👤

🌟 Anant Sant 🌟

Anant Sant - YouTube Playlists

अनंत साहित्य

अपने.....


"रक्त का संबंध...

शरीर बनाता है...


लेकिन... प्रेम का संबंध...

जीवन बनाता है...."

एक रंगमंचीय नाटक

पात्र परिचय

१. उमेश (आयु : 42–45 वर्ष)

इस नाटक का मुख्य पात्र। एक साधारण, शांत, ईमानदार और अथक परिश्रमी व्यक्ति। जीवन भर स्वयं के सुखों का त्याग कर अपनी नौ बेटियों का पालन-पोषण करता है। अपमान, ताने और अकेलापन सहते हुए भी उसके चेहरे पर शिकायत नहीं आती। उसके लिए पिता होना जन्म का नहीं, कर्म का रिश्ता है।

२. शेखर (आयु : 42–45 वर्ष)

उमेश का बचपन का मित्र। गंभीर, स्पष्टवादी और संवेदनशील। वर्षों से उमेश के जीवन का सबसे बड़ा रहस्य अपने भीतर दबाए हुए है। कठिन समय में वही उसका एकमात्र सच्चा साथी है।


उमेश की बेटियाँ

३. संध्या (आयु : 23 वर्ष)

सबसे बड़ी बेटी। कॉलेज की छात्रा। पढ़ाई में अच्छी, आत्मसम्मानी और नेतृत्व करने वाली। समाज के तानों और लोगों की बातों से प्रभावित होकर अपने पिता से दूर हो जाती है। नाटक का सबसे बड़ा मानसिक परिवर्तन इसी पात्र में दिखाई देता है।


४. रिया (आयु : 22 वर्ष)

तेज़ स्वभाव की, बेबाक और जिद्दी। बिना सोचे अपनी बात कह देती है। पिता के प्रति सबसे अधिक आक्रोश इसी के मन में है।


५. पूजा (आयु : 21 वर्ष)

कॉलेज में पढ़ने वाली चंचल और आधुनिक सोच की लड़की। दोस्तों की बातों का प्रभाव जल्दी ले लेती है और पिता को गलत समझ बैठती है।


६. नंदिता (आयु : 21 वर्ष)

हँसमुख, मिलनसार और थोड़ी भावुक। अपने मन से अधिक दूसरों की राय पर विश्वास करती है। परिवार की परिस्थितियों को पूरी तरह समझ नहीं पाती।


७. दीपाली (आयु : 20 वर्ष)

कम बोलने वाली, शांत और संकोची। बड़ी बहनों के निर्णयों के साथ चलती है। भीतर से संवेदनशील है, लेकिन अपने भाव व्यक्त नहीं कर पाती।


८. काव्या (आयु : 19 वर्ष)

छठी बेटी। सरल, समझदार और अपने पिता के सबसे निकट। पूरे घर में वही सबसे पहले पिता का दर्द समझती है। हर परिस्थिति में उनके साथ खड़ी रहती है।


९. ज्योति (आयु : 18 वर्ष)

चंचल, मासूम और जिज्ञासु। अभी दुनिया को समझना सीख रही है। बड़ी बहनों का अनुसरण करती है, लेकिन उसका मन पूरी तरह कठोर नहीं होता।


१०. मीरा (आयु : 12 वर्ष)

भोली, शरारती और निश्छल। घर के तनावपूर्ण वातावरण में भी कभी-कभी मुस्कान ले आती है। बड़ी बहनों की बात मानती है, पर दिल से कोमल है।


११. गुड़िया (आयु : 10 वर्ष)

सबसे छोटी बेटी। पाँचवीं कक्षा की छात्रा। भोली, निष्कपट और अपने पिता की सबसे प्यारी साथी। वही सबसे पहले पिता की कमी महसूस करती है। उसके मासूम संवाद पूरे नाटक की भावनात्मक धुरी हैं।


१२. नीलिमा (आयु : 38–40 वर्ष)

उमेश की प्रेमिका। दोनों एक-दूसरे से सच्चा प्रेम करते हैं, लेकिन परिस्थितियों के कारण उनका मिलन नहीं हो पाता। मंच पर उसका प्रयोग केवल स्मृतियों, फ्लैशबैक अथवा तस्वीर के माध्यम से किया जाता है।


१३. अदिति (आयु : 23 वर्ष)

संध्या की कॉलेज की सहेली। समझदार और संवेदनशील। भीड़ से अलग सोचने वाली लड़की, जो समय-समय पर संध्या को सही दिशा दिखाने का प्रयास करती है।


१४. अन्य सहेलियाँ

कॉलेज का वातावरण, युवाओं की सोच, समाज का दबाव और मित्रों के प्रभाव को दर्शाने वाले पात्र।


१५. मॉल प्रबंधक / कर्मचारी

संक्षिप्त लेकिन महत्वपूर्ण पात्र। इनके माध्यम से उमेश के संघर्ष, आत्मसम्मान और मेहनत को मंच पर जीवंत किया जाता है।


१६. कथावाचक

नाटक की आत्मा। घटनाओं के बीच कुछ मार्मिक पंक्तियों के माध्यम से दर्शकों को पात्रों के मन और भावनाओं से जोड़ता है। इसकी वाणी गंभीर, संयमित और प्रभावशाली होनी चाहिए।


दृश्य 1 भाग 1

यह घर किसी महल से छोटा था... लेकिन सपने इसमें बहुत बड़े रहते थे। (मंच पूर्णत: अँधेरा।)
दूर कहीं मंदिर की घंटी की हल्की आवाज़। फिर... मुर्गे की बाँग। धीरे-धीरे बाँसुरी की मधुर धुन बजती है। लाइट बहुत धीरे-धीरे जलती है।
मंच सज्जा - मंच को दो भागों में बाँटा गया है।
दाईं ओर - एक साधारण-सा बड़ा हॉल। फर्श पर बिछे गद्दे। एक पुराना सोफ़ा। दीवार पर भगवान की छोटी-सी तस्वीर। एक कोने में पुराना लोहे का संदूक। संदूक पर एक साफ़ तह किया हुआ कपड़ा रखा है। उसी के ऊपर... एक छोटी-सी चाबी। (दर्शकों को अभी यह सामान्य लगेगा।)
बाईं ओर - छोटा-सा रसोईघर। दो गैस स्टोव। कुछ स्टील के बर्तन। एक पुरानी डाइनिंग टेबल। जिस पर दस स्टील की थालियाँ रखी हैं।
बाहर से साइकिल की घंटी सुनाई देती है। फिर... दरवाज़ा धीरे से खुलता है।
(प्रवेश उमेश)
साधारण-सी शर्ट। पसीने से भीगी हुई। कंधे पर बड़ा-सा बैग। चेहरे पर थकान... लेकिन... होंठों पर मुस्कान। वह धीरे-धीरे घर में प्रवेश करता है। सब सो रहे हैं। वह सबसे पहले... अपने जूते उतारता है। इतनी सावधानी से... कि आवाज़ भी न हो। वह रसोई में जाता है। चुपचाप पानी पीता है। फिर... जेब से मुड़े हुए नोट निकालता है। गिनता है। एक... दो... तीन... चार... पाँच... कुल...2,840 वह मुस्कुराता है। धीरे से पैसे भगवान के सामने रख देता है। फुसफुसाता है—
उमेश - धन्यवाद...आज भी मेरी बेटियों की फीस पूरी हो जाएगी...
वह पैसे उठाकर अलमारी में रख देता है। फिर... डाइनिंग टेबल पर रखी थालियाँ गिनता है। एक...दो...तीन... ...नौ...
और... एक अपनी। वह मुस्कुराता है। धीरे से कहता है—नौ थालियाँ देखकर अब तो आदत हो गई...बस... भगवान...
इन नौ थालियों में कभी कमी मत आने देना..
उसी समय... अंदर से छोटी-सी आवाज़ आती है—पापा...? 
उमेश तुरंत पलटता है। (प्रवेश गुडिय़ा)बाल बिखरे हुए। आँखें आधी खुली। हाथ में छोटा-सा टेडी। वह दौडक़र उमेश से लिपट जाती है।
गुडिय़ा (नींद में)-  पापा...आप फिर रात में आए...
उमेश बैठ जाता है। उसे गोद में उठा लेता है। - सो जाओ...
गुडिय़ा उसकी दाढ़ी पकडक़र हँसती है।
गुडिय़ा - आप फिर खाना नहीं खाकर आए न?
उमेश हँस देता है।
उमेश - किसने कहा?
गुडिय़ा - आपकी आँखें बता देती हैं।
उमेश एक पल के लिए चुप हो जाता है।फिर... मुस्कुराकर कहता है—
उमेश - अरे...मेरी बेटी तो जासूस बन गई।
गुडिय़ा - नहीं...मैं तो पापा वाली हूँ।
यह सुनते ही... उमेश की आँखें भर आती हैं। लेकिन... वह तुरंत दूसरी ओर देखने लगता है। ताकि बेटी देख न सके।
उसी समय...
दूसरे कमरे से मीरा की आवाज़ आती है— गुडिय़ा... फिर पापा को सोने नहीं दे रही?
(प्रवेश मीरा) वह बाहर आती है। उमेश को देखकर मुस्कुराती है। 
मीरा - आ गए पापा?
उमेश - हाँ बेटा...
मीरा - रुको... वह रसोई में जाती है। एक स्टील का डिब्बा लेकर आती है।  
मीरा - ये आपके लिए रखा था।
उमेश खोलता है। उसमें... दो सूखी रोटियाँ... और आलू की सब्ज़ी। मीरा मुस्कुराती है।
मीरा - मुझे पता था...आप फिर कहोगे...खा लिया।
उमेश उसकी तरफ़ देखता है। कुछ नहीं बोलता। बस... रोटी का पहला टुकड़ा तोड़ता है। लेकिन... खाने से पहले...दोनों बेटियों की ओर देखता है। और कहता है—दुनिया का सबसे स्वादिष्ट खाना... ...वह होता है जो अपने लोग संभालकर रखते हैं।
गुडिय़ा तुरंत बोलती है—तो जल्दी खाइए...ठंडा हो जाएगा।
तीनों हल्का-सा हँसते हैं।मंच पर पहली बार...घर जैसा एहसास आता है।लेकिन...उसी समय...अंदर वाले कमरे से तेज़ आवाज़ आती है— गुडिय़ा...! सुबह-सुबह इतना शोर क्यों मचा रखा है? सोने भी नहीं देती...
हँसी अचानक रुक जाती है। उमेश चुप हो जाता है। मीरा नीचे देखने लगती है।गुडिय़ा धीरे से पापा का हाथ पकड़ लेती है। और... यहीं... लाइट धीरे-धीरे मंद होने लगती है। बैकग्राउंड में धीमी बाँसुरी...
और कथावाचक की आवाज़...
कुछ घरों में दीवारें छोटी होती हैं... लेकिन दूरियाँ बहुत बड़ी। 
और कभी-कभी... सबसे ज़्यादा अकेला वही इंसान होता है...जो पूरे घर का सहारा होता है।

दृश्य - 1, भाग - 2

कुछ शब्द कानों से नहीं... सीधे आत्मा पर लगते हैं।(बाँसुरी धीरे-धीरे समाप्त होती है।)हल्की सुबह की रोशनी। खिडक़ी से आती सूरज की पहली किरणें। दूर कहीं स्कूल की घंटी। मंदिर से आती आरती की आवाज़। उमेश अभी भी वहीं बैठा है। रोटी खत्म कर चुका है। स्टील का गिलास उठाकर पानी पीता है। फिर... अपनी प्लेट खुद धोने के लिए रसोई में चला जाता है। मीरा पीछे-पीछे जाती है।
मीरा (प्लेट पकड़ते हुए) - पापा... रहने दीजिए...
उमेश (मुस्कुराकर) -क्यों?
मीरा -आप रात भर काम करके आए हो...
उमेश - और मेरी बेटी... (मुस्कुराता है) अभी डॉक्टर भी नहीं बनी... अभी से मरीजों की तरह मेरी सेवा करेगी?
दोनों हल्का-सा हँसते हैं। उसी समय... अंदर वाले कमरे का दरवाज़ा खुलता है। एक-एक करके सातों बड़ी बेटियाँ बाहर आती हैं। किसी के हाथ में मोबाइल। कोई कान में ईयरफोन लगाए। कोई जम्हाई लेते हुए। कोई सीधे शीशे के सामने जाकर बाल बनाने लगती है। सबसे पहले... संध्या बाहर आती है। घर में नजऱ घुमाती है।  फिर टेबल पर रखी स्टील की थाली देखती है।
संध्या (हल्की व्यंग्य भरी आवाज़)- वाह...महाराज खाना खाकर भी बैठे हैं।
उमेश मुस्कुराता है। कुछ नहीं बोलता।
नंदिता (हँसते हुए) - लगता है आज फिर...हमसे पहले आ गए।
पूजा - कहाँ काम करते हो पापा? रात को भी...सुबह भी...कभी समझ नहीं आता...
उमेश - बस...थोड़ा-बहुत काम रहता है।
रिया - थोड़ा-बहुत? पूरा शहर घूमते रहते हो।
सब हँस देती हैं। मीरा चुप हो जाती है। गुडिय़ा सबको देख रही है। उसे कुछ अच्छा नहीं लगता।
गुडिय़ा (धीरे से) - दीदी...पापा थके हुए हैं...
संध्या उसकी तरफ़ देखती है।
संध्या - तू बीच में मत बोला कर।
गुडिय़ा डरकर चुप हो जाती है उमेश तुरंत मुस्कुराता है।
उमेश- अरे...मेरी गुडिय़ा तो मेरी वकील है।
ज्योति (हँसते हुए) -हाँ...और आप...पूरे मोहल्ले के सबसे बड़े हीरो।
सब फिर हँसती हैं।उमेश भी... हँस देता है। जैसे... उसे कुछ बुरा ही न लगा हो। लेकिन... दर्शक देखते हैं...वह चुपचाप अपना कप उठाता है... रसोई में जाता है... और... पीठ घुमाकर... एक गहरी साँस लेता है। चेहरा... एक पल के लिए बिल्कुल बदल जाता है। फिर... वापस वही मुस्कान। तभी... 
बाहर से पड़ोसन की आवाज़—अरे बहनों... आज फिर पूरी रेलगाड़ी तैयार हो गई क्या?
बाहर से दो-तीन और औरतों की हँसी। संध्या का चेहरा उतर जाता है। नंदिता सिर झुका लेती है। रिया झुंझला जाती है।
बाहर से आवाज़ - अरे भाई...इतनी लड़कियाँ हैं...क्रिकेट टीम बना लो... ज़ोर की हँसी।
मंच पर...पूरा घर... एकदम शांत। गुडिय़ा समझ नहीं पाती। मीरा... धीरे से दरवाज़ा बंद कर देती है। ताकि आवाज़ अंदर न आए।
उमेश...खिडक़ी से बाहर देखता है। उसके चेहरे पर दर्द आता है। लेकिन... केवल एक पल के लिए। वह पलटकर...
सामान्य आवाज़ में कहता है— चलो...सब नाश्ता कर लो।
संध्या (अचानक फट पड़ती है) -भूख नहीं है।
नंदिता -मुझे भी नहीं।
पूजा -कॉलेज में खा लेंगे।
एक-एक करके... सातों बड़ी बेटियाँ... बिना नाश्ता किए... अपने बैग उठाकर निकल जाती हैं। दरवाज़ा...एक-एक करके... सात बार बंद होता है। ठक... ठक... ठक... हर आवाज़... उमेश के दिल पर जैसे हथौड़े की चोट। मंच पर अब केवल... उमेश... मीरा... और गुडिय़ा।
गुडिय़ा धीरे से पूछती है—पापा...क्या दीदी लोग...आपसे नाराज़ हैं?
उमेश... उसकी ओर देखता है। घुटनों के बल बैठता है। उसके बाल सहलाता है। 
मुस्कुराकर कहता है— नहीं बेटा...कभी-कभी...बड़े होने में...थोड़ा समय लग जाता है।
मीरा...चुपचाप यह सुन रही है। उसकी आँखें भर आती हैं। उसे समझ आ रहा है... कि पापा... झूठ बोल रहे हैं। गुडिय़ा को बचाने के लिए। धीरे-धीरे... बैकग्राउंड में... एक अकेली बाँसुरी बजती है।
कथावाचक
जिस घर में पिता बच्चों से अपना दर्द छिपाने लगे...समझ लेना...वहाँ प्रेम अभी भी जि़दा है...
लेकिन संवाद मरने लगे हैं।

दृश्य - 1 भाग - 3

जिस पिता को पूरा संसार जानता था... उसके अपने बच्चे उसे कभी जान ही नहीं पाए।
(हल्का संगीत) मंच पर वही घर। गुडिय़ा स्कूल जाने की तैयारी कर रही है। मीरा उसके बाल बाँध रही है। उमेश पुराने बैग में टिफिन रख रहा है।
गुडिय़ा(हँसते हुए)पापा...आज टिफिन में क्या रखा?
उमेश -पहले बताओ...आज पूरा खाना खाओगी?
गुडिय़ा -अगर आलू की सब्ज़ी होगी... तो पूरा।
उमेश -और अगर लौकी हुई?
गुडिय़ा -  नाक सिकोड़ती है।
उमेश -तो...आज आलू ही रख देते हैं।
मीरा -लेकिन पापा...आपके लिए?
उमेश -मैं बाहर खा लूँगा।
मीरा उसे देखती है। उसे पता है... यह झूठ है। उसी समय... दरवाज़े पर दस्तक। ठक... ठक... ठक...
बाहर से आवाज़ - ओए... उमेश...जिंदा है कि नहीं?
उमेश मुस्कुराता है। -आ गया...
(प्रवेश  - शेखर) करीब 45 वर्ष। हँसमुख, मुँह में पान, हाथ में अख़बार। घर में आते ही... गुडिय़ा को गोद में उठा लेता है।
शेखर -अरे वाह...मेरी गुडिय़ा तो और लंबी हो गई।
गुडिय़ा -चाचा...आप हर बार यही बोलते हो।
शेखर -अरे... हर बार सच ही बोलता हूँ।
मीरा मुस्कुराती है। -चाचा... चाय बनाऊँ?
शेखर -हाँ...लेकिन पहले...
(उमेश की तरफ़ देखता है)आज कितने घंटे सोया?
उमेश -चार...
शेखर -कल?
उमेश -तीन...
शेखर -परसों?
उमेश -पता नहीं...
शेखर उसे कुछ पल देखता है। फिर... बात बदल देता है।
शेखर -चल...आज पार्क चलेंगे शाम को।
उमेश -देखेंगे...
शेखर -नहीं..आज देखेंगे नहीं...जाएँगे।
दोनों हल्का मुस्कुराते हैं।  उसी समय... संध्या वापस आती है। मोबाइल भूल गई थी। दरवाज़े पर ही रुक जाती है।
शेखर -आओ बिटिया...कॉलेज नहीं गई?
संध्या -(सूखी आवाज़)मोबाइल भूल गई थी। वह मोबाइल उठाती है। जाते-जाते... धीरे से बड़बड़ाती है...
ये चाचा भी न...रोज़ आ जाते हैं।
शेखर सुन लेता है। लेकिन... मुस्कुरा देता है। संध्या चली जाती है। कुछ पल... सन्नाटा।
शेखर धीरे से कहता है—दिल पर लगी?
उमेश हँस देता है। -बच्चे हैं...कहने दे...
शेखर(गंभीर होकर) -बच्चे हैं...इसलिए कह रहे हैं।कल बड़े हो जाएँगे...तो शायद कह भी नहीं पाएँगे।
उमेश...उसकी ओर देखता है। कुछ कहना चाहता है। लेकिन... रुक जाता है। 
्रवह केवल इतना कहता है—जब तक इनके मन का गुस्सा...मुझ पर निकल रहा है...तब तक मैं जीत रहा हूँ। शेखर चौंकता है।
जीत?
उमेश -धीरे-धीरे...बहुत शांत स्वर में... -हाँ... जिस दिन ये रोना बंद कर देंगी...और अंदर ही अंदर टूटने लगेंगी...उस दिन मैं हार जाऊँगा।
शेखर पहली बार...अपने दोस्त की ओर ऐसे देखता है... जैसे आज भी उसे पूरी तरह नहीं समझ पाया। तभी...गुडिय़ा दौडक़र आती है।  -पापा...लेट हो रहा है...
उमेश तुरंत मुस्कुराता है। अपना दर्द...फिर जेब में रख लेता है। वह गुडिय़ा का बैग उठाता है। मीरा का सिर सहलाता है।
और...दरवाज़े से बाहर निकल जाता है। शेखर... दरवाज़े पर खड़ा... उमेश को जाते हुए देखता रहता है। धीरे से... अपने आप से कहता है—यार...तू आदमी कम...पहेली ज़्यादा है...
बैकग्राउंड में धीमा संगीत। लाइट मंद।
कथावाचक
कुछ लोग अपने दु:ख की कहानी नहीं सुनाते...क्योंकि उन्हें डर होता है...
कहीं उनके आँसू...उनके अपनों पर बोझ न बन जाएँ।

दृश्य  - 2 भाग -  1

नाम से पहले ताने लगने लगे थे...
(मंच पर हल्की रोशनी)मंच दो भागों में बँटा है।
बाईं ओर -कॉलेज का कैंपस। दो बेंच। कुछ लडक़े-लड़कियाँ हँसते हुए बातें कर रहे हैं। पीछे कैंटीन का बोर्ड। दाईं ओर
उमेश की पुरानी साइकिल। एक बड़ा बैग। कुछ रंग-बिरंगे टेडी बियर। दो गुब्बारे। एक पुराना हेलमेट।
कॉलेज की घंटी बजती है। छात्र-छात्राएँ बाहर निकलते हैं।
(प्रवेश)
संध्या ,नंदिता,पूजा, रिया, ज्योति, काव्या, दीपाली अपनी सहेलियों के साथ। सब हँसते हुए आ रही हैं।
सहेली 1 -संध्या...आज कैफ़े चलें?
संध्या -चलते हैं...
तभी...पीछे से एक लडक़ा हँसते हुए बोलता है— अरे रास्ता दो...पूरी रेलगाड़ी आ रही है...
पूरा ग्रुप हँस देता है।
दूसरा लडक़ा—अरे भाई...डिब्बे गिन...आज आठ आए हैं...
तीसरा—अरे नौवीं कहाँ है?
तेज़ हँसी। संध्या की मुस्कान गायब। नंदिता का सिर झुक जाता है। रिया गुस्से से पीछे देखती है। लेकिन... कुछ बोलती नहीं।
पूजा धीरे से कहती है—चलो...
सब तेज़ कदमों से आगे बढ़ जाती हैं।कुछ दूरी पर...एक पेड़ के नीचे। सभी रुकती हैं।
रिया(गुस्से में) -कसम से...अब कॉलेज आने का मन नहीं करता।
पूजा -रोज़ यही सुनना पड़ता है।
दीपाली -कल तो हमारी क्लास की मैडम भी पूछ रही थीं... सच में तुम लोग नौ बहनें हो?
सब चुप। कुछ देर बाद... 
नंदिता बहुत धीरे से बोलती है—अगर...हम कम होतीं...तो शायद...कोई हमें ऐसे नहीं चिढ़ाता। 
संध्या पहली बार बोलती है। उसकी आवाज़ धीमी है...लेकिन भीतर आग है। - गलती हमारी नहीं है...लेकिन सज़ा हमें मिल रही है।
सहेली -तुम्हारे पापा ने...
वह रुक जाती है।
संध्या-बोलो...
सहेली -लोग कहते हैं...उन्हें बेटा चाहिए था...इसलिए...नौ बेटियाँ हो गईं।
संध्या...आँखें बंद कर लेती है।उसे लगता है...जैसे...हर बार वही बात...एक नई चोट बनकर लौट आती है।
दूसरी ओर मंच (धीरे-धीरे लाइट दाईं ओर जाती है)
उमेश अपनी पुरानी साइकिल के पास बैठा है। वह बड़े प्यार से...एक-एक टेडी साफ़ कर रहा है।  किसी का कान सीधा करता है।किसी की आँख ठीक करता है। एक टेडी का फटा हाथ... सुई-धागे से सिलता है। वह मुस्कुराता है।
धीरे से कहता है—आज ये वाला बिक गया...तो गुडिय़ा की ड्रॉइंग कॉपी आ जाएगी...
फिर...
दूसरे टेडी को देखकर—और ये वाला...मीरा की प्रैक्टिकल फ़ाइल...
उसे नहीं पता...उसी शहर में...उसी समय...उसकी बेटियाँ...उसी के कारण रो रही हैं।
फिर वापस कॉलेज संध्या अपना बैग उठाती है।धीरे से कहती है—मुझे किसी से नहीं...अपने पापा से शिकायत है।
सब उसकी तरफ़ देखती हैं।वह पहली बार...
दिल की बात कहती है।अगर...उन्हें बेटा नहीं मिला...तो इसमें हमारी क्या गलती थी?उन्होंने हमारी जि़ंदगी क्यों बना दी...
एक मज़ाक?
सन्नाटा। दूर कहीं... मंदिर की घंटी बजती है। लेकिन... किसी के मन तक नहीं पहुँचती।धीमी वायलिन।
कथावाचक
समाज ताने देता है..लेकिन...
उन तानों की गूँज...सबसे पहले घर की दीवारों से टकराती है।

दृश्य - 2 भाग -  2

जिसे दुनिया गरीब समझती थी... वह अपनी बेटियों पर सबसे अमीर था।
(मंच पर हल्का संगीत) 
दाईं ओर...एक सरकारी स्कूल का गेट। बच्चे छुट्टी के बाद बाहर निकल रहे हैं। हँसी... शोर... घंटी... माता-पिता अपने बच्चों को लेने आए हैं। एक बच्चा कार में बैठता है। दूसरा स्कूटी पर। तीसरा बाइक पर। तभी... दूर से... एक पुरानी साइकिल की घंटी सुनाई देती है। टिन... टिन...प्रवेश  उमेश पुरानी लेकिन साफ़ साइकिल।
पीछे बँधा पुराना बैग। चेहरे पर वही मुस्कान। गुडय़िा उसे देखते ही दौड़ पड़ती है।
पापा...!
उमेश -अरे...धीरे...गिर जाएगी मेरी रानी।
गुडिय़ा दौडक़र गले लग जाती है। 
पास खड़ी एक बच्ची पूछती है—गुडिय़ा...ये तुम्हारे पापा हैं?
गुडि़य़ा गर्व से...हाँ...मेरे सबसे अच्छे पापा।
उमेश मुस्कुराता है। लेकिन... नजऱें झुका लेता है।
दूसरी बच्ची बोलती है—मेरे पापा कार से आते हैं।
गुडि़य़ा तुरंत जवाब देती है—मेरे पापा...समय निकालकर आते हैं।
उमेश उसकी तरफ़ देखता है। आँखों में नमी। लेकिन... कुछ नहीं बोलता। दोनों साइकिल पर बैठते हैं।गुडिय़ा पीछे।
रास्ते में...एक दुकान आती है। गुडिय़ा रुकने को कहती है।
पापा...वो लाल वाली रिबन...
उमेश जेब टटोलता है। कुछ सिक्के। कुछ नोट। वह दुकानदार से पूछता है—भाई...कितने की है?पचास रुपए।
उमेश मुस्कुराता है।अच्छा...
वह मुड़ जाता है। गुडि़य़ा सब समझ जाती है। वह खुद ही बोल देती है—नहीं चाहिए... मुझे तो नीली ज़्यादा अच्छी लगती है।
उमेश - अच्छा?
गुडिय़ा - हाँ...
और वो भी तब...जब मेरी कॉपी पूरी भर जाएगी।
उमेश कुछ नहीं कहता। बस... साइकिल फिर चल पड़ती है। थोड़ा आगे...एक आइसक्रीम वाला।
गुडिय़ा फिर देखती है। इस बार... वह खुद ही नजऱें फेर लेती है।
उमेश धीरे से पूछता है—मन है?
गुडि़य़ा मुस्कुराती है।-नहीं...आज नहीं।
उमेश अचानक साइकिल रोक देता है। जेब से दस रुपए निकालता है।
उमेश - एक छोटी वाली देना।
गुडि़य़ा चौंक जाती है।
गुडिय़ा - लेकिन...
उमेश -कभी-कभी... बचपन को भी छुट्टी मिलनी चाहिए।
गुडिय़ा हँस पड़ती है। दोनों... एक ही आइसक्रीम... आधा-आधा खाते हुए...  घर की ओर चल देते हैं। उसी समय...
मंच के दूसरे हिस्से में... संध्या और उसकी बहनें ऑटो से उतर रही हैं। 
रिया दूर से देखती है।देखो...फिर साइकिल पर...
संध्या नजऱ फेर लेती है। उसके चेहरे पर... शर्म। गुस्सा। और... अंदर कहीं... दर्द।
वह धीरे से कहती है—काश...हमारा घर भी...बाकियों जैसा होता।
उधर...उमेश को यह सब सुनाई नहीं देता।
वह गुडिय़ा से पूछ रहा है—आज स्कूल में क्या पढ़ाया?
और गुडिय़ा...उत्साह से पूरी कहानी सुनाने लगती है।
धीमी बाँसुरी।
कथावाचक
बच्चे अक्सर अपने माता-पिता की जेब नहीं देखते...
वे केवल उनका साथ देखते हैं।
लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है...
दुनिया उन्हें तुलना करना सिखा देती है।

दृश्य - 2 भाग -  3

एक ही घर में... तीन अलग-अलग दुनिया रहती थीं। रात... करीब 9:30 बजे। मंच पर हल्की पीली रोशनी। रसोई में मीरा खाना बना रही है। गुडि़य़ा आटा बेलने की कोशिश कर रही है। उसकी रोटी कभी गोल... कभी भारत के नक्शे जैसी हो जाती है।
मीरा(हँसते हुए)अरे...ये रोटी है या मध्यप्रदेश?
गुडिय़ा खिलखिला देती है।
गुडिय़ा - पापा बोलते हैं...रोटी का स्वाद उसके आकार से नहीं...बनाने वाले के प्यार से आता है।
दोनों हँस पड़ती हैं। उसी समय...दूसरे कमरे में...
संध्या...नंदिता...पूजा...रिया...ज्योति...काव्या...दीपाली...
सब मोबाइल लेकर बैठी हैं। कोई रील देख रही है। कोई चैट कर रही है। कोई कॉलेज की बातें कर रही है। रिया अचानक मोबाइल दिखाती है।
देखो...
फिर किसी ने कमेंट किया है...
संध्या मोबाइल लेती है। पढ़ती है। चेहरा उतर जाता है। मोबाइल स्क्रीन पर लिखा है—
ओहो...रेलगाड़ी गैंग...आज नई रील नहीं?
नीचे हँसने वाले इमोजी।
कुछ पल... कोई कुछ नहीं बोलता।
फिर पूजा धीरे से कहती है—काश...हम सिर्फ दो बहनें होतीं...
रिया -या एक भाई भी होता...
नंदिता -कम से कम... लोग हमें ऐसे नहीं देखते।
संध्या पहली बार... अपना दर्द खुलकर कहती है।
मुझे...पापा से नफरत नहीं है...
सब उसकी तरफ़ देखती हैं।
लेकिन...जब भी कोई हमारा मज़ाक उड़ाता है...सबसे पहले उनका चेहरा याद आता है।
सन्नाटा। इधर... घड़ी में 10:15 बजते हैं। दरवाज़ा खुलता है। उमेश आता है। आज उसके कदम पहले से भी भारी हैं।
कंधे पर बैग। शर्ट पर धूल। हाथों पर रंग के निशान। जूते पूरी तरह घिसे हुए। वह धीरे से घर में प्रवेश करता है।
जैसे...घर नहीं...किसी मंदिर में आया हो। सब बेटियाँ एक पल उसे देखती हैं। फिर...फिर से अपने मोबाइल में लग जाती हैं।
उमेश मुस्कुराता है।
सबने खाना खा लिया?
कोई जवाब नहीं।
मीरा रसोई से बाहर आती है।
आ जाइए पापा...आपका खाना रखा है।
उमेश हाथ-मुँह धोकर आता है। गुडिय़ा पहले से ही फ़र्श पर थाली लेकर बैठी है।
मैं इंतज़ार कर रही थी।
उमेश -अरे...मैंने कितनी बार कहा..मेरा इंतज़ार मत किया करो।
गुडिय़ा तुरंत बोलती है—तो आप भी...हमारा इंतज़ार मत किया करो...
उमेश चौंककर देखता है। गुडिय़ा मुस्कुराती है।
सुबह हम स्कूल जाते हैं...आप दरवाज़े तक छोडऩे आते हो...मैं भी खाना आपके साथ खाऊँगी।
उमेश...बस उसे देखता रह जाता है।तीनों फ़र्श पर बैठकर खाना खाते हैं। इसी बीच...रिया पानी लेने आती है।उन्हें साथ बैठा देखती है। वह बिना कुछ बोले... पानी लेकर वापस चली जाती है। लेकिन जाते-जाते... बहुत धीरे से बुदबुदाती है—
ड्रामा...
यह शब्द...मीरा सुन लेती है।उसका हाथ रुक जाता है।उमेश ने भी सुन लिया।लेकिन...वह ऐसे खाना खाता रहता है...
जैसे कुछ हुआ ही नहीं।कुछ देर बाद...वह अपनी रोटी का आधा टुकड़ा... चुपचाप गुडिय़ा की थाली में रख देता है। गुडय़िा देख लेती है।
पापा...आप फिर कम खा रहे हो...
उमेश हँसता है।
अरे... आज तो दोपहर में इतना खाया...कि अभी तक भूख नहीं लगी।
मीरा धीरे से नीचे देख लेती है। उसे पता है... पापा झूठ बोल रहे हैं। तभी... बत्ती चली जाती है। पूरा मंच अँधेरा।
गुडय़िा डर जाती है। उमेश तुरंत जेब से छोटी-सी टॉर्च निकालता है। उसे जलाता है। टॉर्च की रोशनी... सीधे तीन चेहरों पर पड़ती है।
उमेश...मीरा...गुडि़य़ा... बाकी घर... अँधेरे में। यह दृश्य... प्रतीक है। प्रेम कम था... लेकिन... जहाँ था... वहाँ उजाला था।
कथावाचक (ऑफ स्टेज)
हर घर में बिजली का अँधेरा नहीं होता...कुछ घर...
रिश्तों के अँधेरे में भी जीते हैं।
लाइट धीरे-धीरे बुझती है।

दृश्य -3 भाग - 1

कुछ लोग नौकरी नहीं करते... ज़िम्मेदारियाँ निभाते हैं।
(मंच पर हल्का-सा आधुनिक संगीत।)
लाइट जलती है। मंच पर अब एक नया संसार है। एक बड़ा शॉपिंग मॉल। रंग-बिरंगे गुब्बारे। बच्चों के खिलौने।
दो कर्मचारी सजावट कर रहे हैं। एक गुब्बारे फुला रहा है। दूसरा रिबन बाँध रहा है। उसी समय... पीछे वाले दरवाज़े से...
उमेश प्रवेश करता है। हाथ में पुराना टिफिऩ। कंधे पर छोटा बैग। वह आते ही... सबको मुस्कुराकर नमस्ते करता है।
कर्मचारी 1 -आ गए, उमेश भैया?
उमेश -हाँ... आज थोड़ा ट्रैफिक था।
कर्मचारी 2 -(हँसते हुए) -ट्रैफिक नहीं...जिम्मेदारियाँ थीं।
सब हल्का-सा हँसते हैं। तभी...मॉल मैनेजर आता है। 
मैनेजर -उमेश...आज बच्चों का बड़ा कार्यक्रम है। चार बजे से...टेडी बनना पड़ेगा।
उमेश -ठीक है सर।
मैनेजर -और हाँ...आज भी मुस्कुराते रहना।
उमेश हँसकर कहता है—सर...ये नौकरी मुस्कुराने की ही तो है।
मैनेजर आगे बढ़ जाता है।
कर्मचारी 1(धीरे से) यार...इतनी देर काम...फिर रात की दूसरी नौकरी...घर...बच्चे...तू थकता नहीं क्या?
उमेश... गुब्बारा बाँधते-बाँधते रुकता है।
फिर मुस्कुराकर कहता है—थकता हूँ...बहुत थकता हूँ...लेकिन...जब घर पहुँचता हूँ...और कोई पापा कहकर बुला देता है...तो सारी थकान छुट्टी पर चली जाती है। दोनों कर्मचारी... एक-दूसरे को देखते हैं।
कर्मचारी 2 -कितने बच्चे हैं तुम्हारे?
उमेश (मुस्कुराकर) -नौ।
दोनों एक साथ— क्या...?
कर्मचारी 1 - नौ...?
कर्मचारी 2 -मतलब...पूरा क्रिकेट स्टेडियम।
सब हँसते हैं। उमेश भी।
फिर कर्मचारी पूछता है—एक बेटा भी है?
उमेश...कुछ पल के लिए शांत हो जाता है। फिर... धीरे से मुस्कुराता है। -नहीं...
भगवान ने...मुझे सिर्फ़ बेटियाँ दी हैं।
कर्मचारी 1 -दिक्कत नहीं होती?
उमेश -एक गुब्बारे में हवा भरते हुए... बहुत सहज स्वर में—फूलों के बगीचे में...कभी किसी ने पूछा है...कि गुलाब ज़्यादा हैं...या चमेली?
सन्नाटा।
कर्मचारी 2 -धीरे से मुस्कुराता है। -भैया...तुम अलग किस्म के आदमी हो।
उमेश -नहीं...मैं भी...बाकियों जैसा ही हूँ।बस...मेरे हिस्से की खुशियाँ...नौ टुकड़ों में बँटी हुई हैं।
तभी...एक छोटा बच्चा रोते हुए आता है।  उसका गुब्बारा फूट गया है।
बच्चा(रोते हुए) -मम्मी...मेरा गुब्बारा...
माँ परेशान है।उमेश...अपना काम छोड़ देता है। जेब से एक नया गुब्बारा निकालता है। उस पर जल्दी से स्माइली बना देता है। और बच्चे को देता है। बच्चा... रोना भूल जाता है। हँसने लगता है।
माँ- कितने पैसे?
उमेश -कुछ नहीं।
माँ -लेकिन...
उमेश मुस्कुराता है।बच्चों की मुस्कान...बेची नहीं जाती। माँ चली जाती है।
कर्मचारी 1 - धीरे से कहता है—भैया...तू हर किसी के बच्चे को... इतना प्यार क्यों करता है?
उमेश... एक पल आसमान की तरफ़ देखता है। 
फिर मुस्कुराकर जवाब देता है—शायद...हर बच्चा...किसी का पूरा संसार होता है।
धीमी पियानो धुन।
कथावाचक
दुनिया उसे एक कर्मचारी समझती थी..कुछ बच्चे...
उसे टेडी समझते थे..लेकिन...किसी को नहीं पता था...कि वह हर मुस्कान के पीछे...अपनी थकान छिपा देता था।
लाइट धीरे-धीरे मंद होती है।

दृश्य -3 भाग- 2

कुछ चेहरे मुस्कुराते इसलिए हैं... ताकि दूसरे रो न दें।
(मंच पर वही मॉल।)
घड़ी में दोपहर के 3:45 बज रहे हैं। बच्चों के कार्यक्रम की तैयारी पूरी हो चुकी है। एक कोने में बड़ा-सा टेडी बियर कॉस्ट्यूम रखा है। उमेश चुपचाप उसे देख रहा है। उसके हाथ अपने आप कॉस्ट्यूम को साफ़ करने लगते हैं।
(प्रवेश)एक नया कर्मचारी। उम्र लगभग 24 वर्ष। नाम -विक्की, नया-नया नौकरी पर लगा है। थोड़ा शरारती। थोड़ा घमंडी।
विक्की (कॉस्ट्यूम देखकर) -भैया...ये पहनते हो आप?
उमेश -हाँ।
विक्की -पूरा दिन?ज़रूरत पड़े तो।
विक्की हँस देता है।
यार...मैं तो नहीं पहनूँ।बच्चे लात मारते हैं...खींचते हैं...फोटो लेते हैं...ऊपर से चेहरा भी नहीं दिखता।
उमेश मुस्कुराकर केवल इतना कहता है—हाँ...चेहरा नहीं दिखता...
विक्की-फिर मज़ा क्या?
उमेश कॉस्ट्यूम उठाते हुए...बहुत सहज आवाज़ में—जब बच्चों की हँसी सुनाई देती है...तो चेहरा दिखाने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
विक्की समझ नहीं पाता। कंधे उचकाकर चला जाता है। उसी समय...मैनेजर आता है।
उमेश...जल्दी तैयार हो जाओ।
उमेश सिर हिलाता है। वह स्टाफ रूम में जाता है। (हल्का संगीत) स्टेज के एक कोने में... केवल एक कुर्सी। एक छोटा आईना। एक हुक। जिस पर टेडी का सिर टँगा है। उमेश धीरे-धीरे बैठता है। जूते उतारता है। मोज़े पूरी तरह भीगे हुए हैं।
पैरों पर छाले। वह धीरे से मरहम लगाता है। दर्द होता है। लेकिन... कोई आवाज़ नहीं। फिर... जेब से पुरानी-सी तस्वीर निकालता है। दर्शकों को तस्वीर नहीं दिखाई देती। वह उसे देखता है।हल्की-सी मुस्कान। बहुत धीरे से... लगभग फुसफुसाते हुए—आज भी...मैं हार नहीं मानूँगा..
तस्वीर वापस जेब में रख देता है। फिर... टेडी का भारी सिर उठाता है। कुछ पल उसे देखता है। धीरे-धीरे पहन लेता है।
अब...दर्शकों के सामने...उमेश नहीं है। एक बड़ा-सा मुस्कुराता हुआ टेडी है।
बच्चों की हँसी। तालियाँ। घोषणा होती है—बच्चों...आपका प्यारा टेडी आ गया...
टेडी उछलता है।नाचता है। बच्चों से हाथ मिलाता है। एक बच्ची गिर जाती है। वह तुरंत उसे उठाता है। एक छोटा बच्चा डर जाता है। वह घुटनों के बल बैठकर उसे हाई-फाइव देता है। बच्चा हँस पड़ता है। पूरा हॉल... बच्चों की हँसी से भर जाता है।
मंच के दूसरी ओर...हल्की रोशनी।
उसी समय... उमेश का मोबाइल बजता है।
(कॉस्ट्यूम के अंदर।)वह कोने में जाता है। कॉल उठाता है।
मीरा - पापा...
उमेश  -(आवाज़ सामान्य रखने की कोशिश) हाँ बेटा...
मीरा -दवाई ले ली?
उमेश थोड़ा चौंकता है। -हाँ...
मीरा -झूठ मत बोलिए...कुछ पल...चुप्पी। फिर...
उमेश मुस्कुराकर कहता है—आज...डॉक्टर साहिबा बहुत पूछताछ कर रही हैं।
मीरा -क्योंकि...मरीज बहुत जिद्दी है।
दोनों हल्का-सा हँसते हैं।
मीरा -जल्दी घर आ जाना...
उमेश -कोशिश करूँगा।
कॉल कट जाती है। उमेश... दो सेकंड... आँखें बंद करता है। फिर... दोबारा... बच्चों के बीच पहुँच जाता है।
उसी समय...एक बच्चा पीछे से दौडक़र आता है... और ज़ोर से टेडी की पीठ पर मुक्का मारता है। पूरा हॉल हँसता है।
टेडी... यानी उमेश... मुडक़र... उसी बच्चे को गले लगा लेता है। बच्चा खिलखिला उठता है। 
कथावाचक
जिंदगी भी अजीब खेल खेलती है...जिसे अपने घर में अपनापन कम मिले...
वही...दुनिया को सबसे ज़्यादा मुस्कान बाँटता है।
लाइट धीरे-धीरे मंद...

दृश्य- 4, भाग - 1

ताने... जो धीरे-धीरे घर तक पहुँच गए।
(कॉलेज की घंटी) मंच पर बड़ा कॉलेज कैंपस। एक तरफ़ कैंटीन। दूसरी तरफ़ पेड़ के नीचे कुछ बेंच। छात्र-छात्राएँ हँस रहे हैं। कोई सेल्फी ले रहा है। कोई प्रोजेक्ट की बात कर रहा है। प्रवेश संध्या, नंदिता, पूजा, रिया, ज्योति, काव्या,दीपाली
सब धीरे-धीरे कैंटीन की ओर बढ़ते हैं।
पूजा -आज असाइनमेंट जमा करना है।
रिया -मैंने तो बनाया ही नहीं।
सब हल्का हँसते हैं। तभी... पास की टेबल से आवाज़ आती है। एक लडक़ा...अपने दोस्तों से ज़ोर से बोलता है—
यार...इतनी बहनें मैंने पहली बार देखी हैं।
दूसरा हँसता है—घर नहीं...गल्स हॉस्टल होगा।
तीसरा—इनके पापा तो...
रुक जाता है। सब हँसने लगते हैं। संध्या सुन लेती है। वह आगे बढ़ जाती है। लेकिन... उसकी चाल बदल जाती है।
दूसरी तरफ़ दो लड़कियाँ बातें कर रही हैं।
सुना है...इनके पापा अभी भी...हर जगह छोटे-मोटे काम करते हैं।इतनी लड़कियाँ होंगी...तो करना ही पड़ेगा।
धीमी हँसी। नंदिता की आँखें भर आती हैं।
वह धीरे से बोलती है—चलो यहाँ से...
कैंटीन के बाहर सब रुकते हैं। रिया गुस्से में बैग ज़मीन पर पटक देती है।
कब तक?
कब तक सुनेंगे?
कोई जवाब नहीं देता।
कुछ देर बाद...संध्या पहली बार...बहुत शांत स्वर में बोलती है।
लोग हमें नहीं...हमारे पापा को देखकर हँसते हैं।
पूजा -क्यों?
क्योंकि...
उन्होंने...
रुक जाती है।
रिया बात पूरी करती है—
उन्होंने हमारी जि़ंदगी आसान नहीं होने दी।
सन्नाटा। तभी...कॉलेज का प्रोफेसर आता है।
संध्या...आज तुम्हारा प्रेज़ेंटेशन अच्छा था।
संध्या -थैंक यू सर।
प्रोफेसर मुस्कुराता है। फिर... बिल्कुल सामान्य तरीके से पूछता है—
वैसे...तुम सच में नौ बहनें हो?
प्रोफेसर को एहसास भी नहीं... कि उसने क्या पूछ लिया।
संध्या... सिर्फ़ सिर हिला देती है।
प्रोफेसर -ओह... बहुत बड़ी जि़म्मेदारी होगी तुम्हारे पापा पर।
वह चला जाता है। लेकिन... उसका सामान्य-सा सवाल... संध्या के दिल में... एक और कील ठोक जाता है।
दूसरी ओर मंच (हल्की रोशनी)
उमेश... पुरानी साइकिल पर जा रहा है। पीछे दूध के खाली कैन बँधे हैं। जेब में छोटी-सी डायरी। वह साइकिल रोकता है।
डायरी खोलता है। उसमें लिखा है—संध्या - कॉलेज फीस जमा,नंदिता - किताबें? खरीदनी हैं,मीरा - लैब कोट अगले महीने
गुडय़िा - स्कूल बैग ज़रूरी वह कुछ पल... उस सूची को देखता है। फिर... अपनी जेब में हाथ डालता है।
320। बस। वह मुस्कुराता है। धीरे से डायरी बंद करता है। और... अपने आप से कहता है—चलो...अभी चार नाम पूरे हो गए...बाकी पाँच भी हो जाएँगे...फिर... साइकिल आगे बढ़ जाती है। उसे नहीं पता... जिस बेटी की फीस भरकर आया है...
वही इस समय...उसी से सबसे ज़्यादा नाराज़ है।
कथावाचक
पिता अक्सर हिसाब पैसों का नहीं रखते...वे सपनों का हिसाब रखते हैं।
और कई बार...जिन सपनों को वे सींचते हैं...
उन्हीं की नजऱों में छोटे हो जाते हैं।
लाइट धीरे-धीरे बुझती है।

दृश्य - 4 भाग- 2

जब दूसरे लोग तुम्हारी पहचान तय करने लगें... (कॉलेज का कैंपस) लंच ब्रेक। कैंटीन के बाहर हलचल। कुछ छात्र हँस रहे हैं। कुछ मोबाइल पर रील बना रहे हैं। संध्या और उसकी बहनें एक पेड़ के नीचे बैठी हैं। किसी का भी मन खाने का नहीं।
रिया (टिफिन बंद करते हुए) -भूख ही नहीं लग रही।
पूजा -मुझे भी नहीं...
तभी...दो लड़कियाँ पास से गुजरती हैं। उन्हें देखकर धीरे-धीरे हँसती हैं।
पहली लडक़ी—देख...यही हैं...
दूसरी—कौन?
पहली—अरे...नौ बहनों वाला परिवार...
दूसरी लडक़ी हँस पड़ती है। दोनों चली जाती हैं।
नंदिता धीरे से पूछती है—हमने...आखिर किया क्या है?
कोई जवाब नहीं देता। तभी...कॉलेज की सबसे होनहार छात्रा अदिति वहाँ आती है। वह संध्या की सहेली है।
समझदार।शांत। दूसरों से अलग।
अदिति-तुम लोग यहाँ क्यों बैठे हो?
संध्या -बस ऐसे ही।
अदिति सब समझ जाती है। वह बिना पूछे... उनके बीच बैठ जाती है। कुछ देर... सब चुप। फिर...
अदिति धीरे से कहती है—लोगों का काम बोलना है...
रिया(गुस्से में)आसान है कहना...जब कोई तुम्हें रोज़-रोज़ न चिढ़ाए।
अदिति उसकी ओर देखती है।
तुम लोग...अपने पापा से नाराज़ हो?
संध्या -कुछ सेकंड चुप रहती है।फिर... धीरे से कहती है—नाराज़...शायद...या...थक गए हैं।
अदिति -उन्होंने कभी तुम्हें पढऩे से रोका?
नहीं।
कभी किसी बहन में फर्क किया?
नहीं।
कभी हाथ उठाया?
नहीं।
कभी भूखा रखा?
नहीं।
अदिति मुस्कुराती है।
तो फिर...
तुम्हारी लड़ाई...उनसे नहीं...उन लोगों से है...जो तुम्हें रोज़ आईना दिखाने का दावा करते हैं...और तुम्हारा आत्मविश्वास तोड़ देते हैं।
कुछ पल की चुप्पी।
रिया तुरंत बोल पड़ती है—लेकिन...जब लोग हँसते हैं...तो सामने पापा ही दिखाई देते हैं।
संध्या की आँखें भर आती हैं। वह पहली बार... अपना सबसे बड़ा डर कहती है।
मुझे...डर लगता है।
सब उसकी ओर देखते हैं।
कल..जब शादी की बात होगी...लोग यही पूछेंगे...कितनी बहनें हो?जब नौकरी होगी...लोग फिर यही कहेंगे...मैं...
अपनी पहचान बनाना चाहती हूँ...लेकिन..हर बार...हमारे परिवार की गिनती...हमारी पहचान बन जाती है।
अदिति...धीरे से...संध्या का हाथ पकड़ती है।
पहचान...दूसरे नहीं बनाते...उसे इंसान खुद बनाता है।
संध्या हल्की मुस्कान देती है। लेकिन...उसके मन का बोझ...कम नहीं हुआ।
दूसरी ओर मंच
उमेश...एक मेडिकल दुकान के बाहर खड़ा है।
भैया...घुटनों के दर्द की सबसे सस्ती दवाई देना।
दुकानदार -ये वाली...180
उमेश जेब टटोलता है।150।
वह मुस्कुराता है।
कोई...और सस्ती?
दुकानदार -नहीं।
उमेश -ठीक है...
वह दवाई वापस रख देता है। बाहर निकलते समय... सामने स्टेशनरी की दुकान। वह रुकता है। एक सुंदर लैब रिकॉर्ड फ़ाइल।कीमत— 145।
वह बिना सोचे... फ़ाइल खरीद लेता है। धीरे से मुस्कुराता है।
मीरा खुश हो जाएगी...
और...अपने घुटनों का दर्द...फिर अगले महीने के लिए टाल देता है।
कथावाचक
पिता दर्द नहीं खरीदते...वे बच्चों की ज़रूरतें खरीदते हैं।
और धीरे-धीरे...अपनी तकलीफ़ें उधार पर छोड़ देते हैं।
लाइट धीरे-धीरे मंद...

दृश्य - 4 भाग - 3

कुछ वादे... इंसान दुनिया से नहीं... अपने दिल से करता है।
(रात के 1130 बजे।) पूरा मंच शांत। घड़ी की टिक... टिक... टिक... सुनाई दे रही है। घर की सारी लाइटें बंद हैं।
सिर्फ़ एक कमरे में हल्की पीली रोशनी। धीरे-धीरे... उमेश कमरे में प्रवेश करता है। कंधे झुके हुए। कपड़े धूल से भरे।
चेहरे पर दिनभर की थकान। वह चारों तरफ़ देखता है। हॉल में... सात बेटियाँ गहरी नींद में हैं। किसी के हाथ में मोबाइल।
किसी की किताब खुली हुई। कोई तकिए को गले लगाकर सो रही है। दूसरे कोने में... मीरा और गुडिय़ा भी सो चुकी हैं।
उमेश...सबको एक-एक बार देखता है। धीरे से... हर बेटी के ऊपर चादर ठीक करता है। किसी के पैरों पर चादर डालता है।
किसी के सिर के नीचे तकिया ठीक करता है। जब वह संध्या के पास पहुँचता है... तो उसके हाथ रुक जाते हैं।
संध्या नींद में भी बेचैन है। जैसे... कोई सपना उसे परेशान कर रहा हो।
उमेश... बहुत धीरे से... उसके सिर पर हाथ रखता है।
फुसफुसाकर—खुश रहना...बस...
संध्या नींद में ही करवट बदल लेती है। उसे पता भी नहीं चलता...कि उसके पापा अभी उसके पास थे।उमेश अपने कमरे में जाता है।कमरे में...एक पुरानी लकड़ी की पेटी रखी है।जिसके किनारे घिस चुके हैं। ताला पुराना है। वह जेब से चाबी निकालता है। ताला खुलता है। धीरे-धीरे... पेटी का ढक्कन उठता है।उसमें...कुछ पुराने कपड़े। एक टूटी हुई घड़ी।कुछ चि_ियाँ। और... एक कपड़े में लिपटी हुई... पुरानी तस्वीर। उमेश...दोनों हाथों से...तस्वीर उठाता है।
दर्शकों को...अब भी तस्वीर दिखाई नहीं देती।
वह उसे देखता है।मुस्कुराता है। फिर... आँखें भर आती हैं। बहुत धीमी आवाज़...जैसे खुद से बात कर रहा हो।
देखो...सब बड़ी हो गई हैं...
हल्की मुस्कान।
आज...संध्या की फीस भी भर दी...
कुछ पल की चुप्पी।
मीरा के लिए...फ़ाइल भी ले आया...और...गुडिय़ा...
हँस पड़ता है।
आज फिर...आधी आइसक्रीम मुझे खिला गई।
कुछ क्षण...सिर्फ़ सन्नाटा। फिर...उसकी आवाज़ भारी हो जाती है।
मैं...कोशिश कर रहा हूँ...बहुत कोशिश...कहीं...मुझसे...कोई कमी न रह जाए...
आँखों से...एक आँसू...
तस्वीर पर गिरता है। उमेश तुरंत...रुमाल से तस्वीर पोंछ देता है।
नहीं...तुम्हारी तस्वीर पर...आँसू अच्छे नहीं लगते।
वह तस्वीर को...सीने से लगा लेता है। और...पहली बार...पूरा नाटक में... उसकी आवाज़ टूटती है।
मैं...आज भी...वादा निभा रहा हूँ...बस...इतना ही। न नाम। न रिश्ता। न कोई खुलासा।
तभी...दरवाज़े के बाहर...हल्की आहट। उमेश तुरंत...तस्वीर वापस कपड़े में लपेट देता है। पेटी बंद कर देता है।
दरवाज़ा खुलता है।
गुडिय़ा खड़ी है। नींद से भरी आँखें।
पापा...
उमेश मुस्कुराता है।
अरे..मेरी चिडिय़ा जाग गई?
गुडि़य़ा धीरे से पास आती है।
आप...रो रहे थे?
उमेश तुरंत हँस देता है।
अरे नहीं..आँख में धूल चली गई थी।
गुडिय़ा मासूमियत से पूछती है—रात को भी...धूल आती है?
उमेश...दो सेकंड... कुछ बोल नहीं पाता। फिर... उसे गोद में उठा लेता है।
हाँ...कुछ धूल...दिन की नहीं होती बेटा...
गुडिय़ा कुछ समझती नहीं। बस... पापा के कंधे पर सिर रख देती है। उमेश... उसे थपकी देता है। और... बहुत धीरे से...
एक लोरी गुनगुनाने लगता है।
कथावाचक
हर पिता..अपने बच्चों को...
सिर्फ़ रोटी नहीं देता...कई बार...वह अपने आँसू भी...
उनकी नींद के बाहर छोड़ देता है।
धीमी बाँसुरी। रोशनी धीरे-धीरे बुझ जाती है।

दृश्य 5 भाग  1

रात... जब आदमी दुनिया से नहीं, अपने आप से मिलता है। (रात के लगभग 12 बजे।) मंच पर हल्का नीला प्रकाश।
ठंडी हवा की ध्वनि। दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज़। कभी-कभी झींगुरों की आवाज़।
मंच पर...एक पुराना पार्क। बीच में लोहे की बेंच।
दाईं ओर...एक छोटा-सा शिव मंदिर। मंदिर में एक दीपक जल रहा है। धीरे-धीरे... उमेश प्रवेश करता है। उसके कदम भारी हैं। आज वह पहले से ज़्यादा थका हुआ है। वह मंदिर के सामने खड़ा होता है। जूते उतारता है। घंटी नहीं बजाता। सिर्फ़ हाथ जोड़ता है। धीरे से कहता है—सबका ध्यान रखना...
बस...इतना ही। वह बेंच पर जाकर बैठ जाता है। दोनों हाथ घुटनों पर। सिर झुका हुआ। कुछ क्षण... पूरा मंच शांत।तभी...
पीछे से आवाज़ आती है—फिर आ गया?
उमेश बिना पीछे देखे...हल्का-सा मुस्कुराता है।
तू भी आ गया?
प्रवेश शेखर। सादा कपड़े। चेहरे पर अपनापन। आँखों में चिंता। वह बिना कुछ कहे... उमेश के पास बैठ जाता है। दोनों...
लगभग एक मिनट तक...कुछ नहीं बोलते। फिर... शेखर जेब से मूँगफली निकालता है। एक दाना खुद खाता है। एक उमेश की ओर बढ़ाता है। उमेश हँस देता है। चालीस साल हो गए...आज तक तू मूँगफली ही खिलाता है।शेखर भी मुस्कुरा देता है।
और तू...आज तक मना नहीं करता।
दोनों हल्का हँसते हैं। फिर... हँसी खत्म। सन्नाटा।
शेखर...धीरे से पूछता है— आज..फिर कुछ बोलीं?
उमेश...आसमान की तरफ़ देखता है।
बच्चे हैं..
शेखर तुरंत बोल पड़ता है—
नहीं! अब बच्चे नहीं रहे।कॉलेज में पढ़ती हैं।समझती हैं। 
फिर भी...तुझे हर दिन तोड़ देती हैं।
उमेश चुप। शेखर पहली बार... आवाज़ ऊँची करता है।
कब तक?कब तक सुनता रहेगा? क्यों नहीं बता देता...कि...
रुक जाता है।
उमेश...धीरे से उसकी ओर देखता है।
शेखर...आज नहीं...
शेखर उठ खड़ा होता है। - हर बार...आज नहीं...यही बोलता है तू।
तेरे घुटने जवाब दे चुके हैं।दिन में चार-चार काम करता है।एक वक्त खाना खाता है।और...घर में...कोई तुझे पानी तक नहीं पूछता। 
क्यों? किस बात की सज़ा काट रहा है?
उमेश... धीरे से मुस्कुराता है।
सज़ा?नहीं...जि़म्मेदारी।
शेखर...गुस्से में...बेंच पर हाथ मारता है।
झूठ! ये जिम्मेदारी नहीं...पागलपन है।आज बता दे...कि..वे...तेरी...
उमेश...बहुत प्यार से...उसके कंधे पर हाथ रख देता है। शेखर चुप हो जाता है।
उमेश...बहुत शांत आवाज़ में—तू...गुस्से में है।इसलिए...आज...मैं तेरी एक भी बात का जवाब नहीं दूँगा।
सन्नाटा। दूर... मंदिर की घंटी बजती है। दोनों... उसी ओर देखने लगते हैं।
कथावाचक
दोस्ती की सबसे बड़ी पहचान...
यह नहीं कि वह तुम्हारे साथ हँसती है...
बल्कि...यह है कि...
जब पूरी दुनिया तुम्हें गलत समझे...
तब भी वह...
तुम्हारे लिए लडऩे को तैयार रहती है।
हल्की बाँसुरी। रोशनी मंद।

दृश्य - 5 भाग - 2

कुछ सच... सही समय से पहले नहीं बोले जाते। (वही पार्क।) ठंडी हवा। मंदिर का दीपक अब थोड़ा धीमा हो गया है।
शेखर बेंच से उठकर कुछ कदम दूर चला जाता है। उसके चेहरे पर गुस्सा है। दर्द है। और असहायता भी। उमेश...
वैसे ही बैठा है। सिर झुका हुआ। कुछ देर... दोनों के बीच सिर्फ़ सन्नाटा। अचानक... शेखर पलटता है।
शेखर - बस... अब नहीं देखा जाता मुझसे।
हर रोज़...मरता है तू।और...हर रोज़...हँसकर घर चला जाता है।
उमेश...धीरे से मुस्कुराता है।
घर...हँसकर ही जाना चाहिए।
शेखर गुस्से से पास आता है।
क्यों?ताकि...वे फिर तुझे चोट पहुँचाएँ?आज..रिया ने क्या कहा?ड्रामा...सुना मैंने...सब सुनता हूँ मैं।
उमेश चौंकता है।
तू...घर के बाहर था?
शेखर -हाँ।और...मन कर रहा था...अंदर जाकर...सबको बता दूँ...कि...
रुक जाता है। उमेश धीरे से उठता है। दोनों अब आमने-सामने खड़े हैं।
उमेश...पहली बार... शेखर की आँखों में देखता है।
अगर...आज...तूने...एक शब्द भी कहा...तो...मैं...
शेखर बीच में बोल पड़ता है—
क्या करेगा?दोस्ती तोड़ देगा?
उमेश...हल्की मुस्कान के साथ...सिर हिलाता है।
उमेश - नहीं...अपने आप से...नजऱें नहीं मिला पाऊँगा।
सन्नाटा।
शेखर...धीरे-धीरे...शांत होने लगता है।
आखिर ...क्यों?किसके लिए?
उमेश...मंदिर की ओर देखता है।
जब...कोई बच्चा...चलना सीखता है...तो...वह...अपने पिता की उँगली छोड़ देता है।क्या...पिता...उसे गिरने देता है?
शेखर धीरे से—
नहीं...वह...पीछे-पीछे चलता है।
उमेश...मुस्कुराता है।
बस...मैं भी...पीछे-पीछे चल रहा हूँ। उन्हें...जब सच पता चलेगा...तो...वे...मुझे...भगवान बना देंगी।
लेकिन...मैं...भगवान नहीं बनना चाहता।मैं...सिर्फ़...उनका...पापा रहना चाहता हूँ।
शेखर की आँखें भर आती हैं। वह धीरे से... उमेश के कंधे पर हाथ रखता है।
यार...तू...आदमी है...या...पत्थर?
उमेश...हल्का-सा हँसता है।
न...पत्थर रोते हैं...न...मैं...दोनों...एक-दूसरे को देखते हैं।
तभी...मंदिर से आरती की आवाज़ आने लगती है। दोनों... बिना कुछ बोले... मंदिर की सीढिय़ों पर बैठ जाते हैं।
कुछ देर...सिर्फ़ आरती। कोई संवाद नहीं। यही मौन...
कथावाचक
त्याग...जिस दिन...अपनी कहानी सुनाने लगे...
उस दिन...दुनिया में...महान लोग नहीं बचेंगे...
क्योंकि...सच्चा त्याग...शोर नहीं करता।
रोशनी धीरे-धीरे मंद।

दृश्य - 5 भाग -  3

कुछ प्रेम... साथ नहीं रहते, फिर भी जीवन भर साथ चलते हैं।
(वही पार्क...) आरती समाप्त हो चुकी है। रात और गहरी हो गई है। मंदिर का दीपक अब टिमटिमा रहा है। उमेश और शेखर सीढिय़ों पर बैठे हैं। कुछ देर... दोनों चुप।
शेखर... धीरे से बोलता है—
एक बात पूछूँ?
उमेश मुस्कुरा देता है।
आज तक...कभी मना किया है?
शेखर हल्का-सा मुस्कुराता है।
उसकी...याद आती है?
उमेश...पहली बार...दूर आसमान की ओर देखने लगता है।काफी देर... कोई जवाब नहीं।
फिर...धीरे से...उसके होंठों पर मुस्कान आती है।
उमेश - याद...उन्हें किया जाता है...जो...कभी दूर चले जाएँ।
शेखर...उसे देखता रह जाता है। उमेश... अपने सीने पर हाथ रखता है।
उमेश - वो...आज भी...यहीं है।बस...दिखाई नहीं देती।
शेखर की आँखें नम हो जाती हैं।
शेखर - अगर...वो दिन नहीे होता तो...आज ये न होता ...
उमेश...धीरे से मुस्कुराता है।
उमेश - घर? मेरा घर...तो आज भी है। बस...थोड़ा बड़ा है।
दोनों हल्का-सा हँसते हैं।
फिर...शेखर...बहुत धीरे से पूछता है—उसने...
उमेश...कुछ पल चुप। फिर...सिर हिला देता है।
उमेश - नहीं।
शेखर अब खुद को रोक नहीं पाता। उसकी आँखों से आँसू निकल आते हैं। वह उमेश का हाथ पकड़ लेता है।
यार...कभी...अपने लिए भी जी ले।
उमेश...धीरे से...हाथ छुड़ाता है।
मैं...हर दिन...अपने लिए ही जीता हूँ।
शेखर आश्चर्य से देखता है।
उमेश...मुस्कुराकर कहता है—जब...मेरी कोई बेटी...हँसती है...न...उसी पल...मैं...जी लेता हूँ।
शेखर अब कुछ नहीं बोल पाता। दोनों...मंदिर की सीढिय़ों पर बैठे रहते हैं।
दूर...पूर्व दिशा में...हल्की सुबह की आभा दिखाई देने लगती है।
कथावाचक
हर प्रेम...मिलन तक नहीं पहुँचता...
कुछ प्रेम...त्याग बनकर...
दूसरों की ज़िंदगी रोशन करते हैं।
रोशनी धीरे-धीरे बुझती है।

दृश्य - 6 भाग - 1

कुछ शर्म... अपनी नहीं होती, फिर भी इंसान उसे ढोता रहता है।
(रविवार की शाम।) मंच पर रंग-बिरंगी रोशनी। बच्चों की हँसी। गुब्बारे। खिलौने। मॉल में भीड़। लाउडस्पीकर पर बच्चों का गीत। घोषणा होती है—सभी बच्चों का स्वागत है...
कुछ ही क्षणों में...आपका प्यारा टेडी आपसे मिलने आ रहा है...
बच्चे तालियाँ बजाते हैं। पीछे... स्टाफ रूम। उमेश... धीरे-धीरे टेडी का कॉस्ट्यूम पहन रहा है। वह भारी सिर उठाता है।
एक पल... आईने में खुद को देखता है। हल्की मुस्कान। धीरे से कहता है—
चलो...आज भी...किसी बच्चे को हँसाना है।
वह बाहर निकलता है।बच्चे दौडक़र उसके पास आते हैं।कोई हाथ पकड़ता है। कोई गले लगता है। कोई फोटो खिंचवाता है।
एक छोटा बच्चा रो रहा है। टेडी... उसके सामने बैठ जाता है। जेब से छोटी-सी सीटी निकालता है। मज़ेदार आवाज़ निकालता है। बच्चा हँस पड़ता है। पूरा हॉल तालियाँ बजाता है। उसी समय... ंच के दूसरी ओर... प्रवेश— संध्या, रिया, पूजा, नंदिता
और उनकी कॉलेज की चार-पाँच सहेलियाँ। सब पहली बार इस बड़े मॉल में आई हैं।
रिया -वाह...कितना बड़ा है!
पूजा -चलो पहले फोटो लेते हैं।
सब हँसते हुए आगे बढ़ती हैं। तभी... उनकी नजऱ... टेडी पर पड़ती है।
एक सहेली—चलो...उसके साथ भी फोटो लेते हैं।
सब हँसते हुए टेडी के पास पहुँचती हैं।
टेडी...यानी उमेश... सबके साथ मजाक करता है। उसे क्या पता... ये उसकी अपनी बेटियाँ हैं। वह सिर झुकाकर...सबको नमस्ते जैसा इशारा करता है।
संध्या भी...पहली बार... हल्का-सा मुस्कुरा देती है।
कई दिनों बाद...उसके चेहरे पर...सच्ची मुस्कान आती है। फोटो खिंचती है। उसी समय...
रिया मज़ाक में... टेडी के पेट पर हल्का-सा मुक्का मारती है।
अरे...कितना मोटा है!
सब हँस पड़ती हैं। टेडी भी... मज़ाक में... अपना पेट पकडक़र पीछे हट जाता है। पूरा माहौल... हँसी से भर जाता है।
तभी...एक छोटा बच्चा गिर जाता है। टेडी... फौरन उसकी ओर दौड़ता है। उसे उठाता है। उसके कपड़े झाड़ता है।
उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरता है।
संध्या...दूर खड़ी...यह दृश्य देख रही है।
वह धीरे से कहती है—देखा...कैसे संभाला...
अदिति (जो उनके साथ आई है) मुस्कुराती है। -बच्चों से प्यार करने वाले लोग...अक्सर बुरे नहीं होते।
संध्या...एक पल के लिए...चुप हो जाती है। लेकिन... अगले ही पल...मोबाइल पर किसी का मैसेज आता है।
स्क्रीन पर—रेलगाड़ी...आज मॉल घूम रही है?संध्या का चेहरा... फिर उतर जाता है। वह मोबाइल बंद कर देती है।
उधर...टेडी...दूर से...सिर्फ़ इतना देखता है...कि एक लडक़ी...अचानक उदास हो गई।वह पास जाता है। जेब से...
एक छोटा-सा गुब्बारा निकालता है।संध्या की ओर बढ़ाता है। संध्या...पहले मना करती है। फिर...ले लेती है।टेडी...
अँगूठा दिखाता है।और...दूसरे बच्चों की ओर चला जाता है।संध्या...कुछ पल...उस गुब्बारे को देखती रहती है।
उसे क्या पता...जिस हाथ ने...आज उसे मुस्कुराने की कोशिश की...वही हाथ...बचपन में उसे चलना सिखाते थे।
कथावाचक
कई बार...रिश्ते...इतने पास होते हैं..
कि...पहचाने नहीं जाते।
रोशनी मंद।

दृश्य - 6 भाग - 2

कुछ दरवाज़े... गलती से खुलते हैं, लेकिन ज़िंदगी बदल देते हैं।(वही मॉल।)कार्यक्रम समाप्त हो चुका है।बच्चे अपने-अपने माता-पिता के साथ जा रहे हैं। धीरे-धीरे भीड़ कम होने लगती है। संध्या और उसकी सहेलियाँ भी बाहर निकल रही हैं।
रिया -चलो...देर हो रही है।
सब आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन... संध्या रुक जाती है। उसके हाथ में वही छोटा-सा गुब्बारा है... जो टेडी ने दिया था। वह एक पल पीछे मुडक़र देखती है। दूर... टेडी... स्टाफ रूम की ओर जा रहा है। संध्या जाने क्यों... उसे देखती रह जाती है।
अदिति पूछती है—क्या हुआ?
संध्या -कुछ नहीं..तुम लोग चलो...मैं अभी आती हूँ।
सब बाहर निकल जाते हैं। मंच पर अब सन्नाटा। स्टाफ रूम का दरवाज़ा। पूरा बंद नहीं है। हल्का-सा खुला।
संध्या...धीरे-धीरे वहाँ तक पहुँचती है। वह किसी को बुलाने नहीं आई। न ही झाँकने। बस... जिज्ञासा... उसे वहाँ तक ले आई। अंदर... उमेश अकेला है। वह बहुत थका हुआ है। धीरे-धीरे... टेडी का बड़ा सिर उतारता है।फिर... भारी दस्ताने।
फिर... कॉस्ट्यूम। उसके चेहरे पर पसीना है। बाल बिखरे हुए हैं। वह गहरी साँस लेता है। जेब से रुमाल निकालकर चेहरा पोंछता है। उसी समय... संध्या की नजऱ... उस चेहरे पर पड़ती है। उसकी साँस... रुक जाती है। हाथ से गुब्बारा छूट जाता है। गुब्बारा...धीरे-धीरे...ज़मीन पर गिरता है।उमेश...आवाज़ सुनकर पीछे मुड़ता है।
दरवाज़े पर...संध्या खड़ी है। दोनों की नजऱें मिलती हैं। समय...जैसे रुक गया हो।
उमेश... एक पल के लिए घबरा जाता है। फिर... तुरंत... सामान्य बनने की कोशिश करता है।
हल्की मुस्कान...अरे...तुम?
संध्या...कुछ बोल ही नहीं पाती। उसकी आँखें... उमेश से... उस कॉस्ट्यूम तक... फिर उमेश तक जाती हैं। उमेश... धीरे से...
कॉस्ट्यूम समेटने लगता है। जैसे... कुछ हुआ ही न हो। फिर... बहुत सामान्य आवाज़ में पूछता है—
घूमने आई थीं?
संध्या... अब भी चुप। उमेश...उसके चेहरे का तनाव पढ़ लेता है।
मुस्कुराकर कहता है—बच्चों को...
हँसाने का काम है। अच्छा लगता है।
संध्या की आँखों से...आँसू आने ही वाले हैं। लेकिन... उसी क्षण... उसे अपने दोस्तों की बातें याद आती हैं।
रेलगाड़ी...नौ बहनें...तुम्हारे पापा...उसका चेहरा बदल जाता है।शर्म... गुस्सा... अपमान... सब एक साथ। वह बस...
एक ही वाक्य कहती है—आप......ये काम करते हैं?
उमेश...दो सेकंड चुप रहता है। फिर... बहुत सहजता से—काम...छोटा-बड़ा नहीं होता बेटा।ईमानदारी से किया जाए...तो...
हर काम...सम्मान देता है।
संध्या...अब उसकी बात नहीं सुन रही। वह सिर्फ़ अपने दोस्तों के चेहरे देख रही है...अपने कॉलेज के ताने...अपनी टूटी हुई इज़्ज़त...अपने भीतर की आग। वह एक कदम पीछे हटती है।
उमेश...धीरे से कहता है—संध्या...
लेकिन... वह मुड़ जाती है।बिना कुछ कहे...तेज़ क़दमों से...बाहर निकल जाती है।ज़मीन पर...वही छोटा-सा गुब्बारा पड़ा है। उमेश...उसे उठाता है। धीरे से उसकी हवा निकल चुकी है। वह उसे देखता है... और बहुत हल्की मुस्कान के साथ...
फुसफुसाता है—कोई बात नहीं...फिर से भर देंगे।
लेकिन...
कथावाचक
सच...जब अचानक सामने आ जाए...तो...सबसे पहले...
विश्वास टूटता है...इंसान नहीं।

दृश्य - 7 भाग - 1

सबसे बड़ा युद्ध... बाहर नहीं, मन के भीतर होता है।(रात... लगभग 10:30 बजे।)घर का हॉल। सभी बहनें लौट चुकी हैं।
बाहर हल्की बारिश शुरू हो गई है। खिडक़ी पर पानी की बूँदें टकरा रही हैं। घर में... अजीब-सा सन्नाटा।
आज...पहली बार...संध्या किसी से बात नहीं कर रही। मीरा (छठी बेटी) रसोई में है। गुडि़य़ा (सबसे छोटी) होमवर्क कर रही है। बाकी बहनें मोबाइल में लगी हैं। रिया... संध्या के पास बैठती है।
क्या हुआ?
संध्या...चुप।
मॉल में...कुछ हुआ था क्या?
संध्या...धीरे से...सिर्फ़ एक वाक्य बोलती है—
आज...मैं मर गई।
रिया घबरा जाती है।
क्या मतलब?
संध्या...धीरे-धीरे...सब बताती है।- वो...टेडी...पापा थे।
एक पल...पूरा घर...जैसे जम जाता है।
पूजा - क्या?
नंदिता -झूठ बोल रही हो।
संध्या -काश... झूठ होता। मैंने... अपनी आँखों से देखा है।
सब बहनें... एक-दूसरे का चेहरा देखने लगती हैं।
रिया... गुस्से में उठती है। -मतलब...कॉलेज में...अगर किसी ने देख लिया होता...तो?
पूजा -हम कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रहते।
तीसरी बेटी -इतना कमाते कहाँ हैं...अब समझ आया। ये भी काम करते हैं।
चौथी बेटी -हमसे छिपाया क्यों?
संध्या...अचानक ज़ोर से बोलती है—बस!
सब चुप।
संध्या...रोते हुए—मुझे नहीं पता...गलत कौन है...पापा...या...ये समाज...लेकिन...आज...मुझे...बहुत शर्म आई।
यह सुनकर... मीरा... जो रसोई से सब सुन रही थी... बाहर आती है। उसके हाथ में... आटे से सने हाथ।वह धीरे से पूछती है—दीदी...शर्म...पापा पर आई...या...उन लोगों पर...जो...मेहनत करने वाले इंसान पर हँसते हैं?
सन्नाटा।
रिया चिढक़र—तू छोटी है...तुझे समझ नहीं आएगा।
मीरा पहली बार...आवाज़ ऊँची करती है।
नहीं दीदी...शायद...मैं छोटी हूँ...इसलिए...अभी तक...सही देख पा रही हूँ।
सब स्तब्ध।
मीरा...धीरे-धीरे बोलती है—जब...स्कूल में...मेरी फीस नहीं भर पाई थी...तो...पापा...पूरी रात...भीगते रहे...सिर्फ़...
मेरी फीस भरने के लिए। तब...मुझे...शर्म नहीं आई। आज...अगर...वो...टेडी बनकर...किसी बच्चे को...हँसा रहे थे...तो...मुझे...उन पर...गर्व है।
मीरा की आँखें भर आती हैं। वह वापस रसोई में चली जाती है।
संध्या... कुर्सी पर बैठ जाती है। उसके भीतर... दो आवाज़ें लड़ रही हैं।
एक—पापा महान हैं।
दूसरी—लेकिन...समाज क्या कहेगा?
कथावाचक
इंसान...अक्सर...गलत नहीं होता...वह...बस...दूसरों की नजऱों से...
अपने जीवन को देखने लगता है।
रोशनी धीरे-धीरे मंद।

दृश्य - 7 भाग - 2

जब समाज घर के भीतर घुस आता है... (रात... लगभग 11 बजे।)
बाहर बारिश तेज़ हो चुकी है। बिजली चमकती है। घर के भीतर हल्की पीली रोशनी। संध्या अब भी चुप बैठी है। बाकी बहनों के चेहरों पर बेचैनी है। 
रिया धीरे-धीरे बोलती है— दीदी...अगर कल कॉलेज में किसी ने पूछ लिया तो?
पूजा -पूछेगा नहीं... बताएगा.. तुम्हारे पापा मॉल में टेडी बनते हैं।
तीसरी बेटी -हम पहले ही...नौ बहनों के नाम से जाने जाते हैं। अब...ये भी...
संध्या सिर पकड़ लेती है।
बस...बस करो...
तभी...
गुडिय़ा धीरे से पूछती है—दीदी...अगर...पापा ये काम नहीं करेंगे...तो...मेरी किताबें...कौन खरीदेगा?
सन्नाटा।
मीरा...गुडि़य़ा के पास जाकर बैठती है। उसके सिर पर हाथ फेरती है।
रिया झुंझलाकर बोलती है—हर बात में पापा...पापा...पापा...तुम दोनों को...दुनिया की समझ नहीं है।
मीरा... अबकी बार बिल्कुल शांत स्वर में कहती है—
दुनिया की समझ...अगर...अपने पिता से शर्म करना सिखाती है...तो...मुझे...ऐसी दुनिया...समझनी ही नहीं।
कमरे में फिर सन्नाटा।
संध्या उठती है। धीरे-धीरे कमरे में टहलने लगती है। उसके मन की आवाज़ (ऑफ-स्टेज, हल्की गूँज के साथ)
क्या सच में पापा गलत हैं?
दूसरी आवाज़ - नहीं...
पहली - तो फिर मुझे शर्म क्यों आई?
दूसरी - क्योंकि...तुम अपनी आँखों से नहीं... 
दूसरों की आँखों से खुद को देख रही हो। संध्या दोनों कान बंद कर लेती है।
बस...
बस...
बाकी बहनें घबरा जाती हैं।
उसी समय...दरवाज़े के बाहर... कदमों की आहट। सब समझ जाती हैं... पापा आ गए। लेकिन... आज... कोई दरवाज़ा खोलने नहीं जाता। 
उमेश खुद दरवाज़ा खोलता है। भीगे हुए कपड़े। थका चेहरा। हाथ में पुराना झोला। जैसे ही वह अंदर आता है... उसकी नजऱ... अपनी बेटियों पर पड़ती है। आज...कोई पापा नहीं कहता।
कोई पानी नहीं पूछता। सिर्फ़ गुडिय़ा दौड़ती है—पापा...
लेकिन... रिया उसका हाथ पकड़ लेती है।
रुको। 
गुडि़य़ा हैरान। उमेश सब समझ जाता है। वह मुस्कुराने की कोशिश करता है।
क्या हुआ?
कोई जवाब नहीं। कुछ पल बाद... संध्या आगे आती है। उसकी आवाज़ काँप रही है।
हमें...आपसे...एक बात पूछनी है।
उमेश - पूछो बेटा।
संध्या -क्या...आप...मॉल में...टेडी बनते हैं?
कमरे में... एकदम सन्नाटा।
उमेश... दो सेकंड... संध्या को देखता है। फिर... बिना झिझक... मुस्कुराकर कहता है—
हाँ।
कोई सफ़ाई नहीं। कोई झूठ नहीं। कोई बहाना नहीं। बस... एक शब्द—
हाँ। यही हाँ..
रिया... गुस्से में—आपको...जऱा भी...शर्म नहीं आई?
उमेश... धीरे से पूछता है—किस बात की?
रिया -हमारी! हमारे सम्मान की!
उमेश... शांत... बहुत शांत... 
उमेश - सिर्फ़ इतना कहता है—जिस काम से...मेरे बच्चों की पढ़ाई चलती हो...उस काम से...मुझे कभी शर्म नहीं आएगी।
सन्नाटा।
दूर कहीं बिजली कडक़ती है। रोशनी एक पल के लिए बुझती है... फिर लौटती है।

दृश्य क्रमांक - 7 भाग - 3

जिस घर में प्रेम रहता है... वहाँ कभी-कभी समाज मेहमान बनकर आता है और सब कुछ तोड़ देता है। (वही रात... वही घर...) उमेश अब भी दरवाज़े के पास खड़ा है। उसके कपड़ों से बारिश का पानी टपक रहा है। हाथ में पुराना झोला। चेहरे पर थकान... लेकिन आँखों में वही अपनापन। कमरे में... नौ बेटियाँ। कोई बैठी है। कोई खड़ी है। कोई रो रही है। कोई गुस्से में है। केवल घड़ी की आवाज़—टिक... टिक... टिक...
उमेश धीरे से झोला नीचे रखता है।
उमेश - पहले...कपड़े बदल लूँ?
संध्या...बहुत कठिनाई से खुद को संभालते हुए—नहीं...
आज...पहले बात होगी।
उमेश.. सिर हिलाता है। -ठीक है बेटा।
कुछ क्षण... कोई कुछ नहीं बोलता। अचानक...रिया आगे आती है।
आपको..हमारी जऱा भी चिंता नहीं?
उमेश -तुम लोग ही...तो मेरी चिंता हो।
रिया -अगर होती...तो...आज..हमें...अपने दोस्तों के सामने...झुकना नहीं पड़ता।
उमेश...धीरे से पूछता है—क्या...ईमानदारी से मेहनत करना...झुकना होता है?
रिया चुप।
लेकिन...पूजा बोल पड़ती है—समाज...ये नहीं देखता।उसे...बस... हँसना आता है।
उमेश...धीरे से मुस्कुराता है।
तो...गलती...समाज की है।मेरी नहीं।
यह सुनते ही...संध्या की आँखों से आँसू बहने लगते हैं।
लेकिन...सज़ा...हमें मिलती है पापा...आपको नहीं।
यह संवाद...हॉल में सन्नाटा भर देता है।
उमेश...पहली बार...बिलकुल शांत हो जाता है। वह समझ गया है... बात अब सिर्फ़ नौकरी की नहीं रही। यह उनकी टूटती हुई पहचान की लड़ाई है।
उसी समय...मीरा आगे आती है।
दीदी...अगर...कल...लोग...मुझे भी चिढ़ाएँ..तो...मैं...कह दूँगी...हाँ...वो मेरे पापा हैं।और मुझे उन पर गर्व है।
गुडिय़ा दौडक़र... उमेश का हाथ पकड़ लेती है।
मुझे भी।मेरे पापा...सबसे अच्छे हैं।
उमेश... दोनों बच्चियों के सिर पर हाथ रखता है। उसकी आँखें भर चुकी हैं। लेकिन... वह आँसू गिरने नहीं देता।
संध्या...अब टूट चुकी है। वह रोते हुए...कहती है—
पापा...मैं...आपसे...नफऱत नहीं करती।
उमेश...ध्यान से सुनता है।
मैं...बस...इस डर से हार गई हूँ...कि...दुनिया...हमेशा...हमें...आपके काम से पहचानेगी...
उमेश...धीरे-धीरे...उसके पास आता है। बहुत प्यार से...उसके सिर पर हाथ रखता है। और कहता है—
जिस दिन...इंसान...अपने काम से नहीं...अपने चरित्र से पहचाना जाएगा...उस दिन...दुनिया...थोड़ी बेहतर हो जाएगी।
लेकिन...संध्या...उस हाथ को धीरे से हटा देती है।
एकदम शांत।
वह काँपती हुई आवाज़ में कहती है—पापा...हम...अब...ये सब...और नहीं सह सकते।
या...आप...ये काम छोड़ दीजिए...या...
बहुत लंबा मौन...    हमें...
ये घर छोडऩा होगा..
ये कहते ही...संध्या फूट-फूटकर रो पड़ती है।
उसने कहा—हमें घर छोडऩा होगा।
इस एक बदलाव से उसका चरित्र कठोर नहीं, बल्कि टूटा हुआ लगेगा।
उमेश...कुछ सेकंड तक...सभी बेटियों को देखता है।फिर...बहुत हल्की मुस्कान देता है।और सिर्फ़ इतना कहता है—
ठीक है... बस।
कोई बहस नहीं। कोई शिकायत नहीं। कोई गुस्सा नहीं। वह अपने कमरे की ओर बढ़ जाता है।
कथावाचक (धीमे स्वर में)
कभी-कभी...सबसे बड़ी हार...
वह नहीं होती...जब कोई आपको छोड़ दे...
बल्कि...जब वह आपको छोड़ते हुए...खुद भी टूट जाए।

दृश्य - 8 भाग - 1

कुछ लोग घर छोड़ते नहीं... चुपचाप घर को अपने भीतर लेकर चले जाते हैं।
(रात... लगभग 12 बजे।) बाहर बारिश अब थम चुकी है। आसमान में बादलों के बीच से हल्की चाँदनी उतर रही है।
घर के भीतर...एक ऐसा सन्नाटा...जिसमें हर साँस की आवाज़ सुनाई दे रही है।उमेश...धीरे-धीरे...अपने कमरे में प्रवेश करता है। दरवाज़ा बंद नहीं करता। बस... हल्का-सा भेड़ देता है। बाहर...सारी बेटियाँ वहीं बैठी हैं। किसी की हिम्मत नहीं...
कुछ बोलने की। कमरे के भीतर... पुरानी लकड़ी की संदूक। उमेश उसके सामने बैठ जाता है।
कुछ पल... बस उसे देखता रहता है। फिर... जेब से चाबी निकालता है। ताला खोलता है। संदूक खुलती है। सबसे ऊपर...
पुराना ऊनी स्वेटर। एक टूटी हुई घड़ी। कुछ बच्चों की पुरानी ड्रॉइंग। छोटे-छोटे स्कूल बैज। पहली फीस की रसीद। किसी बच्ची का पहला रिपोर्ट कार्ड। एक टूटी हुई गुलाबी हेयर क्लिप। उमेश... हर चीज़ को... ऐसे छूता है... जैसे कोई अपनी जिंदगी को छू रहा हो। धीरे से मुस्कुराता है।
ये...मीरा की पहली ड्रॉइंग...
दूसरा कागज़ उठाता है।गुडय़िा का...पहला  ग्रेड...
फिर...एक छोटी-सी गुलाबी चप्पल। वह उसे देखकर हँस देता है।
कितनी जि़द की थी...यही पहनूँगी...हँसी...धीरे-धीरे... आँसू में बदल जाती है। फिर... वह सबसे नीचे रखा... सफ़ेद कपड़ा उठाता है। उसमें... वही तस्वीर।
दर्शकों को अब भी तस्वीर नहीं दिखाई जाती।
उमेश...तस्वीर को देखता है। बहुत देर तक। फिर... धीरे से कहता है—आज...शायद...पहली बार..हार गया हूँ।
कुछ पल...सन्नाटा।
फिर...मुस्कुराता है।
नहीं...हारा नहीं...बस...अब...उन्हें...मेरे बिना...चलना सीखना होगा।
उसी समय...दरवाज़े पर...धीरे-धीरे...गुडिय़ा दिखाई देती है। उसने सब सुन लिया है। वह चुपचाप... अंदर आती है।
उमेश तुरंत...आँसू पोंछ लेता है।
अरे...मेरी चिडि़य़ा...सोई नहीं?
गुडि़य़ा...कुछ नहीं बोलती। सीधे...उमेश के गले लग जाती है। और... धीरे-धीरे... रोने लगती है।
गुडिय़ा - पापा...आप...जाओगे?
उमेश...उसे कसकर सीने से लगा लेता है।
कौन बोला?
गुडि़य़ा - मुझे...सब...पता चल जाता है।
उमेश...हल्का-सा हँसता है।
सच?
गुडिय़ा सिर हिलाती है।
तो...
तो भी पता है...कि...मैं...जहाँ भी रहूँ...तुम्हारा पापा...वहीं रहूँगा। 
गुडि़य़ा... ज़ोर से सिर हिलाती है।
नहीं...पापा...घर...आपसे है...आप नहीं...तो...घर भी नहीं।
पूरी तरह शांत।
उमेश...अब खुद को रोक नहीं पाता।वह पहली बार... फूटकर नहीं... लेकिन गहराई से रोता है।उसके आँसू...
गुडय़िा के बालों में गिरते हैं।वह जल्दी से... आँसू पोंछता है।
नहीं...मेरी बहादुर बेटी...रोती नहीं है। 
गुडिय़ा...आँसू पोंछती है।
तो...आप भी मत रोओ।
दोनों...एक-दूसरे को देखते हैं।
बाहर...संध्या खड़ी है। दरवाज़े की ओट में। वह सब सुन रही है। उसके होंठ काँप रहे हैं। लेकिन...उसके पैर...
जैसे ज़मीन से चिपक गए हों। वह अंदर नहीं आ पाती।
कथावाचक
सबसे कठिन क्षण...वह नहीं होता...जब कोई घर छोड़ता है...
बल्कि...वह होता है...
जब उसे रोकने की इच्छा भी हो..
और अहंकार...हाथ पकड़ ले।
दूर कहीं मंदिर की घंटी बजती है। रोशनी धीरे-धीरे मंद पड़ती है।

दृश्य - 8 भाग - 2

विदा... हमेशा शब्दों से नहीं होती।
(वही रात...) कमरे में...गुडि़य़ा अब भी उमेश का हाथ पकड़े बैठी है। उसकी आँखें लाल हो चुकी हैं। उमेश धीरे-धीरे उसके आँसू पोंछता है।
उमेश:  -चलो...अब मेरी बहादुर बेटी मुस्कुराएगी।
गुडि़य़ा सिर हिलाती है।
गुडय़िा - पहले आप मुस्कुराइए...
उमेश...पूरी कोशिश करता है। होठों पर मुस्कान लाता है। लेकिन... आँखें उसका साथ नहीं देतीं। 
गुडिय़ा...अपने छोटे-छोटे हाथों से... उसके गाल पोंछती है।
अब ठीक..
उमेश हँस देता है।
हाँ...अब ठीक।
वह संदूक बंद करता है। ताला लगाता है।चाबी... उसी संदूक के ऊपर रख देता है।
कोई संगीत नहीं। सिर्फ़... ताले की आवाज़।
टक...यह आवाज़.. गूँजती है। उमेश अपना पुराना झोला उठाता है।
उसमें... सिर्फ़ तीन चीज़ें रखता है—
एक जोड़ी कपड़े, पुरानी डायरी और... वही तस्वीर
फिर...रुक जाता है। तस्वीर को देखता है। बहुत देर तक। फिर... धीरे से वापस संदूक में रख देता है।
नहीं...ये...यहीं रहेगी...यहीं...
वह तस्वीर के नीचे...एक छोटा-सा मोड़ा हुआ कागज़ रख देता है।
उस पर सिर्फ़ एक पंक्ति लिखी है—जिस दिन सच जानना चाहो... पहले अपने दिल से पूछना।
बस। वह उठता है।दरवाज़े तक पहुँचता है।तभी...संध्या सामने खड़ी मिलती है।दोनों...एक-दूसरे को देखते हैं।
लगभग...बीस सेकंड तक।कोई कुछ नहीं बोलता।संध्या के होंठ काँपते हैं।
उसे लगता है—रोक लूँ...लेकिन...उसी क्षण...कॉलेज...ताने...मॉल...दोस्त...सब उसके भीतर लौट आते हैं।
वह...सिर्फ़ रास्ते से हट जाती है।
उमेश...उसे देखता है।
हल्की मुस्कान।
अपना...ध्यान रखना बेटा।
बस। कोई शिकायत नहीं।
कोई प्रश्न नहीं।कोई आरोप नहीं। वह बाहर निकल जाता है।
सारी बहनें बैठी हैं।किसी की हिम्मत नहीं...उसे देखने की।
उमेश...हर बेटी को...एक बार देखता है।उसकी नजऱ...मीरा पर रुकती है। मीरा फूट पड़ती है।
पापा...मत जाइए...
उमेश...उसके सिर पर हाथ रखता है।
अगर..तू रोएगी...तो...मैं...जाऊँगा कैसे?
मीरा...रोते हुए...
उसके हाथ चूम लेती है।गुडिय़ा दौड़ती हुई आती है। उमेश घुटनों के बल बैठ जाता है। गुडि़य़ा उसे कसकर गले लगा लेती है।
पापा...जल्दी आ जाना...
उमेश...उसकी पीठ सहलाता है।
मैं...कभी...दूर नहीं जाता...बस...थोड़ा...दिखाई कम देता हूँ।
गुडिय़ा कुछ समझती नहीं।बस... और ज़ोर से लिपट जाती है। उमेश...धीरे से...उसे अलग करता है। उसके माथे को चूमता है। और...दरवाज़े की ओर चल पड़ता है। दरवाज़े तक पहुँचकर...
वह एक बार पीछे मुड़ता है।
नौ बेटियाँ। एक घर। एक जीवन। वह मुस्कुराता है। हाथ जोड़ता नहीं... हाथ हिलाता नहीं... कुछ कहता नहीं...
बस...देखता है। और... धीरे-धीरे... अंधेरे में चला जाता है।
दरवाज़ा... खुला रह जाता है।
बाहर...दूर से... मंदिर की घंटी। अंदर...
गुडिय़ा की आवाज़—पापा...
कोई उत्तर नहीं। फिर...थोड़ी ज़ोर से—पापा...
फिर...और ज़ोर से—पा...पा...!!
मंच पर... पूर्ण सन्नाटा।
कथावाचक (बहुत धीमे स्वर में)
कभी-कभी..घर...
दरवाज़ा बंद होने से नहीं...
एक आदमी के चुपचाप चले जाने से...
खाली हो जाता है।
रोशनी पूरी तरह बुझ जाती है।

दृश्य -  9 भाग -  1

कुछ रिश्ते खून से नहीं... निभाने से बनते हैं। (अगली सुबह।)सूरज निकल आया है।
लेकिन...उस घर में जैसे सुबह आई ही नहीं।हॉल वैसा ही है।बर्तन वैसे ही पड़े हैं।रसोई में चूल्हा नहीं जला।दीवार पर लगी घड़ी...सुबह के 8 बजे दिखा रही है।गुडि़य़ा...दरवाज़े के पास बैठी है। उसकी नजऱ अब भी बाहर की सडक़ पर है।हर आती-जाती आहट पर...वह उठती है। फिर बैठ जाती है।
धीरे से बुदबुदाती है—पापा... अब आ जाएँगे...
मीरा उसके पास बैठती है। उसके बाल सहलाती है। तभी... दरवाज़े पर दस्तक।
ठक... ठक... ठक...
गुडिय़ा दौड़ती है।
पापा...!
वह दरवाज़ा खोलती है। लेकिन... बाहर... शेखर खड़ा है। चेहरा थका हुआ। आँखें लाल। जैसे पूरी रात सोया न हो।
गुडिय़ा का चेहरा उतर जाता है।
चाचा... पापा... नहीं आए?
शेखर... उसके सिर पर हाथ रखता है।
नहीं बेटा... अभी नहीं।
गुडिय़ा... धीरे से अंदर चली जाती है।
शेखर... घर के अंदर आता है। पूरा घर... उसे देख रहा है।
रिया...बिना नमस्ते किए बोलती है—आप...फिर आ गए?
शेखर...शांत। - उमेश...आया था क्या?
संध्या... धीरे से सिर हिला देती है।
नहीं।
शेखर...एक गहरी साँस लेता है। वह कुर्सी पर बैठता है। कमरे में... भारी सन्नाटा। कुछ क्षण बाद... रिया बोल पड़ती है—
आप...उन्हें ढूँढ़ रहे हैं? क्यों? उन्होंने तो...अपनी मर्ज़ी से घर छोड़ा है।
शेखर...धीरे से...उसकी ओर देखता है। पहली बार...उसकी आँखों में...दर्द दिखाई देता है। 
मर्जी...? बेटी...जिस आदमी ने...पूरी जिं़दगी...अपनी मर्जी से...कुछ नहीं किया...वो...घर भी... अपनी मर्जी से नहीं छोड़ता। 
पूरा मंच... शांत।
पूजा... थोड़े तीखे स्वर में—चाचा...आप...हर बार...उनका पक्ष क्यों लेते हैं?
शेखर...मुस्कुराता है। लेकिन...उस मुस्कान में...टूटन है।
पक्ष...? काश...आज...मैं...झूठ बोल पाता...तो...शायद...अपने दोस्त को...इतना टूटते हुए...
नहीं देखता।
मीरा... धीरे से पूछती है—चाचा...आपको...पता है...पापा कहाँ हैं?
शेखर...कुछ पल चुप रहता है। फिर...खिडक़ी की ओर देखते हुए कहता है—
जब भी...उमेश...बहुत दुखी होता था...तो...एक ही जगह जाता था।पुराने शिव मंदिर...के पीछे...बरगद के पेड़ के नीचे।
लेकिन...आज...वह वहाँ भी नहीं था।
यह सुनते ही...गुडिय़ा की आँखों में आँसू भर आते हैं।
चाचा...पापा...कहीं...हमें छोडक़र...तो नहीं चले जाएँगे?
शेखर...एक पल के लिए...खुद को संभाल नहीं पाता। वह तुरंत... गुडिय़ा को गोद में उठा लेता है।
नहीं...तुम्हारा पापा...ऐसा आदमी नहीं है।वो...मर सकता है...लेकिन...अपनी बेटियों को...छोड़ नहीं सकता।
कमरे में...एकदम सन्नाटा।
संध्या...धीरे से...पहली बार...शेखर की ओर देखती है।उसे महसूस होता है...चाचा कुछ जानते हैं...बहुत बड़ा सच...जो उनसे छिपाया गया है।
कथावाचक
सच...हमेशा...शोर मचाकर नहीं आता...
कभी-कभी...वह...एक थके हुए आदमी की आँखों से...
चुपचाप बाहर निकलता है।

दृश्य - 9 भाग - 2

सच सुनने से पहले... अपने अहंकार को बाहर छोड़ देना।
(वही सुबह... वही हॉल...) शेखर धीरे-धीरे उठता है। अपनी चप्पल पहनता है। जाने के लिए मुड़ता है। तभी... पीछे से संध्या की आवाज़ आती है।
चाचा...
शेखर रुक जाता है। लेकिन... पीछे नहीं मुड़ता।
संध्या... धीरे-धीरे... उसके पास आती है। उसकी आँखें पूरी रात रोने से सूज चुकी हैं।
अगर...आप...कुछ जानते हैं...तो...आज...सब बता दीजिए।
शेखर...अब भी चुप।फिर... बहुत धीमे स्वर में कहता है—
सच...सुनना आसान नहीं होता बेटा। क्योंकि...सच...सबसे पहले...हमारे अहंकार को तोड़ता है।
शेखर अब मुड़ता है। वह एक-एक बेटी को देखता है।
फिर पूछता है—एक सवाल पूछूँ?
कोई जवाब नहीं देता। वह खुद ही बोलता है—
तुम नौ में से...किसने...अपने पापा से...कभी पूछा...कि..आपने खाना खाया?
सन्नाटा।
किसने...उनके...फटे हुए जूते देखे?किसने...उनके हाथों के छाले देखे?किसने...ये पूछा...पापा... आप थकते नहीं हैं? एक भी बेटी... उत्तर नहीं दे पाती।
गुडिय़ा... धीरे से हाथ उठाती है।
मैं...
मीरा भी... धीरे से—मैं भी..
शेखर... मुस्कुराता है।
हाँ...मुझे पता था...सिर्फ़ तुम दोनों...ये हाथ...पकडऩा जानती हो।
बाकी बेटियाँ... सिर झुका लेती हैं।
अब शेखर की आवाज़ थोड़ी भारी हो जाती है।
तुम...उस आदमी को...कायर समझती थीं...क्योंकि...वह कभी...तुम्हें डाँटता नहीं था।कमज़ोर समझती थीं...क्योंकि...
वह चुप रहता था।लेकिन...तुम्हें...पता ही नहीं...कि...उसने...चुप रहकर...कितने तूफ़ान...अपने भीतर दबा दिए। संध्या की आँखों से आँसू बहने लगते हैं।
वह काँपती हुई आवाज़ में पूछती है—
चाचा...आखिऱ...ऐसा क्या है... हमारी माँ कहा है? हम नहीं जानते?
शेखर...अपनी आँखें बंद कर लेता है। जैसे...सालों पुराना बोझ... अब उतरने वाला हो। वह गहरी साँस लेता है।
धीरे से कहता है—आज...जो बात...मैं बताने जा रहा हूँ...उसे...बताने से...उमेश ने...मुझे...बीस साल तक रोका।उसने...मुझसे कहा था...शेखर...अगर मेरी बेटियाँ...मुझसे नफऱत करके भी...खुश रहें...तो...उन्हें कभी सच मत बताना। 
पूरे मंच पर... पूर्ण सन्नाटा।
शेखर की आँखों से... पहली बार आँसू गिरते हैं।
लेकिन..आज...अगर...मैं...चुप रहा...तो...अपने दोस्त से..नजऱें नहीं मिला पाऊँगा।
वह... धीरे-धीरे... पुरानी संदूक की ओर बढ़ता है। उस पर हाथ रखता है।
और कहता है—जिस आदमी को...तुम...अपना पिता समझती रहीं...उसकी कहानी...यहीं से शुरू होती है...
शेखर... संदूक पर रखी चाबी उठाता है। टक...
चाबी ताले में घूमती है। रोशनी केवल संदूक पर। बाकी पूरा मंच अँधेरे में।
कथावाचक (धीमे स्वर में)
कुछ संदूक...कपड़े नहीं...जि़दगियाँ सँभालकर रखते हैं।

दृश्य - 9 भाग - 3

जिसे तुम बोझ समझते रहे... वह किसी का पूरा संसार था।
पूरा मंच अँधेरे में। सिर्फ़ संदूक पर एक हल्की रोशनी। टक... ताला खुलता है। शेखर धीरे-धीरे संदूक खोलता है। सब बेटियाँ आगे बढ़ आती हैं। गुडिय़ा सबसे आगे खड़ी है। 
शेखर ऊपर रखा पुराना स्वेटर निकालता है। फिर... पहली फीस की रसीद।
शेखर (मुस्कुराकर)यह... उस दिन की रसीद है... जब घर में राशन नहीं था... लेकिन स्कूल की फीस भर दी गई थी।
दूसरा सामान... एक छोटी-सी गुलाबी चप्पल।
इसे खरीदने के लिए... उसने तीन दिन पैदल काम पर जाना स्वीकार किया था...
मीरा फूट पड़ती है।
फिर... बच्चों की टेढ़ी-मेढ़ी ड्रॉइंग।
ये चित्र... उसके लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं थे...
अब...शेखर एक सफ़ेद कपड़ा उठाता है।
उसमें... एक पुरानी तस्वीर।
वह तस्वीर अभी भी दर्शकों को साफ़ नहीं दिखाई जाती।
शेखर... तस्वीर को देखता है। बहुत देर तक। फिर... धीरे से बोलता है—
इस लडक़ी से...उमेश...बहुत प्रेम करता था।
पूरा मंच शांत।
दोनों...शादी करना चाहते थे।लेकिन...एक रात...सब बदल गया।
संध्या... धीरे से पूछती है—
क्या हुआ था...?
शेखर... उसकी ओर देखता है।उस रात...बारिश हो रही थी...और...कूड़ेदान से...एक बच्ची के रोने की आवाज़ आई।
पूरा मंच... एकदम शांत।
शेखर...संध्या के सामने आकर खड़ा हो जाता है। उसकी आँखों में देखता है।
वो बच्ची...तुम थीं।
संध्या के पैरों तले ज़मीन खिसक जाती है। वह पीछे हटती है।
न... नहीं...ये...नहीं हो सकता...
शेखर..धीरे से सिर हिलाता है।
तुम्हें...कूड़ेदान से...उठाकर...सीने से लगाने वाला...कोई भगवान नहीं था...वह...उमेश था।
संध्या वहीं बैठ जाती है। अब...शेखर दूसरी बेटी की ओर मुड़ता है।
और तुम...मंदिर की सीढिय़ों पर...एक कपड़े में लिपटी..पूरी रात रोती रहीं।सुबह...जिसने...तुम्हें उठाया...वह भी...उमेश था।
दूसरी बेटी की चीख निकल जाती है।
अब... शेखर बाकी बेटियों की ओर देखता है।
उसकी आवाज़ काँप रही है।
तुममें से...कोई...रेलवे स्टेशन से मिली...कोई...अस्पताल के बाहर..कोई...बस अड्डे पर...कोई...मेले में रोती हुई...और...कोई...अनाथालय के दरवाज़े पर छोड़ दी गई थी...लेकिन... जिस घर ने...तुम सबको...एक ही नाम दिया...वह...उमेश का घर था। पता है उमेश के घर के लोगों ने उसे निकाल दिया उसके भाई रिश्तेदार सब दूर हो गये। 
पूरा मंच सिसकियों से भर जाता है।
शेखर...अब तस्वीर उठाता है।
और जिस दिन...उसकी प्रेमिका ने कहा...उमेश...मैं तुम्हें चाहती हूँ...लेकिन...मैं नौ बेटियों की माँ नहीं बन सकती... मुझे माफ़ कर देना। उस दिन...उमेश ने.प्रेम नहीं छोड़ा। उसने...अपनी खुशी छोड़ दी।और...तुम सबको चुन लिया। उसके साथ यदि कुछ बुरा हो रहा है उसका वही जिम्मेदार है। और होना भी चाहिये उसके साथ ऐसा ... उसने अपनी खुशी जो छोड़ दी थी। 
अब...पूरा मंच रो रहा है। संध्या... घुटनों के बल गिर जाती है। उसके होंठ काँप रहे हैं।
वह सिर्फ़ एक शब्द कह पाती है—पा......
लेकिन...आवाज़ नहीं निकलती।
कथावाचक
जिसे जन्म देना...ईश्वर का वरदान है...
उसे अपनाकर जीवन देना...
मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है।

दृश्य  -10 (अंतिम दृश्य) 

घर... जहाँ लौट आने का नाम है।
(शाम का समय।) मंच पर... पुराना शिव मंदिर। उसके पीछे... विशाल बरगद का पेड़। हल्की हवा। दूर कहीं आरती की घंटियाँ। कुछ पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौट रहे हैं। बरगद के नीचे... उमेश बैठा है। पीठ पेड़ से लगी हुई। घुटनों पर हाथ।
आँखें सामने... लेकिन मन कहीं बहुत दूर। उसके पास... वही पुराना झोला रखा है। वह धीरे से आसमान की ओर देखता है।
मुस्कुराता है।
उमेश (धीमे स्वर में):देखो...आज...बहुत दिनों बाद...मैं खाली हूँ...पहली बार...मेरी कोई बेटी...मेरी राह नहीं देख रही होगी...
हल्की मुस्कान...जो अगले ही पल... आँसू में बदल जाती है।
झूठ...गुडिय़ा...अब भी..दरवाज़े पर बैठी होगी...
वह अपने आँसू छिपाने की कोशिश करता है। तभी... दूर से... एक छोटी-सी आवाज़।
पा...पा...!
उमेश चौंकता है।
पीछे मुडक़र देखता है। कोई नहीं। वह मुस्कुरा देता है।
अब...आवाज़ें भी...याद आने लगी हैं।
फिर...उसी दिशा से... थोड़ी तेज़ आवाज़—
पापा...!
अब... उमेश खड़ा हो जाता है। दूर...मंदिर की सीढिय़ों से... नौ लड़कियाँ दौड़ती हुई आ रही हैं।
सबसे आगे...गुडिय़ा। उसके पीछे... मीरा। फिर... बाकी सभी।
सबसे पीछे... संध्या। उसके कदम सबसे धीमे हैं।
उसकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे हैं। गुडिय़ा दौडक़र... उमेश से लिपट जाती है।
पापा...घर चलो...घर...आपके बिना...घर नहीं है।
उमेश...गुडि़य़ा को बाँहों में भर लेता है। धीरे-धीरे... बाकी बेटियाँ भी... उसे घेर लेती हैं।
मीरा...उसके हाथ पकड़ लेती है। दूसरी बेटी... रोते-रोते उसके पैरों में बैठ जाती है। उमेश घबरा जाता है।
अरे...ये...क्या कर रही हो?
तभी...संध्या... धीरे-धीरे आगे आती है। उसके कदम काँप रहे हैं। वह... उमेश के सामने आकर रुकती है। कुछ बोल नहीं पाती। अचानक... घुटनों के बल बैठ जाती है। दोनों हाथ जोड़ देती है।
पापा...मुझे...माफ़ कर दीजिए...मैं...आपको...पहचान ही नहीं पाई...यदि शेखर चाचा आज हमें सच नहीं बताते तो हम कितना बड़ा गुनाह कर रहे थे। जिनने हमेें सहारा दिया  जिन्होंने अपनी खुरी हमारे आगे खत्म कर दी उसका ही दिल दुखा दिया। मैं...आपकी बेटी कहलाने के भी..लायक नहीं हूँ...
उमेश... पहले शेखर की ओर देखता है। फिर तुरंत नीचे बैठ जाता है। उसके जुड़े हुए हाथ खोल देता है। उसे उठाता है। और... उसे सीने से लगा लेता है। कुछ क्षण... कोई संवाद नहीं।
सिर्फ़... रोने की आवाज़। फिर... उमेश... उसके सिर पर हाथ फेरते हुए— पगली...बेटियाँ...गलतियाँ करती हैं...तभी...तो...पिता...होते हैं...माफ़ करने के लिए।
पूरा मंच... सिसक उठता है।
दूसरी बेटी... रोते हुए—पापा...मैं...कलेक्टर बनूँगी...लेकिन...सबसे पहले...आपका नाम रोशन करूँगी।
मीरा—मैं...जहाँ भी रहूँ..सबसे पहले...कहूँगी. मैं आपकी बेटी हूँ।
बाकी सभी बेटियाँ...एक साथ...रोते हुए—
हम भी...!
उमेश... हँस पड़ता है। आँसू पोंछते हुए—
अरे..इतनी बड़ी-बड़ी बातें...मत करो...तुम..कुछ बनो...या...कुछ मत बनो...मेरे लिए...तुम...आज भी...उतनी ही प्यारी हो...जितनी...उस दिन थीं...जब..मैंने...तुम्हें...पहली बार...गोद में उठाया था।
अब...शेखर आगे आता है।
मुस्कुराते हुए—चल...बहुत हो गया...अब...घर चल...आज...इतने साल बाद...तेरा परिवार...पूरा हुआ है।
उमेश... सब बेटियों की ओर देखता है।
चलें...?
सभी एक साथ—चलो पापा!
सब...हाथों में हाथ डालकर...मंदिर की सीढिय़ाँ उतरने लगते हैं।
उसी समय... मंदिर की घंटियाँ ज़ोर से बजने लगती हैं।
मंच पर... पीछे से सुनहरी रोशनी फैलती है।
कथावाचक (अंतिम संवाद)
रक्त का संबंध...शरीर बनाता है...
लेकिन...प्रेम का संबंध...जीवन बनाता है।
जिसने जन्म दिया...वह पूजनीय है...लेकिन...
जिसने जीवन दिया...
वह भी किसी भगवान से कम नहीं।
(सभी पात्र मंच के मध्य रुकते हैं।)
उमेश अपनी नौ बेटियों के बीच खड़ा है। कोई आगे नहीं। कोई पीछे नहीं। सब बराबर।
अंतिम संवाद (उमेश)
याद रखना...बच्चों...बड़ा आदमी...वह नहीं...जिसके पास...बहुत पैसा हो...बड़ा आदमी...वह है..जिसके दिल में...किसी और के लिए जगह हो।
पर्दा गिरने से पहले...
अपने...मंच पर केवल एक पंक्ति उभरती है—
अपने...
अपने... वे नहीं होते जो हमारे साथ जन्म लेते हैं।
अपने... वे होते हैं जिन्हें हम जीवन भर अपने साथ निभाते हैं।
।। इति श्री ।।