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वो कमरा, जो बड़ा हो गया

 



बचपन में हमें बहुत-सी चीज़ें बड़ी लगती थीं।

स्कूल का बस्ता बड़ा लगता था। छुट्टियाँ बहुत लंबी लगती थीं। माँ की डाँट बहुत बड़ी लगती थी। और सबसे बड़ी लगती थी—अपनी जगह। हम दोनों भाई-बहन एक ही कमरे में रहते थे। कमरा बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन बचपन की दुनिया में वही हमारा पूरा संसार था। कमरे में एक खिड़की थी, जिसके पास सुबह की धूप सबसे पहले आती थी। एक पुरानी अलमारी थी, जिसकी एक दराज हमेशा अटकती रहती थी। एक कोने में मेरी किताबें रहती थीं और दूसरे कोने में उसकी गुड़िया, रिबन, रंगीन पेंसिलें और न जाने कितनी छोटी-छोटी चीज़ें।

लेकिन असली समस्या कमरे की चीज़ें नहीं थीं।

समस्या थी—किसका हिस्सा कितना है।

एक दिन मैंने कमरे के बीच में चॉक से एक लकीर खींच दी।

"ये मेरी तरफ है।"

वह मुझे घूरकर बोली—

"तो मेरी तरफ कौन-सी है?"

मैंने जमीन पर दूसरी तरफ इशारा किया।

"ये तुम्हारी।"

वह कुछ देर उस लकीर को देखती रही, फिर बोली—

"ठीक है। लेकिन खिड़की मेरी तरफ है।"

मैंने तुरंत कहा—

"खिड़की भी आधी-आधी।"

"नहीं। खिड़की मेरी तरफ है।"

"क्यों?"

"क्योंकि मेरी गुड़िया को धूप चाहिए।"

मैं हँस पड़ा।

"गुड़िया को धूप चाहिए या तुम्हें?"

वह नाराज़ होकर माँ के पास चली गई।

"मम्मी! इसने फिर मेरी चीज़ को हाथ लगाया।"

माँ रसोई से ही चिल्लाईं—

"तुम दोनों चुप रहो! सुबह से क्या लगा रखा है?"

लेकिन हम कहाँ चुप रहने वाले थे। कुछ देर बाद फिर वही आवाज़ें कमरे से आने लगतीं—

"ये मेरा है!"

"नहीं, ये मैंने पहले लिया था!"

"मम्मी! देखो ना!"

"मम्मी, इसने मेरा सामान उठा लिया!"

माँ कभी मुझे डाँटतीं, कभी उसे। और हम दोनों थोड़ी देर के लिए चुप हो जाते। फिर जैसे कुछ हुआ ही न हो, दोबारा साथ बैठ जाते। बचपन की लड़ाइयाँ भी अजीब होती हैं। हम जिनसे सबसे ज्यादा लड़ते हैं, उन्हीं के बिना सबसे ज्यादा अधूरे होते हैं। हम दोनों भी ऐसे ही थे। एक-दूसरे का सामान छूने पर लड़ते थे। एक-दूसरे की जगह पर बैठने पर लड़ते थे। टीवी का रिमोट किसके हाथ में रहेगा, इस पर लड़ते थे। कभी वह मेरी किताब छिपा देती।

कभी मैं उसकी पेंसिल लेकर बैठ जाता। कभी वह मेरी कॉपी पर कुछ बना देती और मैं गुस्से में उसकी ड्राइंग मिटा देता।

और फिर...

माँ के सामने दोनों एक-दूसरे की शिकायत लेकर खड़े हो जाते। लेकिन हमारे बीच एक नियम था, जिसे हमने कभी बनाया नहीं था।

वह नियम था—

बाहर वाले के सामने हम एक थे।

मोहल्ले का कोई बच्चा मुझे चिढ़ा देता तो सबसे पहले वही उसके सामने खड़ी होती।

"मेरे भाई को कुछ मत कहना।"

जिससे पाँच मिनट पहले वह मेरी पेंसिल के लिए लड़ रही होती थी। और अगर किसी ने उसे कुछ कह दिया, तो मैं अपनी सारी शिकायतें भूल जाता।

"मेरी बहन से बात करने की तमीज़ है?"

उस समय हमें समझ नहीं आता था कि ऐसा क्यों होता है। घर के अंदर हम दो थे। बाहर निकलते ही एक। शायद रिश्तों का यही सबसे मासूम रूप होता है। जहाँ प्यार को प्यार कहना नहीं आता, इसलिए वह कभी लड़ाई बन जाता है, कभी शिकायत, कभी गुस्सा।

समय बीतता गया।

हम बड़े होने लगे।

पहले स्कूल की किताबें थीं।

फिर बोर्ड की परीक्षा आई।

फिर कॉलेज।

फिर पढ़ाई के लिए घर से बाहर जाना।

जिस दिन मैं पहली बार घर छोड़कर शहर गया, वह दरवाजे के पास खड़ी थी। उसने बहुत कुछ कहना चाहा, लेकिन कहा कुछ नहीं।

बस इतना बोली—

"समय पर खाना खा लेना।"

मैंने हँसते हुए कहा—

"हाँ, माँ जैसा मत बोलो।"

वह मुस्कुराई।

"मैं माँ नहीं हूँ।"

फिर थोड़ी देर रुककर बोली—

"लेकिन ध्यान रखना पड़ेगा ना।"

उस दिन पहली बार मुझे लगा कि शायद वह सिर्फ मेरी छोटी बहन नहीं रही।

वह बड़ी हो गई थी। और शायद मैं भी।

फिर नौकरी लगी। 

शहर बदल गया।

घर बदल गया।

कमरा वही रहा, लेकिन उसमें रहने वाले बदल गए। अब हमारी मुलाकातें रोज़ नहीं होती थीं। कभी महीनों बाद।

कभी त्योहार पर। कभी किसी जरूरी काम से। फोन पर भी पहले जैसी बातें नहीं होती थीं।

पहले फोन पर बहस होती थी—

"मेरा सामान कहाँ रखा है?"

अब फोन आता—

"खाना खाया?"

पहले सवाल होता—

"मेरी किताब देखी?"

अब पूछा जाता—

"कहाँ पहुँच गई?"

पहले शिकायत होती—

"मेरी चीज़ क्यों ली?"

अब चिंता होती—

"इतनी देर रात तक बाहर क्यों थी?"

समय ने हमारे शब्द बदल दिए थे।

लेकिन शायद...

हमारे भीतर का रिश्ता और गहरा कर दिया था। एक साल बहुत दिनों बाद मैं घर गया। दरवाजा खोला तो घर वही था।

वही पुराना आँगन।

वही दीवार।

वही खिड़की।

वही अलमारी।

और वही कमरा।

मैं कुछ देर दरवाजे पर खड़ा रहा।

फिर कमरे के अंदर गया।

एक अजीब-सी बात महसूस हुई।

कमरा बहुत बड़ा हो गया था।

बहुत बड़ा।

जिस कमरे में बचपन में लगता था कि दोनों के लिए जगह कम पड़ रही है, आज उसमें आराम से पूरा सामान रखा जा सकता था।

मैंने चारों तरफ देखा। फिर मेरी नजर जमीन पर गई।

जहाँ कभी हमने चॉक से एक लकीर खींची थी।

लकीर तो कब की मिट चुकी थी।

लेकिन उसकी याद वहीं थी।

मैं मुस्कुरा दिया।

तभी पीछे से उसकी आवाज़ आई—

"क्या देख रहे हो?"

मैंने पलटकर कहा—

"कुछ नहीं।"

वह कमरे में आई और बोली—

"याद है?"

मैंने पूछा—

"क्या?"

वह जमीन की तरफ देखने लगी।

"यही जगह... जहाँ तुमने लाइन खींची थी।"

मैं हँस पड़ा।

"तुमने भी तो कहा था कि खिड़की तुम्हारी है।"

वह भी हँसने लगी।

"हाँ... क्योंकि मेरी गुड़िया को धूप चाहिए थी।"

कुछ पल हम दोनों हँसते रहे। फिर अचानक दोनों चुप हो गए। शायद दोनों को एक ही बात याद आ गई थी।

वह बचपन।

वह कमरा।

वह लकीर।

वह छोटी-छोटी लड़ाइयाँ। वह माँ के पास शिकायत लेकर जाना।

और फिर...

बिना किसी वजह के दोबारा साथ बैठ जाना।

मैंने कमरे की दीवार को देखा। कितनी चीज़ें बदल गई थीं। हमारे कपड़े बदल गए थे। हमारी आवाज़ बदल गई थी।

हमारे शहर बदल गए थे।

हमारी जिंदगी बदल गई थी।

बस एक चीज़ नहीं बदली थी।

हम दोनों का एक-दूसरे के लिए होना।

वह अब पहले जैसी मेरी चीज़ें नहीं छीनती थी। मैं भी उसकी चीज़ों पर अधिकार नहीं जताता था।

लेकिन अब उसके जीवन की चिंता मुझे अपनी चीज़ों से कहीं ज्यादा थी।

और शायद उसे भी।

उसने अचानक पूछा—

"कल कितने बजे निकलोगे?"

मैंने कहा—

"सुबह।"

वह थोड़ी देर चुप रही।

फिर बोली—

"इतनी जल्दी?"

मैंने मुस्कुराकर कहा—

"काम है।"

उसने सिर हिलाया।

"ठीक है।"

फिर जैसे उसे कुछ याद आया—

"रास्ते में खाना खा लेना।"

मैंने कहा—

"हाँ।"

वह जाने लगी।

फिर वापस मुड़ी।

"और पहुँचकर फोन करना।"

मैंने मज़ाक में कहा—

"इतनी चिंता क्यों करती हो?"

वह कुछ पल मुझे देखती रही।

फिर बोली—

"पता नहीं..."

और चली गई।

मैं वहीं बैठा रहा।

उसके जाते हुए कदमों की आवाज़ सुनता रहा।

और सोचता रहा—

बचपन में हम अपने हिस्से की जगह के लिए लड़ते थे। आज एक-दूसरे के जीवन में अपनी जगह तलाशते भी नहीं। क्योंकि पता है—वो जगह कोई छीन नहीं सकता।

रक्षाबंधन आया।

वह घर आई।

हाथ में राखी थी।

चेहरे पर वही बचपन वाली मुस्कान।

मैंने मज़ाक किया—

"हर साल यही राखी क्यों बाँधती हो?"

वह बोली—

"तुम्हें कोई और मिल गई क्या?"

मैं हँस पड़ा।

"नहीं।"

उसने राखी बाँध दी।

मैं उसे देखता रहा।

अचानक मन में वही पुराना कमरा आ गया।

वही चॉक की लकीर।

वही दो हिस्से।

और अचानक समझ आया—

हमने बचपन में कमरे को बाँटने के लिए लकीर खींची थी। लेकिन जिंदगी ने कभी हमारे रिश्ते के बीच लकीर खींची ही नहीं।

दूरी आई।

शहर आए।

नौकरियाँ आईं।

व्यस्तताएँ आईं।

साल बीते।

त्योहारों के बीच महीनों का अंतर आया।

लेकिन रिश्ता...

वह वहीं रहा। बल्कि शायद और गहरा हो गया। 

मैंने उसकी तरफ देखा।

वह राखी बाँधकर मिठाई का डिब्बा बंद कर रही थी।

मैंने पूछा—

"तुझे याद है बचपन में हम कितना लड़ते थे?"

वह हँसते हुए बोली—

"तुम लड़ते थे। मैं तो बहुत सीधी थी।"

मैंने कहा—

"अच्छा?"

"हाँ।"

"तो मेरी किताब कौन छिपाता था?"

वह चुप।

मैं हँस पड़ा।

वह भी हँसने लगी।

कुछ देर बाद उसने धीरे से कहा—

"अच्छा था वो समय।"

मैंने पूछा—

"क्यों?"

उसने मेरी तरफ देखा।

"क्योंकि तब तुम हमेशा पास थे।"

बस इतनी-सी बात थी।

लेकिन उस एक वाक्य ने जैसे बचपन से आज तक का पूरा सफर मेरे सामने रख दिया। हम सोचते थे कि बड़े होने का मतलब है अपने-अपने रास्ते पर चलना।

हमें कहाँ पता था कि बड़े होने का एक मतलब यह भी है—

एक ही घर में न रहते हुए भी किसी को अपने घर जैसा महसूस करना।

रक्षाबंधन की शाम वह जाने लगी।

दरवाजे तक छोड़ने गया।

उसने कहा—

"अपना ध्यान रखना।"

मैंने कहा—

"तुम भी।"

वह बाहर निकल गई।

मैं दरवाजे पर खड़ा उसे जाते हुए देखता रहा।

कुछ कदम चलकर उसने पीछे मुड़कर देखा।

मैंने हाथ हिलाया। उसने भी हाथ हिलाया। और फिर वह चली गई। मैं वापस कमरे में आया।

वही कमरा।

वही खिड़की।

वही दीवार।

वही अलमारी।

बस अब उसमें दो बच्चों की आवाज़ें नहीं थीं।

मैंने कुछ पल आँखें बंद कीं।

और जैसे कहीं दूर से आवाज़ आई—

"ये मेरी तरफ है।"

मैं मुस्कुरा दिया।

फिर दूसरी आवाज़ आई—

"नहीं, ये मेरी तरफ है।"

मैंने आँखें खोल दीं।

कमरा खाली था।

लेकिन उस खाली कमरे में भी बचपन भरा हुआ था।

तभी समझ आया—

कमरे बड़े नहीं होते।
हम बड़े हो जाते हैं।

और जब हम बड़े होते हैं, तो वही कमरा जिसमें कभी जगह कम लगती थी, अचानक बहुत बड़ा लगने लगता है। क्योंकि उसमें अब हमारी लड़ाइयाँ नहीं होतीं।

वहाँ बस उनकी यादें होती हैं।

पहले हम कहते थे—

"मेरी चीज़ को हाथ क्यों लगाया?"

आज पूछते हैं—

"खाना खाया?"

पहले कहते थे—

"मेरी जगह पर मत बैठो।"

आज कहते हैं—

"घर कब आ रही हो?"

पहले एक-दूसरे से अपना सामान बचाते थे। आज एक-दूसरे को जिंदगी की परेशानियों से बचाना चाहते हैं।

शायद यही भाई-बहन का प्रेम है।

जो बचपन में शोर करता है...

फिर धीरे-धीरे चुप हो जाता है। लेकिन खत्म नहीं होता। वह बस अपना रूप बदलता है। कभी लड़ाई बनता है।

कभी शिकायत।

कभी डाँट।

कभी फोन।

कभी इंतज़ार।

कभी चिंता।

और कभी रक्षाबंधन के दिन कलाई पर बँधी एक छोटी-सी राखी। लेकिन उसके भीतर वही बचपन रहता है।

वही कमरा।

वही लकीर।

वही दो बच्चे।

और एक ऐसा रिश्ता...

जिसे समय जितना दूर ले जाता है,

दिल के उतना ही करीब कर देता है।

क्योंकि भाई-बहन का प्रेम उम्र के साथ कम नहीं होता।

वह बस बचपन की आवाज़ छोड़कर...

खामोश दुआ बन जाता है।

और शायद इसीलिए,

जब बहन दूसरे शहर से फोन करके पूछती है—

"घर पहुँच गए?"

तो भाई समझ जाता है—

बचपन कहीं गया नहीं है।

वह बस...

उस पुराने कमरे की दीवारों में चुपचाप रह गया है। और उस कमरे के बीच खिंची हुई वह छोटी-सी लकीर भी शायद आज मुस्कुरा रही है। क्योंकि जिसे दो हिस्सों में बाँटने के लिए बनाया गया था, वह आखिरकार यह सिखाकर मिट गई—

सामान बाँटा जा सकता है।
कमरा बाँटा जा सकता है।
शहर बाँटे जा सकते हैं।
रास्ते अलग हो सकते हैं।

लेकिन...

भाई और बहन के बीच का प्रेम कभी नहीं बाँटा जा सकता।

वह समय के साथ कम नहीं होता। वह हर दूरी के साथ थोड़ा और गहरा होता है। हर इंतज़ार के साथ थोड़ा और अपना होता है।

और हर रक्षाबंधन पर...

कलाई पर बँधकर फिर से याद दिलाता है—

बचपन बीत गया है,
लेकिन भाई-बहन का साथ नहीं।

वो कमरा आज भी वहीं है। बस अब उसमें दो हिस्से नहीं हैं।

क्योंकि उस कमरे को आखिर समझ आ गया है—

जिस रिश्ते में प्रेम सच्चा हो,
उसे बाँटने के लिए कोई लकीर काफी नहीं होती...

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