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पापा, आप कहाँ गए?






पापा के जाने के बाद

मैंने बहुत ढूँढ़ा उन्हें…

उनकी कुर्सी में, 

उनके कमरे में, 

पुरानी तस्वीरों में,

उनकी आवाज़ की बची हुई गूँज में

लेकिन कहीं नहीं मिले..


फिर एक दिन खाने की थाली में कुछ कम था…

मैंने बिना शिकायत सब खा लिया।

अचानक हाथ रुक गया… 

और लगा—

ये आदत मेरी नहीं, पापा की है।

तब समझ आया…

कुछ लोग जाते-जाते अपनी आदतें नहीं छोड़ते,

अपना पूरा व्यक्तित्व छोड़ जाते हैं..


उनके लिए अपना कोई

कभी “कम” नहीं था।

रिश्ते बचाने के लिए

वो बहुत कुछ छोड़ सकते थे,

लेकिन रिश्ते नहीं।

आज जब मैं अपनों के लिए

बिना हिसाब किए खड़ा हो जाता हूँ,

तो भीतर से कोई कहता है—

“तू अकेला नहीं है… तेरे साथ मैं हूँ।”


तब लगता है—

ये मेरी सोच नहीं…

पापा अब भी मुझमें सोचते हैं....


उनके लिए

परिवार सिर्फ परिवार नहीं था…

वही उनकी दुनिया था।

और मेरी दुनिया भी

आज वहीं से शुरू होती है।

अपने लोगों की खुशी में खुश होना,

उनकी तकलीफ में बेचैन होना,

बिना कहे उनके लिए

कुछ कर गुजरना…


शायद ये मैंने सीखा नहीं था।

ये तो मुझे विरासत में मिला था।


वो बहुत बड़े कलाकार थे।

कला उनके लिए

सिर्फ हुनर नहीं थी…

वो उसमें उतर जाते थे।

काम करते हुए

दुनिया भूल जाते थे।

मैं आज जब

किसी काम में डूब जाता हूँ,

घंटों का पता नहीं चलता…

तो कभी-कभी

खुद पर मुस्कुरा देता हूँ।


पापा फिर मिल गए...


मेरी कला में,

मेरी लगन में,

उस बेचैनी में

जो अधूरे काम को पूरा किए बिना

मुझे चैन नहीं लेने देती।


आज लोग कहते हैं—

“तुम अच्छे कलाकार हो।”

उन्हें क्या पता—

मैं कहाँ कलाकार हूँ…

मेरे भीतर तो पापा काम करते हैं..


और प्रेम…

पापा जिसे चाहते थे,

उसके लिए पूरा जीवन रख देते थे।

कोई हिसाब नहीं,

कोई शर्त नहीं।

आज मैं भी वैसा ही हूँ।

जिसे अपना मान लूँ,

उसके लिए दिल पूरा खुल जाता है।


कभी-कभी सोचता हूँ—

मैं पापा जैसा इतना क्यों हूँ?


फिर समझ आता है…

क्योंकि मेरी कुछ आदतों में वो हैं।

मेरी चुप्पी में,

मेरे रिश्तों में,

मेरी कला में,

मेरी मेहनत में,

मेरे प्रेम करने के तरीके में…

और शायद

मेरी सबसे अच्छी बातों में

उनका ही अंश है।


इसलिए अब

जब उनकी याद आती है,

तो मन कहता है—

पापा, आप गए कहाँ हैं?

आप तो यहीं हैं…

जब मैं किसी अपने के लिए

बिना सोचे खड़ा होता हूँ।

जब कम में भी

शिकायत नहीं करता।

जब पैसों से पहले

रिश्ते चुनता हूँ।

जब अपने काम में

पूरा उतर जाता हूँ।

जब किसी को दिल से चाहता हूँ

तो आधे मन से नहीं,

पूरा का पूरा चाहता हूँ।


तब लगता है—

आपने जाते-जाते

मुझे अपनी तस्वीर नहीं दी…

मुझे अपना स्वभाव दे गए।

तस्वीरें

दीवार पर टंगी रहती हैं,

लेकिन मैं आपको

अपने भीतर महसूस करता हूँ,

तो बस चुप हो जाता हूँ…


और मन ही मन कहता हूँ—

“आप गए नहीं हैं …

आपने बस अपना जीवन

मेरे जीवन में रख दिया है।”


मेरी हर अच्छी आदत में

आपकी उँगली है।


हर सच्चे रिश्ते में

आपका संस्कार।


हर कला में

आपका हाथ।


हर मोहब्बत में

आपका दिल।


और जब तक

मैं जीता रहूँगा…


आप भी मेरे भीतर

जीते रहेंगे।


शायद पिता की सबसे बड़ी विरासत

उनकी संपत्ति नहीं होती…


उनका बेटा होता है—

जो दुनिया को देखकर

उन्हीं की तरह जीता है।


आप मुझसे बिछड़े नहीं हैं

आप तो मुझमें ही बस गए हैं....

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