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एक ऐसा भी बंधन

 एक ऐसा भी बंधन



        गाँव के आखिरी छोर पर एक छोटा-सा घर था। मिट्टी की दीवारें, खपरैल की छत और आँगन के बीचोंबीच लगा एक बूढ़ा नीम का पेड़। गर्मियों में उसकी छाँव पूरे आँगन को ढक लेती और सर्दियों की सुबह उसी के नीचे धूप सेंकते हुए घर के लोग अपने दिन की शुरुआत करते। उस घर में पाँच लोग रहते थे। पिता और उनके चार बच्चे।

सबसे बड़ा था राघव। उससे छोटी थीं उसकी तीन बहनें—सुधा, मीरा और गौरी।

माँ कई साल पहले ही गुजर चुकी थीं। तब राघव बहुत छोटा था और उसकी सबसे छोटी बहन गौरी तो इतनी छोटी थी कि उसे अपनी माँ का चेहरा भी ठीक से याद नहीं था। माँ के जाने के बाद घर अचानक बहुत बड़ा लगने लगा था। पहले जहाँ शाम होते ही रसोई से माँ की आवाज़ आती थी, वहाँ अब चूल्हा देर तक ठंडा पड़ा रहता। कपड़े कौन धोएगा? खाना कौन बनाएगा? बहनों की चोट पर मरहम कौन लगाएगा? रात को डर लगने पर उन्हें अपने पास कौन सुलाएगा? इन सवालों का जवाब धीरे-धीरे राघव बन गया। उस समय उसकी उम्र मुश्किल से सत्रह-अठारह साल थी। वह खुद भी बच्चा ही था। लेकिन पिता के साथ खेत पर जाते-जाते और घर की जिम्मेदारियाँ उठाते-उठाते उसके कंधे समय से पहले बड़े हो गए। एक दिन पिता खेत से लौटे तो बहुत थके हुए थे। कई दिनों से उनकी तबीयत ठीक नहीं थी। उस दिन आँगन में आते ही उनका पैर लड़खड़ाया। राघव दौड़कर उन्हें संभालने आया।

“बाबा!”

पिता ने उसकी ओर देखा। उनकी साँस तेज चल रही थी। उन्होंने चारपाई पर बैठते हुए राघव का हाथ पकड़ लिया।

“बेटा...”

“हाँ बाबा।”

पिता ने सामने खेलती हुई तीनों बच्चियों को देखा। फिर राघव की ओर।

“तू बड़ा है।”

राघव चुप रहा।पिता ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

“मैं शायद अब ज्यादा दिन...”

“ऐसा मत कहो बाबा।”

राघव की आँखें भर आईं। पिता ने उसकी बात काट दी।

“मेरी बात सुन।”

राघव चुप हो गया।

“इनका ध्यान रखना।”

उन्होंने एक-एक करके तीनों बेटियों की ओर देखा।

“इनको कभी माँ-बाप की कमी महसूस मत होने देना।”

राघव की आँखों से आँसू गिर पड़े।

“आप ठीक हो जाओगे बाबा।”

पिता हल्के से मुस्कराए।

“मुझे भरोसा है... तू इन्हें संभाल लेगा।”

फिर उन्होंने उसका हाथ अपने सीने से लगा लिया।

“अब ये तेरे भरोसे हैं।”

कुछ दिनों बाद पिता भी चले गए।

उस दिन घर में पहली बार राघव को समझ आया कि किसी घर की दीवारें कितनी कमजोर होती हैं। चार बच्चे थे।

एक छोटा-सा घर था। और कोई सहारा नहीं था। सबसे छोटी गौरी रोते-रोते पूछ रही थी—

“भैया... बाबा कब आएँगे?”

राघव ने उसे सीने से लगा लिया। उसके पास कोई जवाब नहीं था।

उसने बस इतना कहा—

“अब मैं हूँ ना।”

शायद उसी दिन उसने अपने बचपन को वहीं कहीं छोड़ दिया था। अगले दिन से उसकी जिंदगी बदल गई।

सुबह खेत। दोपहर मजदूरी। शाम बाजार में काम। रात घर लौटकर खाना बनाना। सुधा की चोटी बनाना।

मीरा की किताबें ढूँढना। गौरी को सुलाना। तीनों बहनों के लिए वह धीरे-धीरे भाई कम और माँ-बाप ज्यादा बन गया। कभी सुधा को नई चप्पल चाहिए होती, तो वह अपनी चप्पल टाल देता। कभी मीरा की स्कूल की फीस भरनी होती, तो वह दो दिन अतिरिक्त मजदूरी करता। गौरी बीमार पड़ती तो पूरी रात उसके सिरहाने बैठा रहता। सुबह उसकी आँखें लाल होतीं, लेकिन वह फिर खेत चला जाता।

गाँव के लोग कहते—

“राघव, अपने लिए भी कुछ सोच लिया कर।”

वह हँस देता।

“मैं अपने लिए ही तो सोच रहा हूँ।”

“क्या मतलब?”

वह तीनों बहनों की ओर देखकर कहता—

“ये मेरी दुनिया हैं।”

समय धीरे-धीरे गुजरता गया। तीनों बहनें बड़ी होने लगीं। राघव की कमर पर मेहनत का बोझ बढ़ता गया। चेहरे पर उम्र से पहले थकान आने लगी। लेकिन बहनों के चेहरे पर वह कभी थकान नहीं आने देता था। सुधा पढ़ना चाहती थी। उसने उसे पढ़ाया। मीरा को सिलाई सीखनी थी। उसके लिए मशीन खरीदी। गौरी को तो वह अपने साथ खेत तक ले जाता।

कहता—

“तू बस पढ़। बाकी मैं देख लूँगा।”

एक दिन सुधा के लिए रिश्ता आया। लड़का शहर में नौकरी करता था। घर अच्छा था। राघव ने हामी भर दी। लेकिन शादी के खर्च की चिंता उसके भीतर कहीं बैठ गई। जमीन कम थी। घर की हालत साधारण थी। फिर भी उसने बहन की शादी में कोई कमी नहीं रहने दी। जो पैसे थे, लगा दिए। जो कम पड़े, साहूकार से कर्ज ले लिया।

बारात आई। ढोल बजे। घर रोशनी से भर गया। सुधा की विदाई हुई।

राघव दरवाजे पर खड़ा उसे जाते देखता रहा।

सुधा ने रोते हुए पूछा—

“भैया, मैं चली जाऊँगी तो आप अकेले हो जाओगे।”

राघव ने हँसने की कोशिश की।

“पगली, तू अपने घर जा रही है।”

“आपका घर?”

“जहाँ तू खुश है, वही मेरा घर है।”

कुछ साल बाद मीरा की भी शादी हो गई। उसकी शादी के लिए राघव को और कर्ज लेना पड़ा।

इस बार गौरी ने कहा—

“भैया, इतना कर्ज मत लो।”

राघव ने मुस्कराकर कहा—

“बहन की शादी में भाई हिसाब थोड़ी लगाता है।”

मीरा भी विदा हो गई। अब घर में राघव और गौरी रह गए। दो कमरों का वही पुराना घर। वही नीम। वही चूल्हा।

लेकिन अब घर में पहले जैसी आवाजें नहीं थीं। राघव शाम को कभी-कभी आँगन में बैठकर उन दिनों को याद करता जब तीनों बहनें उसके चारों ओर घूमती रहती थीं।

अब वे अपने-अपने घरों में थीं। शुरुआत में दोनों बहनें आती रहीं। फिर साल में दो बार।

फिर त्योहारों पर।

फिर...

केवल राखी।

डाकिया राखी लेकर आता।

“राघव, तेरी बहनों की राखी।”

राघव उसे दोनों हाथों से लेता। माथे से लगाता। और अपनी कलाई पर बाँध लेता। गौरी कभी-कभी चुपचाप उसे देखती रहती।

एक दिन उसने पूछा—

“भैया, दीदी इस बार भी नहीं आईं?”

राघव ने मुस्कराकर कहा—

“अपने घर में काम होगा।”

“लेकिन राखी तो भेज दी।”

राघव ने अपनी कलाई देखी।

“बस... यही बहुत है।”

गौरी को यह बात अच्छी नहीं लगी। उसे लगता था कि भाई ने जिनके लिए अपना जीवन लगा दिया, वे अब भाई से मिलने तक नहीं आतीं। लेकिन राघव कभी शिकायत नहीं करता।

किसी से नहीं। न बहनों से। न गाँव वालों से। न खुद से।

धीरे-धीरे दोनों बहनों की जिंदगी बदल गई। उनके घर बड़े थे। उनके बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ते थे। त्योहारों पर वे बड़े शहरों में घूमने जातीं। राघव अब भी उसी मिट्टी के घर में रहता था।

कभी-कभी किसी रिश्तेदार ने मजाक में कहा—

“राघव, तूने तो अपनी सारी जिंदगी बहनों के नाम कर दी।”

वह हँस देता।

“हाँ।”

“अपनी शादी क्यों नहीं की?”

राघव कुछ पल चुप रहता।

फिर कहता—

“जरूरत नहीं लगी।”

लेकिन सच यह था कि उसे डर लगता था।

अगर उसकी पत्नी उसकी बहनों को स्वीकार न कर पाई तो?

अगर उसे कभी यह कहना पड़ा कि “ये मेरी बहनें हैं, लेकिन...”?

वह यह सुनने की कल्पना भी नहीं कर सकता था। इसलिए उसने शादी नहीं की।

गौरी कई बार कहती—

“भैया, आप अपना घर बसा लो।”

राघव हँसता।

“मेरा घर तो पहले से बसा हुआ है।”

“कहाँ?”

वह उसकी ओर देखकर कहता—

“यहीं।”

और गौरी समझ जाती कि भैया फिर बात टाल गए। समय बीतता गया।  कर्ज अभी भी बाकी था।

एक दिन उसने कहा—

“गौरी, मुझे शहर जाना पड़ेगा।”

“क्यों?”

“कुछ काम मिला है। दो-चार महीने कर लूँगा तो पुराना कर्ज उतर जाएगा।”

गौरी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“आपकी उम्र अब काम करने की नहीं है।”

राघव हँसा।

“कर्ज की उम्र नहीं होती बहन।”

वह शहर चला गया। एक महीना बीता। फिर दूसरा। फिर तीसरा।

राघव वापस नहीं आया।

फोन पर कहता—

“काम थोड़ा ज्यादा है।”

गौरी पूछती—

“घर कब आओगे?”

“जल्दी।”

लेकिन उसकी आवाज़ पहले जैसी नहीं रही थी। थकी हुई। टूटी हुई।

एक दिन सुधा और मीरा अचानक गाँव आईं। कई महीनों बाद।

गौरी ने दरवाजा खोला। दोनों बहनों को देखकर वह खुश हुई।

“दीदी!”

वे अंदर आईं।

लेकिन कुछ ही देर में सुधा ने पूछा—

“भैया कहाँ हैं?”

गौरी ने कहा—

“शहर गए हैं।”

“कब से?”

“तीन महीने।”

मीरा ने आश्चर्य से पूछा—

“तीन महीने? इतने दिन?”

गौरी ने कोई जवाब नहीं दिया।

शाम को तीनों बैठीं।

पुराने घर की दीवारें जैसे वर्षों की बातें सुन रही थीं।

कुछ देर बाद मीरा ने कहा—

“भैया का कमरा देख लें?”

वे कमरे में गईं। वहाँ एक पुरानी लोहे की अलमारी थी। उस पर धूल जमी थी। सुधा ने कपड़ा उठाया और धूल साफ की। अलमारी खोली। अंदर पुराने कपड़े थे।

कुछ तस्वीरें।

कुछ कागज।

कुछ पुराने पत्र।

मीरा ने एक तस्वीर उठाई। उसमें चार बच्चे थे। बीच में राघव। तीनों बहनें उसके आसपास। सबसे छोटी गौरी उसकी उँगली पकड़े थी। 

सुधा तस्वीर देखते हुए मुस्कराई।

“भैया कितने अलग दिखते थे।”

मीरा ने कहा—

“हमारे लिए हमेशा ऐसे ही रहे।”

तभी एक पुराना लिफाफा नीचे गिरा। सुधा ने उठाया। उस पर राघव का नाम था। मीरा ने लिफाफा पलटा।

पीछे पिता की लिखावट थी।

लेकिन वह पत्र अधूरा था—सिर्फ कुछ पुराने घरेलू हिसाब और खेत से जुड़ी बातें लिखी थीं।  सुधा ने वह पत्र वापस रख दिया। तभी अलमारी के सबसे नीचे एक पुरानी डायरी मिली। उसमें राघव ने वर्षों का हिसाब लिखा था।

मजदूरी।

कर्ज।

ब्याज।

घर का खर्च।

बहनों के खर्च।

और कई जगह एक ही बात लिखी थी—

“अपने लिए नहीं।”

एक पन्ने पर लिखा था—

“सुधा की शादी का कर्ज—बाकी।”

दूसरे पर—

“मीरा की शादी का कर्ज—बाकी।”

और सबसे नीचे—

“जब तक दोनों बहनों का कर्ज पूरा न हो जाए, घर वापस नहीं बैठूँगा।”

मीरा फूट-फूटकर रो पड़ी।

“हमने कभी पूछा तक नहीं...”

सुधा ने सिर झुका लिया।

“हम तो सोचते रहे भैया गाँव में आराम से हैं।”

गौरी ने धीरे से कहा—

“वे आराम से नहीं थे।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। तभी अलमारी के सबसे नीचे एक पुराना पीला लिफाफा मिला।

उस पर काँपते हुए अक्षरों में लिखा था—

“राघव के लिए।”

तीनों बहनों की साँस जैसे थम गई। गौरी ने लिफाफा उठाया। अंदर उनकी माँ की लिखावट थी।

वही माँ, जिसकी तस्वीर घर के मंदिर में आज भी लगी थी।

पत्र पढ़ते-पढ़ते गौरी के हाथ काँपने लगे।

उसने पढ़ना शुरू किया—

“मेरे राघव,

जब तू यह पत्र पढ़ेगा, तब शायद मैं इस दुनिया में नहीं रहूँगी।

मुझे नहीं पता कि मेरे जाने के बाद तू कितना बड़ा हो जाएगा और घर की जिम्मेदारियाँ तुझ पर कितनी आ जाएँगी। लेकिन मुझे इतना पता है कि तू अपने पिता से भी ज्यादा मजबूत है।

राघव, अब इन तीनों बहनों का ध्यान तुझे ही रखना है।

मैं जानती हूँ कि गौरी तेरी सगी बहन है।

सुधा और मीरा हमें मेले में मिली थीं। वे दोनों बहुत छोटी थीं और बहुत रो रही थीं। मैंने और तेरे पिता ने उनके माता-पिता को बहुत ढूँढा, लेकिन वे नहीं मिले।

खैर, अब से वे भी तुम्हारी सगी बहनें ही हैं।

कभी उनके साथ कोई भेद मत करना।

चाहे कैसी भी परिस्थिति आए, उनका साथ मत छोड़ना।

लोग कुछ भी कहें, लेकिन तू हमेशा उन्हें अपनी बहन समझना।

राघव, तू बड़ा है। तेरे कंधों पर इस घर की जिम्मेदारी होगी। हो सकता है तुझे अपने हिस्से की खुशियाँ छोड़नी पड़ें, हो सकता है तुझे बहुत मुश्किलें सहनी पड़ें, लेकिन मेरी एक बात याद रखना—

इन तीनों का हाथ कभी मत छोड़ना।

क्योंकि इनके लिए तू ही भाई नहीं, माँ-बाप भी होगा।

और बेटा, अगर कभी तुझे लगे कि तू अकेला है, तो यह याद करना कि तेरी माँ का आशीर्वाद हमेशा तेरे साथ है।

मुझे भरोसा है, तू मेरी बेटियों को कभी पराया नहीं होने देगा।

—तेरी माँ।”

पत्र हाथ से छूट गया। सुधा जमीन पर बैठ गई। मीरा की आँखों से आँसू रुक नहीं रहे थे। गौरी भी रो रही थी।

लेकिन उसके आँसू किसी और दर्द के थे। उसे आज समझ आया कि राघव ने कभी किसी से शिकायत क्यों नहीं की। उसने कभी यह क्यों नहीं कहा कि “मैंने तुम्हारे लिए इतना किया।”

क्योंकि उसके लिए सवाल ही नहीं था।

बहन सगी थी या नहीं—

यह बात उसके लिए कभी मायने ही नहीं रखती थी।

सुधा ने काँपती आवाज़ में कहा—

“हम... उनकी बहनें नहीं थीं?”

गौरी ने आँसू पोंछते हुए कहा—

“उनके लिए थीं।”

मीरा ने अपना चेहरा दोनों हाथों में छिपा लिया।

“और हम कैसी बहनें निकलीं...”

उस रात तीनों बहनों ने सोया नहीं। सुबह होते ही वे शहर के लिए निकल पड़ीं। राघव जहाँ काम करता था, वहाँ पहुँचने पर उन्हें एक छोटी-सी किराए की कोठरी मिली।

एक चारपाई।

एक पुराना संदूक।

एक स्टील का गिलास।

और दीवार पर टँगी तीनों बहनों की पुरानी तस्वीर। राघव शाम को लौटा। दरवाजे पर तीनों को देखकर ठिठक गया।

“तुम लोग?”

सुधा दौड़कर उसके पास गई।

और उसके पैरों में बैठ गई।

“भैया... हमें माफ कर दो।”

राघव घबरा गया।

“अरे! क्या हुआ?”

मीरा भी रोते हुए उसके सामने बैठ गई।

“हमने आपको भाई होने का हक नहीं दिया।”

राघव ने दोनों को उठाया।

“पागल हो गई हो क्या?”

सुधा रोते हुए बोली—

“आपने हमारे लिए कर्ज लिया... अपनी शादी नहीं की... अपनी पूरी जिंदगी लगा दी... और हम साल में एक बार भी मिलने नहीं आए।”

राघव कुछ पल चुप रहा।

फिर धीरे से बोला—

“तुम खुश थीं ना?”

सुधा ने सिर झुका लिया।

“हाँ।”

“तो फिर मैं भी खुश था।”

मीरा ने रोते हुए पूछा—

“लेकिन क्यों भैया?”

राघव ने उनकी ओर देखा।

“क्योंकि तुम मेरी बहनें हो।”

बस।

इतना ही। न कोई सवाल। न कोई हिसाब। न कोई शिकायत।

तीनों बहनें वहीं रोती रहीं।

कुछ दिनों बाद उन्होंने राघव का पूरा कर्ज चुकाने का फैसला किया।

राघव ने मना किया।

“जरूरत नहीं।”

सुधा ने पहली बार उसके सामने दृढ़ होकर कहा—

“यह कर्ज आपका नहीं है भैया।”

मीरा ने कहा—

“यह हमारी जिंदगी का कर्ज है।”

गौरी ने मुस्कराकर कहा—

“और अब हम चारों मिलकर चुकाएँगे।”

राघव उन्हें देखता रहा। उसकी आँखें भर आईं।

बहुत साल बाद शायद उसे पहली बार लगा कि वह अकेला नहीं है। कुछ महीने बाद वही पुराना घर फिर से हँसी से भर गया।

नीम के नीचे चारों बैठे थे। सुधा खाना बना रही थी। मीरा कपड़े तह कर रही थी। गौरी चाय बना रही थी।

और राघव चारपाई पर बैठा तीनों को देख रहा था।

सुधा ने उसकी कलाई पर राखी बाँधी।

मीरा ने भी।

गौरी ने भी।

तीनों राखियाँ एक साथ चमक रही थीं। राघव ने उन्हें देखा।

फिर धीरे से बोला—

“एक बात बताऊँ?”

तीनों ने उसकी ओर देखा।

“राखी हमेशा मुझे याद दिलाती थी कि मेरी तीन बहनें हैं।”

सुधा की आँखें भर आईं।

राघव ने आगे कहा—

“लेकिन आज पहली बार लगा... कि मेरे तीनों हाथ हैं।”

तीनों बहनें उसके गले लग गईं। उस दिन किसी ने यह नहीं सोचा कि कौन सगा था और कौन नहीं।

क्योंकि उस घर में अब यह सवाल अर्थहीन था।

क्योंकि खून का रिश्ता जन्म से मिलता है।

लेकिन भाई का रिश्ता...

कभी-कभी कोई इंसान अपनी पूरी जिंदगी देकर बनाता है।

और कुछ बंधन ऐसे होते हैं, जिन्हें दुनिया चाहे जितना नाम दे,

वे फिर भी एक ही बात कहते हैं—

“तुम मेरे हो।”

शायद ऐसे ही किसी बंधन को कहते हैं—

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