चिट्ठी ....


 


भूमिका
        कहा जाता है कि इस संसार में सबसे अधिक निस्वार्थ प्रेम यदि कहीं मिलता है, तो वह माता-पिता के हृदय में मिलता है। वे अपने बच्चों को चलना सिखाते हैं, सपने देखना सिखाते हैं, और एक दिन उन्हीं सपनों की उड़ान के लिए अपने आँगन को सूना कर देते हैं।
        समय बदलता है। बच्चे बड़े होते हैं, अपने जीवन और जिम्मेदारियों में व्यस्त हो जाते हैं। दूरियाँ बढ़ती हैं, मुलाक़ातें कम हो जाती हैं, लेकिन एक माँ की आँखें और एक पिता का दरवाज़ा कभी बंद नहीं होता। वे शिकायत कम करते हैं, प्रतीक्षा अधिक करते हैं।
        यह नाटक किसी एक परिवार की कहानी नहीं है। यह उन अनगिनत घरों की कहानी है, जहाँ प्रेम आज भी जीवित है, पर समय की कमी ने संवादों की जगह मौन को दे दी है। यह उस पिता की कथा है, जिसने हर महीने अपने बेटे के नाम एक चिट्ठी लिखी, पर कभी भेजी नहीं। उन चिट्ठियों में न कोई शिकायत थी, न कोई उलाहना—था तो केवल एक पिता का अथाह स्नेह, जो अपने बेटे को बाँधना नहीं चाहता था, केवल उसे याद करना चाहता था।
        "आख़िरी चिट्ठी" केवल एक नाटक नहीं, बल्कि एक प्रश्न है—क्या हम सचमुच इतने व्यस्त हो गए हैं कि उन हाथों को थामना भूल जाएँ, जिन्होंने कभी हमारी उँगली पकड़कर चलना सिखाया था?
        आइए, इस कथा के माध्यम से एक ऐसे पिता के मौन प्रेम, एक माँ की प्रतीक्षा और एक बेटे के पश्चाताप की यात्रा के साक्षी बनें।
प्रस्तुत है— "आख़िरी चिट्ठी"।

पात्र परिचय
1. रामनारायण (मुख्य पात्र)
उम्र - लगभग 65- 70 वर्ष
चरित्र-  रामनारायण एक साधारण गाँव के किसान हैं। जीवन भर मेहनत करके उन्होंने अपने बेटे आदित्य को पढ़ाया-लिखाया और उसे बड़ा बनाया। उनके भीतर पिता का प्रेम बहुत गहरा है, लेकिन वह अपने दु:ख को कभी अपने बेटे पर बोझ नहीं बनने देते। वे शिकायत करने वाले पिता नहीं हैं। उनका प्रेम शांत है, मौन है और त्याग से भरा हुआ है। उनकी सबसे बड़ी विशेषता है—
अपने दर्द को छिपाकर अपनों की खुशी की चिंता करना।
उनके हाथ में हमेशा एक पुरानी घड़ी रहती है और हर महीने लिखी गई चिट्ठी उनके मन की आवाज़ हैं।
अभिनय भाव -  चेहरे पर शांति, आवाज़ में अपनापन, कम शब्दों में गहरी भावनाएँ, दर्द को छिपाकर मुस्कुराने का अभिनय
मुख्य संवाद - 
माँ-बाप बच्चों के सहारे नहीं जीते बेटा... बच्चों के सपनों के सहारे जीते हैं।
2. सावित्री (रामनारायण की पत्नी)
उम्र - लगभग 60 - 65 वर्ष
चरित्र - सावित्री एक सरल, ममतामयी और भावुक माँ है। उसका पूरा संसार उसका परिवार है। वह बेटे आदित्य की राह देखते-देखते बूढ़ी हो जाती है, लेकिन उसके मन में कभी बेटे के लिए शिकायत नहीं आती। वह माँ है इसलिए उसका दिल दर्द महसूस करता है, लेकिन पत्नी है इसलिए रामनारायण के मौन को भी समझती है। वह इस कहानी की भावनात्मक शक्ति है।
अभिनय भाव -  आँखों से भाव व्यक्त करना, कम संवाद लेकिन गहरा असर, बेटे की याद में छुपा दर्द
मुख्य संवाद - 
बोझ? बाप कभी बेटे पर बोझ होता है क्या?
3. आदित्य (रामनारायण का बेटा)
उम्र - 35 - 40 वर्ष
चरित्र -  आदित्य एक सफल व्यक्ति है, जिसने अपने पिता के सपने पूरे किए। वह बुरा बेटा नहीं है, लेकिन शहर की भागदौड़ और जिम्मेदारियों में इतना उलझ जाता है कि समय की कीमत भूल जाता है। उसके अंदर अपने माता-पिता के लिए प्रेम है, लेकिन वह प्रेम समय पर व्यक्त नहीं कर पाता। उसका चरित्र दर्शाता है कि कई बार रिश्ते नफरत से नहीं, बल्कि लापरवाही और टलते हुए समय से दूर हो जाते हैं।
अभिनय भाव -  शुरुआत में व्यस्त और आत्मविश्वासी, बीच में अपराध-बोध, अंत में टूटन और पश्चाताप
मुख्य संवाद- 
मैंने आपको कभी छोड़ा नहीं बाबूजी...बस लौटने में देर कर दी।
4. नेहा (आदित्य की पत्नी)
उम्र - 30 - 35 वर्ष
चरित्र - नेहा समझदार और संवेदनशील महिला है। वह आदित्य की व्यस्तता को समझती है, लेकिन उसे यह भी महसूस होता है कि रिश्तों के लिए समय निकालना जरूरी है। वह आदित्य को दोष नहीं देती, बल्कि धीरे-धीरे उसे उसकी भूल का एहसास कराती है।
अभिनय भाव - शांत स्वभाव, समझदारी भरे संवाद, परिवार को जोडऩे वाली भूमिका
मुख्य संवाद- मैं शिकायत पैसों की नहीं करती...समय की करती हूँ।
5. रघुवीर डाकिया
उम्र - 55 -60 वर्ष
चरित्र:-रघुवीर गाँव का डाकिया है और रामनारायण का पुराना मित्र है। उसने वर्षों तक इस घर की प्रतीक्षा देखी है। वह जानता है कि रामनारायण हर महीने बेटे के नाम चिट्ठी लिखते हैं, लेकिन भेजते नहीं। वह इस कहानी का साक्षी है।
अभिनय भाव - सरलता, दोस्ती का अपनापन, भावुक लेकिन संयमित अभिनय
मुख्य संवाद -कुछ लोग प्यार जताने के लिए नहीं...बस निभाने के लिए पैदा होते हैं।
6. आरव (आदित्य का बेटा)
उम्र: 6 -8 वर्ष
चरित्र -आरव नई पीढ़ी का प्रतिनिधि है। उसकी मासूमियत कहानी में उम्मीद और भावनाओं को जीवित रखती है। वह दादा से मिलने की इच्छा रखता है और अनजाने में अपने पिता को रिश्तों का महत्व समझाता है।
अभिनय भाव- मासूमियत, जिज्ञासा, सच्ची भावनाएँ
मुख्य संवाद -पापा...कोशिश मतलब आओगे... या नहीं?
7. मुन्ना
उम - 10 -12 वर्ष
चरित्र-  गाँव का बच्चा, जो रामनारायण के अकेलेपन में खुशी लाता है। उसके माध्यम से दिखाया गया है कि बच्चों की हँसी बूढ़े घरों में फिर से जीवन भर देती है।
अभिनय भाव - चंचलता, सरल प्रेम, गाँव की मासूमियत
8. हरिराम
उम - 60 वर्ष
चरित्र - रामनारायण का पड़ोसी और मित्र। वह गाँव की सामान्य सोच और समाज की आवाज़ है। उसके छोटे-छोटे संवाद कहानी की सच्चाई को सामने लाते हैं।
मुख्य संवाद -काम तो सबके होते हैं रामू... लेकिन बूढ़े माँ-बाप बार-बार नहीं मिलते।
9. गोपालदास वैद्य
उम्र - 55 -60 वर्ष
चरित्र - गाँव के वैद्य हैं। वे रामनारायण की गिरती सेहत को पहचानते हैं, लेकिन रामनारायण की इच्छा और स्वभाव को भी समझते हैं।
 मुख्य भाव
आखिरी चिट्ठी के सभी पात्र किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं हैं। ये उन सभी घरों की कहानी हैं जहाँ—
माता-पिता इंतज़ार करते हैं।
बच्चे व्यस्त हो जाते हैं।
प्रेम रहता है...
लेकिन समय कम पड़ जाता है।

दृश्य -1 (भाग -1)
एक घर... जहाँ समय ठहर गया था

मंच सज्जा - मंच पर किसी महल की भव्यता नहीं... एक साधारण भारतीय गाँव का घर। मिट्टी की दीवारें। बरामदे की ईंटें जगह-जगह से उखड़ी हुई। एक ओर तुलसी चौरा। दूसरी ओर बूढ़ा नीम। बरामदे में वर्षों पुरानी चारपाई। एक लकड़ी की मेज़। मेज़ पर... स्याही की दवात। बाँस की कलम। पुराना पीतल का चश्मा। एक लाल कपड़े में लिपटी डायरी। और... मेज़ के नीचे... एक लोहे का बक्सा। इतना पुराना... कि उसका रंग अब पहचान में नहीं आता। किनारों पर जंग। बीच में चमक।
मानो... किसी ने उसे रोज़ छुआ हो।
प्रकाश - धीरे-धीरे भोर उतर रही है। आकाश अभी पूरी तरह उजला नहीं हुआ। पूर्व दिशा में हल्की केसरिया आभा। 
दूर कहीं मंदिर की पहली घंटी बजती है।
वृद्ध मुस्कुराता है। फिर..एक वृद्ध...
धीरे-धीरे भीतर से बाहर आता है।
धीरे से कहता है—आओ...तुम लोग तो समय पर आ ही जाते हो...
उसकी आवाज़ में शिकायत नहीं... केवल अपनापन। वह बरामदे में रखे पुराने रेडियो के पास जाता है। रेडियो पर हाथ फेरता है। घुंडी घुमाता है।खड़...खड़...खड़...
सिर्फ़ खरखराहट।
फिर... एक पुराना गीत आधा सुनाई देता है... और तुरंत बंद हो जाता है। वृद्ध हँस पड़ता है।
वृद्ध -अरे...तू भी मेरी तरह बूढ़ा हो गया रे...
भीतर से स्त्री की आवाज़ आती है—
सावित्री (भीतर से) -किससे बातें कर रहे हो?
वृद्ध -अपने पुराने साथी से।
सावित्री बाहर आती है। सफ़ेद सूती साड़ी। बालों में चाँदी उतर चुकी है। चेहरे पर उम्र है... लेकिन आँखों में वही उजाला... जिसके सहारे घर टिके रहते हैं। वह रेडियो देखती है।
सावित्री - कितनी बार कहा... नया रेडियो ले आओ।
रामनारायण मुस्कुराते हैं। रेडियो को धीरे से थपथपाते हैं।
रामनारायण -पुरानी चीज़ें... बदली नहीं जातीं... संभाली जाती हैं।
सावित्री उन्हें देखती है। कुछ कहना चाहती है। फिर चुप रह जाती है। उसे मालूम है... रामनारायण रेडियो की बात नहीं कर रहे।
वह चूल्हे की ओर लौट जाती है। थोड़ी देर बाद दो कुल्हड़ों में चाय लेकर आती है। एक रामनारायण को देती है। दूसरा खुद लेकर चारपाई पर बैठ जाती है। दोनों चुपचाप चाय पीते हैं। यह मौन अजनबी नहीं... पचास साल का साथी है।
कुछ देर बाद...सावित्री धीरे से पूछती है— 
सावित्री -आज... पहली तारीख़ है न?
रामनारायण सिर उठाते हैं। मुस्कुराते हैं।
रामनारायण - हाँ।
सावित्री - तो... आज फिर... उसे चिट्ठी लिखोगे?
रामनारायण चाय का आखिरी घूँट पीते हैं। कुल्हड़ नीचे रखते हैं। आकाश की ओर देखते हैं।
फिर बहुत सहज स्वर में कहते हैं— कुछ बातें ऐसी होती हैं... जो कहे बिना मन नहीं मानता... और भेजे बिना प्रेम पूरा हो जाता है।
सावित्री कुछ नहीं बोलती। वह केवल उन्हें देखती रहती है। जैसे... यह उत्तर उसने वर्षों पहले ही समझ लिया था। रामनारायण धीरे-धीरे मेज़ के पास बैठते हैं। लाल कपड़े में लिपटी डायरी खोलते हैं। स्याही की दवात खोलते हैं। कलम उठाते हैं। कुछ क्षण तक... सफेद कागज़ को देखते रहते हैं। ऐसा लगता है... मानो... हर महीने...
पहला शब्द लिखना... उन्हें फिर से सीखना पड़ता हो। फिर... बहुत सुंदर... बहुत साफ़... थोड़ी काँपती हुई लिखावट में...
वे लिखते हैं—
प्रिय बेटा आदित्य... 
कलम वहीं रुक जाती है। वे आगे नहीं लिख पाते। उनकी आँखें...कागज़ पर नहीं... कहीं बहुत दूर चली जाती हैं। शायद... कई वर्षों पीछे... जहाँ... एक छोटा-सा लडक़ा... उसी आँगन में... नंगे पाँव भाग रहा है।
(प्रकाश धीरे-धीरे मंद पड़ता है...)

दृश्य -1 (भाग -2) 
एक घर... जहाँ समय ठहर गया था

रामनारायण ने काँपते हाथों से लिखा था—प्रिय बेटा आदित्य...
कलम रुक गई थी... जैसे शब्द आगे बढऩा चाहते हों... लेकिन आँखें पीछे लौट गई हों।
 प्रकाश -बरामदे की रोशनी स्थिर। मंच के दूसरे छोर पर हल्की सुनहरी रोशनी फैलती है। 
वहाँ कोई घर नहीं... सिर्फ़ स्मृति है। बाँसुरी की एक लंबी तान सुनाई देती है। धीरे-धीरे... दर्शकों के सामने... एक छोटा-सा आदित्य दिखाई देता है। सात-आठ वर्ष का। घुटनों तक आधी निकर। मिट्टी से सने पैर। हाथ में लकड़ी की बनी तलवार। वह पूरे आँगन में दौड़ रहा है।
बालक आदित्य -बाबूजी...!
देखो...मैं राजा हूँ... पूरा गाँव मेरा है...
पीछे से युवा रामनारायण प्रवेश करते हैं। कंधे पर हल। सिर पर गमछा।
थके हुए... पर बेटे को देखकर चेहरे पर थकान की जगह मुस्कान आ जाती है।
युवा रामनारायण -अच्छा...तो महाराज...जरा यह बताइए...आपकी प्रजा ने खाना खाया या नहीं?
बालक (गर्व से) -नहीं... पहले राजा खाएगा।
रामनारायण- तो राजा साहब... रोटी कहाँ से आएगी?
बालक कुछ सोचता है...फिर भोलेपन से कहता है—
आप खेत जाओगे... तब न...
रामनारायण कुछ पल उसे देखते रहते हैं। फिर धीरे से उसके सिर पर हाथ फेरते हैं।
रामनारायण - हाँ... बाप खेत इसलिए नहीं जाता... कि उसे सिर्फ मिट्टी से प्रेम होता है... वह इसलिए जाता है... कि उसके बच्चे भूखे न सोएँ।
प्रकाश फ्लैशबैक धीरे-धीरे धुँधला पड़ता है। फिर वर्तमान लौट आता है।
बरामदे में बैठे रामनारायण की आँखें नम हैं। उनकी कलम अभी भी वहीं रुकी हुई है। सावित्री उन्हें देख रही है।
सावित्री -फिर... बचपन याद आ गया?
रामनारायण मुस्कुरा देते हैं।---
रामनारायण -पता है... यादें भी बड़ी अजीब होती हैं... बुढ़ापे में... घुटनों से पहले... यादें लौटती हैं।
सावित्री हल्की हँसी हँसती है।
सावित्री -और तुम्हारी यादों में... हमेशा वही शैतान रहता है।
रामनारायण -शैतान नहीं... घर की रौनक।
दोनों मुस्कुराते हैं। कुछ क्षण तक... मंच पर केवल... नीम की पत्तियों से छनती हवा की आवाज़।
अचानक... दूर से डाकिए की साइकिल की घंटी सुनाई देती है।
टिन... टिन...
सावित्री का चेहरा चमक उठता है। वह लगभग बच्चे की तरह दरवाज़े तक जाती है। ओढऩी ठीक करती है। आँगन पार करती है। सडक़ की ओर देखती है।
दूर... रघुवीर डाकिया दिखाई देता है। वह हर घर पर रुकता हुआ आगे बढ़ रहा है। शर्मा जी के घर... रुकता है। एक चिट्ठी देता है। हँसी सुनाई देती है।
फिर... वह आगे बढ़ जाता है। सावित्री की आँखें अब भी उसी पर टिकी हैं। रघुवीर उनके घर के सामने से गुजरता है। एक क्षण के लिए उसकी नजऱ सावित्री से मिलती है। वह हल्का-सा सिर झुका देता है। सावित्री समझ जाती है... आज भी... कुछ नहीं।
वह मुस्कुराने की कोशिश करती है। लेकिन मुस्कान...आँखों तक नहीं पहुँचती। धीरे-धीरे लौट आती है। रामनारायण सब देख रहे थे। उन्होंने कुछ नहीं पूछा।
सिर्फ़ चुपचाप... अपने कुल्हड़ में बची ठंडी चाय पी ली।
कुछ देर बाद... उन्होंने बहुत सहज स्वर में कहा—
रामनारायण - आज...डाकिया जल्दी निकल गया।
सावित्री भी सहज बनने की कोशिश करती है।
सावित्री -हाँ... शायद... आज डाक कम होगी।
दोनों जानते हैं... वे सच नहीं बोल रहे। लेकिन... कभी-कभी... पति-पत्नी... सच इसलिए नहीं छिपाते कि दूसरा धोखा खा जाए... वे इसलिए छिपाते हैं... कि दूसरे का दिल बचा रहे।
 मौन लगभग दस सेकंड। कोई संवाद नहीं। केवल हवा। दूर बैलों की घंटी। मिट्टी की गंध।
रामनारायण फिर कलम उठाते हैं।इस बार...  चिट्ठी आगे बढ़ती है। उनकी आवाज़... धीरे-धीरे... पूरे मंच पर फैल जाती है।
  वॉयसओवर -
प्रिय बेटा, आज सुबह फिर तेरी माँ दरवाज़े तक गई थी।  मैं जानता हूँ...वह डाकिए का इंतज़ार नहीं करती... वह तेरी आहट का इंतज़ार करती है।
पर... यह बात मैंने उससे कभी नहीं कही। क्योंकि... कुछ उम्मीदें... शब्दों में आ जाएँ... तो कमज़ोर हो जाती हैं। बेटा... इस बार खेत में धान अच्छी है।
 अगर तू होता... तो कहता—बाबूजी... इस बार पुआल से मेरे लिए तलवार बनाना। आज भी... खेत में गया था...तो तेरे पैरों के छोटे-छोटे निशान याद आ गए। मिट्टी बदल जाती है... मगर... पिता की आँखों में... बच्चे कभी बड़े नहीं होते।
रामनारायण लिखते-लिखते रुक जाते हैं। स्याही की एक बूँद... कागज़ पर गिरती है। वह उसे जल्दी से पोंछते हैं। जैसे... बेटा... उनका आँसू न देख ले।
सावित्री धीरे से पूछती है—लिख दिया?
रामनारायण मुस्कुराते हैं।
नहीं...क्यों?
वे कागज़ को देखते हुए कहते हैं—
आज...मन बहुत कुछ कहना चाहता है... और कागज़... इतनी जगह नहीं दे रहा...
प्रकाश धीरे-धीरे मंद होने लगता है। नीम की छाया लंबी होती जाती है। दूर... फिर वही घड़ी की टिक-टिक सुनाई देती है। और... मंच अँधेरे में डूब जाता है।

दृश्य- 1 (भाग -3)
एक घर... जहाँ समय ठहर गया था
रामनारायण की कलम अभी भी कागज़ पर टिकी है। बरामदे में ऐसी शांति है कि स्याही की बूँद के गिरने की आवाज़ भी सुनाई दे सकती है। सावित्री उठकर भीतर चली जाती है। चूल्हे में बुझती आँच को कुरेदती है। सूखी लकडिय़ाँ डालती है। कुछ ही क्षण में धुएँ की पतली लकीर आकाश की ओर उठने लगती है। घर में रोटी की पहली महक फैल जाती है। रामनारायण उस महक को गहरी साँस लेकर भीतर खींचते हैं। फिर मुस्कुराकर धीरे से कहते हैं—
रोटी की खुशबू... और माँ की ममता... दोनों कभी बूढ़ी नहीं होतीं।
भीतर से सावित्री की हँसी सुनाई देती है।उसी समय...गली से बच्चों का शोर सुनाई देता है।
भाग... भाग... पकड़ उसे...
एक कपड़े की बनी गेंद आँगन में आ गिरती है। उसके पीछे चार-पाँच बच्चे दौड़ते हुए आते हैं। सब अचानक रुक जाते हैं। रामनारायण को देखकर थोड़े संकोच में पड़ जाते हैं। सबसे छोटा लडक़ा आगे बढ़ता है।
धीरे से कहता है—दादा... हमारी गेंद...
रामनारायण गेंद उठाते हैं। कुछ क्षण उसे देखते रहते हैं। जैसे वह गेंद नहीं... कोई पुरानी स्मृति हो।
फिर पूछते हैं—नाम क्या है तुम्हारा?
- मुन्ना।
 -स्कूल जाते हो?
- हाँ...
- पढ़ाई करते हो या बस गेंद ही खेलते हो?
सारे बच्चे हँस पड़ते हैं। मुन्ना गर्दन खुजलाते हुए कहता है—
-थोड़ी पढ़ाई...ज़्यादा खेल।
रामनारायण भी हँस देते हैं। वे गेंद लौटाने ही वाले होते हैं...
कि अचानक पूछ बैठते हैं—
तुम लोग...अपने बाबूजी के साथ खेलते हो?
एक बच्चा तुरंत कहता है—नहीं...वो शहर में काम करते हैं।
दूसरा—मेरे वाले तो ट्रक चलाते हैं।
तीसरा—मेरे बाबूजी रात में आते हैं।
रामनारायण सबको देखते रहते हैं। फिर बहुत धीरे से कहते हैं—
जब वो घर आएँ... तो एक खेल ज़रूर खेलना।
बच्चे उत्सुक हो जाते हैं।
कौन-सा?
रामनारायण मुस्कुराते हैं।
बस...उनका हाथ पकड़ लेना... और कहना—आज कहीं मत जाना।
बच्चे पूरी बात समझते नहीं।
लेकिन सिर हिलाकर दौड़ जाते हैं। आँगन फिर शांत हो जाता है।
सावित्री बाहर आती है। उसने सब सुन लिया था। वह कुछ नहीं कहती। सिर्फ़ रामनारायण के सामने एक थाली रख देती है। गरम रोटियाँ। थोड़ी दाल। हरी मिर्च। प्याज़। रामनारायण पहली रोटी तोड़ते हैं।
आदत से मजबूर... दूसरी थाली की ओर देखते हैं। फिर जैसे याद आता है—आदित्य तो बरसों से यहाँ बैठकर खाना नहीं खाया। वे तुरंत अपनी नजऱ झुका लेते हैं।
सावित्री सब समझ जाती है।
वह बात बदलने के लिए पूछती है—
नमक ठीक है?
रामनारायण रोटी का कौर मुँह में रखते हुए कहते हैं—हाँ...आज बिल्कुल वैसा है... जैसा आदित्य को पसंद था।
सावित्री का हाथ थम जाता है। दोनों की आँखें एक क्षण के लिए मिलती हैं। फिर दोनों बिना कुछ कहे खाना खाने लगते हैं।
प्रकाश थोड़ा बदलता है। दोपहर ढल रही है।
आँगन में नीम की छाया लंबी होने लगी है। रामनारायण फिर मेज़ के पास आते हैं। चिट्ठी पूरी करते हैं। उनकी आवाज़ पूरे मंच पर फैलती है।
 वॉयसओवर
प्रिय बेटा, आज गाँव के बच्चों की गेंद हमारे आँगन में आ गिरी थी। उन्हें देखकर तू याद आ गया। तेरी माँ आज भी रोटी एक ज़्यादा बना देती है। मैं हर बार कहता हूँ—"दो ही लोग हैं घर में... वह हर बार कहती है—क्या पता... आज तीसरा भी आ जाए।
बेटा... अगर कभी आने का मन हो... तो पहले से खबर मत देना। कुछ खुशियाँ... अचानक आने पर ही पूरी लगती हैं।
 अपना ध्यान रखना।
तुम्हारा
बाबूजी
रामनारायण बहुत देर तक उस पत्र को देखते रहते हैं। उनकी उँगलियाँ कागज़ पर फिरती हैं। जैसे बेटे के सिर पर हाथ फेर रही हों। वे धीरे-धीरे उठते हैं। मेज़ के नीचे रखा लोहे का बक्सा अपनी ओर खींचते हैं। ताले को हाथ में लेते हैं। एक पल के लिए उनकी आँखें बंद हो जाती हैं। ताला खुलता है... लेकिन... दर्शकों की ओर बक्से का मुँह नहीं होता। हम उसके भीतर कुछ नहीं देख पाते। रामनारायण केवल चिट्ठी को दोनों हाथों से पकड़ते हैं। माथे से लगाते हैं।
और बहुत धीमे स्वर में कहते हैं—
जहाँ प्रेम सुरक्षित रहे... वही उसका सही पता है।
वे चिट्ठी बक्से में रख देते हैं। ढक्कन बंद कर देते हैं। ताला फिर लगा देते हैं। चाबी निकालकर अपनी कमीज़ की भीतरी जेब में रख लेते हैं। ऐसे... जैसे कोई अपना हृदय वापस सीने में रख रहा हो।
सावित्री बरामदे के खंभे से टिककर उन्हें देख रही है।
धीरे से पूछती है—कभी भेजोगे भी?
रामनारायण उसकी ओर देखते हैं। चेहरे पर गहरी शांति है। वे मुस्कुराते हैं।
और कहते हैं—जिस दिन उसे मेरी ज़रूरत होगी... मैं चिट्ठी नहीं... खुद पहुँच जाऊँगा।
सावित्री कुछ बोल नहीं पाती। वह केवल आसमान की ओर देखती है। शाम उतरने लगी है। नीम से एक सूखा पत्ता टूटकर आँगन में गिरता है। दूर मंदिर से संध्या आरती की घंटियाँ बजने लगती हैं। रामनारायण उठकर दरवाज़े तक जाते हैं। दरवाज़ा पूरा खोल देते हैं। सडक़ की ओर देखते हैं। कुछ क्षण... बहुत देर तक... फिर बिना निराश हुए... वापस लौट आते हैं। 
सावित्री पूछती भी नहीं— किसका इंतज़ार था। क्योंकि इस घर में... दोनों को उत्तर पहले से मालूम है।
 कथावाचक (ऑफ स्टेज)
कुछ घरों में... शाम इसलिए नहीं होती कि सूरज ढल गया। शाम इसलिए होती है...क्योंकि कोई लौटकर नहीं आया।
और कुछ दरवाज़े... हवा के लिए नहीं... उम्मीद के लिए खुले रहते हैं।
प्रकाश धीरे-धीरे मंद पड़ता है। अंतिम रोशनी...रामनारायण के चेहरे पर नहीं... उस बंद लोहे के बक्से पर ठहरती है।
घड़ी की टिक-टिक... फिर सुनाई देती है। और... अँधेरा।

दृश्य  - 2 (भाग - 1)
दरवाज़ा जो हर शाम खुला रहता था
समय - उसी दिन की साँझ।
स्थान - रामनारायण का घर और गाँव की चौपाल।
प्रकाश - ढलती हुई संध्या। सूरज पश्चिम में झुक चुका है। नीम की छाया आँगन को आधा ढँक चुकी है।
(मंच पर वही पुराना घर...) सुबह की चहल-पहल अब शांत हो चुकी है। चूल्हे की आँच धीमी पड़ गई है। आँगन में गौरैयाँ अब नहीं हैं। उनकी जगह कुछ सूखे पत्ते हवा के साथ इधर-उधर लुढक़ रहे हैं। रामनारायण चारपाई पर बैठे हैं। हाथ में पुरानी जेब-घड़ी। हर शाम की तरह... उसे चाबी दे रहे हैं। घड़ी टिक-टिक करने लगती है। वे उसे कान से लगाकर सुनते हैं। हल्का-सा मुस्कुराते हैं।
रामनारायण (धीरे से)
चल... आज भी साथ निभाना...
भीतर से सावित्री आवाज़ देती है—
सुनते हो...
रामनारायण - हूँ...
सावित्री - संध्या हो गई...
रामनारायण - हाँ...
कुछ क्षण... दोनों फिर चुप। उनके बीच का मौन भी अब वर्षों पुराना साथी है।
सावित्री बाहर आती है। हाथ में दीपक है। वह तुलसी के चौरे पर दीप जलाती है। दोनों हाथ जोड़ती है।
फिर... अनायास... उसकी नजऱ दरवाज़े पर चली जाती है। दरवाज़ा खुला है। जैसा हर दिन रहता है। वह कुछ पल उसे देखती रहती है। फिर धीरे से पूछती है—
सावित्री  - आज... दरवाज़ा बंद कर दूँ?
रामनारायण बिना सिर उठाए कहते हैं— अभी रहने दो...
सावित्री - रात को मच्छर आ जाएँगे।
रामनारायण मुस्कुराते हैं।
 -मच्छर आएँ तो भगा देंगे... अगर कोई अपना आ गया... तो?
सावित्री की आँखें भर आती हैं। वह जल्दी से दूसरी ओर देखने लगती है।
 (ध्वनि) दूर मंदिर से आरती की घंटियाँ। बच्चों की हँसी। गाएँ लौट रही हैं। कहीं कोई बाँसुरी बजा रहा है। पूरा गाँव अपने-अपने घर लौट रहा है। सिर्फ़...
एक घर ऐसा है... जो किसी के लौटने की प्रतीक्षा में पहले से तैयार बैठा है।
(उसी समय) गली से आवाज़ आती है—
रामू काका...!
तीन बच्चे दौड़ते हुए आँगन में आते हैं।
मुन्ना...गुड्डू... और छोटी रानी।
मुन्ना के हाथ में टूटी हुई लकड़ी की कार है।
मुन्ना -काका... इसका पहिया निकल गया।
रामनारायण कार हाथ में लेते हैं। ध्यान से देखते हैं। जेब से एक पतली कील निकालते हैं। बरामदे के खंभे पर हल्का-सा ठोकते हैं। पहिया फिर से लगा देते हैं। कार चलने लगती है। मुन्ना खुशी से उछल पड़ता है।
मुन्ना - काका... आपको सब ठीक करना आता है!
रामनारायण हँसते हैं।
नहीं रे... सब नहीं। कुछ चीज़ें... समय के पास चली जाएँ... तो फिर किसी से ठीक नहीं होतीं...
बच्चे बात नहीं समझते। लेकिन ताली बजाते हुए हँस पड़ते हैं।
रानी अचानक पूछती है—काका... आपका बेटा कब आएगा?
मंच पर... एकदम सन्नाटा। सावित्री के हाथ रुक जाते हैं। रामनारायण कार पर उँगली फेरते रहते हैं।
फिर मुस्कुराकर कहते हैं—जब उसे छुट्टी मिलेगी...
मुन्ना - इतनी बड़ी छुट्टी नहीं मिलती क्या?
रामनारायण कुछ पल चुप रहते हैं। फिर बच्चों के पास बैठ जाते हैं।
बेटा... बड़े लोगों की छुट्टियाँ... कैलेंडर से नहीं मिलतीं... जिम्मेदारियों से मिलती हैं।
बच्चे कुछ समझते हैं... कुछ नहीं। वे कार लेकर दौड़ जाते हैं। उनकी हँसी धीरे-धीरे दूर होती जाती है।
(मंच पर फिर शांति)
सावित्री धीरे से कहती है—तुम हर बार उसका पक्ष क्यों लेते हो?
रामनारायण उसकी ओर देखते हैं।
क्योंकि...अगर हम भी उसके खिलाफ़ हो गए... तो उसके साथ कौन रहेगा?
सावित्री पहली बार थोड़ा टूटती हुई दिखाई देती है।
सावित्री - मैं शिकायत नहीं करती... लेकिन...कभी-कभी मन पूछता है... क्या सचमुच उसे हमारी याद नहीं आती?
रामनारायण उठते हैं। धीरे-धीरे दरवाज़े तक जाते हैं। सडक़ की ओर देखते हैं। फिर बहुत शांत स्वर में कहते हैं—
याद... आने और लौट आने में... बहुत फर्क़ होता है सावित्री।
हवा का एक तेज़ झोंका आता है। दरवाज़ा हल्का-सा हिलता है। जैसे... किसी ने बाहर से उसे छुआ हो। दोनों एक साथ दरवाज़े की ओर देखते हैं। एक क्षण के लिए...
दोनों के चेहरे पर आशा चमकती है। लेकिन... बाहर कोई नहीं। सिर्फ़ हवा। रामनारायण मुस्कुराकर दरवाज़े की चौखट पर हाथ फेरते हैं।
धीरे से कहते हैं—देखा... इसे भी लगा... शायद वह आया हो...
सावित्री अब मुस्कुराने की कोशिश नहीं करती। वह चुपचाप आकर दरवाज़े के पास बैठ जाती है। दोनों पति-पत्नी... एक खुले दरवाज़े की ओर देखते हुए... संध्या को रात में बदलते देखते रहते हैं।
कथावाचक (ऑफ़-स्टेज)
कुछ दरवाज़े... लकड़ी के नहीं होते। वे उम्मीद से बने होते हैं। और उम्मीद... कभी कुंडी नहीं लगाती।
प्रकाश धीरे-धीरे मंद पड़ता है।

दृश्य -2 (भाग 2 )
दरवाज़ा जो हर शाम खुला रहता था

मंच पर साँझ अब रात में बदल रही है। आकाश में पहली चिडिय़ाँ अपने घोंसलों में लौट चुकी हैं। नीम की डाल पर बैठा एक कौआ दो-तीन बार काँव-काँव करता है और उड़ जाता है। तुलसी के चौरे पर रखा दीपक अब स्थिर लौ से जल रहा है। रामनारायण और सावित्री अभी भी दरवाज़े के पास बैठे हैं। बातें समाप्त हो चुकी हैं...
लेकिन प्रतीक्षा नहीं। दूर... साइकिल की घंटी सुनाई देती है। टिन... टिन...सावित्री अनायास उठ खड़ी होती है।
फिर खुद को रोक लेती है। अब वह दरवाज़े तक दौड़ती नहीं... धीरे-धीरे चलती है। शायद उम्र ने उसके कदम धीमे किए हैं... या उम्मीद ने।
गली के मोड़ से... एक पुरानी हरी साइकिल दिखाई देती है। पीछे चमड़े का पुराना डाक-बैग। सिर पर खाकी टोपी। चेहरे पर धूप और बरसात के वर्षों के निशान।
रघुवीर डाकिया।
रघुवीर घर के सामने साइकिल रोकता है। कुछ क्षण तक कुछ नहीं बोलता। सिर्फ़ दोनों को देखता है। फिर मुस्कुराने की कोशिश करता है।
रघुवीर -राम-राम भाभी... राम-राम रामू...
रामनारायण - आओ रघुवीर... आज बहुत देर कर दी।
रघुवीर -डाक देर से आई थी।
(हल्का-सा हँसते हुए) और अब... मेरे घुटने भी पहले जैसे नहीं रहे।
रामनारायण तुरंत चारपाई से उठते हैं। साइकिल पकड़ लेते हैं।
रामनारायण - घुटने बूढ़े हुए हैं... तू नहीं।
तीनों हल्का-सा हँसते हैं। यह हँसी बहुत छोटी है... लेकिन पूरे दृश्य में पहली बार सचमुच मुस्कान आती है सावित्री भीतर से पानी लेकर आती है। रघुवीर दोनों हाथों से गिलास पकड़ता है। एक घूँट पीता है। आँगन की ओर देखता है। फिर धीरे से पूछता है—
रघुवीर  -आज भी... लिखी?
रामनारायण बिना कुछ कहे मुस्कुरा देते हैं। उत्तर मिल चुका है।
रघुवीर भी मुस्कुरा देता है। जैसे... यह प्रश्न वह हर महीने पूछता हो।
कुछ क्षण बाद... रघुवीर अपना डाक-बैग खोलता है। उसमें से बहुत-सी चिट्ठियाँ निकालता है। किसी की पेंशन। किसी का बिजली का बिल। किसी का मनीऑर्डर।
फिर... बैग खाली हो जाता है। वह उसे उल्टा करके झाड़ता है। कुछ भी नहीं गिरता। सावित्री सब देख रही है।
वह मुस्कुराकर कहती है—
सावित्री -आज भी... हमारे नाम कुछ नहीं?
रघुवीर की मुस्कान धीरे-धीरे उतर जाती है।
वह बहुत आदर से उत्तर देता है— नहीं भाभी...
बस...इतना ही। कोई सफ़ाई नहीं। कोई बहाना नहीं। क्योंकि... जिस दु:ख का इलाज न हो... उस पर शब्द खर्च नहीं किए जाते। थोड़ी देर बाद... रामनारायण बात बदलते हैं।
रामनारायण - चल... आज खाना यहीं खाकर जाना।
रघुवीर -नहीं... घर पर बहू इंतज़ार कर रही होगी।
रामनारायण हँसते हैं।
जिसके घर कोई इंतज़ार करता हो... उसे देर नहीं करनी चाहिए।
यह सुनते ही... रघुवीर की आँखें भर आती हैं। वह तुरंत दूसरी ओर देखने लगता है।
कुछ देर बाद... वह बहुत धीमे स्वर में कहता है—
 - रामू...एक बात पूछूँ?
 -पूछ।
 -कभी... मन नहीं करता... कि उन चिट्ठियों में से... एक ही सही...भेज दूँ?
पूरा मंच शांत। हवा तक जैसे ठहर गई हो। रामनारायण बहुत देर तक कुछ नहीं बोलते। फिर धीरे-धीरे नीम के नीचे चले जाते हैं। उसके तने पर हाथ रखते हैं। आकाश की ओर देखते हैं।
और कहते हैं—रघुवीर... चिट्ठी  भेजने का मतलब होता है— सामने वाले से उत्तर माँगना।
 और... प्रेम... कभी हिसाब नहीं माँगता।
रघुवीर की पलकों पर आँसू चमकने लगते हैं। वह उन्हें छिपा लेता है। फिर...एकदम से हँसने की कोशिश करता है।
रघुवीर -याद है... जब आदित्य पहली बार स्कूल गया था?
रामनारायण खिल उठते हैं।
अरे...उस दिन तो...
दोनों एक साथ हँस पड़ते हैं।
रघुवीर - रो-रोकर पूरा स्कूल सिर पर उठा लिया था। कह रहा था—मैं बाबूजी के बिना नहीं पढ़ूँगा...
रामनारायण की हँसी धीरे-धीरे रुक जाती है। वे दूर सडक़ की ओर देखते हैं। 
फिर बहुत धीमे स्वर में कहते हैं—समय... सचमुच बड़ा अच्छा शिक्षक है... पहले...बच्चे पिता के बिना रहना नहीं सीखते...
फिर... पिता... बच्चों के बिना रहना सीख जाते हैं...
इन शब्दों के बाद... किसी के पास कुछ कहने को नहीं बचता। दूर मंदिर की आरती समाप्त हो चुकी है। रात पूरी उतर आई है। आँगन में दीपक अब भी जल रहा है।
उसकी लौ... तीनों के चेहरों पर पड़ती है। तीनों चुप हैं... लेकिन... तीनों अलग-अलग बात सोच रहे हैं। और दर्शक... 
पहली बार समझने लगते हैं—यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं है... यह उस हर घर की कहानी है, जहाँ प्रेम बोलता कम है... निभाया ज़्यादा जाता है।
(प्रकाश धीरे-धीरे मंद होता है।)

दृश्य  - 3 (भाग - 1)
शहर... जहाँ समय किसी का नहीं होता


समय -उसी सप्ताह का सोमवार।
स्थान - महानगर का एक छोटा-सा फ्लैट।
मंच सज्जा - मंच का दृश्य अब पूरी तरह बदल चुका है। मिट्टी का आँगन नहीं... नीम का पेड़ नहीं... तुलसी का चौरा नहीं... सामने है—
तीसरी मंज़िल का एक छोटा-सा फ्लैट। एक सोफ़ा। लैपटॉप। दीवार पर बड़ी घड़ी। टेबल पर बिखरी फाइलें। मोबाइल की लगातार बजती घंटियाँ। बाहर वाहनों का शोर। खिडक़ी के बाहर... सीमेंट का जंगल।
प्रकाश -सुबह के आठ बजे। लेकिन घर में सुबह जैसी शांति नहीं... बल्कि भागदौड़ है। आदित्य जल्दी-जल्दी शर्ट के बटन लगा रहा है।
एक हाथ से मोबाइल कान पर है। दूसरे हाथ से बैग में फाइलें रख रहा है।
आदित्य - जी सर... हाँ सर... रिपोर्ट आज ही भेज दूँगा... जी... नहीं सर... मीटिंग से पहले पहुँच जाऊँगा।
फोन कटता है। उसी समय दूसरा फोन।
क्लाइंट कॉलिंग...
आदित्य गहरी साँस लेता है। फोन उठाता है।
जी... हाँ... मैं रास्ते में हूँ...
इतने में भीतर से उसकी पत्नी नेहा आती है। हाथ में टिफिन। चेहरे पर चिंता।
नेहा - नाश्ता तो कर लो।
 आदित्य - ऑफिस में खा लूँगा।
नेहा - कल भी यही कहा था।
आदित्य - आज सच में खा लूँगा।
नेहा हल्की मुस्कान देती है। उसे मालूम है... यह बात वह पिछले कई महीनों से सुन रही है।
इतने में... छह-सात साल का आरव स्कूल बैग लेकर आता है।
आरव - पापा... आज मेरी ड्रॉइंग प्रतियोगिता है। आप आएँगे न?
आदित्य उसके बाल सहलाता है। घुटनों के बल बैठ जाता है।
आदित्य - कोशिश करूँगा बेटा।
आरव मासूमियत से पूछता है—कोशिश...मतलब आओगे...या नहीं?
आदित्य चुप। उसके पास उत्तर नहीं। वह मुस्कुराने की कोशिश करता है।
 -अगर जल्दी छुट्टी मिली..तो ज़रूर।
आरव धीरे-धीरे सिर हिला देता है। बच्चे झूठ नहीं समझते... लेकिन अधूरे वादे पहचान लेते हैं।
नेहा सब देख रही है।
 नेहा - हर बार... यही कहते हो।
आदित्य पहली बार थोड़ा झुँझला जाता है।
 -तो क्या करूँ नेहा? नौकरी छोड़ दूँ? ईएमआई कौन भरेगा? स्कूल की फीस? घर?
घर में कुछ क्षण का मौन।
नेहा शांत स्वर में कहती है—मैं शिकायत पैसों की नहीं करती...समय की करती हूँ।
आदित्य जवाब नहीं देता। वह घड़ी देखता है। आठ बजकर पैंतालीस मिनट। वह जल्दी से बैग उठाता है। जूते पहनता है। दरवाज़े तक पहुँचता है।
तभी... उसकी नजऱ दीवार पर टँगी एक पुरानी तस्वीर पर पड़ती है। तस्वीर में... युवा रामनारायण... सावित्री... और दस साल का आदित्य।
तीनों हँस रहे हैं। आदित्य कुछ पल तस्वीर को देखता है।
हाथ बढ़ाता है... धूल साफ़ करता है।
फिर... मोबाइल बज उठता है। तस्वीर वहीं रह जाती है। वह बाहर निकल जाता है। दरवाज़ा बंद।
नेहा तस्वीर को देखती है।
धीरे से कहती है— बाबूजी... कभी आप ही इसे बुला लीजिए... यह खुद तो कभी लौट नहीं पाएगा...
(प्रकाश बदलता है) ऑफिस। बड़ी टेबल। कंप्यूटर। फाइलें। मीटिंग। लोग आते-जाते हैं। हर किसी के हाथ में मोबाइल। हर चेहरे पर जल्दी।
आदित्य लगातार काम कर रहा है। घड़ी... दस... बारह... दो... चार... छह... समय भाग रहा है।
अचानक... उसका मोबाइल वाइब्रेट करता है।
स्क्रीन पर लिखा है— घर  (गाँव का नंबर)
आदित्य कुछ क्षण मोबाइल देखता है। मीटिंग चल रही है। बॉस बोल रहा है। सभी की नजऱ स्क्रीन पर है। वह कॉल काट देता है।
धीरे से बुदबुदाता है—मीटिंग खत्म होते ही... खुद फोन करूँगा...
लेकिन... जीवन की सबसे बड़ी भूलें... अक्सर... इसी एक वाक्य से शुरू होती हैं।
कथावाचक (ऑफ-स्टेज)
 शहर... किसी का समय नहीं चुराता। वह केवल... लोगों को इतना व्यस्त कर देता है...
 कि वे... अपने सबसे प्रिय लोगों के लिए... समय निकालना भूल जाते हैं।
प्रकाश धीरे-धीरे मंद पड़ता है।

दृश्य - 3 (भाग - 2)
शहर... जहाँ समय किसी का नहीं होता

 प्रकाश - रात के साढ़े नौ बजे। ऑफिस की अधिकतर लाइटें बुझ चुकी हैं। पूरे फ़्लोर पर अब केवल दो-तीन केबिनों में रोशनी है। बाहर काँच की खिडक़ी से शहर दिखाई देता है। हज़ारों रोशनियाँ... लेकिन किसी रोशनी में अपनापन नहीं। आदित्य अपनी कुर्सी पर झुका बैठा है। लैपटॉप की स्क्रीन अब भी खुली है। फाइलें मेज़ पर फैली हैं। कंधे थक चुके हैं। आँखें लाल हैं। वह चश्मा उतारकर आँखें मलता है। कॉफी का कप उठाता है। कॉफी ठंडी हो चुकी है। एक घूँट लेकर कप वापस रख देता है। इतने में... मोबाइल फिर कंपन करता है। इस बार कोई कॉल नहीं। एक तस्वीर। नेहा ने भेजी है।
आरव... स्कूल की ड्रॉइंग प्रतियोगिता में खड़ा है। हाथ में रंगों से भरी एक पेंटिंग। चेहरे पर मुस्कान है... लेकिन बगल वाली खाली कुर्सी साफ़ दिखाई दे रही है।
वही कुर्सी... जहाँ पिता को बैठना था।
तस्वीर के नीचे केवल दो शब्द लिखे हैं—
पहला पुरस्कार...
और उसके बाद... एक छोटा-सा मुस्कुराता हुआ इमोजी। आदित्य तस्वीर को बहुत देर तक देखता रहता है। फिर धीरे से आँखें बंद कर लेता है।
उसी समय...उसका सहकर्मी विक्रम अंदर आता है।
विक्रम - अरे... अभी तक यहीं हो?
आदित्य - बस... यह आखिऱी रिपोर्ट भेजनी है।
विक्रम कुर्सी खींचकर बैठ जाता है। मेज़ पर रखी तस्वीर देख लेता है।
विक्रम - तुम्हारा बेटा है?
आदित्य - हाँ... आज उसकी प्रतियोगिता थी।
विक्रम - गए थे?
आदित्य मुस्कुराने की कोशिश करता है। लेकिन इस बार मुस्कान नहीं आती। वह केवल सिर हिला देता है। कुछ क्षण दोनों चुप।
फिर विक्रम धीरे से कहता है—दोस्त... पैसा कमाने की दौड़ में... कहीं ऐसा न हो... कि जिनके लिए दौड़ रहे हो...वही पीछे छूट जाएँ।
आदित्य पहली बार थोड़ा झुँझला जाता है।
आदित्य - हर किसी की जिंदगी इतनी आसान नहीं होती विक्रम।
विक्रम - मैंने आसान कहा भी नहीं। मैंने सिर्फ़ इतना कहा... कि... बचपन... मीटिंग का इंतज़ार नहीं करता।
दोनों के बीच फिर मौन। विक्रम उठता है। कंधे पर हाथ रखता है। और बिना कुछ कहे चला जाता है। ऑफिस फिर खाली। सिर्फ़ घड़ी की टिक-टिक। और कीबोर्ड की आवाज़। आदित्य अचानक अपना मोबाइल उठाता है।
कॉन्टैक्ट खोलता है।
स्क्रीन पर लिखा है— घर 
वह अंगूठा कॉल वाले बटन तक ले जाता है। रुक जाता है। गहरी साँस लेता है। धीरे से मुस्कुराता है।
आदित्य (स्वयं से) - पहले रिपोर्ट भेज दूँ... फिर आराम से बात करूँगा। आज... लंबी बात करूँगा। माँ से भी... बाबूजी से भी...
वह मोबाइल मेज़ पर रख देता है। फिर से लैपटॉप खोल लेता है। स्क्रीन की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ती है। समय आगे बढ़ जाता है।
 प्रकाश बदलता है।
रात के ग्यारह बजकर पैंतालीस मिनट। ऑफिस लगभग खाली। आदित्य रिपोर्ट भेजकर कुर्सी पर पीछे टिक जाता है। थका हुआ... लेकिन संतुष्ट। वह फिर मोबाइल उठाता है। इस बार... स्क्रीन पर समय देखकर ठिठक जाता है।
आदित्य - इतनी रात... अब तो सो गए होंगे। कल सुबह बात कर लूँगा...
वह मोबाइल जेब में रख लेता है। लाइट बंद करता है। बाहर निकल जाता है।
उसी समय... मंच के दूसरे हिस्से पर हल्की रोशनी जलती है।
गाँव का वही घर। रामनारायण दरवाज़े के पास बैठे हैं। हाथ में वही जेब-घड़ी।
सावित्री भीतर से आवाज़ देती है—
सावित्री  - सो जाओ... बहुत रात हो गई।
रामनारायण सडक़ की ओर देखते हुए कहते हैं—
बस... घड़ी बारह बजा दे... फिर सो जाऊँगा।
सावित्री -क्यों?
रामनारायण मुस्कुराते हैं।
 - आज सोमवार है। शहर में आज काम ज़्यादा होगा। शायद... देर से फुर्सत मिले। क्या पता... फोन आ जाए।
सावित्री कुछ नहीं कहती। धीरे से उनके पास बैठ जाती है। दोनों... एक बंद मोबाइल की घंटी का... और एक खुले दरवाज़े का... एक साथ इंतज़ार करते रहते हैं।
मंच के दोनों हिस्सों पर एक साथ रोशनी।
एक तरफ़— आदित्य लिफ्ट में नीचे जा रहा है।
दूसरी तरफ़— रामनारायण दरवाज़े की चौखट पर बैठे हैं। दोनों के बीच... सैकड़ों किलोमीटर का फ़ासला। लेकिन... सबसे बड़ी दूरी... केवल एक अधूरा फ़ोन है।
 कथावाचक (ऑफ-स्टेज)
रिश्ते... एक दिन में नहीं टूटते। वे... आज नहीं..कल सही...फुर्सत में बात करेंगे...
जैसे छोटे-छोटे वाक्यों के नीचे... धीरे-धीरे दब जाते हैं।
घड़ी...बारह बजाती है।टन...टन...टन...बारह बार।
रामनारायण धीरे से उठते हैं। दरवाज़े को देखते हैं। उसे बंद नहीं करते। सिर्फ़ इतना कहते हैं—
शुभरात्रि बेटा...
और भीतर चले जाते हैं। दीपक की लौ धीरे-धीरे छोटी होती है... फिर... अँधेरा।

दृश्य - 4 (भाग  - 1)
विदा... जो लौटने का वादा करके गई थी
समय   -गली सुबह।
स्थान - रामनारायण का घर... और उसी घर का बीस वर्ष पुराना रूप।
मंच सज्जा - भोर की हल्की रोशनी। नीम पर बैठी कोयल की आवाज़। तुलसी पर ओस की बूँदें। बरामदे में रामनारायण अकेले बैठे हैं। उनके हाथ में वही पुरानी जेब-घड़ी है। वे घड़ी खोलते हैं। अंदर एक छोटी-सी तस्वीर रखी है। दस वर्ष का आदित्य... स्कूल की वर्दी में... हँसता हुआ। रामनारायण तस्वीर पर उँगली फेरते हैं। धीरे से मुस्कुराते हैं।
रामनारायण (धीरे से) - तू तो इसमें आज भी छोटा ही है...
अचानक... मंच पर बाँसुरी की धुन बजती है। प्रकाश बदलता है। वर्तमान धीरे-धीरे धुँधला पड़ता है। उसी बरामदे में... बीस वर्ष पहले का समय जीवित हो उठता है।
फ़्लैशबैक -
घर में चहल-पहल है।  सावित्री रसोई में पूरियाँ तल रही है। पड़ोस की औरतें आई हुई हैं। आँगन में एक बड़ा-सा लोहे का ट्रंक रखा है। उसमें कपड़े, किताबें, एक कंबल और माँ के हाथ के बने अचार के मर्तबान रखे जा रहे हैं। आज... आदित्य शहर पढऩे जा रहा है। युवा आदित्य उत्साहित है। उसकी आँखों में सपने हैं। इंजीनियर बनने के। बड़ा आदमी बनने के। शहर देखने के।
आदित्य -बाबूजी... वहाँ बहुत बड़ी-बड़ी इमारतें होती हैं?
युवा रामनारायण (हँसकर) -इतनी बड़ी... कि गाँव का नीम भी छोटा लगने लगे।
आदित्य -और ट्रेन? वो भी रोज़ चलती है?
हाँ...
और बिजली जाती नहीं?
शायद नहीं।
आदित्य बच्चों की तरह खुश हो जाता है। उसे शहर किसी कहानी जैसा लग रहा है। सावित्री एक कपड़े की पोटली लाती है। उसमें गुड़, सत्तू, और दो लड्डू हैं। वह आदित्य के बैग में रखने लगती है।
आदित्य (शर्माते हुए) - अरे माँ... इतना सब मत रखो। दोस्त हँसेंगे।
सावित्री मुस्कुराती है।---
दोस्त हँस लेंगे...  पर भूख... कभी किसी की हँसी नहीं देखती बेटा।
आदित्य चुप हो जाता है। उसी समय... रामनारायण भीतर से एक छोटा-सा डिब्बा लाते हैं। लकड़ी का। बहुत साधारण।---
आदित्य- इसमें क्या है?
रामनारायण डिब्बा उसकी हथेली पर रखते हैं।
जब कभी...  बहुत अकेला लगे... तब खोलना।
आदित्य उत्सुक हो जाता है। अभी खोलने लगता है। रामनारायण तुरंत उसका हाथ पकड़ लेते हैं।
नहीं... अभी नहीं।
आदित्य मुस्कुराकर डिब्बा बैग में रख लेता है। उसे क्या मालूम... उस डिब्बे में कोई कीमती चीज़ नहीं... बल्कि... एक मुट्ठी  गाँव की मिट्टी... और नीम के पाँच सूखे पत्ते हैं।
ध्वनि -दूर से बस का हॉर्न।पों... पों... गाँव की बस आ गई है। आँगन में अचानक हलचल बढ़ जाती है। 
पड़ोसी आवाज़ देने लगते हैं—चलो-चलो... बस निकल जाएगी!
सावित्री जल्दी-जल्दी आदित्य के माथे पर काला टीका लगाती है। आँचल से उसकी आँखें पोंछती है। हालाँकि... रो तो वह खुद रही है।
आदित्य झुककर माँ के पैर छूता है। फिर पिता के सामने आता है। कुछ क्षण... दोनों एक-दूसरे को देखते रहते हैं।
आदित्य -बाबूजी...मैं जल्दी लौटूँगा।
रामनारायण मुस्कुराते हैं। उसके दोनों कंधों पर हाथ रखते हैं। और बहुत धीरे से कहते हैं—
जल्दी मत लौटना...  इतना सीखकर लौटना... कि फिर कभी... झुककर जीना न पड़े।
आदित्य की आँखें भर आती हैं।
आदित्य -लेकिन... आप दोनों का ध्यान कौन रखेगा?
रामनारायण हल्का-सा हँसते हैं।
माँ-बाप... बच्चों के सहारे नहीं जीते बेटा... बच्चों के सपनों के सहारे जीते हैं।
आदित्य उन्हें गले लगा लेता है। रामनारायण की आँखें भर चुकी हैं। लेकिन... वे आँसू गिरने नहीं देते। क्योंकि... आज विदा का दिन है। और विदा में... हिम्मत रोने से बड़ी होती है। बस का हॉर्न फिर बजता है। आदित्य बैग उठाता है। धीरे-धीरे बाहर की ओर बढ़ता है। एक बार मुडक़र देखता है। माँ हाथ हिला रही है। पिता मुस्कुरा रहे हैं। बस चल पड़ती है। धूल उड़ती है। धीरे-धीरे... बस आँखों से ओझल हो जाती है।
सावित्री वहीं बैठ जाती है। रो पड़ती है। रामनारायण सडक़ की ओर देखते रहते हैं। बहुत देर तक।
फिर... धीरे से कहते हैं—
सावित्री... आज हमारा बेटा नहीं गया... आज... हमारा घर बड़ा हो गया।
 प्रकाश - फ़्लैशबैक धीरे-धीरे धुँधला पड़ता है। फिर वर्तमान लौट आता है। बरामदे में वही बूढ़े रामनारायण बैठे हैं। उनके हाथ में वही पुरानी घड़ी है। वह तस्वीर को फिर देखते हैं। और बहुत धीरे से कहते हैं—
बेटा... तूने वादा निभाया। बड़ा आदमी बन गया। बस... एक बात भूल गया... लौटने की तारीख़ नहीं बताई।
घड़ी की टिक-टिक सुनाई देती है। प्रकाश मंद पड़ता है। 

 दृश्य - 4 (भाग - 2)
विदा... जो लौटने का वादा करके गई थी

 प्रकाश - मंच पर फिर वर्तमान लौट आया है। बरामदे में बैठे रामनारायण कुछ देर तक उसी पुरानी घड़ी को देखते रहते हैं। फिर उसे सावधानी से जेब में रख लेते हैं।
सावित्री बाहर आती है। उसके हाथ में एक पुराना पीतल का डिब्बा है। वह उसे खोलती है। उसमें कुछ सूखे तुलसी के पत्ते, कपूर और एक छोटी-सी रुई की बत्ती रखी है। वह दीपक में नई बत्ती रखती है। रामनारायण उसे चुपचाप देखते रहते हैं।
रामनारायण -आज नई बत्ती क्यों?
सावित्री मुस्कुराती है।
सावित्री -पुरानी आधी रह गई थी।
रामनारायण धीरे से कहते हैं—कुछ चीज़ें आधी रह जाएँ...तो उन्हें बदल देना चाहिए... लेकिन कुछ रिश्ते... आधे रह जाएँ...तो पूरी उम्र निभाने पड़ते हैं।
सावित्री उनकी ओर देखती है। वह जानती है... यह बात दीपक की नहीं है।
तभी बाहर से आवाज़ आती है—रामू भैया...!
पड़ोसी हरिराम प्रवेश करता है। सिर पर साफ़ा। हाथ में लाठी। चेहरे पर गाँव की सहज मुस्कान।
हरिराम -अरे भाई! इस बार मेले में चलोगे कि नहीं?
रामनारायण हँसते हैं।
रामनारायण - अब हमारी उम्र मेले देखने की नहीं... बच्चों को देखने की है।
हरिराम भी हँस देता है।
हरिराम  -अच्छा... तो इस बार आदित्य आ रहा होगा? इतने साल हो गए... अब तो छुट्टी मिल ही जाती होगी।
यह प्रश्न सुनते ही... सावित्री चूल्हे की ओर मुँह फेर लेती है। रामनारायण का चेहरा वैसा ही शांत रहता है। वे बिना किसी शिकायत के उत्तर देते हैं—
काम बहुत है उसका...
हरिराम सहज भाव से कहता है—
 -काम तो सबके होते हैं रामू... लेकिन... बूढ़े माँ-बाप बार-बार नहीं मिलते।
रामनारायण कुछ नहीं कहते। केवल मुस्कुरा देते हैं।
हरिराम को अपनी बात का भार महसूस होता है। वह तुरंत विषय बदल देता है।
चलो... कल खेत देखने चलते हैं। नई नहर बनी है।
रामनारायण - ज़रूर।
हरिराम चला जाता है। उसके जाते ही... आँगन फिर वैसा ही शांत हो जाता है।
सावित्री धीरे से पूछती है—
सावित्री -तुमने कभी उसे बताया...कि तुम्हारी कमर का दर्द अब बढ़ गया है?
रामनारायण हँस पड़ते हैं।
रामनारायण -नहीं।
 -क्यों?
वे नीम की ओर देखते हैं।
जिस बेटे के कंधों पर पहले से ही इतना बोझ हो...
उसके हाथ में अपने दु:ख का एक और पत्थर क्यों रखूँ?
सावित्री की आँखों से एक बूँद गिर पड़ती है।
उसी समय मंच के दूसरे भाग में हल्की रोशनी। शहर का वही फ्लैट। रात। नेहा अलमारी ठीक कर रही है। उसे आदित्य के पुराने कॉलेज के कागज़ मिलते हैं। उनके बीच एक छोटी-सी लकड़ी की डिब्बी। वही... जो रामनारायण ने विदा के समय दी थी। नेहा उत्सुकता से खोलती है। अंदर... सूखी मिट्टी। नीम के पाँच पत्ते। और एक मुड़ा हुआ कागज़। वह चौंक जाती है। इतने में आदित्य कमरे में आता है।
नेहा - सुनो... ये क्या है?
आदित्य डिब्बी देखता है। कुछ पल बिल्कुल स्थिर रह जाता है। जैसे समय अचानक पीछे लौट गया हो। वह धीरे से डिब्बी हाथ में लेता है। मिट्टी को उँगलियों से छूता है। आँखें नम हो जाती हैं।
नेहा - ये मिट्टी...?
आदित्य धीमे स्वर में कहता है—घर की है... बाबूजी ने कहा था... जब लगे कि दुनिया बहुत बड़ी हो गई है... तो इसे छू लेना... याद आ जाएगा... तुम कहाँ से चले थे।
नेहा चुप हो जाती है। आदित्य वह मुड़ा हुआ कागज़ खोलता है। उस पर रामनारायण की लिखावट है—
बेटा, जहाँ भी रहना... इतना बड़ा मत हो जाना... कि अपने गाँव लौटने का रास्ता छोटा लगने लगे।
-  बाबूजी
आदित्य बहुत देर तक उस कागज़ को देखता रहता है। फिर अचानक अपना मोबाइल उठाता है। 
स्क्रीन पर लिखता है—बाबूजी
उसकी उँगली कॉल के बटन पर जाती है... रुक जाती है। वह घड़ी देखता है। रात के बारह बज चुके हैं।
आदित्य (धीरे से) -सो गए होंगे... कल सुबह सबसे पहले बात करूँगा...
नेहा उसे देखती रहती है। वह कुछ नहीं कहती। क्योंकि...वह जानती है...जि़ंदगी में सबसे ख़तरनाक शब्द कल होता है।---
कथावाचक (ऑफ़-स्टेज)
मनुष्य अपने प्रियजनों से दूर नहीं जाता... वह केवल यह मान लेता है... कि अभी बहुत समय बाकी है।
और... समय... कभी किसी को यह वचन नहीं देता।
मंच पर दोनों घर एक साथ दिखाई देते हैं। एक ओर... गाँव का खुला दरवाज़ा। दूसरी ओर... शहर का बंद फ्लैट। एक ओर... पिता बेटे के फ़ोन की प्रतीक्षा में।
दूसरी ओर... बेटा सुबह फ़ोन करने का निश्चय लेकर सो जाता है।
दोनों के बीच... केवल एक रात का फ़ासला है। लेकिन... कभी-कभी...एक ही रात...पूरी जिं़दगी बदल देती है।
प्रकाश धीरे-धीरे बुझता है।

दृश्य  - 5 (भाग - 1)
हर महीने की पहली तारीख़
समय -  कई महीने बाद।
मंच - बरामदे में वही पुरानी मेज़। दिवार पर टंगा कैलेंडर। रामनारायण धीरे-धीरे पिछले महीने का पन्ना फाड़ते हैं। नई तारीख़ सामने आती है—
1 तारीख़। वे हल्की मुस्कान के साथ बैठते हैं। स्याही की दवात खोलते हैं। कलम उठाते हैं। सावित्री समझ जाती है। आज फिर एक चि_ी लिखी जाएगी।
सावित्री (मुस्कुराकर) - आज क्या लिखोगे?
रामनारायण -जो पिछली बार नहीं लिख पाया।
वे लिखना शुरू करते हैं।
 वॉयसओवर
प्रिय बेटा, आज खेत में पहली बारिश हुई। मिट्टी की खुशबू आई... तो लगा,  तू दौड़ता हुआ आएगा और कहेगा—बाबूजी... भीगने चलो! तेरी माँ ने आज भी खीर बनाई।  कह रही थी—अगर आदित्य होता तो दो कटोरी खाता।
मैंने भी हाँ में सिर हिला दिया।
 झूठ नहीं बोला... क्योंकि मेरे लिए... तू आज भी यहीं रहता है।
 — तुम्हारा बाबूजी।
रामनारायण चि_ी मोड़ते हैं। उसे माथे से लगाते हैं। फिर उसी लोहे के बक्से में रख देते हैं। ताला बंद। चाबी फिर जेब में।
सावित्री धीरे से पूछती है—कभी पढ़ेगा इन्हें?
रामनारायण मुस्कुराते हैं। - अगर भाग्य में लिखा होगा...तो ज़रूर पढ़ेगा।
तभी... रामनारायण को तेज़ खाँसी उठती है। वे तुरंत मुँह फेर लेते हैं। रुमाल मुँह पर रख लेते हैं। सावित्री घबरा जाती है।
सावित्री -वैद्य जी को बुलाऊँ?
रामनारायण (हँसकर) - अरे... बुढ़ापा है... बीमारी नहीं।
लेकिन...रुमाल मोड़ते समय... दर्शकों को एक हल्का-सा लाल धब्बा दिखाई देता है। सावित्री नहीं देख पाती। रामनारायण तुरंत रुमाल जेब में रख लेते हैं।
 कथावाचक
कुछ पिता...अपने आँसू ही नहीं...
अपनी बीमारी भी छिपा लेते हैं।
 क्योंकि उन्हें डर होता है... कहीं उनके बच्चों की नींद न टूट जाए।
प्रकाश मंद पड़ता है।

दृश्य  - 5  (भाग - 2)
हर महीने की पहली तारीख़

मंच -अगली सुबह। आँगन में धूप उतर आई है। रामनारायण खाट पर बैठे हैं। हाथ में वही पुरानी चिट्ठियों वाली डायरी। लेकिन आज... कलम नहीं उठी।
सावित्री भीतर से वैद्य गोपालदास को लेकर आती है।
गोपालदास - रामू, जऱा हाथ तो दिखाओ।
रामनारायण मुस्कुराते हैं।
रामनारायण -मुझे कुछ नहीं हुआ...ये तुम्हारी भाभी ही ज़्यादा डरती है।
गोपालदास नाड़ी देखते हैं। कुछ देर चुप रहते हैं। फिर धीरे से कहते हैं—
गोपालदास -आराम की ज़रूरत है। खेत का काम कम करो। और... एक बार शहर जाकर जाँच भी करा लो।
रामनारायण हँस पड़ते हैं।
इतनी उम्र खेत ने संभाल लिया... अब अस्पताल क्या संभालेगा?
गोपालदास गंभीर हो जाते हैं।
गोपालदास -जि़द मत करो रामू। शरीर भी कभी-कभी... मदद माँगता है।
रामनारायण बात टाल देते हैं। वैद्य चले जाते हैं। सावित्री देर तक चुप बैठी रहती है।
फिर धीरे से पूछती है—
आदित्य को बता दूँ?
रामनारायण तुरंत सिर हिला देते हैं।
 - नहीं।  वह आएगा... तो चिंता लेकर आएगा।
मैं चाहता हूँ...  जब आए... तो मुस्कान लेकर आए।
सावित्री की आँखें भर आती हैं। उसी समय... शहर का दृश्य। आदित्य ऑफिस में बैठा है। मोबाइल पर गाँव का नंबर चमकता है। वह मीटिंग में है। एक क्षण मोबाइल को देखता है... अपने आप से कहता है—शाम को आराम से बात करूँगा...
प्रकाश फिर गाँव पर लौटता है। रामनारायण दरवाज़े तक जाते हैं। सडक़ की ओर देखते हैं। आज... पहली बार... उन्हें सहारे के लिए चौखट पकडऩी पड़ती है। वे तुरंत हाथ हटा लेते हैं। जैसे... घर को भी अपनी कमजोरी का पता न चलने देना चाहते हों।
 कथावाचक
उम्र जब ढलती है...तो आदमी पहले चलना नहीं छोड़ता...
 छिपाना शुरू करता है। 
 अपनी तकलीफ़...अपने बच्चों से।
दूर कहीं बादल गरजते हैं। नीम का एक और पत्ता टूटकर ज़मीन पर गिरता है। प्रकाश मंद होता है।

दृश्य - 6  (भाग - 1)
खामोश होता आँगन

समय -  लगभग छह महीने बाद।
बरसात बीत चुकी है। नीम के पत्ते अब पहले जैसे घने नहीं रहे। आँगन वैसा ही है... पर अब उसमें पहले जैसी चहल-पहल नहीं। बरामदे की चारपाई पर रामनारायण बैठे हैं। हाथ में ऊनी शॉल। चेहरा पहले से कमज़ोर। खाँसी अब साथी बन चुकी है। सावित्री चाय लेकर आती है। कुल्हड़ उनके हाथ में देती है। रामनारायण कुल्हड़ पकड़ते हैं... लेकिन हाथ हल्का-सा काँप जाता है। कुछ चाय ज़मीन पर गिर जाती है। दोनों एक-दूसरे की ओर देखते हैं। रामनारायण मुस्कुराने की कोशिश करते हैं।
रामनारायण - लगता है...हाथ भी अब बूढ़े हो गए।
सावित्री पहली बार मुस्कुराती नहीं। धीरे से उनका हाथ अपने हाथों में ले लेती है।
सावित्री -चलो... इस बार शहर चलते हैं। आदित्य के पास।
रामनारायण कुछ क्षण चुप रहते हैं। फिर दूर सडक़ की ओर देखते हैं।
 - जिस बेटे को आने की फुर्सत नहीं... उसके घर... बोझ बनकर नहीं जाना चाहता।
सावित्री तुरंत बोल उठती है—
बोझ? बाप कभी बेटे पर बोझ होता है क्या?
रामनारायण की आँखें नम हो जाती हैं।
 - नहीं... लेकिन बूढ़ा बाप... अपने मन में... यह डर ज़रूर पाल लेता है।
दोनों चुप। केवल हवा।उसी समय... गली से मुन्ना दौड़ता हुआ आता है। अब वह पहले से थोड़ा बड़ा हो गया है। हाथ में स्कूल का रिपोर्ट कार्ड।
मुन्ना - दादा! पहला नंबर आया!
रामनारायण की आँखें चमक उठती हैं। वे काँपते हाथों से रिपोर्ट कार्ड देखते हैं।
रामनारायण -शाबाश! 
वे जेब टटोलते हैं। एक पुराना पाँच रुपये का सिक्का निकलता है। मुन्ना की हथेली पर रख देते हैं।
मुन्ना -दादा...इतने से क्या होगा?
रामनारायण हँस पड़ते हैं।
 - जब मैं छोटा था... तब पाँच रुपये में...पूरी दुनिया खरीदने का मन हो जाता था।
मुन्ना हँसते हुए भाग जाता है। सावित्री उसे जाते हुए देखती है।
धीरे से कहती है—जब वह आता है... घर फिर से घर लगने लगता है।
रामनारायण सिर हिलाते हैं।
- बच्चे... चाहे अपने हों... या पड़ोस के... घर की साँस बन जाते हैं।
 प्रकाश बदलता है। शहर। रात। आदित्य अपने बेटे आरव का होमवर्क करा रहा है।
आरव अचानक पूछता है— पापा...दादाजी कब आएँगे?
आदित्य रुक जाता है। कुछ पल उत्तर नहीं दे पाता।
फिर धीरे से कहता है—जल्दी...
आरव मासूमियत से पूछता है—या हम चलें?
आदित्य मुस्कुराता है।
इस बार... दीवाली पर चलेंगे। पक्का।
नेहा दरवाज़े पर खड़ी सब सुन रही है। वह धीरे से कैलेंडर देखती है। दीवाली में अभी तीन महीने बाकी हैं। वह कुछ नहीं कहती। बस... कैलेंडर की ओर एक लंबी नजऱ डालती है।
 कथावाचक (ऑफ़-स्टेज)
मनुष्य योजनाएँ... महीनों की बनाता है।
लेकिन जीवन... केवल आज की गारंटी देता है।
प्रकाश मंद पड़ता है।

दृश्य - 6 (भाग - 2)

 मंच - संध्या उतर रही है। आँगन में हल्की ठंडक है। नीम के नीचे सूखे पत्तों की एक परत जम गई है। रामनारायण झाड़ू उठाते हैं। दो-तीन बार झाड़ू चलाते हैं...
फिर साँस फूलने लगती है। वे झाड़ू दीवार से टिकाकर वहीं चौकी पर बैठ जाते हैं। दूर से सावित्री यह सब देख रही है। आज... वह कुछ नहीं कहती। बस चुपचाप झाड़ू उठाकर खुद आँगन साफ़ करने लगती है। रामनारायण अपराध-भाव से उसे देखते हैं।
धीरे से कहते हैं—ये काम मेरा था...
सावित्री झाड़ू चलाते-चलाते रुकती है। मुस्कुराने की कोशिश करती है।
घर में... कौन-सा काम किसका होता है? जब तुम थक जाते थे... मैं कर लेती थी। आज भी कर रही हूँ।
रामनारायण की आँखें भर आती हैं। वे पहली बार महसूस करते हैं... शरीर सचमुच उनका साथ छोड़ रहा है।
उसी समय...रघुवीर डाकिया आता है। आज उसकी साइकिल की घंटी नहीं बजती। वह धीरे-धीरे पैदल ही आँगन में आता है।
रघुवीर -रामू...
रामनारायण मुस्कुराते हैं।
अरे...आज साइकिल कहाँ गई?
रघुवीर हँस देता है।
 - साइकिल नहीं...मैं बूढ़ा हो गया हूँ।
तीनों हल्का-सा मुस्कुराते हैं। रघुवीर जेब से एक लिफ़ाफ़ा निकालता है। सावित्री की आँखें चमक उठती हैं। वह जल्दी से आगे बढ़ती है।
 - आदित्य की चिट्ठी?
रघुवीर धीरे से सिर झुका देता है।
- नहीं भाभी...बैंक का कागज़ है।
सावित्री के चेहरे की चमक एक पल में बुझ जाती है। वह चुपचाप लिफ़ाफ़ा लेकर भीतर चली जाती है। रघुवीर रामनारायण के पास बैठ जाता है। कुछ देर दोनों बिना बोले नीम को देखते रहते हैं। 
फिर रघुवीर धीरे से कहता है— रामू... अब तो उसे बुला लो।
रामनारायण मुस्कुराते हैं।
 -बुलाऊँगा... लेकिन अपनी बीमारी बताकर नहीं। मैं चाहता हूँ... वह पिता से मिलने आए... मरीज़ से नहीं।
रघुवीर सिर झुका लेता है।उसके पास कोई उत्तर नहीं।
 प्रकाश बदलता है। शहर। रात। आदित्य घर लौटता है। आरव सो चुका है। नेहा चुपचाप खाना परोसती है। दोनों बिना बोले खाना खाते हैं। खामोशी लंबी हो जाती है।
आखिर नेहा बोलती है—आज गाँव से फोन आया था।
आदित्य चौंककर देखता है। - किसका?
- रघुवीर चाचा का।
आदित्य घबरा जाता है।
- सब ठीक है न?
नेहा कुछ क्षण चुप रहती है।
फिर कहती है— उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा...जब समय मिले... एक बार घर हो आना।
आदित्य गहरी साँस लेता है।
 - इस रविवार चलता हूँ।
नेहा उसकी आँखों में देखती है। बहुत शांत स्वर में पूछती है—
 -सच? या... पिछली बार की तरह  इस बार भी ज़रूर कह रहे हो?
आदित्य उत्तर नहीं दे पाता। उसकी नजऱ मेज़ पर रखी गाँव की मिट्टी वाली डिब्बी पर चली जाती है। वह उसे उठाता है। धीरे से खोलता है। मिट्टी की हल्की-सी खुशबू उठती है। वह आँखें बंद कर लेता है। जैसे... एक पल के लिए... वह फिर उसी मिट्टी के आँगन में पहुँच गया हो।
 कथावाचक (ऑफ़-स्टेज)
घर... केवल वह जगह नहीं... जहाँ हम पैदा होते हैं।
 घर... वह जगह है... जहाँ लौटने की इच्छा कभी बूढ़ी नहीं होती।
मंच पर दोनों घर एक साथ दिखाई देते हैं।
एक ओर... रामनारायण आकाश की ओर देख रहे हैं।
दूसरी ओर... आदित्य उसी आकाश को खिडक़ी से देख रहा है।
दोनों के बीच... चाँद एक ही है। लेकिन... मुलाक़ात अभी भी अधूरी है।
प्रकाश धीरे-धीरे बुझता है।

दृश्य - 7 (भाग -  1)

समय - दीपावली से एक दिन पहले की रात।
 मंच - पूरा गाँव दीपों की तैयारी में व्यस्त है। दूर-दूर से बच्चों की आवाज़ें... पटाखों की हल्की गूँज... घरों में रंगोली बन रही है। लेकिन... रामनारायण के आँगन में आज भी वैसी ही शांति है। तुलसी के चौरे पर एक दीपक जल रहा है। बरामदे में वही पुरानी मेज़। उस पर दवात... कलम... और सफेद कागज़। रामनारायण धीरे-धीरे बैठते हैं। कलम उठाते हैं। कुछ क्षण तक खाली कागज़ को देखते रहते हैं। फिर लिखना शुरू करते हैं।
(वॉयस ओवर — रामनारायण की आवाज़)
प्रिय बेटा आदित्य,
 आज पता नहीं क्यों...मन बहुत भरा-भरा है। शायद इसलिए कि कल दीपावली है। तेरी माँ ने आज भी तेरी पसंद के लड्डू बनाए हैं। और...मैं आज भी दरवाज़ा खुला छोडक़र बैठा हूँ।
रामनारायण लिखते-लिखते रुक जाते हैं। तेज़ खाँसी उठती है। इस बार...रुमाल पर खून का धब्बा साफ़ दिखाई देता है। वे उसे तुरंत मोडक़र जेब में रख लेते हैं।
इतने में... सावित्री बाहर आती है।
सावित्री -बस करो...कल लिख लेना।
रामनारायण मुस्कुराते हैं।
 - कुछ बातें... कल पर नहीं छोड़ी जातीं।
वे फिर लिखने लगते हैं।
वॉयस ओवर
 बेटा... तेरे बचपन का वह पीपल अब बहुत बड़ा हो गया है।
लेकिन... आज भी उसकी सबसे ऊँची डाल पर  मुझे तेरा बचपन दिखाई देता है।
तू कहता था—बाबूजी, मैं सबसे ऊँचा चढ़ूँगा।
देख... तू सचमुच बहुत ऊँचा चढ़ गया।
रामनारायण की आँखों से पहली बार एक आँसू कागज़ पर गिरता है। स्याही हल्की फैल जाती है।
वे मुस्कुराकर कहते हैं—अरे... बुढ़ापे में हाथ भी काँपते हैं...और आँखें भी।
सावित्री उनके पास बैठ जाती है। धीरे से पूछती है—
अगर वह कल भी नहीं आया...तो?
रामनारायण कुछ देर मौन रहते हैं। फिर आकाश की ओर देखते हैं।
तो... दीपक बुझा देंगे। लेकिन... दरवाज़ा नहीं बंद करेंगे।
सावित्री उनकी ओर देखती है। वह समझ जाती है... यह बात केवल दीपावली की नहीं है। यह पूरी जि़ंदगी की है।
उसी समय... शहर।
आदित्य अपने घर में सूटकेस निकाल रहा है। आरव खुशी से कपड़े रख रहा है।
आरव -पापा...कल दादाजी के घर चलेंगे न?
आदित्य मुस्कुराता है।
- हाँ...इस बार कोई काम बीच में नहीं आएगा।
नेहा चुपचाप भगवान के सामने दिया जलाती है।
धीरे से प्रार्थना करती है—हे भगवान... बस... इस बार देर मत होने देना।
कथावाचक (ऑफ़-स्टेज)
कभी-कभी... पूरी जि़ंदगी...केवल एक दिन का इंतज़ार करती है।
 और वही दिन...सबसे कठिन परीक्षा बन जाता है।**
मंच पर दोनों घर रोशन हैं। एक घर... आने की तैयारी में।
दूसरा...इंतज़ार की तैयारी में।
दर्शक जानते हैं... सुबह कुछ बदलने वाला है।
लेकिन... मंच पर मौजूद कोई पात्र अभी यह नहीं जानता।
प्रकाश धीरे-धीरे मंद पड़ता है।

दृश्य - 7  (भाग  - 2)

मंच - रात गहरी हो चुकी है। दीपावली की हल्की रोशनी गाँव के घरों में चमक रही है। लेकिन रामनारायण के आँगन में केवल एक दीपक जल रहा है। वही...
तुलसी के पास। रामनारायण अपनी चिट्ठी पूरी कर चुके हैं। वे उसे धीरे से मोड़ते हैं। लिफ़ाफ़े में रखते हैं।
ऊपर लिखते हैं—मेरे बेटे आदित्य के नाम...
सावित्री उन्हें देख रही है। उसकी आँखों में डर है।
सावित्री - आज बहुत थक गए हो...
रामनारायण मुस्कुराते हैं।
रामनारायण -नहीं...आज तो बहुत हल्का लग रहा है।
सावित्री उनके पास बैठ जाती है।
सावित्री -एक बात पूछूँ?
रामनारायण -पूछो।
 सावित्री -अगर भगवान पूछें...कि जीवन में सबसे बड़ा दुख क्या मिला?
रामनारायण कुछ देर सोचते हैं। फिर मुस्कुराते हैं।
 - दुख? नहीं सावित्री... मुझे तो बहुत सुख मिला। बेटा मिला...उसका बचपन मिला...  उसकी हँसी मिली...
बस... आखिऱी सालों में उसकी आवाज़ कम सुनाई दी।
सावित्री की आँखों से आँसू निकल आते हैं।
सावित्री -तुमने कभी शिकायत नहीं की...
रामनारायण धीरे से कहते हैं—
 - जिसे अपना मानते हैं...उससे शिकायत नहीं करते। उसके लिए प्रार्थना करते हैं।
कुछ पल दोनों चुप रहते हैं। दूर कहीं पटाखे की आवाज़ आती है। बच्चों की हँसी सुनाई देती है। रामनारायण आँखें बंद कर लेते हैं।
रामनारायण - सुन रही हो?
सावित्री -क्या?
रामनारायण -आदित्य की आवाज़..
सावित्री चौंक जाती है।
सावित्री -कहाँ?
रामनारायण मुस्कुराते हैं।
 - यहीं... यादों में।  जहाँ वह कभी बूढ़ा नहीं होता।
सावित्री उनका सिर अपने कंधे पर रख लेती है।
 उसी समय शहर। आदित्य कार में बैठा है। साथ में नेहा और आरव। रात का सफऱ। आरव उत्साहित है।
आरव -पापा...दादाजी को मेरा चित्र दिखाऊँगा।
आदित्य मुस्कुराता है।
-ज़रूर दिखाना।
वह मोबाइल निकालता है।
स्क्रीन पर—बाबूजी
वह कॉल करने वाला होता है।
फिर सोचता है—सुबह पहुँचकर सामने बात करूँगा।
वह मोबाइल रख देता है।
 वापस गाँव रात का अंतिम पहर। रामनारायण धीरे से उठते हैं। दरवाज़े तक जाते हैं। दरवाज़ा पूरा खोल देते हैं। बाहर ठंडी हवा चल रही है। वह चौखट को हाथ लगाते हैं।
देख... दरवाज़ा खुला है। अब अगर बेटा आए... तो उसे इंतज़ार न करना पड़े।
वह वापस चारपाई पर आते हैं। जेब से पुरानी घड़ी निकालते हैं। घड़ी को देखते हैं।
रामनारायण -चल...अब तू भी आराम कर।
घड़ी को तकिए के पास रख देते हैं। आँखें बंद करते हैं। चेहरे पर हल्की मुस्कान है।
 प्रकाश - धीरे-धीरे सुबह की हल्की रोशनी आने लगती है। मुर्गे की आवाज़। मंदिर की घंटी।
सावित्री पूजा की थाली लेकर आती है।
सावित्री -उठो...आज दीपावली है...
कोई उत्तर नहीं।
वह मुस्कुराते हुए फिर कहती है—
सुनते हो...
फिर रुक जाती है।
उसकी नजऱ रामनारायण के शांत चेहरे पर जाती है। थाली उसके हाथ से धीरे-धीरे नीचे रह जाती है। दीपक की लौ काँपती है। सावित्री उनके पास बैठ जाती है। उनका हाथ पकड़ती है। बहुत धीमे स्वर में कहती है—
 - तुमने कहा था... दरवाज़ा बंद नहीं करेंगे... देखो... मैंने भी नहीं किया।
वह उनका हाथ अपने माथे से लगा लेती है।
कथावाचक
कुछ लोग जाते नहीं हैं...बस... एक कमरे से निकलकर
 यादों के घर में रहने लगते हैं।
मंच पर केवल खुला दरवाज़ा दिखाई देता है। और उसके बाहर... सुबह की पहली किरण।
प्रकाश धीरे-धीरे बुझता है।

दृश्य - 8 (भाग - 1)

वह घर... जहाँ आवाज़ें रह गई थीं
समय - दीपावली की सुबह।
स्थान -  रामनारायण का गाँव।
मंच  - गाँव में दीपावली की तैयारी है। हर घर के बाहर रंगोली। दीवारों पर दीपक। बच्चों की आवाज़ें।
लेकिन... रामनारायण के घर के बाहर असामान्य शांति है।
वही पुराना दरवाज़ा... आज भी खुला है।
दूर से गाड़ी रुकने की आवाज़ आती है। एक कार आकर रुकती है। आदित्य उतरता है।  साथ में नेहा और आरव।
आरव खुशी से इधर-उधर देखता है।
आरव - पापा...यही दादाजी का घर है?
आदित्य मुस्कुराने की कोशिश करता है।
 -हाँ बेटा...
वह दरवाज़े की ओर बढ़ता है। धीरे-धीरे कदम रुकने लगते हैं। जैसे... दिल पहले ही कुछ समझ चुका हो।
 आदित्य -माँ...
कोई उत्तर नहीं। वह फिर आवाज़ लगाता है।
- माँ...
भीतर से सावित्री निकलती है। आदित्य उन्हें देखकर रुक जाता है। माँ का चेहरा... जो हमेशा उसे देखकर खिल उठता था... आज बहुत शांत है।
कुछ क्षण... माँ और बेटे की आँखें मिलती हैं। दोनों के पास शब्द हैं... लेकिन आवाज़ नहीं।
आदित्य धीरे से आगे बढ़ता है।
 - माँ...
सावित्री उसके चेहरे को देखती है। हाथ उसके सिर पर रखती है।
और बस इतना कहती है—आ गया बेटा...
इन दो शब्दों में... कोई शिकायत नहीं। कोई प्रश्न नहीं। बस... वर्षों का इंतज़ार है।
आदित्य चारों ओर देखता है।
- बाबूजी कहाँ हैं?
सावित्री की आँखें भर आती हैं। वह जवाब नहीं दे पाती।
पीछे से रघुवीर की आवाज़ आती है—
- रामू चला गया बेटा...
पूरा मंच शांत। आदित्य जैसे वहीं जम जाता है।
आदित्य -नहीं...कल तो...
वह वाक्य पूरा नहीं कर पाता। रघुवीर धीरे से आगे आता है।
 - हाँ... कल रात तक तुम्हारा इंतज़ार था उसे।
आदित्य की आँखों से आँसू निकल आते हैं।
- मैं आ रहा था...
रघुवीर उसकी ओर देखता है। लेकिन कुछ नहीं कहता। क्योंकि...कभी-कभी सच बोलने की ज़रूरत नहीं होती। सच सामने खड़ा होता है।
आदित्य धीरे-धीरे उस चारपाई के पास जाता है। अपने पिता को देखकर रोने लगता है। 
उनकी जेब-घड़ी रखी है। वह घड़ी उठाता है। उसे कान से लगाता है।
टिक...टिक...टिक... आदित्य टूट जाता है।
आदित्य -बाबूजी...मैं आ गया...
लेकिन...इस बार...दरवाज़ा खुला था। फिर भी... जिसे आना था... वह जा चुका था।
 प्रकाश मंद। कुछ समय बाद।

 दृश्य - 8 (भाग - 2)

    अगला दिन समय बीतता है। चारों ओर सन्नाटा ... सब चारों कोने में बैठे हैं। बाहर के कमरे का दृश्य 
सावित्री एक पुराना लोहे का बक्सा लेकर आती है। उसे आदित्य के सामने रखती है।
सावित्री -ये तुम्हारे बाबूजी ने तुम्हारे लिए छोड़ा है।
आदित्य हैरानी से देखता है।
- इसमें क्या है?
सावित्री धीरे से कहती है—
- तुम्हारे बाबूजी की पूरी उम्र...
आदित्य बक्से का ताला खोलता है। अंदर... कपड़े नहीं। गहने नहीं। कोई पैसा नहीं।
सिर्फ़... एक के ऊपर एक रखे हुए सैकड़ों लिफ़ाफ़े।
हर लिफ़ाफ़े पर एक ही नाम—
प्रिय बेटा आदित्य
आदित्य की साँस रुक जाती है। वह पहला लिफ़ाफ़ा उठाता है।उस पर तारीख़ लिखी है।
1 जनवरी...
उसकी उँगलियाँ काँपने लगती हैं।
रघुवीर धीरे से कहता है— हर महीने... पहली तारीख़ को... तेरे बाबूजी एक चिट्ठी लिखते थे।
आदित्य की आँखें भर आती हैं।
- तो... भेजी क्यों नहीं?
रघुवीर रामनारायण की खाली चारपाई की ओर देखते हुए कहता है—
- क्योंकि...उन्हें जवाब नहीं चाहिए था बेटा...
उन्हें बस... तुमसे बातें करनी थीं।
आदित्य चिट्ठियों को अपने सीने से लगा लेता है।
 कथावाचक
कभी-कभी... सबसे लंबी बातचीत... उन शब्दों में होती है... जो कभी भेजे ही नहीं जाते।
प्रकाश धीरे-धीरे मंद होता है।

दृश्य -  8 (भाग - 3)

वह घर... जहाँ आवाज़ें रह गई थीं
मंच -  आँगन में सन्नाटा है। रामनारायण की चारपाई खाली है। उसके पास उनकी पुरानी जेब-घड़ी रखी है। आदित्य लोहे के बक्से के सामने बैठा है।
सामने... सैकड़ों चिट्ठियाँ।
वह काँपते हाथों से एक लिफ़ाफ़ा उठाता है।
ऊपर लिखा है—
प्रिय बेटा आदित्य...
तारीख़—1 जुलाई...
आदित्य कुछ पल उस लिफ़ाफ़े को देखता रहता है। फिर धीरे से खोलता है।
रामनारायण की आवाज़ (ऑफ़-स्टेज)
प्रिय बेटा, आज तेरी माँ ने तेरी पसंद की खीर बनाई।
फिर खुद ही हँसकर बोली—अब कौन खाएगा?
 मैंने कहा...जिसके लिए बनाई है...वह दूर सही, लेकिन हमारा ही है।
आदित्य की आँखें भरने लगती हैं। वह जल्दी से दूसरी चिट्ठी उठाता है।
 दूसरी चिट्ठी
बेटा, आज गाँव के मेले में गया था। वहाँ एक खिलौने की दुकान पर  वही लकड़ी की कार दिखी... जैसी तेरे बचपन में थी। खरीदने का मन किया...
 फिर सोचा... अब तू बड़ा हो गया होगा।
आदित्य अपने आँसू रोक नहीं पाता। उसके हाथ से चिट्ठी नीचे गिर जाती है।
आरव धीरे-धीरे उसके पास आता है।
आरव -पापा...दादाजी आपको रोज़ लिखते थे?
आदित्य कुछ बोल नहीं पाता। बस सिर हिला देता है।
आरव - फिर भेजते क्यों नहीं थे?
यह सवाल... जैसे पूरे मंच से पूछा गया हो।
रघुवीर धीरे से आगे आता है।
रघुवीर -क्योंकि बेटा... कुछ लोग प्यार जताने के लिए नहीं... बस निभाने के लिए पैदा होते हैं।
इसी बीच आदित्य की पत्नी उसके पास आकर बैठ जाती है। 
आदित्य फिर एक चिट्ठी उठाता है। इस बार तारीख़ बहुत पुरानी है।
 रामनारायण की आवाज़
बेटा, आज तेरी पहली नौकरी लगी होगी। मुझे बहुत गर्व है। गाँव में सबको बताया।
 लेकिन... जब लोगों ने पूछा—
बेटा कब आएगा?
 तो मैंने कहा—जब उसका मन होगा।
आदित्य सिर झुका लेता है।
आदित्य -मैंने...कभी पूछा ही नहीं...कि उनका मन क्या चाहता था...
सावित्री पहली बार उसके पास बैठती है।
सावित्री - तुम्हारे बाबूजी को तुमसे कुछ नहीं चाहिए था बेटा।
आदित्य रोते हुए पूछता है—तो फिर क्या चाहिए था?
सावित्री रामनारायण की खाली कुर्सी की ओर देखती है।
- बस... कभी-कभी दरवाज़े पर तुम्हारी आवाज़।
पूरा मंच शांत। आदित्य चारपाई के पास जाता है। वहाँ बैठ जाता है।
जैसे वर्षों बाद... वह फिर बच्चा बन गया हो।
वह जेब-घड़ी उठाता है। घड़ी अब भी चल रही है।
टिक...टिक...टिक...
आदित्य -माँ...क्या बाबूजी मुझसे नाराज़ थे?
सावित्री तुरंत कहती है—
- नहीं बेटा। वह तुमसे नाराज़ होकर नहीं गए... वह तुम्हारा इंतज़ार करते-करते गए।
आदित्य की आँखों से आँसू गिरते हैं। वह बक्से में हाथ डालता है। नीचे एक अलग लिफ़ाफ़ा मिलता है।
उस पर लिखा है—
सबसे आखिर में पढऩा।
आदित्य उसे हाथ में लेता है।
रघुवीर धीरे से कहता है—
शायद... यही वह चिट्ठी है।
आदित्य काँपते हाथों से उसे देखता है।
खोलने की हिम्मत नहीं कर पाता।
कथावाचक
कुछ खत... पढऩे के लिए नहीं होते।
 उन्हें खोलने से पहले... इंसान को अपने भीतर टूटना पड़ता है।
आदित्य उस आखिऱी लिफ़ाफ़े को अपने सीने से लगा लेता है। प्रकाश धीरे-धीरे कम होता है।

दृश्य -  9
वह चिट्ठी... जो कभी देर से नहीं पहुँची

 मंच - दीपावली की रात। रामनारायण का वही आँगन। तुलसी के पास दीपक जल रहा है। दरवाज़ा अब भी खुला है। चारपाई खाली है। उस पर रामनारायण की चादर रखी है। आदित्य चारपाई के पास बैठा है। हाथ में वह आखिऱी लिफ़ाफ़ा है। पूरा घर शांत है। सावित्री एक तरफ़ बैठी है। रघुवीर दूर खड़ा है। सबकी नजऱें उसी चिट्ठी पर हैं। आदित्य धीरे-धीरे लिफ़ाफ़ा खोलता है। कागज़ बाहर निकालता है।
उस पर वही परिचित लिखावट है। उसकी उँगलियाँ काँपने लगती हैं।
रामनारायण की आवाज़ (ऑफ़-स्टेज)
प्रिय बेटा आदित्य,
 आज बहुत दिनों बाद... तुझे लिखने बैठा हूँ।
पता नहीं यह चिट्ठी तुझ तक पहुँचेगी या नहीं...
 लेकिन मन कह रहा है... आज तुझसे कुछ बातें कर लूँ।
आदित्य आँखें बंद कर लेता है।
 बेटा... जब तू छोटा था... तो तेरी उँगली पकडक़र चलना मैंने सिखाया था।
आज तू इतना बड़ा हो गया... कि दुनिया में अपना रास्ता खुद बना लिया।
यह देखकर मुझे हमेशा गर्व हुआ।
आदित्य की आँखों से आँसू गिरने लगते हैं।
 मुझे कभी यह दुख नहीं हुआ... कि तू दूर चला गया।
क्योंकि मैंने ही तो तुझे सिखाया था... कि सपनों के लिए घर की चौखट पार करनी पड़ती है।
सावित्री आँचल से आँखें पोंछती है।
बस एक छोटी-सी इच्छा थी बेटा... जब कभी थक जाओ...तो एक बार उस घर को याद कर लेना...
जहाँ तेरे आने से पहले ही  तेरी माँ खाना बना देती थी...
और मैं दरवाज़े पर बैठ जाता था।
आदित्य चिट्ठी को अपने सीने से लगा लेता है।
 रामनारायण की आवाज़
मैंने हर महीने तुझे चिट्ठी लिखी। लेकिन भेजी नहीं।
 क्योंकि मुझे डर था... कहीं तू यह न समझ ले... कि तेरा बूढ़ा पिता तुझे रोक रहा है।
कुछ क्षण मौन।
बेटा... माँ-बाप बच्चों को बाँधकर नहीं रखते।
 वे तो बस... दूर खड़े होकर दुआ करते हैं।
आदित्य अब पूरी तरह टूट चुका है।
आदित्य - बाबूजी...
उसकी आवाज़ पूरे मंच में गूँजती है।
 रामनारायण की आवाज़
अगर कभी लगे...कि तू देर से आया...
तो खुद को दोष मत देना।
आदित्य चौंककर चिट्ठी को देखता है।
 क्योंकि बेटा... तू कभी देर से नहीं आया...
 बस... मैं थोड़ा जल्दी चला गया।
पूरा मंच शांत। कुछ क्षण तक कोई संवाद नहीं। केवल दीपक की लौ दिखाई देती है। आदित्य चिट्ठी को माथे से लगाता है।
आदित्य - बाबूजी... आपने मुझे हमेशा आगे बढऩा सिखाया...
लेकिन... लौटना नहीं सिखाया।
सावित्री उसके पास आती है। उसके सिर पर हाथ रखती है।
सावित्री -तेरे बाबूजी गए नहीं हैं बेटा...
आदित्य उसकी ओर देखता है।
- जहाँ प्रेम बचा रहता है...वहाँ लोग जाते नहीं... बस दिखाई देना बंद हो जाते हैं।
आदित्य उठता है। धीरे-धीरे उस खुले दरवाज़े तक जाता है। कुछ क्षण बाहर देखता है। फिर... दरवाज़ा बंद नहीं करता। वह चौखट पर हाथ रखकर कहता है—
 - बाबूजी...अब यह दरवाज़ा हमेशा खुला रहेगा।
आरव आगे आता है। वह दादा की पुरानी जेब-घड़ी उठाता है।
आरव -पापा...यह घड़ी मुझे देंगे?
आदित्य उसे देखता है। मुस्कुराता है।
आदित्य -हाँ बेटा...लेकिन संभालकर रखना।
आरव -क्यों?
आदित्य घड़ी को देखते हुए कहता है—
क्योंकि इसमें समय नहीं... एक पूरा जीवन चलता है।

मंच पर सभी पात्र स्थिर।
एक ओर—रामनारायण की खाली कुर्सी।
दूसरी ओर— उनकी चिट्ठी।
बीच में— खुला हुआ दरवाज़ा।
 कथावाचक
कुछ लोग हमारे साथ रहते हुए भी...हमें दिखाई नहीं देते।
और जब चले जाते हैं...तो उनकी हर छोटी चीज़...
पूरी दुनिया बन जाती है।
 इसलिए... जिनके लिए दरवाज़ा खुला है...
उनके रहते... एक बार ज़रूर लौट आइए।
दीपक की लौ तेज़ होती है। धीरे-धीरे संगीत बजता है। मंच अंधकार में चला जाता है।
।। इतिश्री।।