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अनंत साहित्य

कागज़ की नाव

 कागज़ की नाव...



आज बरसों बाद...

बारिश हुई।

मैं खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया।

सामने सड़क पर
पानी बह रहा था।

एक छोटा-सा बच्चा
अपने दोनों हाथों से
कागज़ की नाव बनाकर
उसे पानी में छोड़ रहा था।

वह उसके पीछे-पीछे दौड़ रहा था...

और मैं...

अपनी जगह खड़ा रह गया।

क्योंकि...

उस पानी में
मुझे अपनी नाव दिखाई दे रही थी।

याद है मुझे...

जब बारिश की पहली बूँद गिरती थी,

तो हम आकाश नहीं देखते थे...

हम गली में बहते पानी को देखते थे।

किताबों के पुराने पन्ने ढूँढ़ते थे,

कॉपी का बीच वाला साफ़ पन्ना निकालते थे,

और पूरे मन से
एक कागज़ की नाव बनाते थे।

फिर उसे पानी में छोड़कर

ऐसे खुश हो जाते थे...

जैसे किसी ने
पूरी दुनिया हमें दे दी हो।

वह नाव...

बारिश के पानी में नहीं बहती थी।

उसमें बहते थे...

हमारे सपने...

हमारी हँसी...

हमारी नादानियाँ...

और वह बचपन...

जो कभी लौटकर नहीं आता।

अगर नाव कहीं अटक जाती,

तो हम दोनों हाथों से

उसके लिए नया रास्ता बना देते थे।

तब कहाँ पता था...

कि एक दिन

ज़िंदगी की नाव अटक जाएगी...

और उसे आगे बढ़ाने के लिए

कोई हाथ नहीं आएगा।

आज...

बारिश पहले जैसी ही होती है।

बादल भी वैसे ही गरजते हैं।

मिट्टी भी वैसी ही महकती है।

बस...

बदल गया हूँ मैं...

अब बारिश देखकर

भीगने का मन नहीं करता।

बस...

यादें भीगने लगती हैं।

अब हाथों में

कागज़ की नाव नहीं बनती।

बिजली के बिल बनते हैं।

बैंक के कागज़ बनते हैं।

रसीदें बनती हैं

और.....

ज़िम्मेदारियों की लंबी सूची बनती है।

सोचता हूँ...

आख़िर वह कौन-सा दिन था...

जब कागज़ से नाव बनाना छोड़कर

हमने कागज़ों में

अपनी पूरी ज़िंदगी समेट दी।

आज उस बच्चे को देखकर

मन हुआ...

उससे कह दूँ—

"बेटा...

अपनी नाव को थोड़ा धीरे बहाना।

जल्दी बड़े मत होना।

क्योंकि बड़े होने के बाद...

बारिश वही रहती है...

पर कागज़ की नाव कहीं खो जाती है।"

कभी-कभी लगता है...

हम बड़े नहीं हुए।

बस...

हमारे अंदर का वह बच्चा

चुप हो गया।

जो हर बारिश में

भीगना चाहता था।

जो हर गड्ढे में

समंदर देख लेता था।

जो हर कागज़ में

एक नई नाव खोज लेता था।

आज भी...

अगर कोई पूछे—

ज़िंदगी में सबसे कीमती चीज़ क्या खोई?

तो मैं कहूँगा—

न पैसा...

न समय...

न कोई सामान...

मैंने खोई है...

बारिश में

कागज़ की नाव के पीछे

बिना किसी चिंता के

दौड़ने वाली अपनी उम्र।


हमारी पहली नाव

कागज़ की नहीं थी।

वह...

हमारा बचपन था।

जो हर बरसात में

थोड़ा-थोड़ा बहता रहा...

और एक दिन

हमारी आँखों से ओझल हो गया।

इसलिए...

जब अगली बार बारिश हो...

और कहीं कोई बच्चा

कागज़ की नाव बहाता दिखाई दे...

तो उसे रोकना मत।

उसे जल्दी घर मत बुलाना।

उसे डाँटना मत...

कि कपड़े गंदे हो जाएँगे।

क्योंकि...

वह केवल एक नाव नहीं बहा रहा...

वह अपनी सबसे सुंदर यादें बना रहा है।

वही यादें...

जो चालीस साल बाद

किसी बरसाती शाम

उसे खिड़की पर खड़ा करके

चुपचाप रुला देंगी।

और शायद...

इसीलिए...

हर बरसात में

कागज़ की नाव नहीं बहती...

किसी का पूरा बचपन बहता है.....