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छोटी बुआ

शहर के पुराने से मोहल्ले में एक दो कमरों का छोटा-सा मकान था। मकान बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन उसमें रहने वाले चार लोगों के लिए वही उनकी पूरी दुनिया था। घर में विनोद अपनी पत्नी सीमा, बारह साल के बेटे आरव और अठारह साल की बेटी गुड़िया के साथ रहता था। बाहर से देखने पर घर साधारण था—दो कमरे, एक छोटी-सी रसोई, सामने जाली वाला बरामदा और बरामदे के कोने में तुलसी का गमला। लेकिन उस छोटे से घर में रिश्तों के लिए जगह बहुत थी। विनोद और सीमा एक कमरे में सोते थे और दूसरे कमरे में आरव और गुड़िया। आरव अभी छोटा था। उसकी दुनिया क्रिकेट, स्कूल, वीडियो गेम और अपने दोस्तों तक सीमित थी। लेकिन गुड़िया अठारह की हो चुकी थी। उसकी दुनिया अब थोड़ी बड़ी हो गई थी। उसके अपने दोस्त थे, कॉलेज था, फोन था, अपनी बातें थीं, अपनी पसंद-नापसंद थीं। वह देर रात तक अपनी सहेलियों से बातें करती और अपने कमरे में बैठकर पढ़ते-पढ़ते अचानक हँस पड़ती। उसे अपना छोटा-सा कमरा बहुत प्यारा था। शायद इसलिए जब भी उसकी बुआ घर आती थीं, उसे थोड़ा-सा अच्छा नहीं लगता था। विनोद की एक छोटी बहन थी। सब उसे प्यार से कहते थे— छोटी बुआ ।

वो कमरा, जो बड़ा हो गया

  बचपन में हमें बहुत-सी चीज़ें बड़ी लगती थीं। स्कूल का बस्ता बड़ा लगता था। छुट्टियाँ बहुत लंबी लगती थीं। माँ की डाँट बहुत बड़ी लगती थी। और सबसे बड़ी लगती थी—अपनी जगह। हम दोनों भाई-बहन एक ही कमरे में रहते थे। कमरा बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन बचपन की दुनिया में वही हमारा पूरा संसार था। कमरे में एक खिड़की थी, जिसके पास सुबह की धूप सबसे पहले आती थी। एक पुरानी अलमारी थी, जिसकी एक दराज हमेशा अटकती रहती थी। एक कोने में मेरी किताबें रहती थीं और दूसरे कोने में उसकी गुड़िया, रिबन, रंगीन पेंसिलें और न जाने कितनी छोटी-छोटी चीज़ें।

सही समय पर....

  सही समय पर.... ईश्वर कभी जल्दी नहीं करते, और देर से भी नहीं आते, वे बस… सही समय पर अपना कमाल दिखाते हैं। हम घड़ी की सुइयों से अपनी किस्मत नापते रहते हैं, हर गुजरते दिन के साथ थोड़ा और टूटते रहते हैं। कभी लगता है— शायद हमारी प्रार्थना उन तक पहुंची ही नहीं, शायद हमारी पुकार आसमान ने सुनी ही नहीं। लेकिन हम क्या जानें… जिस दरवाजे को हम बंद समझकर लौट रहे हैं, ईश्वर उसी दरवाजे की चाबी बना रहे होते हैं। हम कहते हैं— “अब बहुत देर हो गई…” और ऊपर से कोई आवाज आती है— “देर नहीं हुई, अभी तुम्हारा समय नहीं आया।” हम चाहते हैं फूल आज ही खिल जाए, बारिश आज ही बरस जाए, मंजिल आज ही मिल जाए, और जिंदगी की हर उलझन आज ही सुलझ जाए। लेकिन ईश्वर जानते हैं— किस फूल को कब खिलना है, किस बादल को कब बरसना है, किस इंसान को कब मिलना है, और किस दर्द को कब खत्म होना है। कभी-कभी वे हमारी इच्छा पूरी नहीं करते, क्योंकि हमारी इच्छा से कहीं बेहतर कुछ हमारे रास्ते में रख रहे होते हैं। कभी किसी इंसान को हमसे दूर कर देते हैं, क्योंकि जानते हैं कि उसकी मौजूदगी हमारी मंजिल से दूर कर देगी। कभी हमें रोक देते हैं, कभी अकेला कर ...

दोस्त या भीड़?

दोस्त या भीड़? शहर के पुराने हिस्से में एक छोटी-सी गली थी। गली बहुत बड़ी नहीं थी, लेकिन उसमें रहने वाले लोगों के रिश्ते बहुत गहरे थे। किसी के घर में खुशी होती तो पूरी गली में मिठाई बंटती और किसी के घर में दुख आता तो दरवाजे पर सबसे पहले वही लोग खड़े मिलते, जिनसे शायद खून का कोई रिश्ता भी नहीं था।

एक ऐसा भी बंधन

  एक ऐसा भी बंधन           गाँव के आखिरी छोर पर एक छोटा-सा घर था। मिट्टी की दीवारें, खपरैल की छत और आँगन के बीचोंबीच लगा एक बूढ़ा नीम का पेड़। गर्मियों में उसकी छाँव पूरे आँगन को ढक लेती और सर्दियों की सुबह उसी के नीचे धूप सेंकते हुए घर के लोग अपने दिन की शुरुआत करते। उस घर में पाँच लोग रहते थे। पिता और उनके चार बच्चे। सबसे बड़ा था राघव। उससे छोटी थीं उसकी तीन बहनें—सुधा, मीरा और गौरी। माँ कई साल पहले ही गुजर चुकी थीं। तब राघव बहुत छोटा था और उसकी सबसे छोटी बहन गौरी तो इतनी छोटी थी कि उसे अपनी माँ का चेहरा भी ठीक से याद नहीं था। माँ के जाने के बाद घर अचानक बहुत बड़ा लगने लगा था। पहले जहाँ शाम होते ही रसोई से माँ की आवाज़ आती थी, वहाँ अब चूल्हा देर तक ठंडा पड़ा रहता। कपड़े कौन धोएगा? खाना कौन बनाएगा? बहनों की चोट पर मरहम कौन लगाएगा? रात को डर लगने पर उन्हें अपने पास कौन सुलाएगा? इन सवालों का जवाब धीरे-धीरे राघव बन गया। उस समय उसकी उम्र मुश्किल से सत्रह-अठारह साल थी। वह खुद भी बच्चा ही था। लेकिन पिता के साथ खेत पर जाते-जाते और घर की जिम्मेदारियाँ उठाते-उ...

दो रोटी और एक ईमान

 दो रोटी और एक ईमान सोनपुर गाँव बहुत बड़ा नहीं था। करीब दो सौ घरों का वह गाँव, चारों तरफ फैले खेत, बीच से गुजरती कच्ची सड़क, गाँव के बाहर पुराना बरगद और उसके नीचे बनी छोटी-सी चाय की दुकान—बस यही उसकी पहचान थी। सुबह होते ही गाँव जाग जाता था। कहीं मुर्गे बाँग देते, कहीं चूल्हों से धुआँ उठने लगता। किसी आँगन में गाय बँधी होती तो कहीं भैंसों को चारा डालते हुए बच्चे दिखाई देते। सूरज निकलने से पहले ही औरतें सिर पर घड़े रखकर कुएँ की ओर चल पड़तीं। सर्दियों की सुबह में खेतों पर सफेद धुंध की चादर बिछी रहती और दूर से देखने पर लगता जैसे धरती ने खुद को किसी पुराने कंबल में लपेट लिया हो। इसी गाँव के आखिरी छोर पर मिट्टी और खपरैल का एक छोटा-सा घर था। घर क्या था—चार दीवारें, एक टूटा दरवाजा, सामने छोटी-सी क्यारी और बगल में नीम का पेड़। वहीं रहता था रघु। रघु उम्र में लगभग चालीस का था। शरीर दुबला, रंग धूप में तपकर साँवला पड़ चुका था और माथे पर हमेशा पसीने की एक पतली परत दिखाई देती थी। उसके पास अपनी जमीन नहीं थी। दूसरों के खेतों में मजदूरी करके ही उसका घर चलता था। घर में उसकी बूढ़ी माँ जमुना, पत्नी सीता...

नदी जो बोलती थी

 नदी जो बोलती थी...  गाँव के किनारे से एक नदी गुजरती थी। बहुत बड़ी नदी नहीं थी वह। बरसात में उसका रूप फैल जाता, तो वह खेतों को छूती हुई दूर तक चमकने लगती और गर्मियों में सिकुड़कर बीच में एक पतली-सी धार बन जाती। लेकिन गाँव के लिए वह सिर्फ नदी नहीं थी। वह माँ थी। गाँव के लोग उसे “नदी माँ” कहते थे।