रंगों के उस पार
समर्पण
उन सभी कलाकारों को...
जो रंगों से चित्र बनाते रहे,
स्वरों से मौन को आवाज़ देते रहे,
मंच पर हँसी बाँटते रहे,
और अपने भीतर के आँसुओं को
तालियों की गूँज में छिपाते रहे।
भूमिका
कला सीखी नहीं जाती...
वह महसूस की जाती है।
और जो जितना अधिक महसूस करता है...
वह उतना ही बड़ा कलाकार बनता है।
लेकिन शायद...
उतना ही बड़ा उसका एकांत भी होता है।
अध्याय - 1
हँसी के बाद का मौन
कुछ लोग जीवन जीते हैं... कुछ लोग जीवन को रचते हैं। और जो रचते हैं... अक्सर उन्हें समझा सबसे कम जाता है।
पर्दा गिरने के बाद
वाह...!
एक बार और...!
गोविंद...! गोविंद...!
पूरा सभागार तालियों से गूँज रहा था। बच्चे अपनी सीटों पर खड़े होकर ताली बजा रहे थे। कई लोग हँसते-हँसते अपनी आँखों से आँसू पोंछ रहे थे। मंच पर लाल मुखौटा लगाए एक कलाकार झुक-झुककर दर्शकों का अभिवादन कर रहा था। वह कभी किसी बच्चे की नकल करता... तो कभी किसी बूढ़े की चाल।
और पूरा सभागार फिर ठहाकों से भर जाता। उसके पीछे खड़े कलाकार भी मुस्कुरा रहे थे। लेकिन... आज भी... सबसे ज़्यादा तालियाँ उसी के लिए थीं। निर्देशक ने परदे के पीछे से इशारा किया।
गोविंद...
बस...
समाप्त करो।
गोविंद ने एक बार पूरे सभागार की ओर देखा। मुखौटे के पीछे उसका चेहरा छिपा था। लेकिन... उसकी आँखें... जैसे कुछ ढूँढ़ रही थीं। उसने दोनों हाथ जोडक़र प्रणाम किया। धीरे-धीरे पर्दा गिर गया। तालियों की आवाज़... धीरे-धीरे... कम होती गई। और फिर... सब शांत।
ग्रीन रूम।
बाकी कलाकार ज़ोर-ज़ोर से हँस रहे थे। आज तो कमाल हो गया...यार सामने वाली लाइन वाले अंकल तो कुर्सी पकडक़र हँस रहे थे...अगले महीने भी यही नाटक करेंगे.. सभी कपड़े बदल रहे थे। कोई मेकअप साफ़ कर रहा था। कोई सेल्फ़ी ले रहा था। लेकिन... एक कोने में... आईने के सामने... गोविंद बिल्कुल चुप बैठा था। उसने धीरे-धीरे लाल मुखौटा उतारा। मेज़ पर रखा। कुछ क्षण... बस उसे देखता रहा। फिर बहुत सावधानी से... रूमाल निकाला... मुखौटे पर लगी धूल साफ़ की। जैसे... वह कोई सामान नहीं... किसी अपने का चेहरा हो।
पीछे से आवाज़ आई—अरेे...इतना प्यार तो लोग अपनी बीवी से नहीं करते जितना तू इस मुखौटे से करता है।
राघव था। बचपन का दोस्त। गोविंद मुस्कुराया।
ये...मुझे लोगों तक पहुँचा देता है।
राघव हँसा।
और तू?
गोविंद ने आईने में खुद को देखा।
धीरे से बोला—मैं...आज भी रास्ते में हूँ।
राघव समझा नहीं। वह वर्षों से गोविंद का दोस्त था। लेकिन... गोविंद के कुछ वाक्य... हमेशा उसकी समझ से आगे निकल जाते थे।
राघव बोला—चल...आज चाय मेरी तरफ़ से।
गोविंद ने बैग उठाया। उसमें सबसे पहले... मुखौटा रखा। फिर अपना कुर्ता। बाकी सामान बाद में। राघव मुस्कुराया।
पहले मुखौटा?
गोविंद ने कहा—जो हमें पहचान दिलाते हैं... उन्हें सबसे पहले संभालना चाहिए।
दोनों बाहर निकल गए।
दृश्य - 2
वापसी
रात के लगभग साढ़े दस बज रहे थे। शहर की सडक़ें धीरे-धीरे खाली हो रही थीं। दूर कहीं कुत्ते भौंक रहे थे। कुछ दुकानें बंद हो चुकी थीं। दोनों पैदल चल रहे थे। राघव लगातार बोल रहा था।
अगले रविवार भोपाल का शो है...फिर इंदौर...फिर शायद दिल्ली भी...
गोविंद सुन रहा था। लेकिन...उसकी नजऱें... रास्ते पर थीं। अचानक... वह रुक गया। सडक़ किनारे... लगभग सत्तर साल का एक बूढ़ा चित्रकार बैठा था। सामने पाँच चित्र रखे थे।
लोग आते... चित्र देखते... कहते—अच्छे हैं... और आगे बढ़ जाते। कोई खरीदता नहीं। बूढ़ा हर जाते हुए आदमी को उसी उम्मीद से देखता... जिस उम्मीद से किसान बादलों को देखता है।
गोविंद वहीं खड़ा रह गया।
राघव बोला—चल न...
क्या हुआ?
गोविंद धीरे से बोला—जानता है...
सबसे कठिन काम चित्र बनाना नहीं है...
राघव ने उसकी ओर देखा। गोविंद की आँखें उस बूढ़े पर ही थीं।
सबसे कठिन काम...
किसी अनजान आदमी को...अपने सामने...दो मिनट रोक लेना है।
राघव ने बूढ़े की ओर देखा। फिर गोविंद की ओर। कुछ नहीं बोला। दोनों आगे बढ़ गए।
दृश्य - 3
कमरा
पुरानी इमारत की दूसरी मंजि़ल। लकड़ी का दरवाज़ा। गोविंद ने जेब से चाबी निकाली। ताला खोला।कमरा अँधेरे में डूबा था। उसने बत्ती जलाई। पीली रोशनी पूरे कमरे में फैल गई। कमरे में सबसे पहले जो दिखाई देता था...
वह था— एक बिल्कुल सफेद कैनवास। दीवार पर कुछ अधूरी पेंटिंग।
एक कोने में पुराना हारमोनियम। मेज़ पर रंग। ब्रश। डायरी। और एक बंद लिफ़ाफ़ा... जिस पर धूल जमी हुई थी। गोविंद ने बैग रखा।
सबसे पहले... मुखौटा निकाला। दीवार पर टाँग दिया।
फिर हारमोनियम के पास गया। उस पर हाथ फेरा।
धीरे से बोला—
आ गया...
फिर खुद ही मुस्कुराया।
तुझे बताने की क्या ज़रूरत थी...तू तो सुन ही रहा होगा।
कमरे में कोई नहीं था। फिर भी... वह बात कर रहा था। उसने हारमोनियम खोला।
एक स्वर छेड़ा।
सा...
बस... एक ही स्वर। फिर चुप।
कुछ देर बाद वह कैनवास के सामने जाकर बैठ गया। बहुत देर तक उसे देखता रहा। फिर धीरे से बोला—आज भी नहीं...है न?
कुछ क्षण बाद...
वह खुद ही दूसरी आवाज़ में बोला—नहीं...आज भी नहीं।
वह मुस्कुराया। - तू बड़ा जि़द्दी है।
फिर फिर से दूसरी आवाज़—और तू... बहुत अधीर।
गोविंद हल्के से हँसा। उसकी आँखें चमक उठीं।
लोग कहते हैं...मैं अकेला रहता हूँ...काश...वे एक शाम...मेरे कमरे में बैठते...उन्हें पता चल जाता...मैं कभी अकेला नहीं होता।
वह धीरे से उठा। डायरी खोली। आज की तारीख लिखी।
और केवल एक पंक्ति लिखी—
आज फिर सबको हँसाया...
कुछ पल रुका।
फिर दूसरी पंक्ति लिखी—लेकिन..आज भी...जो कहना था...वह रंगों ने भी नहीं सुना।
उसने डायरी बंद कर दी। लैंप बुझा दिया। कमरे में अब केवल चाँदनी थी। सफेद कैनवास... चुपचाप... अब भी उसका इंतज़ार कर रहा था।
हर रात की तरह... आज भी गोविंद सो गया।
लेकिन उसके कमरे में रखा सफेद कैनवास... पूरी रात जागता रहा।
अध्याय - 2
रंगों की भाषा
हर कलाकार दुनिया को वैसा नहीं देखता, जैसी वह है...
वह उसे वैसा देखता है, जैसी वह महसूस होती है।
दृश्य - 1
सुबह का पहला सुर
खिडक़ी से आती हल्की धूप ने कमरे की दीवारों को छूना शुरू ही किया था। गोविंद की आँख खुली। कुछ क्षण वह यूँ ही छत को देखता रहा। फिर उसकी नजऱ दीवार पर टंगे उसी लाल मुखौटे पर गई। वह हल्का-सा मुस्कुराया।
कल फिर लोगों को खूब हँसाया तुमने...
फिर खुद ही रुक गया।
नहीं...
हमने।
कमरे में कोई उत्तर नहीं था। फिर भी... उसे लगा जैसे मुखौटा मुस्कुरा रहा हो। वह उठकर हारमोनियम के पास गया। उस पर जमी हल्की धूल अपने रूमाल से साफ़ की। धीरे से बोला—चल...आज कौन-सा राग सुनाओगे?
कुछ पल वह चुप रहा।
फिर स्वयं ही उत्तर दिया—नहीं...आज राग नहीं...आज मौन सुनते हैं।
गोविंद हँस पड़ा।
तुम भी न...जब मैं उदास होता हूँ...तब तुम भी चुप हो जाते हो।
उसने हारमोनियम खोला। एक स्वर छेड़ा।
सा...
फिर...
रे..
बस।
आगे कुछ नहीं। कमरे में दो अधूरे सुर तैरते रहे। गोविंद ने आँखें बंद कर लीं।
सुर भी अजीब होते हैं...पूरा बजाओ तो गीत बन जाते हैं...
अधूरे छोड़ दो...तो याद बन जाते हैं।
दृश्य - 2
रंग जो दिखाई नहीं देते
चाय का कप हाथ में लिए गोविंद खिडक़ी के पास आकर बैठ गया। गली में रोज़ जैसी सुबह थी। दूध वाला। सब्ज़ी वाला। स्कूल जाते बच्चे। काम पर निकलते लोग। सब अपने-अपने समय में बँधे हुए। तभी सामने वाली गली में लगभग पाँच साल की एक बच्ची दौड़ती हुई आई। उसके हाथ में एक छोटा-सा गुब्बारा था। वह खिलखिलाकर हँस रही थी। अचानक... गुब्बारा उसके हाथ से छूट गया। हवा उसे ऊपर ले गई। बच्ची कुछ कदम दौड़ी... फिर रुक गई। उसने ऊपर देखा। और बिना रोए... धीरे-धीरे वापस लौट गई। सडक़ पर खड़े लोगों ने शायद इस घटना पर ध्यान भी नहीं दिया। किसी के लिए... वह बस एक गुब्बारा था। लेकिन... गोविंद बहुत देर तक उसी आकाश को देखता रहा।
उसने डायरी खोली।
लिखा—बचपन रोता नहीं...
वह स्वीकार करना जल्दी सीख जाता है...
फिर कुछ देर बाद उसी पंक्ति के नीचे जोड़ दिया—
शायद इसलिए...
बड़े लोग बच्चों जितने मज़बूत नहीं होते।
वह डायरी बंद करके मुस्कुराया।
देखा...एक गुब्बारा भी...कितनी बड़ी कहानी लिखवा गया।
दृश्य - 3
अधूरी रचना
दोपहर। गोविंद कैनवास के सामने बैठा था। ब्रश हाथ में था। रंग भी तैयार थे। लेकिन... पहली रेखा अभी तक नहीं बनी थी। वह बहुत देर तक सफेद कैनवास को देखता रहा।
फिर बोला—डर रहे हो?
कुछ पल चुप्पी रही।
वह स्वयं ही दूसरी आवाज़ में बोला—
- नहीं... डर तो तुम्हें लग रहा है।
गोविंद मुस्कुराया।
- हाँ...सच है। हर नई रचना... पहले कलाकार को परखती है...फिर जन्म लेती है।
उसने ब्रश उठाया। नीले रंग में डुबोया। कैनवास की ओर बढ़ाया। फिर रोक लिया।
- नहीं...आज नहीं।
वह कुर्सी से उठ गया। कमरे में टहलने लगा। अपने आप से बातें करते हुए बोला—
लोग कहते हैं...इतना सोचते क्यों हो?
कैसे समझाऊँ...
चित्र हाथ से नहीं...
पहले मन में बनता है।
जब तक मन तैयार नहीं होता...
ब्रश भी चलना नहीं चाहता।
इतने में दरवाज़े पर दस्तक हुई। राघव था।
अरे...अभी तक शुरू नहीं किया?
गोविंद मुस्कुराया।
- शुरू तो बहुत पहले कर दिया था।
राघव ने कैनवास की ओर देखा।
- लेकिन इसमें तो कुछ भी नहीं है।
गोविंद धीरे से बोला— जो दिखाई देता है...चित्र उसका आखिरी हिस्सा होता है।
असल चित्र...तो अभी मेरे भीतर बन रहा है।
राघव ने सिर खुजलाया।फिर हँसकर बोला—
- तेरी आधी बातें मेरी समझ में कभी नहीं आएँगी।
गोविंद भी हँस पड़ा।
- अच्छा ही है...अगर सब समझ गए..तो शायद मैं कलाकार नहीं रहूँगा।
दोनों की हँसी कमरे में गूँज गई।
लेकिन... सफेद कैनवास अब भी शांत खड़ा था।
जैसे... उसे पता हो... कि उस पर बनने वाली अगली रचना...
केवल रंगों की नहीं... गोविंद के जीवन की भी होगी।
कुछ कैनवास सफेद इसलिए नहीं रहते कि कलाकार के पास रंग नहीं होते...
वे इसलिए सफेद रहते हैं, क्योंकि कलाकार अभी अपने मन के रंग तलाश रहा होता है।
अध्याय - 3
प्रदर्शनी से पहले
हर कलाकार अपनी रचना दुनिया को नहीं दिखाता...
पहले वह उसे अपने मौन से मिलवाता है।
दृश्य - 1
एक अधूरी सुबह
सुबह की धूप आज कुछ अलग थी। कमरे में हल्की हवा चल रही थी। खिडक़ी के पास रखा सफेद परदा धीरे-धीरे हिल रहा था। गोविंद चाय का कप लेकर कैनवास के सामने बैठा था। कल रात उसने उस पर पहली रेखा खींची थी। आज वही रेखा उसे देख रही थी।
वह मुस्कुराया।
- तो... आज आगे बढ़ें?
कुछ पल तक वह चुप रहा।
फिर खुद ही बोला—या अभी भी नाराज़ हो?
उसने ब्रश उठाया। रंग खोले। लेकिन रंग लगाने से पहले... उसने हथेली से कैनवास को हल्के से छुआ। जैसे कोई किसान खेत में पहला बीज डालने से पहले मिट्टी को प्रणाम करता है।
जानते हो...लोग कहते हैं...चित्र बनाते समय कलाकार रंग चुनता है।पर सच यह है...रंग ही कलाकार चुनते हैं।
वह खुद ही मुस्कुराया।
देखो...फिर शुरू हो गया...अपने आप से बातें...
कुछ पल बाद उसने आईने की ओर देखा। आईने में वही चेहरा था।
उसने खुद से पूछा—गोविंद...तू इतना बोलता कब से है?
फिर खुद ही उत्तर दिया—
जिस दिन लोगों ने सुनना बंद किया...उस दिन से।
कमरे में एक गहरी चुप्पी फैल गई। उसने धीरे-धीरे रंग उठाए।
नीला... थोड़ा हरा... हल्का पीला... और कैनवास पर पहली आकृति उभरने लगी। वह कोई चेहरा नहीं था। कोई पहाड़ नहीं। कोई नदी नहीं।
बस...
एक विशाल बरगद... और उसकी छाँव में बैठा एक छोटा बच्चा। गोविंद अचानक रुक गया। बहुत देर तक उस बच्चे को देखता रहा।
तू...मुस्कुरा क्यों नहीं रहा?
फिर खुद ही जवाब दिया—
क्योंकि...मैं अभी तुझे जानता नहीं।
दृश्य - 2
निमंत्रण
दोपहर का समय था। दरवाज़े पर दस्तक हुई।
आ जा...
गोविंद ने बिना देखे ही कहा। राघव भीतर आया। हाथ में एक सफेद लिफाफा था।
बधाई हो..
गोविंद ने चौंककर देखा।
क्या हुआ?
राघव ने लिफाफा उसकी ओर बढ़ा दिया।
शहर की वार्षिक कला प्रदर्शनी...इस बार तेरी पेंटिंग चुनी गई है।
गोविंद ने धीरे से लिफाफा खोला। कुछ क्षण तक पढ़ता रहा। फिर चुपचाप मेज़ पर रख दिया। राघव हैरान था।
अरे...तू खुश नहीं है क्या?
गोविंद मुस्कुराया।
खुश हूँ।फिर ऐसा चेहरा क्यों?
गोविंद ने कैनवास की ओर देखा। बहुत धीरे से बोला—
जब बच्चे पहली बार स्कूल जाते हैं...माँ खुश भी होती है...और रोती भी है...
राघव उसकी ओर देखता रह गया।
मतलब?
गोविंद चित्र के पास गया। उसके फ्रेम पर हाथ फेरा।
ये...अब मेरा कमरा छोड़ देगा। इसलिए।
राघव हँस पड़ा।
तू सच में... हर चीज़ में जान डाल देता है।
गोविंद ने बिना उसकी ओर देखे कहा—
नहीं राघव...जान पहले से होती है...मैं सिर्फ़ उसे पहचान लेता हूँ।
कुछ देर बाद दोनों चाय पी रहे थे।
राघव बोला—एक बात पूछूँ?
गोविंद - पूछ।
अगर यह पेंटिंग बिक गई...
-तो?
गोविंद कुछ क्षण चुप रहा। उसने खिडक़ी के बाहर देखा। फिर बोला—
हर कलाकार चाहता है... कि उसकी रचना दुनिया तक पहुँचे...
लेकिन...जब वह सचमुच चली जाती है...तब पता चलता है...
विदा सिर्फ़ बेटियाँ नहीं होतीं... रचनाएँ भी होती हैं।
राघव ने पहली बार उसकी आँखों में नमी देखी।
दृश्य - 3
एक रात... सिर्फ़ कलाकार की
रात के ग्यारह बज चुके थे। पूरा मोहल्ला सो चुका था। गोविंद के कमरे में सिर्फ़ एक टेबल लैंप जल रहा था। उसने पेंटिंग को सामने रखा। कुर्सी खींची। और बिल्कुल सामने बैठ गया। कई मिनट तक... दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।
फिर गोविंद बोला—डर लग रहा है?
कुछ क्षण की चुप्पी।
- मुझे भी।
- अगर.. कल किसी ने तुम्हें पसंद नहीं किया तो?
उसने खुद ही उत्तर दिया—
- तो क्या हुआ?
मैं तो पहले भी तेरे कमरे में खुश था।
गोविंद हल्का-सा हँसा।
- और अगर... किसी ने खरीद लिया?
इस बार उसने उत्तर नहीं दिया। कमरे में मौन उतर आया।
कुछ देर बाद उसने बहुत धीरे से कहा—
- तुझे पता है.. मैं लोगों से कम... अपनी रचनाओं से ज़्यादा बातें करता हूँ।
क्योंकि..ये मुझे बीच में नहीं टोकतीं...मेरी हर चुप्पी सुनती हैं...
और...मुझे बदलने की कोशिश भी नहीं करतीं।
उसने पेंटिंग के कोने को हल्के से छुआ।
कल...अगर कोई तुझे अपने घर ले जाए...तो......वहाँ भी ऐसे ही रहना...
...जैसे यहाँ रहा है।
उसने धीरे से सफेद कपड़ा उठाया। बहुत सावधानी से पेंटिंग को ढक दिया।
जैसे... कोई माँ... सर्द रात में... अपने बच्चे पर रज़ाई ओढ़ा रही हो।
लाइट बंद हो गई। कमरे में अँधेरा था।
लेकिन... कपड़े के नीचे छिपे रंग...
मानो जाग रहे थे।
अगली सुबह पहली बार गोविंद अपनी रचना को दुनिया के बीच ले जाने वाला था...
दुनिया उसे एक चित्र की तरह देखेगी।
लेकिन गोविंद... उसे अपने जीवन के एक हिस्से की तरह विदा करेगा।
अध्याय - 4
प्रदर्शनी
कुछ लोग चित्र खरीदने आते हैं...
कुछ लोग दीवार सजाने...
और कुछ अनजाने में...
किसी कलाकार का एक टुकड़ा अपने साथ ले जाते हैं।
दृश्य - 1
भीड़ के बीच एक कलाकार
सुबह से ही शहर की कला दीर्घा लोगों से भरने लगी थी। दीवारों पर अलग-अलग चित्र सजे थे। कहीं पहाड़ थे...कहीं नदी...कहीं आधुनिक कला...कहीं देवी-देवताओं के चित्र... और उन्हीं के बीच... दीवार के एक कोने में टँगी थी... गोविंद की पेंटिंग।
बरगद... उसकी छाँव... और दूर जाती हुई पगडंडी। नीचे एक छोटी-सी पट्टी लगी थी—
— चित्रकार -गोविंद
बस इतना ही। न कोई पुरस्कार... न कोई परिचय। गोविंद दूर खड़ा था। इतनी दूर... कि कोई पहचान न सके... कि यही उसका चित्र है। वह लोगों के चेहरे देख रहा था। चित्र नहीं। पहला आदमी आया।
दो सेकंड देखा।
बोला—रंग थोड़े फीके हैं...
और आगे बढ़ गया। दूसरा आया। मोबाइल निकाला। चित्र के साथ सेल्फी ली। और बिना देखे चला गया।
तीसरा बोला—ये खाली-खाली-सा क्यों है?
उसकी पत्नी ने कहा—चलो...आगे वाले में घोड़े बने हैं..
दोनों चले गए। गोविंद मुस्कुराया।
धीरे से बोला—कोई बात नहीं...हर आदमी...अपने मन का चित्र ही खोजता है।
दृश्य - 2
जिसने चित्र नहीं... मन देखा, लगभग दोपहर हो चुकी थी। भीड़ कम होने लगी। तभी लगभग आठ-नौ साल की एक बच्ची... अपनी माँ का हाथ छोडक़र...
सीधे उसी चित्र के सामने आकर खड़ी हो गई। वह बहुत देर तक उसे देखती रही।
माँ ने आवाज़ लगाई—आओ बेटा...
लेकिन बच्ची नहीं हिली। कुछ क्षण बाद...
वह धीरे से बोली—मम्मी...वो बच्चा...घर क्यों नहीं जा रहा?
माँ ने चित्र देखा। उसे कुछ समझ नहीं आया।
- पता नहीं बेटा...
- चलो...
बच्ची फिर बोली—
- मुझे लगता है... वो किसी का इंतज़ार कर रहा है।
गोविंद की आँखें उसी बच्ची पर टिक गईं। वह पहली बार मुस्कुराया।
धीरे से बुदबुदाया—धन्यवाद... तुमने रंग नहीं..कहानी देखी।
बच्ची जाते-जाते एक बार फिर मुड़ी। चित्र को देखा। हाथ हिलाया और चली गई।
गोविंद बहुत देर तक वहीं खड़ा रहा।
उसने मन ही मन कहा—
देखा...मैं कहता था न...एक दिन...कोई तुम्हें समझेगा।
फिर खुद ही चित्र की आवाज़ बनाकर बोला—
आज मुझे नहीं...तुम्हें समझा गया है।
वह हल्का-सा हँस पड़ा। पास खड़े एक आदमी ने उसे देखा... और सोचा... शायद यह आदमी अपने आप से बातें कर रहा है।
उसे क्या पता... कलाकार कभी अकेला नहीं होता। उसकी रचना उसके साथ हमेशा होती है।
दृश्य - 3
कीमत
शाम होने लगी थी। लोग अब कम थे। तभी सफेद बालों वाले एक सज्जन... धीरे-धीरे चलते हुए... उसी चित्र के सामने आकर रुक गए। उन्होंने लगभग पाँच मिनट तक... बिना पलक झपकाए... चित्र देखा। फिर एक कदम पीछे हटे। फिर आगे आए। जैसे... चित्र नहीं पढ़ रहे हों... किसी की डायरी पढ़ रहे हों।
उन्होंने धीरे से पूछा—यह चित्र किसने बनाया है?
पास खड़े स्वयंसेवक ने गोविंद की ओर इशारा किया।
- उन्होंने।
वृद्ध मुस्कुराते हुए गोविंद के पास आए।
- बेटा...तुम्हारा नाम?
- गोविंद।
- बहुत सुंदर चित्र है।
गोविंद ने सिर झुका दिया।
- धन्यवाद।
वृद्ध ने चित्र की ओर देखते हुए पूछा—इस बच्चे का चेहरा क्यों नहीं बनाया?
गोविंद कुछ क्षण चुप रहा।
फिर बोला—ताकि...हर देखने वाला...उसमें...अपना बचपन देख सके।
वृद्ध की आँखों में चमक आ गई।
उन्होंने धीरे से कहा— बहुत कम कलाकार...दर्शक के लिए जगह छोड़ते हैं।
गोविंद मुस्कुरा दिया। कुछ क्षण की चुप्पी के बाद...
वृद्ध ने जेब से अपना कार्ड निकाला। गोविंद की ओर बढ़ाया।
फिर बोले— यदि मैं...यह चित्र खरीदना चाहूँ...तो इसकी कीमत क्या होगी?
समय जैसे रुक गया। गोविंद ने पहले कार्ड देखा...
फिर चित्र... फिर अपने हाथ। उसे लगा...
जैसे किसी ने उससे पूछा हो—अपनी एक याद बेचोगे?
वह कुछ बोल नहीं पाया। उसने चित्र की ओर देखा।
मन ही मन कहा—क्या करूँ?
और जैसे भीतर से आवाज़ आई—जिस दिन बनाया था...
उसी दिन तो तय कर लिया था...कि एक दिन...मुझे जाना होगा।
गोविंद की आँखें भर आईं। लेकिन उसने आँसू पोंछ लिए।
मुस्कुराया।
और पहली बार बोला— सर...
चित्र की कीमत बताना आसान है...लेकिन...उसमें बीता हुआ समय...उसमें घुली हुई चुप्पियाँ..और...उसमें छिपी हुई प्रार्थनाएँ..
उनकी कीमत...मैं आज तक नहीं लगा पाया।
वृद्ध बहुत देर तक उसे देखते रहे।फिर मुस्कुराकर बोले—
- अच्छा है...क्योंकि...जिस कलाकार को अपनी रचना की कीमत नहीं पता... दुनिया एक दिन उसी की सबसे ज़्यादा कीमत लगाती है।
उन्होंने अपना कार्ड मेज़ पर रखा।
और जाते-जाते केवल इतना कहा—
सोच लेना...मैं कल फिर आऊँगा।
गोविंद कार्ड हाथ में लिए खड़ा रह गया। उसकी नजऱ सामने टँगी पेंटिंग पर थी।
उसे पहली बार लगा... कल शायद यह दीवार खाली हो जाएगी। और यह सोचकर...
उसने अनायास ही बहुत धीरे से कहा—
- अगर चली जाओ...तो वहाँ भी...किसी के घर में...वैसी ही शांति देना...जैसी तुमने..मेरे कमरे को दी थी।
उस रात गोविंद देर तक सो नहीं पाया। पहली बार उसकी चिंता यह नहीं थी कि उसकी पेंटिंग बिकेगी या नहीं...
बल्कि यह थी कि...
.....क्या कलाकार अपनी रचनाओं को सचमुच विदा करना सीख पाता है?
अध्याय - 5
अधूरी ......
कलाकार प्रेम करना नहीं सीखता... वह प्रेम को जीता है।
और जब उसे शब्द नहीं मिलते...तो वही प्रेम उसकी रचनाओं में उतर जाता है।
दृश्य - 1
एक पुरानी दस्तक
रात के लगभग नौ बजे थे। प्रदर्शनी से लौटने के बाद गोविंद अपने छोटे-से कमरे में बैठा था। आज पहली बार उसकी एक पेंटिंग किसी ने खरीदने की इच्छा जताई थी। लेकिन उसके चेहरे पर खुशी नहीं थी। वह उस खाली दीवार को देख रहा था... जहाँ कुछ दिनों बाद उसकी वह पेंटिंग नहीं होगी। वह धीरे-धीरे हारमोनियम के पास गया। उस पर हाथ रखा।
मुस्कुराकर बोला—आज सब लोग उस चित्र की कीमत पूछ रहे थे...कोई यह नहीं पूछ रहा था..उसे बनाते समय मैं कितना टूटा था।
उसी समय... दरवाज़े पर दस्तक हुई।
टुक... टुक...
गोविंद ने दरवाज़ा खोला।
सामने...नंदिनी थी।
वर्षों से परिचित वही मुस्कान... हाथ में कपड़े का झोला... और आँखों में वही अपनापन।
दोनों कुछ क्षण बिना बोले एक-दूसरे को देखते रहे।
नंदिनी मुस्कुराई
गोविंद —अंदर आने के लिए भी निमंत्रण चाहिए क्या?
गोविंद हँस पड़ा।
- नहीं...
गोविंद - तुम्हें तो इस कमरे का रास्ता मुझसे ज़्यादा याद है।
दृश्य - 2
घर जैसा कमरा
नंदिनी कमरे में आई। उसने चारों ओर देखा। रंग... ब्रश... कैनवास...दीवार पर टंगा नाटक का मुखौटा... कोने में रखा हारमोनियम...
सब कुछ वहीं था। वह मुस्कुराई।
- तुम नहीं बदले...
गोविंद बोला— मैं बदलना चाहता भी नहीं।
नंदिनी ने झोला रखा। सीधे रसोई में चली गई।
- चाय बनाऊँ?
गोविंद ने हँसते हुए कहा—तुम्हें आज भी पता है... चीनी कहाँ रखता हूँ?
नंदिनी ने पीछे मुड़े बिना उत्तर दिया—
कुछ घर...भूलते नहीं।
कुछ ही देर में दोनों चाय लेकर खिडक़ी के पास बैठ गए। बाहर हल्की बारिश हो रही थी।
कमरे में चाय की भाप... और वर्षों की चुप्पी एक साथ तैर रही थी।
दृश्य - 3
तुम कहाँ हो?
नंदिनी धीरे-धीरे उठी। गोविंद की अधूरी पेंटिंग के सामने जाकर खड़ी हो गई। उसने उस पर उँगलियाँ फेरीं। फिर बहुत शांत स्वर में बोली—
- गोविंद...
एक बात पूछूँ?
गोविंद मुस्कुराया।
- तुम्हें कब से पूछने की अनुमति लेनी पडऩे लगी?
नंदिनी ने उसकी ओर देखा। कुछ क्षण चुप रही।
फिर बोली—
तुम्हारे जीवन में..
मेरी जगह कहाँ है?
कमरे में सन्नाटा उतर आया। गोविंद तुरंत उत्तर नहीं देता।
वह धीरे-धीरे उठता है। पहले हारमोनियम तक जाता है।
उस पर हाथ फेरता है। फिर कैनवास के सामने खड़ा हो जाता है।
कुछ पल रंगों को देखता है। फिर नंदिनी की ओर मुड़ता है।
- तुम कहाँ नहीं हो, नंदिनी...
मेरे हर कैनवास में तुम हो...
जब कोई रंग दूसरे रंग से मिलने में डरता है...
तो तुम उसे साहस बनकर जोड़ देती हो।
वह हारमोनियम का ढक्कन खोलता है।
एक हल्का-सा... सा छेड़ता है।
मेरे हर सुर में तुम हो...
तुम मेरे संगीत का सा हो... जिससे हर राग जन्म लेता है...
और जिसके बिना कोई धुन पूरी नहीं होती।
वह अपनी डायरी उठाता है। उसके पन्ने पलटता है।
मेरी हर कविता में तुम हो...
कुछ पंक्तियों में शब्द बनकर...
और कुछ पंक्तियों के बीच की खामोशी बनकर।
अब वह दीवार पर टंगे नाटक के मुखौटे को उतारता है। उसे हथेली पर रखता है। बहुत धीरे से मुस्कुराता है।
- और मेरे हर नाटक में...जब पूरा सभागार हँस रहा होता है...
तब...मेरे भीतर जो आदमी रो रहा होता है...उसे संभालने वाली भी तुम ही हो।
तुम...
मेरे हर पात्र की मुस्कान हो...
जिसके पीछे...मैं अपने आँसू छिपा देता हूँ।
नंदिनी की आँखें भर आईं।
उसने धीरे से पूछा—
अच्छा...तो मैं तुम्हारी हर रचना में हूँ...
लेकिन...तुम्हारे जीवन में कहाँ हूँ?
गोविंद कुछ देर तक चुप रहा। उसने अपने हाथों पर लगे रंग देखे।
फिर बहुत धीरे से बोला—
मेरा जीवन...
इन रंगों से अलग है ही कहाँ?
जब मैं चित्र बनाता हूँ...तभी जीता हूँ।
जब सुर छेड़ता हूँ...तभी साँस लेता हूँ।
जब मंच पर किसी और का जीवन जीता हूँ...
तब कहीं जाकर...
अपने जीवन का बोझ हल्का कर पाता हूँ।
फिर उसने नंदिनी की आँखों में देखा। और मुस्कुराकर कहा—
- अगर तुम पूछो...कि मेरे जीवन में कहाँ हो...
- तो उत्तर यही है...
- जहाँ-जहाँ मैं सचमुच जीवित होता हूँ...
- वहाँ तुम ही तुम हो।
नंदिनी की आँखों से आँसू निकल आए। लेकिन वह मुस्कुराई।
उसने धीरे से कहा—
यही तो मेरी शिकायत है, गोविंद...
तुम अपनी कला में इतने जीवित हो...
कि...अपने लिए जीना भूल जाते हो।
मैं तुम्हें तुम्हारी कला से दूर नहीं करना चाहती...
मैं तो बस...
उस गोविंद के साथ भी कुछ पल जीना चाहती हूँ...
जो रात को रंग समेटने के बाद...
हारमोनियम बंद करने के बाद...
और नाटक का मुखौटा उतारने के बाद...
चुपचाप बैठ जाता है।
गोविंद की आँखें पहली बार झुक गईं।
उसने धीमे स्वर में कहा—
- शायद...उस गोविंद से...
मैं भी अभी तक नहीं मिल पाया हूँ।
दोनों के बीच फिर मौन उतर आया। बाहर बारिश रुक चुकी थी। नंदिनी उठी। अपने झोले से एक छोटा-सा लिफाफा निकाला।
उसे मेज़ पर रखा।
गोविंद ने पूछा—
यह क्या है?
नंदिनी मुस्कुराई।
जब कभी...तुम्हें लगे कि... दुनिया में कोई तुम्हें नहीं समझता...
तब इसे पढ़ लेना।
गोविंद ने लिफाफा हाथ में लिया। कुछ कहना चाहा... पर शब्द नहीं मिले।
नंदिनी दरवाज़े तक पहुँची। फिर मुड़ी।
मुस्कुराकर बोली—मैं जा नहीं रही, गोविंद...बस...
इतनी दूर खड़ी रहूँगी...कि जब तुम पीछे मुड़ो...तो तुम्हें यह भरोसा रहे...कोई अब भी तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है।
दरवाज़ा धीरे से बंद हो गया। गोविंद बहुत देर तक वहीं खड़ा रहा। उसने लिफाफा खोला नहीं। बस उसे अपने स्केचबुक के बीच रख दिया।
और खिडक़ी से बाहर देखते हुए धीरे से बोला—
कुछ लोग साथ रहकर भी दूर हो जाते हैं...और कुछ...
दूर रहकर भी...हमारी हर रचना में साँस लेते रहते हैं।
उस रात गोविंद ने कोई नई पेंटिंग नहीं बनाई।
लेकिन उसने पहली बार महसूस किया कि कुछ रिश्ते साथ रहने से नहीं, एक-दूसरे को समझने से जीवित रहते हैं।
अध्याय - 6
सरस्वती
कला केवल सीखी नहीं जाती...
उसे किसी का आशीर्वाद बनकर जीवन में उतरना पड़ता है।
दृश्य - 1
खामोश सुबह
रात भर बारिश होती रही थी। सुबह खिडक़ी से आती हवा में मिट्टी की सोंधी गंध घुली हुई थी। कमरे में सब कुछ वैसा ही था... दीवार पर लाल मुखौटा...
सामने अधूरा कैनवास... मेज़ पर रंग... और कोने में रखा पुराना हारमोनियम। बस... एक चीज़ बदल गई थी। कैनवास के नीचे दबा नंदिनी का पत्र...
अब भी वहीं था। गोविंद कई बार उसके पास गया... लेकिन हर बार हाथ वापस खींच लिया।
- अभी नहीं...
वह धीरे से बोला।
- कुछ चिट्ठियां...सही समय आने पर ही पढऩी चाहिए।
कमरे में फिर वही मौन उतर आया। वह हारमोनियम के पास जाकर बैठ गया।
ढक्कन खोला। हाथ रखा... लेकिन बजाया नहीं। बहुत देर तक उसे देखता रहा।
फिर मुस्कुराया।
- तू भी न...जब भी मैं चुप होता हूँ...सबसे पहले तू ही मुझे देखने लगता है।
उसने धीरे से एक सुर छेड़ा।
सा...
स्वर कमरे में गूँजा... और जैसे किसी पुराने समय का दरवाज़ा खुल गया।
फ्लैशबैक
गोविंद तब दस साल का था। बरसात का ही दिन था। घर की छत टपक रही थी। माँ आटे की लोइयाँ बना रही थीं। छोटा-सा गोविंद...
स्टील की थाली उलटी करके... उसे तबले की तरह बजा रहा था।
माँ हँस पड़ीं।
- अरे...रोटी बनने दे... फिर जितना बजाना है बजा लेना।
गोविंद ने भोलेपन से पूछा—
- माँ...संगीत दिखाई क्यों नहीं देता?
माँ कुछ क्षण उसे देखती रहीं। फिर उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं—
- बेटा...भगवान भी दिखाई नहीं देते...
लेकिन महसूस होते हैं। संगीत भी वैसा ही है।
गोविंद चुप हो गया। उस दिन शायद...उसे उत्तर पूरा समझ नहीं आया था।
वर्तमान
गोविंद की आँखें खुलीं। हारमोनियम अब भी उसके सामने था। उसने उसके किनारे पर उँगली फिराई।
बहुत धीरे से बोला—
- माँ...तुमने सही कहा था...कुछ चीज़ें दिखाई नहीं देतीं...
लेकिन...आज भी इस कमरे में रहती हैं। उसकी आँखें नम हो गईं।
दृश्य - 2
मजबूरी
दरवाज़े पर दस्तक हुई। मकान मालिक था।
गोविंद जी...तीन महीने हो गए। अब मैं भी क्या करूँ?
गोविंद चुप रहा।
दो दिन का समय और दे दीजिए।
मकान मालिक ने लंबी साँस ली।
देखिए...मैं आपको समझता हूँ...लेकिन समझदारी से किराया नहीं भरता।
वह चला गया। कमरे में फिर सन्नाटा। गोविंद ने जेब टटोली।
कुछ सिक्के। एक पुराना नोट। बस।उसने पूरे कमरे पर नजऱ डाली।
रंग?
नहीं... वे नहीं बेच सकता।
कैनवास?
नहीं... वह अभी अधूरा है।
मुखौटा?
नहीं... वह उसकी पहचान है।
उसकी नजऱ... धीरे-धीरे...
हारमोनियम पर जाकर ठहर गई। कमरे में जैसे किसी ने साँस रोक ली। वह तुरंत दूसरी ओर देखने लगा।
- नहीं...तू नहीं...
कुछ देर बाद फिर वही नजऱ। फिर वही मौन। फिर वही संघर्ष। वह हारमोनियम के सामने बैठ गया। दोनों हाथ उस पर रख दिए।और पहली बार...
जैसे किसी दोस्त से बात कर रहा हो—
- सुन...अगर मैं तुझे भेज दूँ...तो नाराज़ तो नहीं होगा?
कमरा शांत था।फिर उसने खुद ही उत्तर दिया—
- नहीं...अगर तेरी ज़रूरत कहीं ज़्यादा है...
तो जाना चाहिए।
गोविंद मुस्कुराया...
लेकिन इस बार मुस्कान में दर्द था।
- झूठे...
- तुझे भी दुख हो रहा होगा...
दृश्य - 3
विदाई
दोपहर। एक व्यक्ति नया संगीतकार लग रहे थे ... हारमोनियम देखने आए। उन्होंने सुर मिलाए।
बोले—अच्छा साज़ है।
गोविंद ने कुछ नहीं कहा।
उन्होंने पूछा—कितने का दोगे?
गोविंद ने हारमोनियम की ओर देखा। जैसे उससे अनुमति माँग रहा हो।
फिर बहुत धीरे से बोला—
आप...जो उचित समझें।
व्यक्ति ने पैसे मेज़ पर रख दिए। हारमोनियम उठाया। चलने लगे।
अचानक...गोविंद ने उन्हें आवाज़ दी।
- एक मिनट...
व्यक्ति रुक गए। गोविंद आगे बढ़ा। हारमोनियम का ढक्कन खोला। बहुत प्यार से उसकी धूल साफ़ की।
फिर...
दोनों हाथ जोडक़र... उसके सामने झुक गया।
व्यक्ति चौंक गए।
ये क्या कर रहे हो ?
गोविंद की आवाज़ भर्रा गई।
माफ़ करना...तुझे बेच नहीं रहा...बस...कुछ दिन के लिए...अपने से दूर कर रहा हूँ।
व्यक्ति की आँखें भीग गईं।
उन्होंने पैसे वापस बढ़ाते हुए कहा—
अगर मन नहीं है...तो मत बेचो।
गोविंद ने धीरे से सिर हिलाया।
मन तो...बहुत पहले से नहीं है...
लेकिन...कभी-कभी..रोटी..सरस्वती से भी बड़ी हो जाती है।
व्यक्ति कुछ नहीं बोले। उन्होंने हारमोनियम उठाया। दरवाज़े तक पहुँचे।
गोविंद की नजऱ...आखिरी बार...
उस पर पड़ी।
उसे लगा... जैसे घर का कोई सदस्य... हमेशा के लिए जा रहा हो।
दरवाज़ा बंद हुआ। कमरा... पहली बार... सचमुच खाली लगने लगा। गोविंद उसी जगह बैठ गया... जहाँ हारमोनियम रखा रहता था।
हाथ ज़मीन पर टिकाए... जैसे अब भी वही मौजूद हो।
बहुत देर बाद...उसने फुसफुसाकर कहा—
आज..मेरे कमरे से...संगीत नहीं गया...आज...
मेरे बचपन का एक हिस्सा चला गया।
उसने सिर दीवार से टिकाया। आँखें बंद कर लीं। कमरे में कोई धुन नहीं थी।
लेकिन... उस मौन में... एक पूरा राग रो रहा था।
उस दिन गोविंद ने हारमोनियम नहीं बेचा था... उसने अपनी माँ के हाथों का स्पर्श...
कुछ समय के लिए किसी और घर भेज दिया था।
अध्याय- 7
पिता की चुप्पी
कुछ लोग जीवन भर बोलते रहते हैं और कुछ एक शब्द कहे बिना पूरी उम्र प्रेम लिख जाते हैं।
दृश्य-1
हँसी के पीछे
शहर के सबसे पुराने रंगमंच में आज गोविंद का नाटक था। ग्रीन रूम में कलाकार तैयार हो रहे थे। किसी के चेहरे पर राजा का मेकअप था। किसी पर विदूषक का। गोविंद...
आज भी वही पात्र निभा रहा था... जो पूरे नाटक में लोगों को हँसाता है।
एक कलाकार बोला—
- गोविंद भाई...आज भी पूरा हॉल लोटपोट हो जाएगा।
गोविंद मुस्कुराया।
- हँसना आसान है...हँसाना थोड़ा कठिन।
- और...हँसते हुए रोना...सबसे कठिन।
किसी ने उस वाक्य का अर्थ नहीं समझा।
दृश्य- 2
नाटक शुरू हुआ। पहला संवाद... और पूरा सभागार हँस पड़ा। गोविंद गिरा... उठा... अजीब चेहरे बनाए... बच्चे ताली बजा रहे थे। बूढ़े लोग हँसते-हँसते आँखों से आँसू पोंछ रहे थे। पर... हर बार जब दर्शक हँसते... गोविंद की आँखें एक क्षण के लिए खाली हो जातीं।
जैसे... वह किसी और दुनिया में चला जाता हो। नाटक समाप्त हुआ।
तालियों की गडग़ड़ाहट... लोग खड़े होकर सम्मान दे रहे थे। गोविंद झुककर प्रणाम करता है।
मुस्कुराता है। फिर... जैसे ही पर्दा गिरता है... वह बिना किसी से कुछ कहे...ग्रीन रूम में चला जाता है।
दृश्य-3
आईने के सामने बैठा। धीरे-धीरे अपना मेकअप उतारने लगा। हर परत के साथ... मुस्कान उतरती गई। आँखों में वही पुराना सन्नाटा लौट आया। उसने आईने से कहा—
- तू भी अजीब है...मंच पर मेरा चेहरा सबको दिखाता है..
और...मंच के पीछे...
मुझे मुझसे मिला देता है।
उसी समय... मोबाइल बजा।
माँ
उसने तुरंत आँसू पोंछे।
आवाज़ सँभाली।
- हाँ माँ...
दृश्य-4
माँ
- खाना खाया?
गोविंद मुस्कुराया।
- हाँ... आज तो खूब खाया।
माँ हँस दीं।
- झूठ मत बोल...तेरी आवाज़ बता रही है... आज फिर चाय पीकर बैठा है।
गोविंद चुप।
माँ फिर बोलीं—
- बेटा...मैं यहाँ ठीक हूँ। तेरे भैया बहुत ध्यान रखते हैं।
लेकिन..जब भी रोटी बनाती हूँ...
एक रोटी अलग रख देती हूँ।
फिर याद आता है...
तू तो यहाँ है ही नहीं।
गोविंद की आँखें भर आईं।
- माँ...जल्दी आऊँगा।
माँ बोलीं—नहीं...
जब समय मिले तभी आना।
लेकिन...अपने ऊपर थोड़ा समय भी खर्च किया कर।
फोन कट गया। कमरे में फिर सन्नाटा।
दृश्य- 5
संदूक
रात। घर लौटकर गोविंद पुराने संदूक को खोलता है। पिता का कुर्ता... पुराना प्रमाणपत्र... पहली तूलिका... और... एक डायरी।
वह पढऩा शुरू करता है।
- आज मैंने गोविंद को डाँटा।क्योंकि वह फिर चित्र बना रहा था।असल में...मैं चित्रों से नहीं...उसकी भूख से डरता हूँ।
दूसरा पन्ना।
- आज उसने हारमोनियम माँगा। घर में पैसे नहीं थे। रात भर सो नहीं पाया।
तीसरा पन्ना।
मैं चाहता हूँ...मेरा बेटा...मुझसे बड़ा कलाकार बने।
लेकिन..
उससे भी बड़ा इंसान।
आखिरी पन्ना...
लिखावट काँप रही थी।
अगर...तू यह पढ़ रहा है...
तो शायद...मैं तेरे सामने नहीं हूँ।
एक बात याद रखना..
कला कभी पैसे से बड़ी नहीं होती...
गोविंद पढ़ते-पढ़ते रुक गया। उसकी आँखें फैल गईं। नीचे एक और पंक्ति थी।
लेकिन...पैसा...कभी कला से बड़ा भी नहीं होता।
संतुलन सीख लेना बेटा...
यही जीवन है।
गोविंद डायरी सीने से लगा लेता है। फूट-फूटकर रोता है। पहली बार... अपने पिता के लिए।
उस रात गोविंद को समझ आया... कि पिता कभी उसके सपनों के विरोधी नहीं थे।
वे केवल उसके संघर्ष से डरते थे।
और प्रेम...
कई बार डाँट का रूप पहनकर आता है।
अध्याय - 8
शरण
जब संसार में कोई उत्तर नहीं मिलता... तब मन उस द्वार पर पहुँच जाता है,
जहाँ प्रश्न पूछने की भी आवश्यकता नहीं रहती।
दृश्य - 1
आधी रात का रास्ता
रात के लगभग दो बज रहे थे। शहर सो चुका था। सडक़ें खाली थीं। हल्की-हल्की हवा चल रही थी। गोविंद धीरे-धीरे पैदल चल रहा था। आज उसके कदमों में कोई दिशा नहीं थी... लेकिन उसका मन जानता था... उसे कहाँ जाना है। उसने जेब में हाथ डाला। पिता की डायरी अब भी उसके साथ थी।
दूसरी जेब में...
नंदिनी की वह चिट्ठी...
जो आज तक उसने खोली नहीं थी। उसने दोनों जेबों पर हाथ रखा...
और हल्की मुस्कान आई।
- एक ने मुझे जन्म दिया...
- दूसरी ने मुझे समझा...
और..अब मैं उस माँ के पास जा रहा हूँ...
जिसने शायद...मुझे बनाया है।
कुछ ही देर में...
वह शहर के पुराने भगवती मंदिर के सामने खड़ा था।
दृश्य - 2
माँ के चरणों में
मंदिर में कोई नहीं था। केवल एक अखंड दीपक जल रहा था। घंटियाँ शांत थीं। अगरबत्ती की हल्की सुगंध पूरे मंदिर में फैली हुई थी।
गोविंद ने धीरे से चप्पल उतारी। सीढि़य़ाँ चढ़ा। और माँ भगवती की प्रतिमा के सामने बैठ गया।
उसने कुछ नहीं कहा। बस... देखता रहा। बहुत देर तक।
इतनी देर... कि उसकी आँखों से आँसू अपने आप बहने लगे।
फिर...
वह मुस्कुराया। बिल्कुल एक छोटे बच्चे की तरह।
- माँ...आज...मैं कलाकार बनकर नहीं आया हूँ।
आज...मैं...सिर्फ़ तुम्हारा बेटा बनकर आया हूँ।
उसने दोनों हाथ जोड़ दिए।
- सब कहते हैं...
गोविंद बहुत अच्छा चित्र बनाता है।
कोई कहता है...
उसकी धुन दिल छू लेती है।
कोई कहता है...
उसके नाटक में जान होती है।
लेकिन...
माँ...क्या कभी किसी ने...गोविंद को भी देखा?
मंदिर में केवल दीपक की लौ हिल रही थी।
- माँ...मैं थक गया हूँ।लोग...मेरी पेंटिंग खरीद लेते हैं...लेकिन...मेरी रातें नहीं।
वे...मेरे सुर सुन लेते हैं...लेकिन...मेरी खामोशी नहीं।
वे...मेरे नाटक पर हँसते हैं...
लेकिन...ग्रीन रूम में...मेरे आँसू नहीं देखते।
अब उसकी आवाज़ काँप रही थी।
- माँ...क्या कलाकार होना...इतना कठिन होता है?
दृश्य - 3
मौन का उत्तर
कोई उत्तर नहीं आया। केवल... दीपक की लौ थोड़ी तेज़ हुई। मंदिर के बाहर से हवा का एक हल्का झोंका आया। माँ के चरणों में रखा एक लाल गुड़हल का फूल... धीरे-धीरे खिसकता हुआ... गोविंद की गोद में आकर गिर गया। गोविंद ने काँपते हाथों से वह फूल उठाया।
आँखें बंद कर लीं।
और तभी... जैसे उसके भीतर कोई बहुत पुरानी आवाज़ जागी।
- गोविंद... रंग मैंने दिए थे...
इसलिए नहीं...कि तू अपने घाव गिनता रहे।
सुर मैंने दिए थे..इसलिए नहीं...
कि तू अपनी पीड़ा में डूब जाए।
मंच मैंने दिया था...इसलिए नहीं...
कि तू अपना चेहरा खो दे।
तुझे...रचना इसलिए दी...कि...
तू...दूसरों के टूटे हुए मनों को जोड़ सके।
गोविंद की आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।
उसने धीरे से कहा—
लेकिन माँ...मुझे कौन जोड़ेगा?
मंदिर फिर शांत हो गया। कुछ क्षण बाद... उसकी अपनी ही साँसों के बीच...
एक विचार जन्मा।
- जिसे...मैंने बनाया है...वही...मुझे बनाएगा।
गोविंद ने आँखें खोलीं। सामने माँ की मुस्कान वैसी ही थी। पहले जैसी।
शायद... कुछ भी नहीं बदला था।
बदल गया था... तो केवल उसका मन।
दृश्य - 4
वह मंदिर की सीढि़य़ों पर बैठ गया। जेब से नंदिनी का लिफ़ाफ़ा निकाला। वर्षों बाद... पहली बार उसे खोला। उसमें केवल एक पन्ना था।लिखा था—
- गोविंद,
जिस दिन तुम्हें लगे कि दुनिया तुम्हें नहीं समझती...
उस दिन अपनी किसी रचना के पास बैठ जाना।
क्योंकि कलाकार को सबसे पहले उसकी रचना समझती है।
और यदि कभी वह भी साथ न दे...
तो माँ भगवती के पास चले जाना।
वहाँ शब्द नहीं मिलेंगे...
लेकिन तुम स्वयं को मिल जाओगे।
और हाँ ..मैं जानती हूँ कि तुम मुझसे बहुत प्रेम करते हो ... उस प्रेम में खुदको संवारना मिटाना नहीं...
मैं तुम्हारी ही हूँ ..
— नंदिनी
गोविंद मुस्कुराया। आसमान की ओर देखा। धीरे से बोला—
तुम...मुझसे दूर नहीं थीं...
तुम...बस..मुझे...मेरे पास भेज रही थीं।
सुबह की पहली किरण मंदिर की सीढि़य़ों पर पड़ी।
गोविंद उठा। माँ के चरणों में वह लाल फूल रख दिया...
और पहली बार... उसने कुछ माँगा नहीं।
सिर्फ़ कहा—
- माँ...अब दर्द मत लेना...उसे रचना बना देना।
वह मंदिर से बाहर निकला। आज उसके हाथ खाली थे।
लेकिन... पहली बार... उसका मन भरा हुआ था। उस रात गोविंद को कोई चमत्कार नहीं मिला।
उसे केवल अपना विश्वास वापस मिल गया।
और कई बार... मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा चमत्कार यही होता है।
अध्याय - 9
रंगों के उस पार
कुछ जीतें मंच पर मिलती हैं...
और कुछ मन के भीतर।
कलाकार की सबसे बड़ी विजय पुरस्कार नहीं होती...
वह वह दिन होता है,
जब उसका मन अपने ही दर्द से लडऩा छोड़ देता है।
दृश्य - 1
रंगों की प्रदर्शनी
सुबह का समय था। शहर की सबसे बड़ी कला दीर्घा... आज लोगों से भरी हुई थी। दीवारों पर दर्जनों चित्र टंगे थे। कहीं बारिश थी... कहीं अकेलापन...
कहीं एक बूढ़े किसान की आँखें... कहीं माँ की हथेली... कहीं मुस्कुराता हुआ विदूषक... और कहीं... एक खाली कुर्सी... जिसे देखकर लोग देर तक रुक जाते थे।
हर चित्र के नीचे एक ही नाम लिखा था—
- गोविंद
लोग धीरे-धीरे चलते...चित्र देखते...
फिर एक-दूसरे से फुसफुसाकर कहते—
- कमाल है...इतने रंग...इतनी गहराई...ऐसा लगता है...
जैसे चित्र बोल रहे हों।
एक बच्चा अपनी माँ से बोला—
मम्मी...ये अंकल दुखी थे क्या?
माँ ने चित्र देखा। फिर बच्चे को देखा।
मुस्कुराकर बोली—
- बेटा... जो इतना सुंदर बना सकता है...उसने बहुत कुछ महसूस किया होगा।
दूर खड़ा गोविंद...
सब सुन रहा था। वह मुस्कुराया।
धीरे से बोला—
महसूस करना...कलाकार की सबसे बड़ी पूँजी है।
उसी समय... एक बड़े उद्योगपति... अपनी पत्नी के साथ... उस सबसे बड़े कैनवास के सामने आकर रुके।
चित्र का नाम था—
मौन
चित्र में... एक आदमी था... जिसके चेहरे पर मुस्कान थी...
लेकिन... उसकी परछाईं रो रही थी।
दोनों बहुत देर तक चित्र देखते रहे।
फिर उद्योगपति ने आयोजक से पूछा—
इसकी कीमत?
आयोजक ने मुस्कुराकर कहा—
- सर...यह आज की सबसे मूल्यवान पेंटिंग है।
उन्होंने बिना मोलभाव किए कहा—
- जो भी कीमत हो...
मैं इसे खरीदना चाहता हूँ।
आयोजक गोविंद के पास आया।
धीरे से बोला—
- बधाई हो...आपकी सबसे बड़ी पेंटिंग बिक गई।
पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा। सब लोग खुश थे।
लेकिन... गोविंद की आँखें...
उस कैनवास पर ही टिकी रहीं। वह धीरे-धीरे उसके पास गया।
बहुत प्यार से... उस फ्रेम पर हाथ फेरा।
इतने प्यार से...
जैसे कोई पिता... अपनी बेटी की विदाई से पहले...उसके सिर पर हाथ फेरता है।
उसने मन ही मन कहा—
- जा...अब...किसी और के घर...रंग भरना।
फिर...धीरे से मुस्कुराया।
लेकिन... उस मुस्कान के पीछे...
एक पिता की विदाई छिपी हुई थी।
क्योंकि... लोगों के लिए... वह एक पेंटिंग थी।
गोविंद के लिए... वह उन रातों का इतिहास थी...
जब उसने भूख... अकेलापन... अपमान...
और टूटे हुए सपनों को...रंगों में घोल दिया था।
चित्र दीवार से उतारा गया। दो कर्मचारी उसे बहुत सावधानी से पैक करने लगे।
गोविंद एकटक देखता रहा।
अचानक...
उसे लगा... जैसे उसके घर का कोई सदस्य... हमेशा के लिए जा रहा हो।
उसने आँखें बंद कर लीं।
और पहली बार...
उसे अपना पुराना हारमोनियम याद आया... जो वर्षों पहले मजबूरी में बेचना पड़ा था।
वह धीरे से मुस्कुराया। आँखों में नमी थी।
- तुम भी गए थे...और आज...यह भी जा रहा है।
शायद..कलाकार की रचनाएँ...उसके पास रहने के लिए नहीं...
दुनिया के पास जाने के लिए जन्म लेती हैं।
तभी...
पीछे से एक नन्हा हाथ... उसकी उँगलियों से आकर लिपट गया।
गोविंद ने पलटकर देखा। उसकी छोटी-सी भतीजी...
मुस्कुरा रही थी।
वह बोली—चाचू...रो रहे हो क्या?
गोविंद झट से मुस्कुराया। घुटनों के बल बैठ गया।
उसके बाल सहलाते हुए बोला—
- नहीं पगली...बस...मेरे एक बच्चे का...आज नया घर मिल गया।
भतीजी ने चित्र की ओर देखा।
फिर भोलेपन से पूछा—ये आपका बच्चा था?
गोविंद हँसा...और उसकी आँखों से एक आँसू गिर पड़ा।
-हाँ...कलाकार...अपनी रचनाओं को...बच्चों की तरह ही पालता है।
भतीजी ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।
- तो चिंता मत करो...वो फिर मिलने आएगा..
गोविंद मुस्कुरा दिया। बच्चों को...विदाई का अर्थ नहीं पता होता।
शायद...इसलिए... उनकी बातें... ईश्वर की तरह सच्ची होती हैं।
अध्याय - 9
दृश्य - 2
शाम के सात बजे। उसी शहर का सबसे पुराना रंगमंच। बाहर बोर्ड लगा था—
आज का अंतिम विशेष मंचन
लेखन, निर्देशन एवं अभिनय - गोविंद
सभागार खचाखच भरा हुआ था। बच्चे... युवा... बुज़ुर्ग... सभी अपनी सीटों पर बैठे थे। सब जानते थे...
आज गोविंद का अंतिम सार्वजनिक नाटक है। कल से वह राष्ट्रीय कला सम्मान लेने दिल्ली जाने वाला था।
लेकिन...
गोविंद के लिए आज भी सबसे बड़ा सम्मान... मंच ही था।
ग्रीन रूम... हमेशा की तरह शोर से भरा हुआ था। कोई मेकअप कर रहा था। कोई संवाद दोहरा रहा था। कोई हँस रहा था। कोई घबराया हुआ था।
गोविंद एक कोने में बैठा... अपने पुराने लकड़ी के बक्से से...
वही लाल रंग का मुखौटा निकाल रहा था।
बीस वर्षों से... हर नाटक में... यही मुखौटा उसके साथ मंच पर गया था।
उसने उसे दोनों हाथों से उठाया। धीरे से साफ़ किया।
फिर मुस्कुराकर बोला—
चल मेरे दोस्त...
आज...
फिर आखिरी बार...लोगों को हँसाते हैं।
पास बैठा एक युवा कलाकार बोला—
सर..आप सच में मंच छोड़ देंगे?
गोविंद मुस्कुराया।
मंच...कभी छोड़ा नहीं जाता।
बस...एक दिन...मंच...हमसे आगे निकल जाता है।
घंटी बजी। परदा उठा। नाटक शुरू हुआ।
पहले ही दृश्य में... गोविंद मंच पर आया।
अपने पुराने अंदाज़ में... गिरा... उठा... अजीब चेहरा बनाया...
और पूरा सभागार ठहाकों से गूँज उठा। लोग हँसते-हँसते ताली बजा रहे थे। बच्चे सीटों से उछल रहे थे।
लेकिन... आज पहली बार...
गोविंद की मुस्कान अभिनय नहीं थी।
उसके भीतर... अब कोई बोझ नहीं था।
वह सचमुच मुस्कुरा रहा था। नाटक का अंतिम दृश्य आया।
पटकथा के अनुसार... विदूषक को अकेले मंच पर बैठना था।
सब कलाकार पीछे जा चुके थे। मंच पर केवल एक दीपक जल रहा था।
गोविंद ने दर्शकों की ओर देखा।
फिर धीरे से कहा—
लोग...अक्सर...विदूषक की हँसी याद रखते हैं...
लेकिन...उसके मेकअप के नीचे छिपा चेहरा...
कोई याद नहीं रखता।
पूरा सभागार शांत हो गया।
फिर वह मुस्कुराया।
और बोला—
यदि...आज...आप मेरे साथ हँसे हैं...
तो...घर जाकर...
किसी एक ऐसे इंसान को भी...
ध्यान से देखिएगा...
जो हमेशा हँसाता है...
हो सकता है...उसे...
सबसे ज़्यादा...एक मुस्कान की ज़रूरत हो।
इतना कहकर...गोविंद ने अपना मुखौटा उतार दिया।
पहली बार...दर्शकों के सामने।
सभागार में सन्नाटा छा गया।
फिर... एक व्यक्ति खड़ा हुआ।
ताली बजाई। फिर दूसरा। फिर तीसरा।
कुछ ही क्षणों में... पूरा सभागार खड़ा था।
लगातार... लगातार... लगातार तालियाँ।
लेकिन... गोविंद मंच पर खड़ा... केवल एक खाली कुर्सी को देख रहा था।
उसे लगा... जैसे उस कुर्सी पर... उसके पिता बैठे हों।
और वर्षों बाद... पहली बार...
मुस्कुराकर कह रहे हों—
- अच्छा किया बेटा...तूने..अपने मन की सुनी।
गोविंद की आँखें भीग गईं। उसने मंच को प्रणाम किया। उस लाल मुखौटे को...
धीरे से मंच पर रख दिया। और मन ही मन बोला—
- धन्यवाद...
तूने...मेरे आँसू...बीस साल तक...दुनिया से छिपाए रखे।
मंच की रोशनी धीरे-धीरे बुझने लगी। परदा गिर गया।
लेकिन...एक कलाकार के भीतर...
आज पहली बार...
कोई परदा उठा था।
दृश्य - 3
सम्मान
दिल्ली... विज्ञान भवन का विशाल सभागार। देशभर के कलाकार... साहित्यकार... संगीतज्ञ... चित्रकार... रंगकर्मी... सब एक ही छत के नीचे बैठे थे।
आज राष्ट्रीय कला सम्मान समारोह था। मंच फूलों से सजा था। पीछे विशाल अक्षरों में लिखा था—
भारतीय कला सम्मान
धीरे-धीरे नाम पुकारे जा रहे थे। तालियाँ बज रही थीं। फोटो खिंच रहे थे।
लेकिन...
एक कोने में बैठा गोविंद... इन सबसे बिल्कुल अलग था। उसकी हथेलियाँ हल्की-हल्की काँप रही थीं। उसने धीरे से अपने कुर्ते की जेब में हाथ डाला।
अंदर...
वर्षों पुरानी...
माँ भगवती की छोटी-सी तस्वीर रखी थी। उसने तस्वीर को उँगलियों से छुआ।
आँखें बंद कीं। धीरे से मुस्कुराया।
-माँ...
आज भी...पहले तुम्हें प्रणाम...
फिर दुनिया को।
उसने तस्वीर वापस जेब में रख ली।
इतने में...
घोषणा हुई—
इस वर्ष का राष्ट्रीय कला सम्मान...
चित्रकला, संगीत एवं रंगमंच के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए...श्री गोविंद...
पूरा सभागार तालियों से गूँज उठा। गोविंद धीरे-धीरे उठा। मंच की ओर बढऩे लगा।
हर कदम के साथ...
उसे अपना बचपन याद आ रहा था।
मिट्टी का घर...माँ की आवाज़... पिता की डाँट... पहला कैनवास... पहला नाटक... पहला हारमोनियम...
पहली असफल प्रदर्शनी...
नंदिनी की मुस्कान...
माँ भगवती का मंदिर...
सब...
एक-एक कर उसकी आँखों के सामने से गुजर रहा था।
मंच की सीढिय़ों तक पहुँचकर...वह एक क्षण के लिए रुक गया। गहरी साँस ली।
और...
सभागार की ओर देखा।
सबसे पहले... पहली पंक्ति में... उसकी माँ बैठी थीं।
सफेद साड़ी... चेहरे पर झुर्रियाँ...
लेकिन...
आज आँखों में वैसी ही चमक थी...जैसी तब थी...
जब गोविंद ने बचपन में पहली बार दीवार पर सूरज बनाया था।
माँ के उसने पैर छुये और पुन: मंच की ओर बढ़ गया ।
कुछ नहीं बोलीं। उनकी आँखें कह रही थीं—
- आज...तेरे बाबा...जहाँ भी होंगे...मुस्कुरा रहे होंगे।
फिर...
थोड़ा पीछे... नंदिनी बैठी थी।
आज भी वही सादगी।
न कोई आभूषण... न कोई दिखावा।
केवल... वही शांत मुस्कान।
उसने दूर से... बहुत हल्के से सिर झुका दिया।
गोविंद भी मुस्कुराया।
दोनों समझ गए...
कुछ रिश्ते... मिलकर नहीं...
समझकर पूरे होते हैं।
तभी...
एक छोटी-सी आवाज़ आई—
- चाचू...
गोविंद ने देखा... उसकी प्यारी भतीजी... दोनों हाथों से ताली बजा रही थी।
उसकी आँखों में गर्व नहीं...प्रेरणा थी।
वह अपनी माँ से कह रही थी—
- देखना...मैं भी...बड़े होकर... चाचू जैसी पेंटिंग बनाऊँगी...
गोविंद हँस पड़ा।
धीरे से बोला—
- नहीं...मुझ जैसी नहीं...अपने जैसी बनाना।
अब...
उसे किसी और को खोजने की आवश्यकता नहीं थी।
उसने फिर...
अपनी जेब पर हाथ रखा।
जहाँ...
माँ भगवती की तस्वीर...
शांत होकर...उसके साथ थी।
उसे लगा... आज भी...
वह अकेला नहीं है।
सम्मान ग्रहण करने के बाद... संचालक ने मुस्कुराकर कहा—
गोविंद जी...देश के युवा कलाकारों के लिए...कुछ शब्द...
पूरा सभागार शांत हो गया। गोविंद माइक के सामने पहुँचा।
उसने बोलने से पहले... अपनी जेब को हल्के से छुआ।
फिर... अपनी माँ की ओर देखा।
नंदिनी की ओर देखा।
भतीजी की ओर देखा।
और...
धीरे से मुस्कुरा दिया।
उसकी आँखों में अब आँसू नहीं थे... केवल शांति थी।
वह बोला—
आज...मैं जो भी हूँ...उसमें...मेरे रंग कम हैं...
और..मेरे जीवन के लोगों के रंग ज़्यादा हैं।
सभागार बिल्कुल शांत था।एक भी कैमरे की क्लिक सुनाई नहीं दे रही थी।गोविंद ने गहरी साँस ली।
और आगे कहना शुरू किया...
पूरा सभागार शांत था। गोविंद मंच पर खड़ा था। उसके हाथ में पुरस्कार था... लेकिन उसकी नजऱ उस पुरस्कार पर नहीं...
अपनी हथेलियों पर थी।
उन्हीं हथेलियों पर... जिन पर कभी रंग सूख जाते थे... जिन उँगलियों में कभी हारमोनियम के सुर बसते थे...
जिनसे नाटक के पात्र जन्म लेते थे... और जिनसे कभी...
भूख में भी... रचना रुकती नहीं थी।
उसने माइक को थोड़ा अपनी ओर खींचा।
गहरी साँस ली।
और मुस्कुराकर बोला—
मुझे बोलना कभी नहीं आया..
.मैं...
हमेशा चित्र बनाता रहा...
सुरों में छिपता रहा...
और...
मंच पर...
किसी और का जीवन जीता रहा।
हल्की-सी मुस्कान पूरे सभागार में फैल गई।
फिर उसकी आवाज़ गंभीर हो गई।
आज...लोग मुझे सम्मान दे रहे हैं...
लेकिन...यह सम्मान...
उन रातों का है...जिन्हें किसी ने देखा नहीं।
यह...उन अधूरी रोटियों का है..
जो ठंडी होकर...रंगों के पास पड़ी रह जाती थीं।
यह...
उन सुरों का है...जो..
हारमोनियम बिक जाने के बाद भी...
मेरे भीतर बजते रहे।
यह...
उन तालियों का नहीं...
जो मंच पर मिलीं...
यह..उन आँसुओं का है...
जो ग्रीन रूम में...
चुपचाप बहते रहे।
सभागार में बैठे अनेक कलाकारों की आँखें नम हो चुकी थीं। एक वृद्ध तबला वादक धीरे-धीरे सिर झुकाए बैठा था। एक रंगकर्मी अपनी ऐनक उतारकर आँसू पोंछ रहा था।
शायद... हर कोई...
अपने भीतर के गोविंद से मिल रहा था।
गोविंद ने आगे कहा—
- लोग पूछते हैं...
कलाकार इतना सोचता क्यों है?
वह मुस्कुराया।
- क्योंकि..
- वह घटना नहीं देखता...
वह...
उस घटना के पीछे छिपी हुई भावना देखता है।
आप किसी सूखे पेड़ को देखते हैं...
कलाकार...उसकी छाँव याद करता है।
आप बारिश देखते हैं...
कलाकार...उसमें किसी की प्रतीक्षा सुनता है।
आप...एक खाली कुर्सी देखते हैं...
कलाकार...
उस पर बैठा हुआ...कोई अपना खोज लेता है।
पूरा सभागार अब साँस रोके सुन रहा था। गोविंद ने अपनी माँ की ओर देखा। उसकी आँखें भर आईं।
- माँ...जब मैं हार जाता था...
आप कहती थीं..खाना खा ले...आज समझ आया...वह रोटी नहीं...जीने की वजह खिलाती थीं।
माँ की आँखों से आँसू बह निकले। फिर उसने धीरे से ऊपर देखा...जैसे पिता कहीं वहीं बैठे हों।
-बाबा...आप...मुझे रोकते नहीं थे...
आप...मेरे गिरने से डरते थे।
मुझे देर से समझ आया...
लेकिन...आज समझ आया। अब उसकी नजऱ नंदिनी पर गई। दोनों की आँखें मिलीं।
वह मुस्कुराया।
और..कुछ लोग...जीवन में...साथ रहने नहीं आते..
वे...हमें...समझने आते हैं।
नंदिनी ने चुपचाप अपनी आँखें बंद कर लीं।
यही...उनके प्रेम का सबसे सुंदर स्वीकार था। गोविंद ने अपनी छोटी भतीजी की ओर देखा। वह अब भी पूरे उत्साह से मुस्कुरा रही थी।
गोविंद बोला—
-अगर...मेरे बाद..यह बच्ची...रंग उठाए...तो...मैं चाहता हूँ...
यह...मेरी तरह चित्रकार न बने...
यह...अपने मन की कलाकार बने।
उसने अपनी जेब में हाथ डाला। माँ भगवती की छोटी-सी तस्वीर बाहर निकाली।
दोनों हाथों से उसे प्रणाम किया।
और कहा—
मेरे पास..जब कोई नहीं होता था...
तब भी...मुझे कभी अकेलापन नहीं मिला...
क्योंकि...विश्वास...हमेशा...
मेरी जेब में नहीं...मेरे भीतर रहा।
उसने तस्वीर फिर जेब में रख ली। पूरा सभागार खड़ा हो चुका था।
लेकिन... गोविंद कुछ क्षण मौन रहा।
फिर...
उसने अपना अंतिम वाक्य कहा।
आवाज़ बिल्कुल शांत थी।
जैसे...
कोई नदी...
समुद्र में मिल रही हो।
जानते हो...
कलाकार का दर्द...
कभी विनाश नहीं बनता।
वह...
रचना बन जाता है...
जैसे...
किसी अनियंत्रित ऊर्जा का...
एक सुंदर रूपांतरण.....
पूरा सभागार खड़ा हो गया। तालियाँ... लगातार... रुकने का नाम नहीं ले रही थीं।
लेकिन... गोविंद की आँखें बंद थीं।
वह तालियाँ नहीं सुन रहा था।
उसे... अपने पिता की आवाज़ सुनाई दे रही थी... माँ का स्पर्श महसूस हो रहा था... नंदिनी का विश्वास दिखाई दे रहा था... भतीजी की मुस्कान भविष्य बनकर चमक रही थी...
और... जेब में रखी माँ भगवती की तस्वीर...
जैसे कह रही थी—
अब...तू सचमुच...रंगों के उस पार पहुँच गया है।
उपसंहार
उस रात... गोविंद अपने पुराने कमरे में लौटा। कमरा वैसा ही था। दीवार पर वही ब्रश... वही पुराना मुखौटा... वही मेज़...
वही खिडक़ी... और... कोने में वह खाली जगह...
जहाँ कभी उसका हारमोनियम रखा था।
वह धीरे से उस खाली जगह के सामने बैठ गया।
मुस्कुराया।
और फुसफुसाया—
तुम गए नहीं थे...तुम...तो...हर सुर में रह गए।
उसने नई डायरी खोली। पहले पन्ने पर लिखा—
रंगों के उस पार
फिर उसके नीचे...
बहुत छोटे अक्षरों में...
माँ भगवती के चरणों में...माँ की ममता को...पिता की चुप्पी को...नंदिनी के विश्वास को...और उन सभी कलाकारों को समर्पित...
जो अपने भीतर के तूफ़ानों को...
रंग, सुर और मंच की मुस्कान में बदल देते हैं।
उसने कलम बंद की।
दीपक बुझाया।
खिडक़ी से आती चाँदनी कैनवास पर फैल गई।
और उसी चाँदनी में...ऐसा लगा... जैसे रंग अब भी सूख नहीं रहे...
वे किसी नए कलाकार की प्रतीक्षा कर रहे हों।
इतिश्री...
