खामोशी से दूर हो जाते हैं.....
जो लोग सचमुच मन से जुड़े होते हैं,
वे हर छोटी बात पर शिकायत नहीं करते।
दिल पर कितनी भी चोट क्यों न लगे,
अक्सर मुस्कुराकर उसे अपने भीतर ही रख लेते हैं।
कभी यूँ ही हँसते-हँसते कह देते हैं—
"ये बात... थोड़ी-सी चुभी थी।"
और फिर उसी क्षण बात बदल देते हैं,
मानो कुछ हुआ ही न हो।
क्योंकि उन्हें विश्वास होता है
आँखों की नमी पढ़ लेंगे,
आवाज़ की थकान सुन लेंगे,
और उन शब्दों के बीच छिपी पीड़ा को भी महसूस कर लेंगे,
जो कभी होंठों तक आ ही नहीं पाई।
लेकिन...
जब वही छोटी-छोटी चोटें
बार-बार उसी जगह लगने लगती हैं,
तब इंसान बदलता नहीं...
बस बोलना कम कर देता है।
शब्द धीरे-धीरे कम होने लगते हैं,
मुस्कुराहटें छोटी पड़ जाती हैं,
और खामोशी लंबी होने लगती है।
बाहर से सब कुछ वैसा ही दिखाई देता है...
वही बातचीत...
वही अपनापन...
वही रोज़मर्रा की ज़िंदगी...
लेकिन भीतर कहीं
एक अनदेखी दूरी जन्म ले चुकी होती है।
ऐसी दूरी...
जिसे कोई आँख नहीं देख पाती,
पर जिसे एक संवेदनशील दिल हर दिन महसूस करता है।
और फिर...
एक दिन वे चले जाते हैं......
बिना किसी शोर के...
बिना किसी आरोप के...
बिना यह बताए कि उन्हें किस बात ने सबसे अधिक तोड़ा।
वे केवल अपने कदम पीछे खींच लेते हैं..
क्योंकि जो लोग मन से जुड़े होते हैं,
वे रिश्ते तोड़ने का शोर नहीं करते...
वे किसी को दोष देकर नहीं जाते...
वे केवल अपनी खामोशी साथ ले जाते हैं।
वे आपको कभी बुरा नहीं बोलते,
वे तो आपका बुरा भी नहीं सोचते,
वे बस आपको स्नेह देते हैं—
और जाने के बाद भी उनका वह भाव कभी नहीं बदलता।
कुछ रिश्ते आवाज़ से नहीं,
अहसास से जीवित रहते हैं।
और जब अहसास मरने लगे...
तो शब्दों की कोई शक्ति नहीं बचती।
इसलिए...
यदि आपकी ज़िंदगी में कोई ऐसा व्यक्ति है,
जो कम शिकायत करता है,
ज़्यादा समझता है,
और हर बार आपकी खुशी के लिए स्वयं को पीछे कर देता है—
तो उसकी खामोशी को कभी हल्के में मत लीजिए।
क्योंकि...
जो लोग मन से जुड़े होते हैं,
वे जाते समय शोर नहीं करते...
बस... खामोशी से बहुत दूर चले जाते हैं....
