नदी जो बोलती थी...
गाँव के किनारे से एक नदी गुजरती थी।
बहुत बड़ी नदी नहीं थी वह। बरसात में उसका रूप फैल जाता, तो वह खेतों को छूती हुई दूर तक चमकने लगती और गर्मियों में सिकुड़कर बीच में एक पतली-सी धार बन जाती। लेकिन गाँव के लिए वह सिर्फ नदी नहीं थी।
वह माँ थी।
गाँव के लोग उसे “नदी माँ” कहते थे।
सुबह जब सूरज खेतों के पीछे से निकलता, तब सबसे पहले उसकी किरणें नदी के पानी पर पड़तीं। पानी में सुनहरी लकीरें बन जातीं। नदी के किनारे खड़े पीपल और बरगद के पेड़ों की परछाइयाँ पानी में उतर आतीं। कुछ औरतें घड़े लेकर नदी की ओर जातीं, बच्चे किनारे बैठकर पैर पानी में डालते, किसान खेतों की ओर जाने से पहले वहीं दो घड़ी सुस्ता लेते।
नदी के किनारे ही गाँव का जीवन पलता था। किसी की शादी होती तो नदी के किनारे दीप जलते। किसी बच्चे का जन्म होता तो उसकी पहली नहाई नदी के पानी से होती। त्योहारों पर नदी के घाट पर रंग-बिरंगे कपड़े दिखाई देते। और जब किसी घर में दुख आता, तब भी लोग नदी के पास आकर चुपचाप बैठ जाते। नदी सबकी थी। लेकिन गाँव में एक आदमी था, जो नदी को सबसे ज्यादा अपना मानता था।
उसका नाम था गोविंद।
जब गोविंद छोटा था, तब उसके पिता खेत में काम करते थे और माँ घर संभालती थी। गोविंद अक्सर घर से भागकर नदी के किनारे चला जाता।
वह घंटों वहाँ बैठा रहता। कभी पानी में कंकड़ फेंकता। कभी मछलियों को देखता। कभी पेड़ की छाँव में लेटकर आसमान देखता। और कभी-कभी नदी से बातें करता। गाँव के बच्चे उसका मज़ाक उड़ाते।
“अरे गोविंद, नदी से कौन बात करता है?”
गोविंद हँस देता।
“मैं करता हूँ।”
“नदी जवाब देती है?”
वह बड़े विश्वास से कहता—
“हाँ।”
“क्या कहती है?”
गोविंद नदी की ओर देखकर मुस्कराता।
“जो तुम लोग सुन नहीं सकते।”
बच्चे हँसते हुए भाग जाते। लेकिन गोविंद सचमुच मानता था कि नदी उससे बातें करती है। जब वह बड़ा हुआ, तो उसकी शादी हुई। उसके बच्चे हुए। फिर बच्चे बड़े हुए। फिर उनके भी बच्चे हुए। समय बीतता गया। लेकिन नदी वहीं रही। गोविंद जब जवान था, तब भी नदी के पास जाता था। जब वह पिता बना, तब भी। और जब उसकी कमर झुकने लगी, तब भी। उसके बेटे रामदास को याद था कि बचपन में पिता अक्सर उसे नदी के किनारे ले जाते थे।
रामदास पूछता—
“बाबा, आप यहाँ रोज क्यों आते हो?”
गोविंद कहते—
“नदी से मिलने।”
“नदी से भी कोई मिलने जाता है?”
“क्यों नहीं?”
फिर वह पानी की ओर देखते और कहते—
“यह हमसे बहुत कुछ कहती है।”
रामदास कुछ समझता नहीं था। वह पानी में पत्थर फेंकता और हँसता रहता। गाँव में तब नदी साफ थी। पानी इतना स्वच्छ कि नीचे पड़े कंकड़ दिखाई देते थे। मछलियाँ किनारे तक आ जातीं। गर्मी में जब खेत सूखने लगते, तब भी नदी की धार गाँव के लिए सहारा बनी रहती। गाँव के कुएँ उसी नदी के पानी से भरे रहते। खेतों में फसल उसी के भरोसे लहलहाती। भैंसें दोपहर में नदी में उतरकर घंटों बैठी रहतीं। बच्चे गर्मियों की छुट्टियों में नदी में नहाते। औरतें कपड़े धोते हुए गीत गातीं। नदी बहती रहती।
चुपचाप। बिना किसी शिकायत के। लेकिन समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। गाँव में धीरे-धीरे बदलाव आने लगा। पुराने कच्चे घरों की जगह पक्के मकान बनने लगे। खेतों के बीच नई सड़क बनी। बाज़ार बढ़ने लगा। नदी के किनारे छोटी-छोटी दुकानों ने जगह बना ली। फिर लोगों ने नदी को नदी की तरह नहीं, सुविधा की तरह देखना शुरू कर दिया। किसी ने कूड़ा किनारे फेंका। किसी ने नाली का पानी नदी में छोड़ दिया। किसी ने प्लास्टिक की थैलियाँ बहा दीं। किसी ने पूजा की सामग्री नदी में डाल दी। शुरुआत में नदी ने कुछ नहीं कहा। वह बहती रही।
लोगों को लगा—नदी तो नदी है, सब सह लेगी।
लेकिन नदी भी थकती है। कुछ वर्षों बाद उसका पानी पहले जैसा साफ नहीं रहा। मछलियाँ कम हो गईं। किनारों की घास सूखने लगी। गर्मियों में पानी और कम होने लगा।
एक दिन रामदास अपने बेटे अमन को नदी दिखाने ले गया।
अमन ने पानी की ओर देखा और पूछा—
“पापा, नदी इतनी गंदी क्यों है?”
रामदास के पास जवाब नहीं था।
उसने बस कहा—
“लोगों ने इसे गंदा कर दिया।”
अमन ने पूछा—
“दादाजी तो इसे माँ कहते हैं ना?”
रामदास ने नदी की ओर देखा।
“हाँ।”
“फिर लोग माँ को गंदा क्यों करते हैं?”
रामदास चुप रहा। उस शाम गोविंद नदी के किनारे बैठे थे। अब उनकी उम्र बहुत हो चुकी थी। चेहरा झुर्रियों से भर गया था। बाल पूरे सफेद। हाथ में वही पुरानी लकड़ी की छड़ी। नदी की धार बहुत पतली हो चुकी थी। गोविंद ने पानी को देखा।
धीरे से बोले—
“बहुत थक गई हो?”
हवा चली।
पानी की छोटी-सी लहर किनारे से टकराई।
गोविंद मुस्कराए।
“मुझे पता है।”
अमन उनके पास बैठ गया।
“दादाजी, आप किससे बात कर रहे थे?”
गोविंद ने उसकी ओर देखा।
“नदी से।”
अमन ने हँसते हुए कहा—
“नदी आपसे बात करती है क्या?”
गोविंद ने उसकी आँखों में देखा।
“करती है।”
“कैसे?”
गोविंद ने नदी की ओर इशारा किया।
“जब मैं छोटा था ना, तब मैं यहाँ आकर बैठता था। घर में कोई बात समझ नहीं आती थी तो नदी को बता देता था।”
“फिर?”
“फिर नदी सुनती थी।”
“और जवाब?”
गोविंद ने मुस्कराकर कहा— “अपनी लहरों से देती थी।”
अमन कुछ देर नदी को देखने लगा।
“आपको सच में उसकी आवाज़ सुनाई देती थी?”
गोविंद ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“बेटा, कुछ आवाज़ें कानों से नहीं, मन से सुनी जाती हैं।”
अमन चुप हो गया। उस दिन से वह भी कभी-कभी दादाजी के साथ नदी के पास जाने लगा। लेकिन नदी अब पहले जैसी नहीं थी। धीरे-धीरे उसकी धार और कम होती गई। एक साल गर्मी बहुत तेज पड़ी। तालाब सूख गए। कुएँ नीचे चले गए। खेतों में दरारें पड़ गईं।
और एक सुबह गाँव वालों ने देखा—
नदी की धार पूरी तरह सूख चुकी थी।
जहाँ कभी पानी बहता था, वहाँ अब फटी हुई मिट्टी थी। किनारे पर प्लास्टिक, कूड़ा, टूटी बोतलें और सड़ी हुई चीज़ें पड़ी थीं। बच्चे नदी के पुराने रास्ते में क्रिकेट खेलने लगे। भैंसें अब वहाँ नहीं जाती थीं। औरतों के गीत बंद हो गए। घाट सूना हो गया। पीपल की छाँव के नीचे बैठने वाले लोग भी अब वहाँ नहीं आते थे। नदी चुप हो गई थी।
बहुत चुप। गोविंद उस सूखी नदी के किनारे खड़े रहे। उन्होंने अपनी छड़ी मिट्टी में गड़ा दी। आँखों से आँसू निकल आए। अमन ने पहली बार अपने दादाजी को रोते हुए देखा।
“दादाजी...”
गोविंद ने कुछ नहीं कहा।
काफी देर बाद बोले—
“यह मरना नहीं है बेटा।”
“तो क्या है?”
“यह हमारी गलती की सजा है।”
अगली सुबह सूरज बहुत तेज था। गाँव के लोग अपने-अपने काम में लगे थे। तभी किसी ने देखा—
नदी के सूखे किनारे पर एक बूढ़ा आदमी झुककर कूड़ा उठा रहा है। वह गोविंद थे। उनके हाथ काँप रहे थे। कमर झुक नहीं रही थी। फिर भी वे एक-एक प्लास्टिक की थैली उठाकर किनारे रख रहे थे। कुछ देर बाद उनके साथ एक छोटा बच्चा भी दिखाई दिया।
अमन।
वह भी कूड़ा उठा रहा था।गाँव के लोग दूर खड़े होकर देखते रहे।
किसी ने कहा—
“बूढ़े आदमी को इस उम्र में क्या सूझी है?”
दूसरे ने कहा—
“नदी तो सूख ही गई है।”
गोविंद ने सुन लिया।
उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
बस बोले—
“नदी सूखी है... मरी नहीं।”
अमन ने दादाजी की ओर देखा। फिर दोनों काम करते रहे। दोपहर हो गई। धूप सिर के ऊपर आ गई। मिट्टी तपने लगी। अमन के पैर जलने लगे।
उसने कहा—
“दादाजी, घर चलें?”
गोविंद ने अपनी पसीने से भीगी पगड़ी उतारी और उसके सिर पर रख दी।
“थक गए?”
“हाँ।”
गोविंद मुस्कराए।
“मैं भी।”
“फिर क्यों कर रहे हो?”
गोविंद ने सूखी नदी की ओर देखा।
“क्योंकि जब मैं छोटा था, इसने मुझे कभी थकने नहीं दिया।”
अमन चुप हो गया। अगले दिन दोनों फिर आए। तीसरे दिन भी। चौथे दिन भी। अब गाँव वाले उन्हें देखने लगे थे।
फिर एक सुबह रामदास भी उनके साथ आ गया। उसने बिना कुछ कहे कूड़ा उठाना शुरू कर दिया। फिर उसकी पत्नी आई। फिर कुछ बच्चे। फिर दो किसान। फिर गाँव के बुजुर्ग। जिस नदी के किनारे कभी पूरा गाँव इकट्ठा होता था, वहाँ वर्षों बाद फिर लोग जमा होने लगे। किसी ने कूड़ा उठाया। किसी ने नालियाँ बंद कीं। किसी ने नदी के किनारे मिट्टी हटाई। किसी ने पेड़ लगाए। किसी ने पुराने कुओं की सफाई शुरू की।
किसी ने कहा—
“अब इसमें कूड़ा नहीं डालेंगे।”
किसी ने कहा—
“नदी के किनारे फिर से पेड़ लगाए जाएँगे।”
काम एक दिन में नहीं हुआ। एक महीने में भी नहीं। पूरा गाँव महीनों लगा रहा। फिर एक दिन आसमान में बादल आए। पहली बारिश हुई। बारिश की बूँदें सूखी मिट्टी पर गिरने लगीं। अमन नदी के किनारे खड़ा था।
उसने देखा—
फटी हुई मिट्टी के बीच कहीं से पानी की एक पतली-सी लकीर निकली। फिर दूसरी। फिर तीसरी।
धीरे-धीरे नदी की पुरानी धार में पानी जमा होने लगा।
अमन चिल्लाया—
“दादाजी!”
गोविंद दौड़ नहीं सकते थे। वे धीरे-धीरे वहाँ पहुँचे। नदी में पानी था। बहुत कम। लेकिन था। गोविंद घुटनों के बल बैठ गए। उन्होंने दोनों हथेलियाँ पानी में डुबो दीं। आँखें बंद कर लीं। कुछ देर बाद उनके चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान लौट आई।
“सुना?”
अमन ने पूछा—
“क्या?”
गोविंद ने कहा—
“बोल रही है।”
अमन ने ध्यान से पानी को देखा।
लहरें किनारे से टकरा रही थीं।
छप... छप... छप...
अमन मुस्कराया।
“क्या कह रही है?”
गोविंद ने उसकी ओर देखा।
“कह रही है—तुम लोगों ने देर कर दी।”
दोनों हँस पड़े। कुछ महीनों बाद नदी फिर बहने लगी। पहले जैसी विशाल नहीं। पहले जैसी निर्मल भी नहीं।
लेकिन अब वह जीवित थी। गाँव ने उसे फिर माँ की तरह मानना सीख लिया था। उसके किनारे फिर बच्चे खेलने लगे। पीपल के नीचे फिर चारपाइयाँ बिछने लगीं। और शाम को फिर नदी की आवाज़ सुनाई देने लगी। लेकिन अब गोविंद बहुत बूढ़े हो चुके थे।
एक दिन अमन अकेला नदी के किनारे आया। गोविंद अब चल नहीं पाते थे। अमन नदी के पास बैठ गया। उसने अपने पैर पानी में डाल दिए। लहरें उसके पैरों से टकराईं।
छप... छप...
अमन ने धीरे से कहा—
“दादाजी कहते थे, तुम उनसे बात करती थीं।”
नदी बहती रही। अमन मुस्कराया।
“मुझे तो तुम्हारी आवाज़ सुनाई नहीं देती।”
हवा चली। पेड़ों के पत्ते हिले। नदी की एक लहर उसके पैर से टकराई। अमन ने आसमान की ओर देखा।
फिर नदी की ओर। और धीरे से बोला—
“लेकिन कोई बात नहीं।”
वह थोड़ा और पास खिसक आया।
“दादाजी कहते थे कि कुछ आवाज़ें कानों से नहीं, मन से सुनाई देती हैं।”
उसने पानी में हाथ डाला।
“तो आज मैं भी तुमसे एक बात कहने आया हूँ।”
नदी बहती रही।
अमन ने मुस्कराकर कहा—
“जब तुम्हें लगे कि तुमसे बात करने वाला कोई नहीं है ना...”
वह कुछ क्षण रुका।
फिर पानी पर हाथ फेरते हुए बोला—
“तो मुझे बुला लेना। मैं हूँ ना।”
नदी की एक छोटी-सी लहर उसके हाथ से टकराई।
छप... छप...
अमन हँस पड़ा।
उसे लगा—
शायद नदी सचमुच बोल रही थी।
और शायद इस बार... उसने उसकी आवाज़ सुन ली थी..........

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