गाँव के बीचों-बीच खड़ा वह पुराना बरगद...
आज भी वहीं है।
बस अब उसके चारों ओर दुनिया बदल गई है।
कहते हैं—उसे दो सौ साल हो गए।
पर उसकी जड़ों में आज भी
कई पीढ़ियों की साँसें बसी हैं।
उसने देखा है—
कच्चे घरों से पक्के घरों तक का सफर,
बैलगाड़ियों से गाड़ियों तक का शोर,
और मिट्टी से मशीनों तक का बदलाव।
कच्चे घरों से पक्के घरों तक का सफर,
बैलगाड़ियों से गाड़ियों तक का शोर,
और मिट्टी से मशीनों तक का बदलाव।
उसने देखा है—
नववधू का पहली बार गाँव में आना,
बच्चों की हँसी में झूलते झूले,
और बूढ़ों की आख़िरी विदाई।
नववधू का पहली बार गाँव में आना,
बच्चों की हँसी में झूलते झूले,
और बूढ़ों की आख़िरी विदाई।
पर हर बार...
उसने अपनी छाया नहीं बदली।
और उसने वह समय भी देखा है...
जब देश आज़ाद नहीं था।
जब लोग दबे स्वर में बातें करते थे,
और हवा में भी एक डर सा घुला रहता था।
जब देश आज़ाद नहीं था।
जब लोग दबे स्वर में बातें करते थे,
और हवा में भी एक डर सा घुला रहता था।
उसी की डालों के नीचे
धीरे-धीरे फुसफुसाहटें उठी थीं—
“एक दिन यह देश आज़ाद होगा…”
धीरे-धीरे फुसफुसाहटें उठी थीं—
“एक दिन यह देश आज़ाद होगा…”
नौजवानों की आँखों में
सपने जलते थे,
और उसी बरगद ने
उन सपनों को चुपचाप अपनी छाया दी थी।
उसने देखा—
क्रांति की वो रातें,
जब कदमों की आहट भी
एक इरादा हुआ करती थी।
क्रांति की वो रातें,
जब कदमों की आहट भी
एक इरादा हुआ करती थी।
और फिर...
वह सुबह भी देखी
जब तिरंगा पहली बार खुलकर लहराया था।
देश आज़ाद हुआ था।
और बरगद की पत्तियाँ
हवा में ऐसे काँपी थीं
जैसे उसने भी स्वतंत्रता की साँस ली हो।
कभी उसकी डालों पर
बचपन झूला करता था।
चौपाल लगती थी,
कहानियाँ बोली जाती थीं,
और रिश्ते वहीं बनते थे।
चिड़ियाँ उसे घर मानती थीं,
और राहगीर उसे राहत।
बरगद ने कभी कुछ माँगा नहीं—
बस देता रहा।
बचपन झूला करता था।
चौपाल लगती थी,
कहानियाँ बोली जाती थीं,
और रिश्ते वहीं बनते थे।
चिड़ियाँ उसे घर मानती थीं,
और राहगीर उसे राहत।
बरगद ने कभी कुछ माँगा नहीं—
बस देता रहा।
फिर समय बदला।
गाँव शहर बनने लगा।
सड़कें आईं, गाड़ियाँ आईं,
और विकास की बातें भी।
लोग मुस्कुराए—
“विकास हो रहा है।”
बरगद भी चुप रहा।
उसे विकास से शिकायत नहीं थी
गाँव शहर बनने लगा।
सड़कें आईं, गाड़ियाँ आईं,
और विकास की बातें भी।
लोग मुस्कुराए—
“विकास हो रहा है।”
बरगद भी चुप रहा।
उसे विकास से शिकायत नहीं थी
फिर एक दिन...
रेखा खींची गई।
और कहा गया—
“पेड़ बीच में आ रहा है।”
बस...
इतना ही काफी था।
रेखा खींची गई।
और कहा गया—
“पेड़ बीच में आ रहा है।”
बस...
इतना ही काफी था।
अगले दिन मशीनें आईं।
आरी चली।
चिड़ियाँ उड़ गईं,
गिलहरी भागती रही,
और बच्चे दूर खड़े देखते रहे।
एक बूढ़ा किसान रो नहीं सका—
बस देखता रहा।
आरी चली।
चिड़ियाँ उड़ गईं,
गिलहरी भागती रही,
और बच्चे दूर खड़े देखते रहे।
एक बूढ़ा किसान रो नहीं सका—
बस देखता रहा।
बरगद गिरा...
तो सिर्फ पेड़ नहीं गिरा।
गाँव की यादें गिर गईं।
बचपन गिर गया।
चौपाल गिर गई।
और एक पूरी छाया हमेशा के लिए खो गई।
तो सिर्फ पेड़ नहीं गिरा।
गाँव की यादें गिर गईं।
बचपन गिर गया।
चौपाल गिर गई।
और एक पूरी छाया हमेशा के लिए खो गई।
मैं विकास के खिलाफ नहीं हूँ।
सड़कें बनें, शहर बढ़ें, देश आगे जाए—
यह ज़रूरी है।
पर क्या विकास इतना कठोर हो गया है
कि वह एक जीवित इतिहास को जगह नहीं दे सकता?
क्या एक पेड़ के लिए
सड़क थोड़ी नहीं मुड़ सकती थी?
सड़कें बनें, शहर बढ़ें, देश आगे जाए—
यह ज़रूरी है।
पर क्या विकास इतना कठोर हो गया है
कि वह एक जीवित इतिहास को जगह नहीं दे सकता?
क्या एक पेड़ के लिए
सड़क थोड़ी नहीं मुड़ सकती थी?
क्योंकि बरगद सिर्फ पेड़ नहीं होता।
वह समय का साक्षी होता है।
उसकी जड़ों में
सिर्फ मिट्टी नहीं,
आज़ादी की फुसफुसाहटें भी दबी होती हैं।
और उसकी छाया में
सिर्फ लोग नहीं,
एक पूरा इतिहास साँस लेता है।
वह समय का साक्षी होता है।
उसकी जड़ों में
सिर्फ मिट्टी नहीं,
आज़ादी की फुसफुसाहटें भी दबी होती हैं।
और उसकी छाया में
सिर्फ लोग नहीं,
एक पूरा इतिहास साँस लेता है।
और जब हम उसे काटते हैं...
तो सिर्फ लकड़ी नहीं गिरती।
हम अपनी स्मृतियों का एक हिस्सा खो देते हैं।
तो सिर्फ लकड़ी नहीं गिरती।
हम अपनी स्मृतियों का एक हिस्सा खो देते हैं।
अगली बार जब किसी बरगद के पास जाओ...
तो बस एक पल रुकना।
शायद वहाँ
तुम्हारा बचपन अब भी साँस ले रहा हो।
और शायद...
कहीं गहराई में
आज़ादी की वो पुरानी गूँज भी अब तक जीवित हो।
तो बस एक पल रुकना।
शायद वहाँ
तुम्हारा बचपन अब भी साँस ले रहा हो।
और शायद...
कहीं गहराई में
आज़ादी की वो पुरानी गूँज भी अब तक जीवित हो।
क्योंकि...
बरगद कभी सिर्फ पेड़ नहीं होता...
वह गाँव की याद होता है..
आज़ादी की गवाही होता है...
और हमारी जड़ों की सबसे सच्ची पहचान होता है.....
बरगद कभी सिर्फ पेड़ नहीं होता...
वह गाँव की याद होता है..
आज़ादी की गवाही होता है...
और हमारी जड़ों की सबसे सच्ची पहचान होता है.....
