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🌟 Anant Sant 🌟

Anant Sant - YouTube Playlists

अनंत साहित्य

माँ के हाथ के खाने का स्वाद

 
मिट्टी के चूल्हे से गैस तक... और स्वाद से यादों तक का सफऱ.....



अध्याय - 1
धुएँ वाली सुबह
सुबह के पाँच बजे थे। पूरा गाँव अभी नींद में था। आँगन की मिट्टी पर रात की ओस मोतियों की तरह चमक रही थी। दूर मंदिर से आरती की हल्की आवाज़ हवा के साथ गाँव में फैल रही थी। पेड़ों पर बैठी चिडि़य़ाँ धीरे-धीरे जाग रही थीं। लेकिन... एक घर ऐसा था जहाँ दिन बहुत पहले शुरू हो चुका था। रसोई में... मिट्टी का चूल्हा जल चुका था। सूखी लकडिय़ाँ धीरे-धीरे सुलग रही थीं। धुएँ की पतली लकीर छप्पर की दरारों से बाहर निकल रही थी। उस धुएँ में लकड़ी की खुशबू थी... और उस खुशबू में... घर होने का एहसास।
रसोई के बीचों-बीच बैठी थी—
माँ।
सिर पर आँचल। चेहरे पर सादगी। आँखों में अपनापन। वह चूल्हे में फूँक मारती... आग तेज़ हो जाती। तवा गरम होता। पहली रोटी फूलती। और पूरा घर... उसकी खुशबू से भर जाता।
उसी समय...छोटा बेटा मोहन उनींदी आँखों से रसोई में आ गया।
- माँ...
- हूँ बेटा?
- भूख लगी है।
माँ मुस्कुरा दी।
- अभी पहली रोटी उतर रही है।
मोहन चूल्हे के पास बैठ गया।उसे आग की गर्मी बहुत अच्छी लगती थी।
वह अक्सर कहता—
- माँ... तुम्हारी रसोई सबसे अच्छी है।
माँ हँसकर पूछती—
- क्यों?
- क्योंकि... यहाँ रोटी से पहले खुशबू मिलती है।
माँ हँस पड़ती।
कुछ देर बाद... पिताजी खेत जाने के लिए तैयार हो गए। दादी पूजा करके आईं। बहन पानी भरकर लौटी। और देखते ही देखते... पूरा परिवार एक साथ बैठकर खाना खाने लगा। न कोई मोबाइल। न कोई जल्दी। न कोई अलग कमरा। एक ही थाली में अचार घूमता। एक ही कटोरी से दाल बढ़ाई जाती। और हर रोटी के साथ...
माँ पूछती— एक और दूँ?
किसी ने कभी नहीं नहीं कहा। नाश्ते के बाद... माँ रसोई समेट रही थी। मोहन ने देखा— माँ सबसे आखिर में खा रही है।
उसने पूछा—माँ... तुम हमेशा सबसे बाद में क्यों खाती हो?
माँ ने मुस्कुराकर कहा—क्योंकि... मुझे तुम सबको खाते हुए देखकर ही पेट भर जाता है।
मोहन ने बात तो सुन ली... लेकिन उस उम्र में उसका अर्थ नहीं समझ पाया।
दिन बीतते गए। मोहन बड़ा होता गया। गाँव में बिजली आई। रेडियो आया। फिर एक दिन... घर में पहली बार एक गैस चूल्हा आया। पूरा परिवार उसे देखने के लिए रसोई में इकट्ठा हो गया। पड़ोस की काकी बोलीं—
- अरी वाह! अब धुआँ नहीं होगा।
दादी ने मुस्कुराकर चूल्हे की ओर देखा। धीरे से उसके पास बैठीं। उस पर हाथ फेरा।
और बोलीं—धुआँ तो नहीं होगा... लेकिन इस चूल्हे की याद बहुत आएगी।
माँ कुछ नहीं बोली। उसने मिट्टी के चूल्हे को आखिरी बार साफ़ किया। उसकी राख समेटी। और उसे रसोई के एक कोने में रख दिया। जैसे... घर के किसी बुज़ुर्ग को सम्मान से बैठाया जाता है।
उस रात... मोहन ने पहली बार गैस पर बनी रोटी खाई। रोटी नरम थी। जल्दी बन गई थी। सब खुश थे। लेकिन...
सोते समय उसने माँ से एक सवाल पूछा—माँ...
- हाँ बेटा?
- रोटी तो आज भी अच्छी थी...
फिर भी...आज रसोई पहले जैसी क्यों नहीं लगी?
माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरा। मुस्कुराई।
और धीरे से बोली—बेटा... रसोई चूल्हे से नहीं... घरवालों की हँसी से महकती है।
मोहन ने आँखें बंद कर लीं। 
बाहर आँगन में रखा पुराना मिट्टी का चूल्हा... चाँदनी में चुपचाप पड़ा था। जैसे...
उसे भी अपने घर की आवाज़ें सुनाई दे रही हों।

अध्याय - 2
सिलबट्टे की आवाज़
सुबह की पहली किरण अभी आँगन तक पहुँची ही थी। रसोई में माँ पहले से काम में लगी हुई थी। मिट्टी का चूल्हा अब कम जलता था। गैस चूल्हा आ चुका था। लेकिन... रसोई के एक कोने में रखा सिलबट्टा आज भी रोज़ अपनी बारी का इंतज़ार करता था। माँ ने टोकरी से हरी मिर्च, धनिया, लहसुन और अदरक निकाला। थोड़ा-सा नमक डाला।फिर सिल पर पानी की कुछ बूँदें छिडक़ीं।
और...
घर्र... घर्र... घर्र...
सिलबट्टे की आवाज़ पूरे घर में फैल गई। यह आवाज़ मोहन के लिए किसी अलार्म से कम नहीं थी। वह मुस्कुराते हुए रसोई में आया।
- माँ...आज फिर चटनी बन रही है?
माँ हँसी।
- हाँ... और तुम्हारे लिए थोड़ी ज़्यादा तीखी।
मोहन ने शरारत से कहा—दादी कहती हैं... तुम्हारी चटनी में कोई जादू है।
दादी बाहर से बोलीं—जादू नहीं रे... प्यार है।
पूरा घर हँस पड़ा।
कुछ महीनों बाद... मोहन की पढ़ाई के लिए उसे शहर भेजने की बात होने लगी।
पिताजी बोले—अब गाँव का स्कूल छोटा पड़ जाएगा।
माँ चुपचाप सब सुनती रही। उसने कुछ नहीं कहा। लेकिन उस दिन... उसने मोहन की पसंद की हर चीज़ बनाई। बाजरे की रोटी। लहसुन की चटनी। गुड़। घर का ताज़ा मक्खन। मोहन ने खूब खाया। उसे लगा... आज माँ बिना वजह इतना अच्छा खाना क्यों बना रही है?
समय बीता। मोहन शहर चला गया। पहली बार घर से दूर। पहली बार हॉस्टल।
पहली बार...
माँ की रसोई से दूर। हॉस्टल की मेस में खाना मिलता था। सब्ज़ी भी थी। दाल भी थी। रोटी भी थी। सब कुछ था... पर... कुछ कमी थी। एक रात उसने पहला पत्र घर भेजा। उसमें पढ़ाई का ज़िक्र कम था।
और एक पंक्ति ज़्यादा थी—
- माँ...यहाँ खाना पेट भर देते है...लेकिन मन नहीं भरता।
पत्र पढ़ते-पढ़ते माँ की आँखें भीग गईं। उसने पत्र को तह किया। रसोई में गई। सिलबट्टे के पास बैठी। धीरे से उस पर हाथ फेरा।
और बोली—लगता है... मेरे बेटे को आज मेरी चटनी याद आई है।
दादी मुस्कुराईं।
-जिस बच्चे ने बचपन से सिलबट्टे की आवाज़ सुनी हो... उसे मशीन की आवाज़ कभी घर जैसी नहीं लगेगी।
कुछ दिनों बाद माँ ने एक डिब्बा तैयार किया। घर का बना आम का अचार। सूखी लहसुन की चटनी। भुना हुआ पापड़। गुड़। और एक छोटी-सी पोटली में भुना जीरा। डिब्बे के ऊपर एक कागज़ रखा। उस पर केवल एक पंक्ति लिखी थी—
- खाना समय पर खाना...
और जब मेरी याद आए...
तो चटनी खोल लेना।
हॉस्टल में जब वह डिब्बा पहुँचा,  मोहन ने सबसे पहले चटनी की डिब्बी खोली। जैसे ही खुशबू बाहर आई... उसकी आँखें बंद हो गईं। उसे लगा... वह फिर उसी रसोई में बैठा है। माँ सिलबट्टे पर चटनी पीस रही है। दादी हँस रही हैं। पिताजी खेत जाने की तैयारी कर रहे हैं। 
और वह... चूल्हे के पास बैठा पहली रोटी का इंतज़ार कर रहा है। उसने धीरे से एक कौर खाया।
उसके दोस्त ने पूछा—क्या हुआ?
मोहन मुस्कुराया।
-कुछ नहीं...
फिर हल्की आवाज़ में बोला—
- माँ के हाथ का स्वाद...
- डिब्बे में बंद होकर भी घर पहुँचा देता है।
उस रात... मोहन ने पहली बार महसूस किया— दूरी किलोमीटरों से नहीं मापी जाती। दूरी तब महसूस होती है... जब रसोई की खुशबू याद आने लगे। और गाँव में... उसी समय... माँ फिर सिलबट्टे पर चटनी पीस रही थी। उसे नहीं पता था... कि उसी आवाज़ की गूँज... सैकड़ों किलोमीटर दूर... उसके बेटे के दिल तक पहुँच रही है।

अध्याय - 3
टिफिऩ का स्वाद
समय किसी नदी की तरह बहता रहा। मोहन की पढ़ाई पूरी हो गई। अब वह नौकरी के लिए शहर में रहने लगा था। ऊँची-ऊँची इमारतें... चौड़ी सडक़ें... चमकती दुकानें... और हर मोड़ पर खाने की नई-नई जगहें। किसी दिन दक्षिण भारतीय भोजन... किसी दिन पंजाबी थाली... किसी दिन पिज़्ज़ा... तो किसी दिन बर्गर।
दोस्त कहते—यार, शहर में खाने की कितनी वैरायटी है!
मोहन मुस्कुरा देता। लेकिन... हर नए स्वाद के बाद उसके मन में एक पुराना स्वाद जाग जाता।
एक रविवार की सुबह, उसने अपने लिए आलू के पराँठे बनाने की कोशिश की। यूट्यूब पर वीडियो देखा। सामग्री भी वही डाली। मसाले भी वही। घी भी वही। पराँठे भी अच्छे बने। लेकिन पहला कौर खाते ही वह चुप हो गया।
उसने खुद से कहा—
- सब कुछ तो वही है...फिर स्वाद अलग क्यों है?
उसके कमरे में कोई उत्तर नहीं था। 
कुछ दिन बाद दफ़्तर में घर के खाने का दिन रखा गया। हर कर्मचारी अपने घर से कुछ बनाकर लाया था। किसी के घर की इडली। किसी के घर की खीर। किसी के घर का थेपला। सब एक-दूसरे का खाना चख रहे थे। मोहन उस दिन कुछ नहीं लाया था। उसके पास घर नहीं... केवल किराए का कमरा था।
उसका एक साथी मुस्कुराकर बोला—अरे मोहन, तुम्हारे घर का क्या स्पेशल है?
मोहन कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला—मेरे घर की सबसे बड़ी रेसिपी... मेरी माँ हैं।
कमरे में कुछ क्षणों के लिए सन्नाटा छा गया। फिर सब मुस्कुरा दिए।
उसी शाम... मोहन ने माँ को फ़ोन लगाया।
- माँ...
- हाँ बेटा?
- आज ऑफिस में सब घर का खाना लाए थे।
- अच्छा...
- तुमने क्या ले गए थे?
मोहन हँस पड़ा।
- काश... तुम्हारे हाथ की दाल ले जा पाता।
फ़ोन के उस पार कुछ क्षण खामोशी रही।
फिर माँ ने धीरे से कहा—जब छुट्टी मिले... आ जाना।
बस...इतना ही। माँ ने कभी ज़्यादा शब्दों में प्यार जताना सीखा ही नहीं था।
कुछ सप्ताह बाद... मोहन अचानक बिना बताए घर पहुँच गया। दोपहर का समय था। माँ रसोई में रोटी बेल रही थी। दरवाज़े पर आहट हुई। माँ ने पीछे मुडक़र देखा। मोहन सामने खड़ा मुस्कुरा रहा था। माँ ने कुछ नहीं पूछा। न यह कि अचानक कैसे आ गए। न यह कि छुट्टी कितने दिन की है।
उन्होंने बस इतना कहा—हाथ-मुँह धो लो... रोटी अभी उतारती हूँ।
यही तो माँ होती है। उसे कारण नहीं चाहिए। उसे बस यह जानना होता है कि...
बच्चा घर आ गया है।
थोड़ी देर बाद... थाली सामने थी। गरम-गरम रोटियाँ। अरहर की दाल। आलू की सूखी सब्ज़ी। आम का अचार। और वही... सिलबट्टे की हरी चटनी। मोहन ने पहला कौर खाया। आँखें बंद कर लीं।
माँ मुस्कुराकर बोली—क्या हुआ?
मोहन धीरे से बोला—कुछ नहीं... बस... घर का स्वाद वापस मिल गया।
रात को सब सो गए। लेकिन मोहन की नींद नहीं आई। वह चुपचाप रसोई में गया। गैस बंद थी। बर्तन सजे हुए थे। कोने में वही पुराना मिट्टी का चूल्हा रखा था। सिलबट्टा भी वहीं था। उसने चूल्हे पर हाथ रखा। मिट्टी ठंडी थी। लेकिन उसके मन में बचपन की गर्माहट लौट आई। उसे याद आया— यहीं बैठकर वह पहली रोटी माँगा करता था। यहीं दादी कहानियाँ सुनाती थीं। यहीं माँ सबसे आखिर में खाना खाती थीं।
सुबह जब माँ उठीं, तो उन्होंने देखा— मोहन रसोई में बैठा था।
- इतनी सुबह?
मोहन मुस्कुराया।
- आज चाय मैं बनाऊँगा।
माँ हँस पड़ीं।
- ठीक है...बना लो।
मोहन ने चाय बनाई। अदरक डाली। इलायची डाली। दूध भी सही डाला। सबने चाय पी।
पिताजी बोले—अच्छी बनी है।
दादी मुस्कुराईं। माँ ने भी एक घूँट लिया।
फिर प्यार से कहा—बहुत अच्छी है...
कुछ पल रुकीं...और हँसते हुए बोलीं—लेकिन... मेरे हाथ जैसी अभी नहीं बनी।
पूरा घर हँसी से गूँज उठा। मोहन भी हँस पड़ा। क्योंकि... अब वह समझ चुका था—
रसोई की सबसे बड़ी रेसिपी किताबों में नहीं मिलती।
वह माँ के वर्षों के स्नेह, धैर्य और अपनापन से बनती है।

अध्याय -  4
पहली रसोई
समय अपनी चाल चलता रहा। देखते ही देखते... मोहन की शादी तय हो गई। पूरे घर में फिर से रौनक लौट आई। आँगन में रंगोली बनी। रिश्तेदारों की हँसी गूँजने लगी। रसोई से दिनभर तरह-तरह के पकवानों की खुशबू आने लगी। माँ सुबह से रात तक व्यस्त रहतीं। लेकिन... थकान उनके चेहरे पर नहीं... संतोष दिखाई देता था। 
शादी के बाद... घर में एक नया रिश्ता आया। 
वंदिता।
संकोची... मधुर स्वभाव वाली... और हर बात सीखने की उत्सुक। पहले ही दिन वह रसोई के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गई। धीरे से बोली—
- माँजी... आज मैं आपकी मदद कर दूँ?
माँ मुस्कुराईं।
- मदद नहीं बहू... आज से यह रसोई तुम्हारी भी है।
कुछ दिन बाद... घर में परंपरा के अनुसार पहली रसोई का दिन आया। वंदिता सुबह से ही घबराई हुई थी।
बार-बार माँ से पूछती—नमक ठीक है?
- दाल कितनी देर पकाऊँ?
- रोटी गोल बनेगी या नहीं?
माँ हर बार मुस्कुराकर कहतीं—आराम से... रसोई जल्दी नहीं... मन से बनती है।
वंदिता ने पूरी मेहनत से खाना बनाया। दाल। सब्ज़ी। रोटी। खीर। सब कुछ तैयार हो गया। पूरा परिवार एक साथ बैठा। सबने खाना चखा।
पिताजी ने मुस्कुराकर कहा—बहुत स्वादिष्ट।
दादी ने सिर हिलाया—बिलकुल घर जैसा।
मोहन ने भी मुस्कुराकर कहा—बहुत अच्छा बना है।
लेकिन...वंदिता की नजऱ केवल माँ पर थी। वह उनके चेहरे का भाव पढऩा चाहती थी।
माँ ने धीरे-धीरे एक कौर खाया। फिर दूसरा। फिर मुस्कुराईं। उन्होंने वंदिता का हाथ पकड़ लिया।
और बोलीं— बहू...एक बात कहूँ?
वंदिता थोड़ा घबरा गई।
- जी माँजी...
माँ बोलीं—
- मेरे जैसा खाना बनाने की कोशिश मत करना।
वंदिता चौंक गई।
- क्यों?
माँ ने प्यार से कहा—
- क्योंकि हर माँ के हाथ का स्वाद अलग होता है।
मैंने अपने बच्चों के लिए अपना स्वाद बनाया था।
तुम अपने बच्चों के लिए अपना स्वाद बनाना।
यही इस घर की सबसे सुंदर परंपरा होगी।
रसोई में कुछ पल के लिए गहरी शांति छा गई। वंदिता की आँखें भर आईं। उसने झुककर माँ के चरण छू लिए।
उस दिन के बाद... रसोई बदलने लगी। कभी माँ खाना बनातीं। कभी वंदिता। कभी दोनों साथ खड़ी होकर हँसतीं। एक रोटी माँ बेलतीं...
दूसरी बहू। एक तडक़ा माँ लगातीं... दूसरा बहू। 
रसोई में अब दो पीढिय़ाँ साथ-साथ थीं। और घर में... स्वाद भी दोगुना हो गया था।
एक शाम...वंदिता ने मिक्सर में हरी चटनी बना दी।
जल्दी भी हो गई। साफ़ भी रही। लेकिन... माँ चुपचाप सिलबट्टा धोने लगीं।
वंदिता ने पूछा—
- माँजी... अब इसकी क्या ज़रूरत?
माँ मुस्कुराईं। उन्होंने सिलबट्टे पर हाथ फेरा।
और बोलीं—मिक्सर समय बचा देता है...लेकिन सिलबट्टा यादें बना देता है।
वंदिता कुछ नहीं बोली। उसने उसी दिन पहली बार... सिलबट्टे पर चटनी पीसी। धीरे-धीरे... 
घर्र... घर्र... घर्र... रसोई में वही पुरानी आवाज़ फिर गूँज उठी। माँ मुस्कुराईं। उन्हें लगा... घर में केवल बहू नहीं आई है। परंपरा भी आगे बढ़ रही है।
रात को... मोहन रसोई के दरवाज़े पर खड़ा दोनों को काम करते देख रहा था।
माँ ने पूछा—क्या देख रहे हो?
मोहन मुस्कुराया। और बोला—
पहले इस रसोई में मेरी माँ रहती थीं...
अब यहाँ मेरे बचपन की खुशबू और मेरे भविष्य की मुस्कान साथ रहती हैं।
माँ ने कुछ नहीं कहा। बस... रोटी पर घी लगाया।और हमेशा की तरह पूछा—
- एक और दूँ?
मोहन हँस पड़ा। कुछ चीज़ें सचमुच कभी नहीं बदलतीं।

अध्याय - 5
खाली होती रसोई
समय किसी के लिए नहीं रुकता। वह चुपचाप आगे बढ़ता रहता है। देखते-देखते... वही घर जहाँ कभी सुबह-सुबह बच्चों की आवाज़ें गूँजती थीं, अब पहले से थोड़ा शांत रहने लगा था। मोहन नौकरी में व्यस्त था। वंदिता भी बच्चों की पढ़ाई और घर के काम में लगी रहती। पोते-पोतियाँ स्कूल जाने लगे थे। घर अब भी भरा हुआ था... लेकिन पहले जैसी भागदौड़ नहीं रही थी।
रसोई भी बदल चुकी थी। दीवारों पर नई टाइलें लग गई थीं। गैस चूल्हे की जगह अब चार बर्नर वाला चूल्हा था। मिक्सर, फ्रिज, माइक्रोवेव... सब कुछ था। लेकिन... एक चीज़ आज भी नहीं बदली थी।
माँ की आदत।
वह आज भी सुबह सबसे पहले उठतीं। आटा गूँधतीं। दाल चढ़ातीं। और हमेशा... दो-तीन रोटियाँ ज़्यादा सेंक देतीं।
एक दिन वंदिता ने मुस्कुराकर पूछा—
- माँजी... इतनी रोटियाँ क्यों बना रही हैं?
माँ ने सहज स्वर में कहा—क्या पता... आज मोहन जल्दी आ जाए।
वंदिता ने धीरे से कहा— माँजी... उसने तो बताया है कि आज देर होगी।
माँ मुस्कुरा दीं।
- हाँ... पता है।
फिर भी... उन्होंने दो रोटियाँ अलग डिब्बे में रख दीं।
शाम हुई। मोहन नहीं आया। रोटियाँ वैसे ही रखी रहीं। रात को माँ ने उन्हें गाय को खिला दिया। 
अगले दिन... फिर वही हुआ। और उसके अगले दिन भी। किसी ने ध्यान नहीं दिया। लेकिन... रसोई की दीवारें सब देख रही थीं।
एक रविवार को... पूरा परिवार खाने की मेज़ पर बैठा था। मोबाइल भी साथ थे। टीवी भी चल रहा था। बच्चे जल्दी-जल्दी खाना खाकर अपने कमरे में चले गए। मोहन भी किसी ज़रूरी फ़ोन में व्यस्त हो गया।
कुछ ही मिनटों में... मेज़ खाली हो गई। माँ अभी भी बैठी थीं। उनकी थाली में आखिरी रोटी बची थी। उन्होंने चारों ओर देखा। फिर मुस्कुराईं। और धीरे से रोटी का छोटा-सा टुकड़ा तोड़ लिया। उसी समय... उनकी नजऱ रसोई के कोने में रखे पुराने सिलबट्टे पर पड़ी। वह आज भी वहीं था।
पुराना। घिसा हुआ। लेकिन जैसे घर का कोई बुज़ुर्ग... जो कम बोलता है, फिर भी घर छोडक़र कहीं नहीं जाता। माँ उसके पास गईं। उस पर हाथ फेरा।
और धीमे से बोलीं—हम दोनों अब कम काम आते हैं... लेकिन घर में हैं तो अच्छा लगता है।
इतने में... मोहन पीछे से आ गया। उसने माँ की आखिरी बात सुन ली। उसका गला भर आया।
उस रात... उसे नींद नहीं आई। उसे अपना बचपन याद आने लगा। जब वही रसोई हँसी से भरी रहती थी। जब पहली रोटी के लिए वह ज़िद करता था।
जब माँ हर पाँच मिनट में पूछती थीं—
एक और दूँ?
और वह बिना सोचे कह देता था—हाँ!
आज... वही माँ पूछती भी नहीं थीं। क्योंकि... उन्हें पता था— सब अपने-अपने समय में व्यस्त हैं।
अगले दिन... मोहन ने दफ़्तर से छुट्टी ली। सुबह-सुबह रसोई में पहुँचा। माँ चौंक गईं।
- अरे...आज इतनी जल्दी?
मोहन मुस्कुराया।
- आज ऑफिस बाद में जाऊँगा।
- क्यों?
वह चूल्हे के पास बैठ गया। बचपन की तरह।
और बोला—
- पहले दो रोटियाँ बना दो... बाक़ी दुनिया बाद में देख लूँगा।
माँ कुछ क्षण उसे देखती रहीं। फिर बिना कुछ कहे... रोटी बेलने लगीं। पहली रोटी उतरी। उस पर घी लगाया। मोहन ने पहला कौर खाया।
फिर धीरे से बोला—
- माँ...दुनिया का हर स्वाद बदल सकता है...
लेकिन तुम्हारे हाथ का स्वाद...
आज भी मुझे मेरे बचपन में पहुँचा देता है।
माँ की आँखों में चमक आ गई। उन्होंने हमेशा की तरह वही प्रश्न पूछा— एक और दूँ?
मोहन मुस्कुराया। इस बार उसने जवाब देने में जऱा भी देर नहीं की—
- हाँ माँ...आज दो नहीं... तीन रोटियाँ देना।
रसोई फिर हँसी से भर गई। और दीवार पर टँगी पुरानी घड़ी... मानो कुछ देर के लिए पीछे चल पड़ी।

अध्याय - 6
रविवार का भोजन
रविवार की सुबह थी। आज घर में कोई जल्दी नहीं थी। न स्कूल की घंटी... न दफ़्तर की भागदौड़... न समय पर बस पकडऩे की चिंता। आँगन में धूप धीरे-धीरे उतर रही थी। तुलसी के चौरे पर दीपक अभी भी जल रहा था। रसोई से घी, जीरे और हरी धनिया की खुशबू पूरे घर में फैल रही थी। माँ आज भी सबसे पहले उठी थीं। आदतें उम्र से नहीं बदलतीं। उन्होंने आटा गूँधा। दाल चढ़ाई। सब्ज़ी काटी। और फिर जैसे हमेशा करती थीं... वैसे ही रोटी बेलने लगीं।उधर... मोहन बैठक में बैठा अपने बचपन की एक पुरानी तस्वीर देख रहा था। तस्वीर में पूरा परिवार एक साथ बैठकर खाना खा रहा था। दादी थीं। पिताजी थे। माँ बीच में बैठी थीं। और वह... माँ की गोद में सिर रखे हँस रहा था। उसने तस्वीर को कुछ देर देखा। फिर धीरे से मुस्कुराया। और उसी समय उसने एक निर्णय लिया।
दोपहर होने से पहले उसने पूरे परिवार को बुलाया।
- आज से...
सब उसकी ओर देखने लगे।
-हमारे घर में एक नया नियम होगा।
बच्चे उत्सुक हो गए। - क्या नियम, पापा?
मोहन ने कहा—
- हर रविवार...दोपहर का खाना... सब लोग एक साथ माँ की रसोई में खाएँगे।
बच्चों ने पूछा—
- अगर काम हुआ तो?
- काम इंतज़ार करेगा।
- अगर फ़ोन आया तो?
- फ़ोन बाद में उठाएँगे।
- अगर टीवी पर मैच हुआ तो?
मोहन हँस पड़ा।
- मैच फिर आ जाएगा...
- लेकिन...
- माँ के साथ बैठकर खाने वाला यह समय...
- वापस नहीं आएगा।
माँ चुपचाप सब सुन रही थीं। उनकी आँखों में हल्की-सी नमी थी। लेकिन इस बार... वह खुशी की नमी थी।
दोपहर को... रसोई में पुरानी चौकी बिछाई गई। स्टील की थालियाँ निकाली गईं। अचार का मर्तबान खोला गया। सिलबट्टे की हरी चटनी भी रखी गई।
पोते ने पूछा—दादी... यह चटनी इतनी स्वादिष्ट कैसे होती है?
माँ मुस्कुराईं।
- क्योंकि...इसे मशीन नहीं...हाथ बनाते हैं।
वंदिता ने धीरे से जोड़ा—और हाथों में प्यार हो... तो स्वाद अपने आप आ जाता है।
सब एक साथ बैठ गए। आज किसी के हाथ में मोबाइल नहीं था। टीवी बंद था। बातें शुरू हुईं। दादी की पुरानी यादें। पिताजी के खेत। मोहन का बचपन। बच्चों के स्कूल के किस्से। रोटी के साथ... हँसी भी परोसी जा रही थी।
खाना खाते-खाते... पोती ने अचानक पूछा—
- दादी... आप हमेशा सबसे आखिर में क्यों खाती थीं?
माँ मुस्कुराईं। कुछ पल चुप रहीं।
फिर बोलीं—क्योंकि...
माँ का पहला निवाला पेट से नहीं...
बच्चों की मुस्कान से उतरता है।
पूरा कमरा शांत हो गया। मोहन ने माँ की ओर देखा। उसे बरसों पहले पूछा अपना वही सवाल याद आ गया। जिसका उत्तर तब समझ नहीं आया था। आज... वह पूरी तरह समझ चुका था।
खाना समाप्त हुआ। सब उठने लगे। तभी सबसे छोटे पोते ने कहा—
- अगले रविवार को भी ऐसे ही खाना खाएँगे ना?
मोहन मुस्कुराया।
- हर रविवार।
- पक्का?
- हाँ...
- जब तक यह घर है...
- तब तक यह परंपरा रहेगी।
उस दिन के बाद... रविवार केवल छुट्टी का दिन नहीं रहा। वह...परिवार का दिन बन गया। धीरे-धीरे... बच्चे बड़े हुए। उनकी पढ़ाई बढ़ी। फिर नौकरी आई। लेकिन... जब भी रविवार आता... सबकी कोशिश रहती... कि दोपहर तक घर पहुँच जाएँ। क्योंकि उन्हें पता था—रसोई में माँ इंतज़ार कर रही होंगी।
और पहला सवाल वही होगा—एक और रोटी दूँ?
रसोई की दीवार पर टँगी पुरानी घड़ी चलती रही। गैस बदल गई। बर्तन बदल गए। फर्नीचर बदल गया। लेकिन... रविवार की वह थाली... कभी नहीं बदली। और शायद... यही किसी घर की सबसे बड़ी दौलत होती है।

अध्याय - 7
धीमी आँच
साल बीतते गए। घर की दीवारों पर समय की हल्की रेखाएँ दिखाई देने लगीं। आँगन का आम का पेड़ अब बड़ा हो चुका था। तुलसी का चौरा भी पहले से चौड़ा हो गया था। रसोई... अब पहले से कहीं अधिक आधुनिक थी। नया फ्रिज। चिमनी। मिक्सर। ओवन। इंडक्शन। सब कुछ था। लेकिन... रसोई के एक कोने में रखा पुराना सिलबट्टा आज भी अपनी जगह पर था।
और उसके पास... माँ की छोटी-सी लकड़ी की चौकी।
अब माँ पहले जैसी तेज़ी से काम नहीं कर पाती थीं। रोटी बेलते समय बीच-बीच में रुक जातीं। मसाला पीसते समय साँस लेतीं।
लेकिन... जब भी कोई कहता—
- माँ, रहने दीजिए...
वह मुस्कुराकर कहतीं—
- जब तक हाथ चल रहे हैं...तब तक प्यार भी चलता रहेगा।
एक दिन वंदिता ने कहा—
- माँजी... आज आप आराम कीजिए। खाना मैं बना दूँगी।
माँ ने मुस्कुराकर सिर हिलाया।
- ठीक है...
लेकिन कुछ ही देर बाद... वह धीरे-धीरे रसोई में आ गईं।
वंदिता हँस पड़ी।
- अरे! आप फिर आ गईं?
माँ ने हँसते हुए कहा—
- रसोई मुझे बुला लेती है।
अब पोते-पोतियाँ बड़े हो चुके थे। एक दिन सबसे छोटे पोते राहुल ने पूछा—
- दादी... आप रोज़ रसोई में क्यों आ जाती हैं?
माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—
- बेटा...
घर की रसोई में केवल खाना नहीं बनता।
यहीं परिवार का अपनापन भी पकता है।
राहुल ने बात पूरी तरह नहीं समझी। लेकिन उसने दादी का हाथ पकड़ लिया।
रविवार का दिन था। घर में फिर सब इकट्ठा थे।
आज माँ ने कहा—आज खाना तुम सब बनाओ।
सबने मिलकर काम शुरू किया। कोई सब्ज़ी काट रहा था।  कोई आटा गूँध रहा था। कोई दाल में तडक़ा लगा रहा था। रसोई में हँसी गूँज रही थी। माँ दरवाज़े पर बैठी सब देख रही थीं। उनकी आँखों में संतोष था।
खाना तैयार हुआ।
सबने माँ से कहा—अब आप बताइए... कैसा बना है?
माँ ने एक कौर खाया।फिर मुस्कुराकर बोलीं—
- बहुत अच्छा है।
कुछ पल बाद उन्होंने हँसते हुए जोड़ा—
बस...एक चीज़ कम है।
सब एक साथ बोले—
- क्या?
माँ ने हँसकर कहा—जब खाना बन रहा था...
तुम लोगों ने एक-दूसरे को छेड़ा कम।
रसोई में थोड़ा शोर भी होना चाहिए।
पूरा घर ठहाकों से गूँज उठा।खाना खत्म होने के बाद... माँ धीरे-धीरे उठीं। रसोई के कोने में गईं। पुराने सिलबट्टे पर हाथ फेरा। फिर राहुल को बुलाया।
- आओ बेटा।
उन्होंने उसका छोटा-सा हाथ अपने हाथ पर रखा।
और कहा—याद रखना...घर बड़ा होने से परिवार बड़ा नहीं होता।
परिवार तब बड़ा होता है...जब सब एक साथ बैठकर खाना खाते हैं।
राहुल ने मासूमियत से पूछा—और अगर मैं बड़ा होकर कहीं दूर चला गया तो?
माँ मुस्कुराईं।
- दूर चले जाना...लेकिन घर का रास्ता कभी मत भूलना।
शाम ढल रही थी। रसोई की खिडक़ी से आती सुनहरी धूप माँ के चेहरे पर पड़ रही थी। उन्होंने एक बार पूरे घर को देखा। बच्चे हँस रहे थे। बहू रसोई समेट रही थी। मोहन पानी भर रहा था। पिताजी तुलसी में जल डाल रहे थे।
माँ ने मन ही मन कहा—अब मेरी रसोई सुरक्षित है।
उन्हें समझ आ गया था— रसोई केवल दीवारों में नहीं रहती।
वह... पीढ़ी दर पीढ़ी... दिलों में चली जाती है।

अध्याय - 8
वापसी
समय ने फिर एक लंबा चक्कर पूरा किया। मोहन के बच्चे अब बड़े हो चुके थे। कोई इंजीनियर था। कोई डॉक्टर। कोई पढ़ाई के लिए विदेश चला गया था। घर अब पहले जैसा भरा नहीं रहता था। रविवार की मेज़ पर कई कुर्सियाँ खाली रहने लगी थीं। लेकिन... माँ की आदत आज भी नहीं बदली थी। वह रविवार को हमेशा थोड़ा ज़्यादा खाना बनाती थीं।
वंदिता हँसकर कहती—
- माँजी...इतना कौन खाएगा?
माँ मुस्कुरा देतीं।
- क्या पता...आज कोई अचानक आ जाए।
एक दिन... घर के बाहर अचानक एक कार आकर रुकी। फिर दूसरी। फिर तीसरी। दरवाज़ा खुला। सबसे पहले आरव दौड़ता हुआ अंदर आया।
- दादी...!
उसकी आवाज़ सुनते ही माँ रसोई से बाहर आईं। उनके चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान थी। पीछे-पीछे बाकी बच्चे भी थे। किसी के हाथ में सूटकेस। किसी के हाथ में उपहार। किसी के गले में कैमरा। लेकिन... माँ की नजऱ केवल बच्चों के चेहरों पर थी। उन्होंने एक-एक को गले लगाया। कुछ नहीं पूछा।
बस इतना कहा—
- आ गए?
उन दो शब्दों में वर्षों का इंतज़ार समा गया था। दोपहर तक घर फिर से वैसा ही लगने लगा। आँगन में बच्चों की हँसी। बरामदे में चाय। रसोई में चहल-पहल।
वंदिता ने पूछा—
- आज क्या बनाएँ?
राहुल ने तुरंत कहा—
- दादी..आज पिज़्ज़ा नहीं।
सब हँस पड़े।दूसरे ने कहा—हमें वही बाजरे की रोटी चाहिए।
तीसरा बोला—और सिलबट्टे वाली हरी चटनी।
चौथा मुस्कुराया—और गुड़ भी।
माँ ने हँसते हुए पूछा—इतना साधारण खाना?
राहुल बोला—
-दादी...दुनिया के बड़े-बड़े होटल देख लिए।
लेकिन बचपन का स्वाद कहीं नहीं मिला।
माँ धीरे-धीरे रसोई में चली गईं। उन्होंने आटा निकाला। सिलबट्टा धोया। हरी मिर्च, धनिया और लहसुन रखा। फिर...
- घर्र... घर्र... घर्र...
सिलबट्टे की वही पुरानी आवाज़ पूरे घर में गूँज उठी। राहुल दौडक़र रसोई के दरवाज़े पर आकर खड़ा हो गया। वह कुछ देर तक चुपचाप उस आवाज़ को सुनता रहा।
फिर मुस्कुराकर बोला—
- दादी...यह आवाज़... मेरे बचपन की सबसे प्यारी धुन है।
माँ की आँखें चमक उठीं।
कुछ देर बाद... सब लोग एक साथ बैठकर खाने लगे। रोटी पर घी लगाया गया। चटनी परोसी गई। दाल की खुशबू पूरे कमरे में फैल गई। राहुल ने पहला कौर खाया।
फिर आँखें बंद कर लीं।
कुछ पल बाद उसने धीरे से कहा—
- दादी...यह स्वाद तो वैसा ही है...
माँ मुस्कुराईं।
- कौन-सा?
- जिसे मैं कभी अपने साथ ले ही नहीं जा पाया।
खाना खत्म होने के बाद... राहुल अपने बैग से एक छोटा-सा डिब्बा निकालकर लाया। उसमें एक नया मिक्सर था। वह बोला—
- दादी... अब आपको सिलबट्टे पर मेहनत नहीं करनी पड़ेगी।
माँ ने प्यार से उसका हाथ पकड़ा। मिक्सर को देखा। फिर सिलबट्टे को देखा।
और मुस्कुराकर बोलीं—बेटा...यह मिक्सर बहुत अच्छा है।इसे भी रखेंगे।
लेकिन यह सिलबट्टा कहीं नहीं जाएगा।
 राहुल ने पूछा—क्यों?
माँ ने उत्तर दिया—क्योंकि मशीनें मसाले पीसती हैं...यादें नहीं।
पूरा कमरा शांत हो गया।
शाम को... सब लोग आँगन में बैठे थे। हल्की हवा चल रही थी।
माँ ने धीरे से कहा—अगले रविवार भी आओगे?
राहुल ने बिना सोचे कहा—जहाँ भी रहूँ...साल में कम से कम एक रविवार...मैं माँ की रसोई के नाम रखूँगा।
मोहन ने बेटे की ओर देखा। उसे लगा... अब यह परंपरा आगे बढ़ चुकी है।
रसोई की खिडक़ी से आती शाम की रोशनी सिलबट्टे पर पड़ रही थी। उस पर वर्षों की घिसावट थी। 
लेकिन...उसी घिसावट में पूरे परिवार की सबसे मीठी यादें चमक रही थीं।

अध्याय - 9
खुशबू जो कभी नहीं जाती
सूरज की पहली किरण आँगन में उतर चुकी थी। तुलसी के चौरे पर ओस की बूँदें चमक रही थीं। रसोई की खिडक़ी से आती हल्की हवा में धनिए और ताज़े आटे की महक घुल रही थी। घर वैसा ही था...लेकिन अब समय एक और पीढ़ी आगे बढ़ चुका था।
माँ अब पहले से बहुत धीमे चलती थीं। बाल पूरी तरह सफ़ेद हो चुके थे। आँखों पर हल्का-सा चश्मा था। लेकिन... रसोई में कदम रखते ही उनके चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान लौट आती थी। आज उन्होंने काम अपने हाथ में नहीं लिया। वह अपनी पुरानी लकड़ी की चौकी पर बैठ गईं। और चुपचाप देखने लगीं।
रसोई में एक साथ तीन पीढिय़ाँ थीं। वंदिता दाल में तडक़ा लगा रही थी। पोती रोटी बेल रही थी।
राहुल सिलबट्टे पर हरी चटनी पीस रहा था।
घर्र... घर्र... घर्र...
सिलबट्टे की आवाज़ फिर पूरे घर में गूँज उठी। माँ ने आँखें बंद कर लीं। उनके चेहरे पर संतोष था।
राहुल मुस्कुराकर बोला—
- दादी...देखो, अब मैं भी चटनी पीस लेता हूँ।
माँ ने कहा—हाँ... लेकिन याद रखना...
- क्या?
- चटनी जल्दी मत पीसना।धीरे-धीरे पीसना।
कुछ स्वाद...धीमी मेहनत से ही आते हैं।
राहुल ने सिर हिलाया।
उसे लगा... दादी केवल चटनी की नहीं,जि़ंदगी की बात कर रही हैं।
दोपहर को... रविवार का वही पुराना नियम निभाया गया। सब लोग एक साथ बैठे। रोटी घूमी। दाल परोसी गई। अचार की डिब्बी खुली। हरी चटनी की खुशबू पूरे कमरे में फैल गई। सबने पहला कौर लिया। कुछ क्षण कोई नहीं बोला।
फिर सबसे छोटी पोती मुस्कुराकर बोली—
- दादी... माँ का खाना बहुत अच्छा बनता है।
माँ हँस दीं।
- हाँ...
- लेकिन?
पोती ने आगे कहा—
- फिर भी...आपके हाथ का स्वाद थोड़ा अलग है।
माँ ने वंदिता की ओर देखा।ं वंदिता मुस्कुराई। और वही बात दोहराई जो उसने वर्षों पहले माँ से सीखी थी—
- हर माँ के हाथ का स्वाद अलग होता है। यही तो उसकी पहचान है।
माँ की आँखें चमक उठीं। उन्होंने महसूस किया... आज उनकी सीख शब्दों से नहीं, जीवन से आगे बढ़ रही है।
खाना समाप्त हुआ। सब लोग उठ गए। लेकिन माँ वहीं बैठी रहीं। उन्होंने रसोई को ध्यान से देखा। दीवारें बदल गई थीं। बर्तन बदल गए थे। चूल्हा बदल गया था। समय बदल गया था।
लेकिन... रसोई की आत्मा आज भी वही थी।
मोहन उनके पास आया।
धीरे से बोला—माँ... क्या सोच रही हो?
माँ मुस्कुराईं।
-कुछ नहीं बेटा...
- बस यह देख रही हूँ कि अब इस रसोई को मेरी ज़रूरत कम पड़ती है।
मोहन ने तुरंत उनका हाथ पकड़ लिया।
- नहीं माँ...
- रसोई को शायद कम पड़े...
- लेकिन...घर को आज भी आपकी खुशबू की ज़रूरत है।
माँ की आँखें भर आईं। लेकिन उन्होंने आँसू नहीं गिरने दिए।
उन्होंने केवल इतना कहा—
अब मुझे कोई चिंता नहीं।रोटी बनाना तुम सब सीख गए हो...और सबसे बड़ी बात... एक साथ बैठकर खाना भी।
शाम ढलने लगी। आँगन में बच्चे खेल रहे थे। रसोई से फिर चाय की खुशबू आने लगी। माँ ने अपनी पुरानी चौकी पर बैठकर सबको देखा। धीरे-धीरे मुस्कुराईं।
और मन ही मन बोलीं—
घर तब तक घर रहता है...
जब तक उसकी रसोई में केवल खाना नहीं...
अपनापन भी पकता रहे।
उपसंहार
मिट्टी का चूल्हा अब नहीं था। लेकिन उसकी गर्माहट थी। सिलबट्टा अब रोज़ नहीं चलता था। लेकिन उसकी आवाज़ याद थी। रसोई आधुनिक हो गई थी। लेकिन रविवार की थाली अब भी सबको एक साथ बैठाती थी। समय ने बहुत कुछ बदल दिया। पर एक बात कभी नहीं बदल सकी—
जब भी कोई बच्चा दुनिया की भीड़, काम की थकान या जीवन की उलझनों से हार जाता... उसे सबसे पहले याद आती थी—
माँ की रसोई।
क्योंकि वहाँ केवल भोजन नहीं मिलता था। वहाँ बिना शर्त अपनापन मिलता था। और शायद... दुनिया की सबसे स्वादिष्ट रेसिपी आज भी किसी किताब में नहीं लिखी गई है। वह हर माँ के हाथों में जन्म लेती है। हर रोटी के साथ मुस्कुराती है। हर निवाले के साथ बच्चों के जीवन में उतर जाती है। और फिर... जीवन भर उनके साथ रहती है।
दुनिया के हर स्वाद की एक सीमा होती है...
लेकिन माँ के हाथ के खाने का स्वाद...
समय के साथ कम नहीं होता,
बल्कि हर दूरी के साथ और गहरा होता जाता है।
चूल्हे बदल जाते हैं...बर्तन बदल जाते हैं...
रसोई बदल जाती है...
पर माँ के हाथों का प्रेम...
हर पीढ़ी में एक नई खुशबू बनकर जीवित रहता है....
।। इतिश्री ।।