दो रोटी और एक ईमान
सोनपुर गाँव बहुत बड़ा नहीं था। करीब दो सौ घरों का वह गाँव, चारों तरफ फैले खेत, बीच से गुजरती कच्ची सड़क, गाँव के बाहर पुराना बरगद और उसके नीचे बनी छोटी-सी चाय की दुकान—बस यही उसकी पहचान थी।
सुबह होते ही गाँव जाग जाता था। कहीं मुर्गे बाँग देते, कहीं चूल्हों से धुआँ उठने लगता। किसी आँगन में गाय बँधी होती तो कहीं भैंसों को चारा डालते हुए बच्चे दिखाई देते। सूरज निकलने से पहले ही औरतें सिर पर घड़े रखकर कुएँ की ओर चल पड़तीं। सर्दियों की सुबह में खेतों पर सफेद धुंध की चादर बिछी रहती और दूर से देखने पर लगता जैसे धरती ने खुद को किसी पुराने कंबल में लपेट लिया हो। इसी गाँव के आखिरी छोर पर मिट्टी और खपरैल का एक छोटा-सा घर था। घर क्या था—चार दीवारें, एक टूटा दरवाजा, सामने छोटी-सी क्यारी और बगल में नीम का पेड़।
वहीं रहता था रघु।
रघु उम्र में लगभग चालीस का था। शरीर दुबला, रंग धूप में तपकर साँवला पड़ चुका था और माथे पर हमेशा पसीने की एक पतली परत दिखाई देती थी। उसके पास अपनी जमीन नहीं थी। दूसरों के खेतों में मजदूरी करके ही उसका घर चलता था। घर में उसकी बूढ़ी माँ जमुना, पत्नी सीता और दस साल का बेटा गोपाल था। रघु की सबसे बड़ी दौलत थी—उसका ईमान। गाँव में लोग अक्सर उसकी गरीबी का मजाक उड़ाते थे।
“अरे रघुआ! ईमान से पेट भरता है क्या?”
रघु हँसकर कह देता—
“पेट दो रोटी से भरता है काका, लेकिन नींद ईमान से आती है।”
लोग हँस देते।
किसी को उसकी बात समझ नहीं आती।
उस साल बारिश कुछ ज्यादा ही हुई थी। खेतों में धान लहलहा रहा था। चारों ओर हरियाली ऐसी थी कि सोनपुर दूर से किसी हरे समुद्र जैसा दिखाई देता था। सुबह-सुबह जब हवा खेतों के ऊपर से गुजरती तो धान की बालियाँ एक साथ झूमतीं। लगता जैसे हजारों छोटे-छोटे हाथ धरती को प्रणाम कर रहे हों। लेकिन रघु के घर में हरियाली नहीं थी। वहाँ चिंता थी। उसकी माँ कई दिनों से बीमार थी। सीता की आँखों के नीचे काले घेरे पड़ गए थे और गोपाल पिछले तीन दिनों से ठीक से खाना नहीं खा पाया था। घर में आटा बस इतना था कि सुबह दो रोटी बन सकें। सीता ने चूल्हे पर तवा रखा। गोपाल चुपचाप पास बैठा आग को देख रहा था।
“अम्मा…”
“क्या हुआ?”
“आज एक रोटी मुझे बड़ी वाली देना।”
सीता ने बेटे की तरफ देखा।
“क्यों?”
“कल वाली रोटी छोटी थी।”
सीता कुछ बोल नहीं पाई। उसने आटे की छोटी-सी लोई उठाई और उसे बेलने लगी। पीछे चारपाई पर पड़ी जमुना खाँस रही थी।
“बहू…”
“जी अम्मा?”
“मेरे लिए मत बनाना।”
सीता ने पलटकर देखा।
“क्यों?”
“मेरा पेट नहीं है आज।”
रघु बाहर खड़ा सब सुन रहा था। उसने नजरें झुका लीं। उस दिन भी उसे काम मिलने की उम्मीद थी। लेकिन गाँव के बड़े किसान ठाकुर हरिराम के खेत पर मजदूर पहले ही पूरे हो चुके थे। दूसरे खेत में भी काम नहीं मिला। दोपहर तक रघु तीन घरों के चक्कर लगा चुका था।
हर जगह एक ही जवाब—
“आज काम नहीं है।”
आखिर वह गाँव के पुराने बरगद के नीचे जाकर बैठ गया। बरगद की जड़ें जमीन से निकलकर ऐसे फैली थीं जैसे बूढ़े आदमी की नसें। वहीं चाय की दुकान चलाता था नंदू।
नंदू ने उसे देखते ही पूछा—
“क्यों रघु, आज भी खाली?”
रघु मुस्कुराया।
“खाली कहाँ हूँ? पेट साथ है।”
नंदू हँस पड़ा।
“चाय पीएगा?”
रघु ने सिर हिलाया।
“उधार में?”
“हाँ।”
“तो नहीं।”
“अरे एक चाय से क्या बिगड़ जाएगा?”
रघु ने कहा—
“एक चाय का उधार आज रहेगा, कल दूसरी चीज का। फिर आदमी उधार का आदी हो जाता है। गरीब आदमी के लिए उधार रस्सी जैसा है नंदू—पहले सहारा लगता है, बाद में गला पकड़ लेता है।”
नंदू चुप हो गया। दोपहर ढलने लगी। आसमान में बादल जमा होने लगे थे। रघु घर लौटने के लिए उठा ही था कि तभी सड़क पर तेज आवाज सुनाई दी। एक जीप आकर बरगद के पास रुकी। जीप से गाँव का साहूकार लाला बंसीधर उतरा। लाला बंसीधर सोनपुर का सबसे अमीर आदमी था। गाँव के आधे से ज्यादा किसानों के खेत किसी न किसी तरह उसके कर्ज में फँसे हुए थे। उसकी दुकान गाँव के बीचोंबीच थी। दुकान पर अनाज से लेकर तेल, नमक, बीज और कपड़े तक सब मिलता था। लेकिन असली कमाई उसकी बही में लिखे ब्याज से होती थी। उस दिन लाला जल्दी में था।
उसने नंदू से पूछा—
“रघु इधर आया था?”
नंदू ने बरगद की तरफ इशारा किया।
“अभी तो गया।”
लाला ने जेब टटोली। उसके चेहरे का रंग अचानक बदल गया।
“अरे राम!”
नंदू ने पूछा—
“क्या हुआ?”
“कुछ नहीं।”
लाला जीप में बैठा और जल्दी से चला गया। रघु को तब तक कुछ पता नहीं था।वह गाँव की सीमा पार कर रहा था कि उसे रास्ते में कुछ चमकता हुआ दिखाई दिया। वह रुका। झुककर देखा। एक कपड़े की थैली थी। रघु ने थैली उठाई। उसका दिल धक से रह गया। थैली के अंदर नोटों की गड्डियाँ थीं। साथ में कुछ कागज और एक छोटी-सी सोने की डिबिया भी थी। उसने चारों ओर देखा। सड़क खाली थी। दूर खेत में एक किसान हल चला रहा था। रघु ने थैली हाथ में कसकर पकड़ ली। उसके मन में सबसे पहले घर का चूल्हा आया। माँ की दवाई। गोपाल की भूख। सीता की चिंता।
फिर उसे याद आया—
“पेट दो रोटी से भरता है, लेकिन नींद ईमान से आती है।”
रघु कुछ देर वहीं खड़ा रहा। उसके हाथ काँप रहे थे। उसने थैली खोलकर फिर देखी। इतने पैसे उसने जिंदगी में एक साथ नहीं देखे थे। अगर वह चाहे तो—
माँ की दवा आ सकती थी। घर की टूटी छत ठीक हो सकती थी। गोपाल के लिए नए कपड़े आ सकते थे। सीता के लिए चाँदी की पायल तक खरीदी जा सकती थी। लेकिन…
पैसे उसके नहीं थे। रघु ने थैली बाँधी और सीधे लाला बंसीधर की दुकान की ओर चल पड़ा। जब वह दुकान पर पहुँचा तो वहाँ भीड़ लगी थी। लाला का चेहरा उतरा हुआ था। वह बार-बार अपनी बही देख रहा था।
“मेरा पैसा कहाँ गया?”
तभी रघु ने आवाज दी—
“लाला…”
लाला ने सिर उठाया। रघु ने थैली उसके सामने रख दी। कुछ क्षण के लिए दुकान पर बिल्कुल सन्नाटा छा गया।
लाला ने थैली खोली। नोटों की गड्डियाँ देखकर उसकी आँखें फैल गईं।
“तुझे कहाँ मिली?”
“बरगद से आगे वाली सड़क पर।”
लाला ने तुरंत पैसे गिने। एक भी रुपया कम नहीं था।
“तूने खोली थी?”
रघु ने कहा—
“हाँ।”
“सब देखा?”
“हाँ।”
लाला कुछ देर उसे देखता रहा।
फिर बोला—
“रघु, तू चाहता तो…”
रघु मुस्कुरा दिया।
“चाहता तो बहुत कुछ था लाला।”
“फिर लौटाया क्यों?”
रघु ने धीरे से कहा—
“क्योंकि वो मेरा नहीं था।”
लाला के पास कोई जवाब नहीं था। भीड़ में खड़े लोग रघु को देखने लगे। नंदू भी वहाँ आ गया था।
किसी ने कहा—
“अरे रघु, तूने तो कमाल कर दिया।”
दूसरे ने हँसते हुए कहा—
“इतने पैसे देखकर भी मन नहीं डोला?”
रघु ने जवाब दिया—
“मन तो डोला था भाई।”
सब चुप हो गए।
रघु ने कहा—
“बहुत डोला था।”
उसने लाला की आँखों में देखते हुए कहा—
“घर में आटा नहीं है। माँ बीमार है। बेटे ने सुबह बड़ी रोटी माँगी थी। फिर भी सोचा, अगर ये पैसा घर ले गया तो रोटी तो बड़ी हो जाएगी, लेकिन निवाला गले से नहीं उतरेगा।”
भीड़ में खड़े एक बूढ़े किसान ने अपनी आँखें पोंछ लीं। लाला बंसीधर ने जेब से पाँच सौ रुपये निकालकर रघु की ओर बढ़ाए।
“ले, इनाम।”
रघु ने हाथ पीछे कर लिया।
“नहीं।”
“क्यों?”
“मैंने आपका पैसा लौटाया है। अपना ईमान नहीं बेचा।”
लाला का चेहरा गंभीर हो गया।
“कुछ तो ले ले।”
रघु ने कहा—
“अगर देना ही है तो…”
वह कुछ पल रुका।
“मेरी माँ की दवा के पैसे उधार दे देना। काम करके लौटा दूँगा।”
लाला ने पहली बार उसे अलग नजर से देखा। वह कुछ बोल नहीं पाया। रघु घर लौट आया। दरवाजे पर पहुँचते ही गोपाल दौड़कर आया।
“बाबा!”
“क्या हुआ?”
“आज खाना बनेगा?”
रघु ने बेटे के सिर पर हाथ रखा।
“हाँ।”
सीता ने उसकी ओर देखा।
“काम मिला?”
रघु ने कहा—
“नहीं।”
सीता का चेहरा उतर गया।
रघु ने मुस्कुराकर कहा—
“लेकिन आज मन बहुत हल्का है।”
सीता समझ नहीं पाई। उस रात घर में फिर वही दो रोटियाँ बनीं। एक रोटी गोपाल ने खाई। दूसरी रघु ने माँ के सामने रख दी।
जमुना ने रोटी वापस करते हुए कहा—
“तू खा ले बेटा।”
रघु ने कहा—
“माँ, आज भूख नहीं है।”
जमुना मुस्कुरा दी। उसे मालूम था कि उसका बेटा झूठ बोल रहा है।
रात गहरी हो गई। बाहर नीम के पत्ते हवा में सरसराने लगे। दूर कहीं कुत्ता भौंक रहा था। आकाश में बादल छँट चुके थे और तारों की रोशनी मिट्टी के घर की छत पर गिर रही थी। रघु चारपाई पर लेटा था। गोपाल उसकी बाँह पर सिर रखकर सो चुका था। सीता चूल्हे की बुझी राख समेट रही थी। रघु की आँखें बंद थीं। उस दिन उसके पेट में पूरा खाना नहीं गया था। लेकिन उसकी नींद गहरी थी। बहुत गहरी। अगली सुबह जब गाँव में सूरज निकला तो कुछ बदल चुका था। लाला बंसीधर अपनी दुकान पर बैठा था। उसके सामने रघु खड़ा था।
“लाला, माँ की दवा…”
लाला ने उसे दवा की पुड़िया देते हुए कहा—
“पैसे नहीं लगेंगे।”
रघु चौंका।
“लेकिन…”
“इसे उधार मत समझना।”
“तो?”
लाला ने पहली बार मुस्कुराकर कहा—
“इसे उस ईमान की कीमत समझ ले, जिसकी कीमत तूने मुझे समझाई है।”
रघु ने दवा ले ली। उस दिन लाला ने दुकान के बाहर अपनी पुरानी बही खोली। कई किसानों के नाम थे।
रामदीन।
शिवलाल।
हीरालाल।
और न जाने कितने। उनके नामों के सामने ब्याज पर ब्याज लिखा था। लाला देर तक उन पन्नों को देखता रहा।
फिर उसने बही बंद कर दी। उसी शाम उसने गाँव में पंचायत बुलवाई। बरगद के नीचे पूरा गाँव जमा हुआ।
लाला ने कहा—
“आज से जिन लोगों का मूल कर्ज चुका दिया गया है, उनसे ब्याज नहीं लिया जाएगा।”
लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। किसी को विश्वास नहीं हुआ। नंदू ने धीरे से रघु की ओर देखा। रघु चुप था।
लाला ने आगे कहा—
“और जिनके पास मूल कर्ज चुकाने की ताकत नहीं है, उनके लिए नया हिसाब बनेगा। ब्याज पर ब्याज नहीं।”
गाँव में जैसे हवा बदल गई।
किसी ने पूछा—
“लाला, ये अचानक क्या हुआ?”
लाला ने बरगद के नीचे बैठे रघु की तरफ देखा।
“कभी-कभी गरीब आदमी के पास पैसा नहीं होता, लेकिन उसके पास ऐसी चीज होती है जो अमीर के पास भी नहीं होती।”
“क्या?”
लाला ने कहा—
“ईमान।”
उस दिन के बाद रघु की जिंदगी अचानक अमीर नहीं हुई। उसका घर वही रहा। मिट्टी की दीवारें वही रहीं। नीम का पेड़ वही रहा। उसकी मजदूरी भी उतनी ही थी। लेकिन गाँव में उसका सम्मान बदल गया था। अब लोग उसे देखकर हँसते नहीं थे।
कोई अपने बच्चे से कहता—
“देखो, रघु काका जैसा आदमी बनना।”
गोपाल जब स्कूल जाने लगा तो मास्टर जी ने एक दिन उससे पूछा—
“बड़े होकर क्या बनोगे?”
गोपाल ने तुरंत कहा—
“अपने बाबा जैसा।”
मास्टर जी मुस्कुराए।
“क्यों?”
गोपाल ने कहा—
“क्योंकि मेरे बाबा गरीब हैं, लेकिन उनका दिल बहुत अमीर है।”
मास्टर जी कुछ पल चुप रहे। फिर उन्होंने गोपाल के सिर पर हाथ रख दिया। बरसों बाद सोनपुर में बहुत बड़ा बदलाव आया। गाँव में पक्की सड़क बनी। नया स्कूल बना। कुएँ की जगह हैंडपंप लगा। बरगद के नीचे की चाय की दुकान अब छोटी-सी पक्की दुकान बन गई। लेकिन रघु का घर लगभग वैसा ही रहा। उसने अपना घर बड़ा करने की कभी कोशिश नहीं की।
कहता था—
“जिस घर में लोग एक-दूसरे के लिए जगह बना लें, उसे बड़ा करने की जरूरत नहीं।”
एक दिन गाँव में शहर से कुछ अधिकारी आए।
उन्होंने पूछा—
“इस गाँव में सबसे भरोसेमंद आदमी कौन है?”
गाँव वालों ने एक साथ रघु का नाम लिया। रघु उस समय खेत में मिट्टी खोद रहा था। उसे बुलाया गया।
अधिकारी ने कहा—
“आपको गाँव की समिति का अध्यक्ष बनाया जा रहा है।”
रघु घबरा गया।
“मैं?”
“हाँ।”
“लेकिन मैं तो मजदूर हूँ।”
बूढ़े रामदीन ने हँसते हुए कहा—
“इसीलिए तो।”
रघु ने आसमान की तरफ देखा।
उसे वह दिन याद आया जब वह सड़क किनारे एक थैली उठाकर खड़ा था।
वही भूख।
वही मजबूरी।
वही दो रोटियाँ।
और वही सवाल—
पैसा बड़ा है या ईमान?
उसने तब भी जवाब नहीं दिया था। उसने बस अपना रास्ता चुना था। शाम को जब वह घर लौटा तो गोपाल अब जवान हो चुका था।
उसने पिता से पूछा—
“बाबा, आज बहुत खुश लग रहे हो?”
रघु ने कहा—
“हाँ।”
“क्यों?”
रघु ने आँगन में रखी पुरानी चारपाई पर बैठते हुए कहा—
“आज समझ आया कि ईमान कभी भूखा नहीं मरता बेटा।”
गोपाल ने पूछा—
“कैसे?”
रघु मुस्कुराया।
“कभी दो रोटियाँ कम मिलती हैं…”
“और?”
“लेकिन सिर ऊँचा करके सोने की जगह मिल जाती है।”
आँगन में सीता चूल्हा जला रही थी। जमुना अब इस दुनिया में नहीं थी। नीम के पेड़ के नीचे उसकी पुरानी चारपाई खाली पड़ी थी। हवा चली तो नीम के पत्ते धीरे-धीरे हिले। रघु ने आसमान की ओर देखा। उसे लगा जैसे माँ कहीं ऊपर से मुस्कुरा रही हो। उस रात घर में फिर दो रोटियाँ बनीं। गोपाल ने एक रोटी पिता के सामने रख दी।
“बाबा, आज बड़ी वाली आप खाओ।”
रघु ने हँसकर पूछा—
“और तू?”
गोपाल बोला—
“आज मुझे भूख नहीं है।”
रघु उसकी आँखों में देखता रहा।
फिर दोनों हँस पड़े।
सीता चूल्हे के पास बैठी मुस्कुरा रही थी। बाहर गाँव में रात उतर चुकी थी। खेतों के ऊपर चाँदनी फैल रही थी।
दूर मंदिर की घंटी सुनाई दे रही थी। बरगद के पत्ते हवा में सरसराते थे।और सोनपुर की उस छोटी-सी मिट्टी की बस्ती में एक गरीब आदमी अपने छोटे-से घर में चैन की नींद सो रहा था।
उसके पास न बड़ा खेत था, न पक्का मकान, न बैंक में पैसा।
उसके पास बस दो रोटियाँ और एक ईमान था।
और कभी-कभी…
इंसान को जिंदगी में इससे ज्यादा की जरूरत भी नहीं होती......

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