अध्याय- 1
जिस घर की पहचान एक बरामदा था गाँवों में घरों के नाम नहीं होते। उनकी पहचान होती है।किसी घर के सामने पीपल का पेड़ होता है, किसी के आँगन में पुराना कुआँ, किसी के दरवाज़े पर लाल रंग का किवाड़। लोग पता नहीं बताते, केवल एक निशानी बताते हैं और राहगीर बिना भटके वहाँ पहुँच जाता है।
उस गाँव में भी एक घर था। यदि कोई बाहर का आदमी पूछ बैठता—रघुनाथ प्रसाद का घर किधर है?
तो गाँव का सबसे छोटा बच्चा भी मुस्कुराकर कह देता—अरे... वही बड़ा-सा बरामदा वाला घर?
सीधे चले जाइए...जहाँ तुलसी का चौरा दिखे, वहीं। और सचमुच... उस घर की सबसे बड़ी पहचान उसका बरामदा ही था। लंबा... चौड़ा... सालों की धूप और बरसात से पकी हुई ईंटों का बरामदा। उस बरामदे ने बच्चों को घुटनों के बल चलना सिखाया था। उसी ने नई दुल्हनों की पहली पायल की छनकार सुनी थी। उसी ने कितनी ही बार अर्थी को कंधों तक जाते देखा था। बरामदे बूढ़े नहीं होते... वे घर का इतिहास बन जाते हैं। उस बरामदे की पश्चिम वाली दीवार पर एक पुरानी लोहे की कील गड़ी थी। कील पर एक काला छाता टँगा रहता था। उसका रंग अब काला कम, समय का रंग अधिक था। कई जगह कपड़ा फीका पड़ चुका था। बाँस का हत्था हथेलियों की अनगिनत पकड़ से चिकना हो गया था। किनारों पर महीन धागे बाहर झाँकते थे। फिर भी... उसकी एक भी सलाख टेढ़ी नहीं हुई थी। वह छाता वर्षों से वहीं टँगा था। इतने वर्षों से कि गाँव के नए बच्चों ने उसे कभी खुलते नहीं देखा। किसी ने कभी उसे माँगा नहीं। किसी ने उसे साफ़ नहीं किया। किसी ने उसे फेंकने की भी ज़रूरत नहीं समझी। वह घर में था... जैसे पुरानी घड़ी होती है... जिसे कोई देखता नहीं... लेकिन जिसके रुक जाने पर पूरे घर को समय का पता नहीं चलता। उस दिन सावन की पहली तेज़ वर्षा हुई थी। सुबह से ही बादल ऐसे उमड़ रहे थे, मानो वर्षों बाद अपने किसी पुराने मित्र से मिलने आए हों। पहली बूँद गिरी... फिर दूसरी... और देखते-देखते पूरा गाँव पानी की चादर में लिपट गया। कच्ची गलियाँ चमक उठीं। नीम के पत्ते धुल गए। आम की डालियों से टपकती बूँदें मिट्टी पर गिरतीं तो हवा में एक ऐसी सुगंध घुल जाती, जिसे शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता। बरामदे की छत से पानी की धार बह रही थी। हवा का एक झोंका आया। दीवार पर टँगा पुराना छाता हल्का-सा हिला। बस... इतना ही। जैसे किसी बूढ़े ने करवट बदली हो। उसी समय भीतर वाले कमरे का दरवाज़ा खुला।
धीरे-धीरे एक वृद्ध बाहर आए। धोती। हल्का-सा खादी का कुर्ता। कंधे पर सफ़ेद गमछा। चेहरे पर झुर्रियाँ थीं... लेकिन उनमें हार नहीं थी।उनका नाम था— रघुनाथ प्रसाद।
उन्होंने बरामदे में कदम रखा। पहले आकाश की ओर देखा। फिर वर्षा की ओर। और अंत में... दीवार पर टँगे उस पुराने छाते की ओर। उनकी आँखों में एक ऐसी मुस्कान उतर आई... जो केवल पुराने मित्रों को देखकर आती है। वे कुछ देर तक उसे देखते रहे। फिर धीरे से बोले—आ गया... इस बार भी समय पर आ गया।
यह बात उन्होंने वर्षा से कही थी... या उस छाते से... यह केवल वही जानते थे। इतने में भीतर से एक बालक दौड़ता हुआ आया। लगभग दस वर्ष का। हाथ में नया, रंग-बिरंगा छाता। उसने अपना छाता गर्व से खोला... फिर दादाजी की नजऱ का पीछा करते हुए दीवार पर टँगे पुराने छाते तक पहुँचा। कुछ देर तक उसे देखता रहा। फिर मासूमियत से बोला—दादाजी...
- हाँ बेटा?
- यह पुराना छाता अभी तक क्यों रखा है?
रघुनाथ ने उत्तर नहीं दिया। उन्होंने केवल मुस्कुराकर उस छाते को देखा।
बालक फिर बोला—अब तो यह किसी काम का भी नहीं होगा...
रघुनाथ ने पहली बार उसकी ओर देखा। उनकी मुस्कान गहरी हो गई।
उन्होंने धीरे से कहा—बेटा... जिस चीज़ ने पूरी उम्र तुम्हें भीगने से बचाया हो... उसे बूढ़ा होने पर फेंका नहीं जाता।
बालक चुप हो गया। उसे लगा... दादाजी छाते की बात कर रहे हैं। और सच भी यही था। लेकिन... पूरी सच्चाई अभी कहानी ने भी नहीं सुनी थी।
घरों में रखी हुई कुछ पुरानी चीज़ें केवल सामान नहीं होतीं...
वे समय की तहों में दबे हुए ऐसे उत्तर होती हैं, जिनके प्रश्न अभी आने बाकी होते हैं।
अध्याय - 2
पहली बारिश की कहानी रात भर वर्षा होती रही...
सुबह जब गाँव जागा, तब तक धरती धुल चुकी थी। आम के पत्तों पर मोती-सी बूँदें ठहरी थीं। कच्ची गलियों में छोटे-छोटे पानी के गड्ढे बन गए थे और तालाब किनारे खड़े बगुले ऐसे लग रहे थे, मानो वे भी रात की वर्षा का हिसाब लगा रहे हों। बरामदे में वही पुरानी चारपाई बिछी थी। रघुनाथ प्रसाद उस पर बैठे धूप सेंक रहे थे। सावन की सुबहों में धूप देर से निकलती है। जब निकलती है... तो बूढ़ी हड्डियों को जैसे नया साहस दे जाती है। जानकी देवी पीतल के गिलास में अदरक की चाय लेकर आईं।
गिलास उनके हाथ में देते हुए बोलीं—लो...आज घुटनों का दर्द कुछ कम होगा।
रघुनाथ मुस्कुरा दिए।
-दर्द कम नहीं होता जानकी...बस आदमी उसे अपना साथी बना लेता है।
जानकी ने उनकी ओर देखा। पचपन वर्षों का साथ था। वे जानती थीं... रघुनाथ जब ऐसी बातें करते हैं, तब उनके मन में कोई पुरानी याद ज़रूर जागी होती है। उन्होंने कुछ नहीं पूछा। जीवन के लंबे साथ ने उन्हें सिखा दिया था— हर प्रश्न का उत्तर शब्दों से नहीं माँगा जाता। उसी समय चिंटू भागता हुआ आया। हाथ में वही नया नीला छाता था। उसने दादाजी के सामने उसे दो-तीन बार खोला और बंद किया।
फिर हँसकर बोला—देखो दादाजी...मेरा छाता कितनी जल्दी खुल जाता है।
रघुनाथ ने सिर हिलाया।
- अच्छा है।
चिंटू कुछ पल चुप रहा। फिर धीरे से बोला—
- लेकिन...आपने कल मेरी बात का उत्तर नहीं दिया।
- कौन-सी बात?
- यही...कि उस पुराने छाते को आप इतना क्यों सँभालकर रखते हैं?
बरामदे में कुछ क्षण मौन छा गया। दूर किसी पेड़ पर बैठी कोयल ने एक लंबी कूक भरी। हवा का हल्का झोंका आया। दीवार पर टँगा पुराना छाता धीरे से हिल गया। रघुनाथ ने उसकी ओर देखा। उनकी आँखों में जैसे बरसों पुरानी वर्षा उतर आई।
उन्होंने चारपाई पर अपने पास जगह बनाते हुए कहा—- आ...इधर बैठ।
चिंटू चुपचाप उनके पास बैठ गया। रघुनाथ ने उसके सिर पर हाथ फेरा।
फिर बहुत धीमे स्वर में बोले— तुझे लगता है...यह केवल एक पुराना छाता है।
चिंटू ने मासूमियत से सिर हिला दिया।
- हाँ।
रघुनाथ हल्के से मुस्कुराए।
- जब मैं तेरी उम्र का था...तब हमारे घर में छाता नहीं था।
चिंटू की आँखें फैल गईं।
- एक भी नहीं?
- एक भी नहीं।
- फिर बारिश में कैसे जाते थे?
रघुनाथ ने बरामदे से बाहर भीगी पगडंडी की ओर देखा। कुछ देर तक देखते रहे।
फिर बोले—भीगकर।
बस...एक शब्द। लेकिन उस एक शब्द में जैसे पूरा बचपन भीग उठा।
तब स्कूल जाने के लिए तीन कोस पैदल चलना पड़ता था।बरसात होती...तो कपड़े भीग जाते। धूप निकलती... तो वही कपड़े शरीर पर सूख जाते। उस समय गरीब आदमी के पास कपड़े कम होते थे... लेकिन हिम्मत ज़्यादा होती थी।
चिंटू बिना पलक झपकाए सुन रहा था। उसे पहली बार लगा... दादाजी की दुनिया उसकी दुनिया से कितनी अलग थी।
रघुनाथ ने गहरी साँस ली।
- फिर...एक दिन ऐसी बारिश हुई...जिसने मेरी पूरी जि़ंदगी बदल दी।
चिंटू उत्सुक होकर आगे झुक आया।
- क्या हुआ था दादाजी?
रघुनाथ मुस्कुराए। लेकिन इस बार मुस्कान में कहीं दूर का दर्द था। उन्होंने उत्तर देने के बजाय दीवार पर टँगे पुराने छाते को देखा।
ऐसा लगा... जैसे कहानी उनसे नहीं... उसी से अनुमति माँग रही हो।
कुछ क्षण बाद उन्होंने धीरे से कहा—
- यह कहानी...आज नहीं...जी जाती है।
चिंटू समझ नहीं पाया।
- मतलब?
रघुनाथ ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
- आज मैं तुझे उस दिन में ले चलूँगा...जिस दिन यह छाता पहली बार हमारे घर आया था।
बरामदे में हवा फिर चली। छाते का कपड़ा हल्का-सा फडफ़ड़ाया। और वर्षों से बंद पड़ा समय... धीरे-धीरे खुलने लगा।
कुछ कहानियाँ सुनाई नहीं जातीं...
वे समय की भीगी पगडंडियों पर चलकर अगली पीढ़ी तक पहुँचती हैं।
जो धैर्य से सुन ले...उसे विरासत मिलती है।
अध्याय - 3
जिस दिन छाता घर आया
सावन उस वर्ष कुछ जल्दी ही गाँव पहुँच गया था।
आषाढ़ के अंतिम दिनों से ही बादल खेतों के ऊपर डेरा डाले बैठे थे। कभी हल्की फुहार पड़ती, कभी हवा गीली होकर लौट जाती। किसान आकाश की ओर देखकर मुस्कुराते थे। उन्हें मालूम था—इस बार धरती खाली नहीं रहेगी।
लेकिन...हर वर्षा सबके लिए एक-सी नहीं होती। जिस बारिश से किसान की आँखों में उम्मीद जन्म लेती है... उसी बारिश से मजदूर की चिंता भी बढ़ जाती है। क्योंकि खेत अपना हो तो पानी वरदान है... दूसरे का खेत हो तो वही पानी रोज़ी छीन भी सकता है।
वर्षों पहले... जब रघुनाथ प्रसाद केवल रघु कहलाते थे।
न चेहरे पर झुर्रियाँ थीं... न सिर पर सफेदी। सिर्फ़ आँखों में उजाला था। और कंधों पर जिम्मेदारियों से पहले सपने। उनके पिता का देहांत कई वर्ष पहले हो चुका था। घर में बूढ़ी माँ थीं। एक छोटी-सी झोंपड़ी। दो बिस्वा खेत। और मेहनत... जो कभी छुट्टी नहीं लेती थी। उस सुबह माँ ने मिट्टी के चूल्हे पर दो सूखी रोटियाँ सेंकीं। रोटियों के साथ थोड़ा-सा नमक और हरी मिर्च रख दी। रघु खाने बैठे तो माँ उन्हें देखती रहीं। माँ अक्सर खुद कम खाती है... लेकिन बेटे को खाते हुए भरपेट देखना चाहती है। रघु ने आधी रोटी तोडक़र उनकी ओर बढ़ाई।
- अम्मा...तुम भी खाओ।
माँ मुस्कुराईं।
- मैं खा चुकी।
रघु जानते थे...यह झूठ है। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस आधी रोटी वापस थाली में रख दी।
कुछ झूठ... घर की गरीबी छिपाने के लिए बोले जाते हैं। और कुछ झूठ... अपनों का पेट भरने के लिए। बाहर बादल फिर घिर आए थे।
माँ ने आँगन से आवाज़ दी—आज मत जा बेटा...लगता है पानी बहुत गिरेगा।
रघु ने गमछा कंधे पर रखा।
- न जाऊँगा...तो शाम को चूल्हा कैसे जलेगा?
माँ चुप हो गईं। गरीबी में कई बार... चुप्पी ही आखिरी उत्तर होती है। मंडी गाँव से तीन कोस दूर थी। रघु नंगे पाँव ही निकल पड़े। पगडंडी पर कीचड़ था। बारिश शुरू हो चुकी थी। पहले गमछा भीग गया... फिर कुर्ता... फिर पूरा शरीर। लेकिन उनके कदम नहीं रुके। उन्हें बारिश से नहीं... खाली हाथ लौटने से डर लगता था। मंडी में उस दिन असाधारण भीड़ थी। बैलगाडिय़ों पर भीगा हुआ अनाज आया था। बोरियाँ उतारने वाले मजदूर कम पड़ गए। रघु भी काम में लग गए। एक बोरी... फिर दूसरी... फिर तीसरी... गीली बोरियाँ सूखी बोरियों से कहीं अधिक भारी होती हैं।कंधे छिलने लगे। हथेलियाँ लाल हो गईं। कपड़े शरीर से चिपक गए। लेकिन सूरज ढलने तक उन्होंने काम छोड़ा नहीं।
शाम हुई। मुनीम ने मजदूरी गिनी। कुछ सिक्के... कुछ मुड़े हुए नोट। रघु ने उन्हें दोनों हथेलियों में ऐसे सँभाला... जैसे किसान पहली बार अपनी फसल छूता है। उनकी आँखों में संतोष था। आज घर में चूल्हा जलेगा। वापस लौटते समय बारिश फिर तेज़ हो गई। बाज़ार के मोड़ पर एक छोटी-सी दुकान थी। टीन की छत। लकड़ी का पुराना काउंटर। और सामने रस्सी पर टँगे कुछ काले छाते। रघु पहली बार वहाँ रुक गए। उनकी नजऱ सबसे किनारे वाले छाते पर ठहर गई। न बहुत बड़ा... न बहुत छोटा। बस... सादा। मज़बूत। जैसे दिखावे से उसका कोई संबंध ही न हो।
दुकानदार ने मुस्कुराकर पूछा— क्या देख रहे हो बेटा?
रघु झिझक गए।
- छाता...
-ले लो।
रघु ने उसकी कीमत पूछी। फिर चुप हो गए। जेब में रखी मजदूरी... कीमत से कम थी। उन्होंने धीरे से छाता वापस टाँग दिया।
-फिर कभी...
इतना कहकर वे मुड़ गए।
- अरे... सुनो! दुकानदार ने पुकारा।
रघु रुक गए।
- नाम क्या है?
- रघु।
- रोज़ मंडी आते हो?
- हाँ।
दुकानदार कुछ क्षण उन्हें देखता रहा। फिर रस्सी से वही छाता उतारा। रघु के हाथ में देते हुए बोला—
- बाकी पैसे...जब हो जाएँ, तब दे देना।
रघु हड़बड़ा गए।
- लेकिन... अगर न दे पाया तो?
दुकानदार हँस पड़ा। उसकी हँसी में व्यापार कम... विश्वास अधिक था।
वह बोला—जिस लडक़े ने अपनी भीगी रोटी से पहले अपनी माँ का हिस्सा बचाया हो... वह मेरा पैसा नहीं खाएगा।
रघु जैसे पत्थर के हो गए। उन्होंने तो सुबह का वह दृश्य किसी को नहीं बताया था। दुकानदार मुस्कुराया।सुबह तुम्हारी माँ भी यहीं से गुजऱी थीं।
रुककर कह रही थीं—भगवान करे, आज मेरे बेटे को काम मिल जाए।
बस...उसी दुआ पर उधार दे रहा हूँ।
रघु की आँखें भर आईं। उन्होंने दोनों हाथों से छाता लिया। पहली बार... उन्हें लगा... दुनिया केवल सौदे से नहीं चलती। कुछ लोग... विश्वास पर भी जीवन काट देते हैं। जब वे घर पहुँचे... माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं।
उन्होंने देखा— बेटा भीगा नहीं था। और उसके हाथ में एक नया छाता था। वे कुछ पल उसे देखती रहीं। फिर बिना कुछ पूछे... छाते को माथे से लगा लिया।
धीरे से बोलीं—ईश्वर उस अनजान आदमी का भला करे...जिसने मेरे बेटे के सिर पर आसमान बाँध दिया।
रघु ने पहली बार छाते को खोला। वह बारिश के बीच पूरी शान से फैल गया। उस क्षण... रघु को लगा... उन्होंने केवल एक छाता नहीं खरीदा। उन्होंने अपनी माँ की चिंता का एक हिस्सा कम कर दिया है। बरामदे में आज वर्षों बाद... बारिश की आवाज़ कुछ धीमी लग रही थी। शायद... अब उसके और घर के बीच... एक छाता खड़ा था।
किसी वस्तु की कीमत बाज़ार तय करता है.. लेकिन उसका मूल्य उन हाथों से बनता है, जिन्होंने उसे पाने के लिए संघर्ष किया हो।
यही कारण है कि कुछ पुरानी चीज़ें कभी पुरानी नहीं होतीं।
अध्याय - 4
जिस घर में शामें उतरती थीं
समय नदी की तरह बहता रहा। बरसातें आती रहीं... जाती रहीं। दीवार पर टँगा वह काला छाता अब केवल रघु का नहीं रहा था। धीरे-धीरे... वह पूरे घर की आदत बन गया था। जब भी बादल घिरते...
कोई कह देता—रघु... छाता ले जाना।
और जब कोई मेहमान लौटता... जानकी दरवाज़े तक आकर कहती—
बारिश तेज़ है...छाता साथ लेते जाइए।
वह छाता किसी एक आदमी का नहीं... घर का हो चुका था।
वर्षों बाद... उसी बरामदे में शहनाई बजी। आँगन में आम के पत्तों की बंदनवार सजी। दीवारों पर गोबर और गेरू से अल्पनाएँ बनीं। गाँव भर की औरतें मंगलगीत गा रही थीं। रघु की बारात लौट आई थी। घर में पहली बार... जानकी ने दुल्हन बनकर कदम रखा। उनके पायल की पहली रुनझुन आज भी बरामदे की दीवारों में कहीं छिपी होगी। उस दिन भी मौसम ने जैसे इस घर का साथ दिया था। दोपहर तक तेज़ वर्षा हुई। सबको चिंता होने लगी—बारात कैसे लौटेगी?
रघु मुस्कुराए। उन्होंने वही पुराना छाता उठाया। पहले अपनी माँ को उसके नीचे खड़ा किया। फिर जानकी को। और स्वयं भीगते हुए दोनों को आँगन पार कराया। माँ ने हँसकर कहा—
- अरे पगले... खुद भी तो नीचे आ जा।
रघु हँसे।
- जिसके सिर पर दो-दो दुआएँ हों...उसे बारिश क्या बिगाड़ेगी?
जानकी ने पहली बार अपने पति की ओर देखा। उस एक वाक्य में उन्हें अपने पूरे जीवन का सहारा दिखाई दे गया। दिन बीतते गए। आँगन में तुलसी बड़ी होती गई। बरामदे की दीवार पर समय की परतें चढ़ती गईं। और घर में... दो नन्हीं किलकारियाँ गूँज उठीं। पहले सुरेश। फिर महेश। घर छोटा था... लेकिन खुशियाँ बड़ी थीं। बरसात के दिनों में दोनों भाई बरामदे में कागज़ की नाव चलाते। जानकी बार-बार डाँटतीं— "अरे बाहर मत भागो... बीमार पड़ जाओगे।
और तभी... रघु हँसते हुए दीवार से छाता उतारते। दोनों बच्चों को उसके नीचे खड़ा कर लेते। छाता छोटा था। तीन लोग ठीक से नहीं समाते थे। फिर भी... किसी को शिकायत नहीं होती थी।
सुरेश कहता—बाबा... मुझे ज़्यादा जगह दो।
महेश हँसकर उसे धक्का देता—नहीं... मैं पहले आया हूँ।
रघु दोनों को अपनी बाँहों में खींच लेते।
- अरे...छाते में जगह कम हो सकती है... बाप के दिल में नहीं।
बारिश बाहर गिरती रहती। और उस छोटे-से छाते के नीचे... पूरा संसार समा जाता। समय का पहिया घूमता रहा। सुरेश स्कूल जाने लगा। महेश भी उसके पीछे-पीछे। हर सुबह जानकी दोनों के बस्ते सँभालतीं। रघु उनके सिर पर हाथ फेरते। और यदि बादल घिरे होते... तो वही पुराना छाता उनके साथ चलता। पहले सुरेश को स्कूल छोड़ता। फिर लौटकर महेश को। फिर रघु खेत चले जाते। गाँव के लोग अक्सर हँसते—
- अरे रघु... नया छाता ले ले।
यह अब बूढ़ा हो गया। रघु मुस्कुरा देते।
- जिसने साथ निभाना सीख लिया हो... उसे बदलते नहीं।
लोग हँसकर आगे बढ़ जाते। पर रघु की बात... हवा में कहीं रह जाती।
एक दिन शाम को बिजली चली गई। पूरा गाँव अँधेरे में डूब गया। बरामदे में लालटेन जल उठी। जानकी रोटियाँ सेंक रही थीं। सुरेश किताब पढ़ रहा था। महेश दादी की गोद में सिर रखे सो गया था। रघु चुपचाप दरवाज़े पर बैठे वर्षा देख रहे थे। अचानक सुरेश ने पूछा—बाबा...
- हाँ बेटा?
- हमारे घर में सबसे पुरानी चीज़ क्या है?
रघु ने बिना सोचे दीवार की ओर देखा। फिर बोले—वह छाता।
- इतना पुराना क्यों रखा है?
रघु ने मुस्कुराकर उत्तर दिया—क्योंकि... जिस दिन घर अपनी पुरानी चीज़ों को भूलने लगता है... उस दिन वह अपने पुराने लोगों को भी भूलने लगता है।
जानकी ने रोटी पलटते-पलटते एक क्षण के लिए उनकी ओर देखा। न जाने क्यों... उस वाक्य ने उनके मन में एक हल्की-सी बेचैनी छोड़ दी। उन्हें लगा... जैसे समय कहीं बहुत दूर खड़ा... धीरे-धीरे उनकी ओर चला आ रहा हो। रात गहरी हो गई। बच्चे सो चुके थे। बरामदे की लालटेन बुझा दी गई। सिर्फ़ बाहर बारिश की बूँदें थीं... और दीवार पर टँगा वह पुराना छाता। वह आज भी उतना ही शांत था। लेकिन... यदि कोई ध्यान से देखता... तो समझ जाता... कि उस छाते पर अब केवल पानी की बूँदें नहीं थीं। उस पर... इस घर के हँसते हुए वर्षों की स्मृतियाँ भी टँगी थीं।
घर ईंटों से नहीं बसते...वे छोटी-छोटी आदतों से बनते हैं।
और जब आदतें बदलने लगती हैं...तो दीवारें बहुत देर तक घर नहीं रह पातीं।
अध्याय - 5
जब घर में मेरा शब्द आया
जेठ की दोपहर थी। आकाश बिल्कुल साफ़ था। हवा जैसे कहीं दूर जाकर बैठ गई थी। खेतों में गेहूँ की कटाई समाप्त हो चुकी थी। खलिहान में सुनहरे दानों के ढेर लगे थे, लेकिन मिट्टी की वह परिचित महक अब धीरे-धीरे कम होने लगी थी। गाँव बदल रहा था। अब बैलगाडिय़ों के साथ-साथ मोटरसाइकिलें भी दिखाई देने लगी थीं। कुछ लडक़े शहर पढऩे जाने लगे थे। कुछ किसान अपनी ज़मीन के दाम पूछने लगे थे। समय चुपचाप गाँव की चौपाल पर आ बैठा था। और किसी को उसकी आहट भी नहीं हुई। बरामदे की वही पुरानी दीवार थी। उसी कील पर पुराना छाता टँगा था। लेकिन अब उसके नीचे खेलने वाले बच्चे बड़े हो चुके थे। सुरेश शहर के कॉलेज से पढक़र लौट आया था। महेश भी अब जवान हो गया था। दोनों की आँखों में अपने-अपने सपने थे। रघुनाथ प्रसाद जब उन्हें देखते, तो मन ही मन ईश्वर का धन्यवाद करते।
- मेरी गरीबी मेरे बच्चों तक नहीं पहुँची...
वे अक्सर यही सोचते। उस दिन दोपहर का भोजन साथ हो रहा था। जानकी रोटियाँ सेंक रही थीं। रघुनाथ चौकी पर बैठे थे। सुरेश सामने था। महेश बगल में। बरामदे में एक ऐसी शांति थी, जो केवल अपने घरों में मिलती है।
तभी सुरेश ने धीरे से कहा—बाबूजी...
- हाँ बेटा।
- शहर में एक नौकरी का अवसर मिला है।
रघुनाथ का चेहरा खिल उठा।
- अरे वाह! यह तो बहुत अच्छी बात है।
- लेकिन...
सुरेश रुक गया।
- कुछ रुपये लगाने पड़ेंगे।
रघुनाथ ने बिना एक पल सोचे कहा—जितना होगा, हो जाएगा।
महेश मुस्कुराया। जानकी ने भगवान का नाम लिया। उस दिन घर में किसी ने पैसों का हिसाब नहीं लगाया। घरों में जब बेटे उड़ान भरते हैं... तो पिता पहले पंख देखते हैं...कीमत नहीं। कुछ ही महीनों बाद सुरेश शहर चला गया। शुरू-शुरू में हर सप्ताह चिट्ठी आती। फिर महीने में एक। फिर... सिर्फ़ फ़ोन आने लगे। रघुनाथ हर शाम डाकिए की घंटी सुनते। फिर स्वयं ही मुस्कुरा देते।
- अब ज़माना बदल गया है...
वे कहते। लेकिन डाकिए के जाने के बाद... बरामदे में कुछ देर तक यूँ ही बैठे रहते। जैसे आदत अभी भी चिट्ठियों की हो। महेश गाँव में ही रहा। खेती संभालने लगा। लेकिन अब खेती पहले जैसी नहीं रही थी। खाद महँगी हो गई थी। बीज बदल गए थे। मौसम भी पहले जैसा भरोसेमंद नहीं रहा। एक शाम वह थका हुआ घर लौटा। उसने चुपचाप लोटे का पानी पिया।
फिर बोला—बाबूजी...
- हाँ?
- अगर पश्चिम वाला छोटा खेत बेच दें... तो ट्रैक्टर आ जाएगा।
रघुनाथ कुछ क्षण चुप रहे। उन्होंने बाहर आँगन की ओर देखा। वहीं... जहाँ कभी सुरेश और महेश मिट्टी के घरौंदे बनाया करते थे।उन्होंने बहुत शांत स्वर में पूछा—खेत बेचकर खेती बचाएँगे?
महेश ने सिर झुका लिया।
- समय ऐसा ही है बाबूजी।
रघुनाथ ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
- मैं तेरी बात समझता हूँ बेटा...
और सचमुच... वे समझते थे। समस्या बेटे में नहीं थी। समय बदल गया था। उसी रात बारिश हुई। बहुत दिनों बाद। रघुनाथ बरामदे में आए। दीवार से पुराना छाता उतारा। उसे खोला। फिर बरसते आकाश की ओर देखते रहे। जानकी भी पास आ गईं।
- क्या सोच रहे हो?
रघुनाथ मुस्कुराए।
- याद है...जब यह छाता लाया था?
जानकी हँस पड़ीं।
- कैसे भूलूँ? तुम खुद भीगते थे... हमें इसके नीचे रखते थे।
कुछ पल दोनों चुप रहे।
फिर जानकी ने धीमे से पूछा—मन भारी है?
रघुनाथ ने उत्तर दिया—नहीं...
फिर थोड़ा रुककर बोले—बस... आज पहली बार लगा... घर में ज़रूरतें बढ़ गई हैं... और बातें छोटी हो गई हैं।
जानकी ने उनकी ओर देखा। वह जानती थीं... रघुनाथ शिकायत नहीं करते। वे केवल महसूस करते हैं। अगली सुबह सुरेश का फ़ोन आया। वह जल्दी में था।
- बाबूजी, बाद में बात करता हूँ...मीटिंग है।
फ़ोन कट गया। रघुनाथ कुछ क्षण मोबाइल देखते रहे। फिर उसे धीरे से मेज़ पर रख दिया। उन्होंने कुछ नहीं कहा। लेकिन उसी क्षण... बरामदे की दीवार पर टँगा पुराना छाता हवा से हल्का-सा हिल गया। जैसे किसी ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा हो—
- दूरी हमेशा मीलों से नहीं बनती...
कभी-कभी कुछ अधूरी बातचीत भी बहुत दूर ले जाती है।
रिश्ते एक दिन में नहीं बदलते। वे पहले इंतज़ार कम करते हैं...
फिर बातचीत कम होती है...और एक दिन...घर में हम की जगह मैं आ जाता है।
अध्याय - 6
आँगन के बीच की रस्सी
भादों का महीना था। रात भर हुई वर्षा के बाद सुबह का आकाश धुला-धुला लग रहा था। तुलसी के पत्तों पर पानी की बूँदें ठहरी थीं। नीम की डालियों से टपकता पानी मिट्टी में समा रहा था। हवा में एक ऐसी ठंडक थी, जो बरसात के अंतिम दिनों में ही उतरती है। रघुनाथ प्रसाद रोज़ की तरह सबसे पहले बरामदे में आए। उन्होंने तुलसी को जल चढ़ाया। दोनों हथेलियाँ जोडक़र आँखें बंद कीं। फिर उनकी नजऱ अनायास उसी कील पर चली गई। पुराना छाता आज भी वहीं था। उन्होंने मुस्कुराकर उसे देखा। जैसे हर सुबह किसी पुराने मित्र का हाल पूछते हों। घर अब पहले से बड़ा लगने लगा था। सुरेश की शादी हो चुकी थी। कुछ ही महीनों बाद महेश भी विवाह बंधन में बँध गया। दो नई बहुओं के आने से आँगन में फिर रौनक लौट आई। सुबह एक रसोई से मसालों की खुशबू आती। दूसरी ओर से हँसी की आवाज़। जानकी का चेहरा वर्षों बाद इतना निश्चिंत दिखाई देता था।
वे अक्सर भगवान से कहतीं—अब हमें और क्या चाहिए?
रघुनाथ हँसकर कहते—बस...इतना कि यह हँसी बनी रहे।
होली, दीपावली, तीज... हर त्योहार पहले की तरह साथ मनाया जाता। रात को सब एक ही चौके में बैठकर भोजन करते। बच्चे बरामदे में खेलते। बहुएँ एक-दूसरे के हाथों की मेहंदी की तारीफ़ करतीं। कभी-कभी सुरेश शहर की बातें सुनाता। महेश खेतों की। रघुनाथ दोनों को सुनते रहते। उन्हें लगता... उनका घर अब दो दुनियाओं को साथ लेकर चल रहा है। एक दिन जानकी ने पापड़ बनाने का निश्चय किया। आँगन में बड़ी-सी रस्सी बाँधी गई। एक कोने से दूसरे कोने तक। उस पर सफेद कपड़ा डाला गया। फिर पापड़ सूखने रख दिए गए। आँगन दो हिस्सों में बँट गया। एक ओर धूप थी। दूसरी ओर छाया। चिंटू और गुडिय़ा खेलते-खेलते रस्सी के दोनों ओर खड़े हो गए।
चिंटू हँसकर बोला—
- यह मेरी तरफ़ है!
गुडिय़ा भी हँस पड़ी— नहीं...यह मेरी!
दोनों खिलखिलाकर हँसने लगे। बरामदे में बैठे रघुनाथ भी मुस्कुराए। लेकिन... उनकी मुस्कान कुछ ही क्षण रही। न जाने क्यों... उनकी आँखें उस रस्सी पर टिक गईं। उन्हें लगा... रस्सियाँ चाहे कपड़े सुखाने के लिए बाँधी जाएँ... धीरे-धीरे आदत भी बन जाती हैं। दोपहर बाद सुरेश शहर लौटने की तैयारी करने लगा।
बहू ने पूछा—इतनी जल्दी?
- ऑफिस है।
-एक दिन और रुक जाते।
सुरेश ने मुस्कुराकर कहा—अगली बार।
यह अगली बार बहुत साधारण शब्द था। लेकिन रघुनाथ ने देखा— अब यह शब्द पहले से ज़्यादा बोला जाने लगा है।
महेश खेत से लौटा। थका हुआ था। रघुनाथ ने पूछा—कैसी रही खेती?
महेश ने लोटे का पानी पीते हुए कहा—खेती ठीक है बाबूजी... बस मौसम का भरोसा नहीं।
रघुनाथ ने धीमे स्वर में कहा—मौसम का भरोसा कभी नहीं रहा बेटा। आदमी भरोसा निभाता है... तो मौसम भी हार मान जाता है।
महेश मुस्कुरा दिया। लेकिन उसके चेहरे की थकान नहीं गई।
शाम ढल रही थी। बारिश फिर शुरू हो गई। रघुनाथ बरामदे में बैठे-बैठे बच्चों को देख रहे थे। चिंटू और गुडिय़ा उसी रस्सी के नीचे दौड़ रहे थे। अचानक हवा का तेज़ झोंका आया। रस्सी खुलकर नीचे गिर गई। दोनों बच्चे डर गए। रघुनाथ तुरंत उठे। उन्होंने पहले बच्चों को अपनी ओर खींचा। फिर दीवार से पुराना छाता उतार लिया। बच्चों को उसके नीचे खड़ा कर दिया। चिंटू हँस पड़ा।
- दादाजी... यह तो अभी भी बिल्कुल मज़बूत है!
रघुनाथ ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—बेटा... मज़बूती नई होने से नहीं आती...निभाने से आती है।
जानकी दूर खड़ी यह दृश्य देख रही थीं। उन्होंने मन-ही-मन भगवान का धन्यवाद किया। उन्हें क्या पता था... यही छाता... एक दिन इस घर की सबसे बड़ी याद बन जाएगा।
रात गहरा चुकी थी। सब अपने कमरों में जा चुके थे। रघुनाथ अकेले बरामदे में बैठे थे। उन्होंने धीरे से रस्सी को समेटा। उसे दीवार के सहारे रख दिया। फिर बहुत देर तक उसे देखते रहे।
धीरे से बोले—रस्सियाँ...घर में रहें...मन में नहीं।
हवा चली। दीवार पर टँगा पुराना छाता हल्का-सा हिला। जैसे उसने भी उस बात से सहमति जताई हो।
दीवारें ईंटों से बनती हैं...लेकिन दूरियाँ दिखाई नहीं देतीं।
वे पहले आदत बनती हैं...फिर स्वभाव...और अंत में नियति।
अध्याय - 7
आखिरी होली
फाल्गुन की हवा में एक अलग ही मिठास होती है। गेहूँ की बालियाँ पकने लगती हैं। सरसों के फूल विदा लेने लगते हैं। पेड़ों पर नई कोंपलें फूटती हैं। और गाँव... होली की तैयारी में लग जाता है। इस बार भी गाँव में वही उत्साह था। चौपाल पर ढोलक की थाप सुनाई दे रही थी। बच्चे गलियों में रंग लेकर दौड़ रहे थे। औरतें गुजिया तल रही थीं। हर घर में हँसी थी। लेकिन... हर हँसी एक जैसी नहीं थी। रघुनाथ प्रसाद सुबह-सुबह बरामदे में बैठे थे। उनके सामने पुरानी पीतल की थाली रखी थी। उसमें गुलाल था। हर वर्ष की तरह उन्होंने सबसे पहले तुलसी पर थोड़ा-सा गुलाल चढ़ाया। फिर दोनों हथेलियाँ जोडक़र बोले—सबके घर रंग बने रहें।
उनकी प्रार्थना छोटी थी... लेकिन उसके भीतर पूरे परिवार की चिंता छिपी थी। धीरे-धीरे घर के सभी लोग इकट्ठा होने लगे। सुरेश भी शहर से आया था। महेश पहले से ही घर पर था। बच्चे सबसे अधिक उत्साहित थे। चिंटू दौडक़र आया और बोला—
- दादाजी...पहले आपको रंग लगाऊँगा।
रघुनाथ हँस पड़े।
- अरे...इतना भी बूढ़ा नहीं हुआ कि भाग न सकूँ।
पूरा आँगन हँसी से भर गया। चिंटू ने उनके गाल पर गुलाल लगाया। रघुनाथ ने उसे गले लगा लिया। फिर सुरेश और महेश आगे बढ़े। दोनों ने झुककर पिता के चरण छुए। रघुनाथ ने दोनों के सिर पर हाथ रखा। क्षण भर के लिए उन्हें लगा... समय यहीं रुक जाए।
दोपहर तक घर में मेहमानों का आना-जाना लगा रहा। किसी ने ढोल बजाया। किसी ने फाग गाया। बहुएँ रसोई में व्यस्त रहीं। सब कुछ पहले जैसा ही था। लेकिन... रघुनाथ की अनुभवी आँखें एक छोटी-सी बात बार-बार देख रही थीं। सुरेश बार-बार मोबाइल देख रहा था। महेश बार-बार खेत की बात कर रहा था। बच्चे अपने खेल में खोए थे। जानकी रसोई और आँगन के बीच दौड़ती रहीं। सब साथ थे... पर सब अपने-अपने भीतर भी थे। दोपहर के बाद हल्की फुहार पडऩे लगी। होली के दिन बरसात गाँव में शुभ मानी जाती थी।
चिंटू खुशी से चिल्लाया—दादाजी...
- बारिश!
रघुनाथ मुस्कुराए। उन्होंने बरामदे की ओर देखा। दीवार पर पुराना छाता टँगा था। उन्होंने उसे उतारा। धीरे से खोला। फिर चिंटू और गुडय़िा को उसके नीचे खड़ा कर दिया। दोनों खिलखिलाकर हँसने लगे। छाता छोटा पड़ गया। रघुनाथ का एक कंधा बाहर रह गया। बारिश उनकी पीठ भिगो रही थी।
चिंटू बोला—दादाजी... आप भी अंदर आ जाइए।
रघुनाथ ने हँसते हुए कहा—बेटा... बड़ों को थोड़ा भीगना पड़ता है... तभी छोटे सूखे रहते हैं।
जानकी बरामदे से यह दृश्य देख रही थीं। उनकी आँखें अनायास भर आईं। उन्हें याद आया... बरसों पहले... एक और होली थी। एक और बारिश।
और रघु... तब भी ऐसे ही भीग रहे थे। समय बदल गया था। आदमी नहीं।
शाम को सब अपने-अपने कमरों में चले गए।सुरेश ने कहा—सुबह जल्दी निकलना है बाबूजी। ऑफि़स पहुँचना है।
रघुनाथ ने केवल इतना कहा—ठीक है बेटा।
वे कुछ और कहना चाहते थे। शायद—
- एक दिन और रुक जा।
लेकिन उन्होंने कहा नहीं। प्यार... जब उम्रदराज़ हो जाता है... तो आग्रह करना छोड़ देता है। रात गहरा गई। बरामदे में केवल रघुनाथ और जानकी बैठे थे। दूर कहीं ढोलक की आखऱिी थाप सुनाई दे रही थी।
जानकी ने धीमे स्वर में पूछा—क्या सोच रहे हो?
रघुनाथ मुस्कुराए।
- याद है... जब बच्चे छोटे थे... होली के अगले दिन तक आँगन से रंग नहीं जाते थे।
जानकी बोलीं—अब भी तो हैं रंग।
रघुनाथ ने आँगन की ओर देखा। फिर बहुत धीरे से बोले—हाँ...रंग हैं... बस... अब सबके हाथों में अलग-अलग हैं।
जानकी ने उनकी ओर देखा। इस बार उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। क्योंकि कुछ वाक्य... सिर्फ़ सुने जाते हैं। समझे बहुत बाद में जाते हैं।
उस रात देर तक वर्षा होती रही। दीवार पर टँगा पुराना छाता सूख रहा था। और उसके ठीक सामने बैठे रघुनाथ प्रसाद... पहली बार... थोड़े थके हुए लग रहे थे।
त्योहार केवल रंगों का नहीं होता...एक साथ बैठने का भी होता है।
जब लोग साथ तो हों..पर समय अलग-अलग जी रहे हों..
तो समझ लेना चाहिए कि ऋतु नहीं...युग बदल रहा है।
अध्याय - 8
आखिरी बरसात
सावन फिर लौट आया था। उम्र चाहे जितनी बढ़ जाए... बरसात हर वर्ष उसी उत्साह से आती है। धरती हर बार भीगती है। पेड़ हर बार झूमते हैं। बस... कुछ लोग हर सावन में थोड़े और बूढ़े हो जाते हैं। रघुनाथ प्रसाद भी अब पहले जैसे नहीं रहे थे। चलते समय लाठी का सहारा लेने लगे थे।
सीढय़िाँ धीरे-धीरे उतरते। साँस पहले से जल्दी फूल जाती। लेकिन उनकी एक आदत आज भी नहीं बदली थी। हर सुबह... तुलसी को जल चढ़ाना। और... दीवार पर टँगे पुराने छाते को एक बार अवश्य देखना। जैसे दोनों से ही दिन की शुरुआत होती हो। उस दिन सुबह से ही बादल घिरे थे। हवा में मिट्टी की भीनी-भीनी गंध थी। रघुनाथ बरामदे में बैठे वर्षा की प्रतीक्षा कर रहे थे। चिंटू, जो अब किशोर हो चुका था, उनके पास आकर बैठ गया। कुछ देर दोनों चुप रहे।
फिर चिंटू ने धीरे से पूछा—दादाजी...एक बात पूछूँ?
- पूछ बेटा।
- आप रोज़ इस छाते को देखते क्यों हैं?
रघुनाथ ने छाते की ओर देखा। फिर मुस्कुराए।
- क्योंकि... इसने मुझे हमेशा याद दिलाया... कि आदमी की कीमत उसके नए होने में नहीं... उसके निभाने में होती है।
चिंटू चुपचाप सुनता रहा। पहली बूँद गिरी। फिर दूसरी। और कुछ ही क्षणों में मूसलाधार वर्षा शुरू हो गई। बिजली चमकी। तेज़ हवा चली। बरामदे की छत से पानी धार बनकर गिरने लगा। अचानक आँगन में बँधी तुलसी की मड़ैया का बाँस टूट गया। चिंटू घबरा गया।
- दादाजी!
रघुनाथ बिना देर किए उठ खड़े हुए। दीवार से पुराना छाता उतारा। उसे खोला। और धीमे-धीमे आँगन की ओर बढ़े। चिंटू भी उनके पीछे भागा। बरसात बहुत तेज़ थी। रघुनाथ ने पहले तुलसी को सीधा किया। फिर टूटा हुआ बाँस ठीक से गाड़ दिया। जब तक वे लौटे... उनका आधा शरीर भीग चुका था।
चिंटू बोला—दादाजी... इतनी बारिश में क्यों गए?
रघुनाथ ने मुस्कुराकर कहा—जिस घर ने हमें जीवन दिया हो... उसकी रक्षा करने में देर नहीं करनी चाहिए।
रात तक उन्हें हल्का ज्वर हो गया। जानकी ने माथे पर हाथ रखा।
- बुखार है।
सुरेश को फ़ोन किया गया। महेश भी कमरे में आ गया। बहुएँ काढ़ा बनाने लगीं। घर में हलचल थी। रघुनाथ सबको देख रहे थे। उनके चेहरे पर चिंता नहीं... संतोष था। धीरे से बोले—देखा जानकी... जब ज़रूरत पड़ती है... सब एक साथ आ ही जाते हैं।
जानकी की आँखें भर आईं। उन्होंने मुँह फेर लिया। आधी रात बीत चुकी थी। बारिश थम गई थी। बरामदे में केवल पानी टपकने की आवाज़ रह गई थी।
रघुनाथ ने धीरे से कहा—चिंटू...
वह तुरंत पास आ गया।
- जी दादाजी।
रघुनाथ ने उसकी हथेली अपने हाथ में ली। फिर दीवार पर टँगे छाते की ओर इशारा किया।
- जब मैं न रहूँ...
चिंटू ने तुरंत बात काट दी।
- ऐसी बातें मत करो दादाजी।
रघुनाथ मुस्कुराए।
- सुन ले बेटा... जीवन में कुछ बातें समय रहते सुन लेनी चाहिए।
कमरे में गहरा मौन था। सुरेश और महेश भी पास आ गए।
रघुनाथ बहुत धीरे बोले—इस छाते को कभी फेंकना मत।
सबकी नजऱ छाते पर चली गई।
उन्होंने आगे कहा—यह इसलिए नहीं कि यह पुराना है...बल्कि इसलिए कि यह तुम्हें याद दिलाता रहेगा...
घर में जो सबसे पुराना हो...उसे सबसे पहले नहीं... सबसे अधिक संभाला जाता है।
इतना कहकर उन्होंने आँखें बंद कर लीं। कमरे में किसी ने कोई शब्द नहीं कहा। बाहर बादलों के पीछे से चाँद धीरे-धीरे निकल आया था।
भोर की पहली किरण खिडक़ी से भीतर आई। जानकी ने उन्हें जगाना चाहा।
- सुनते हो...
कोई उत्तर नहीं मिला। उन्होंने फिर कंधा हिलाया। रघुनाथ वैसे ही शांत लेटे रहे। चेहरे पर वैसी ही मुस्कान थी... जैसे रात को सोते समय थी। उन्होंने किसी को जगाया नहीं। किसी को पुकारा नहीं। बस... जीवन की लंबी यात्रा पूरी करके... चुपचाप आगे बढ़ गए। बरामदे में हवा चली।
दीवार पर टँगा पुराना छाता हल्का-सा हिला। ऐसा लगा... जैसे उसने भी अपने सबसे पुराने साथी को अंतिम प्रणाम किया हो।
कुछ लोग जाते नहीं...वे घर की आदत बन जाते हैं।
और जब आदतें अचानक छूटती हैं...तब घर बहुत दिनों तक खाली-खाली रहता है।
अध्याय - 9
पुराना छाता
रघुनाथ प्रसाद को गए आज पूरे एक वर्ष हो चुका था। समय ने अपना काम कर दिया था। बरामदे की दीवार पर सफेदी फिर से हो गई थी। आँगन की टूटी मेड़ भी बन चुकी थी। तुलसी का चौरा पहले से अधिक हरा दिखाई देता था। लेकिन... कुछ खालीपन ऐसे होते हैं... जिन्हें समय भी भरना नहीं जानता। सुबह अब भी होती थी। सूरज पहले की तरह उगता था। चिडिय़ाँ पहले की तरह चहकती थीं। पर बरामदे में अब कोई तुलसी को जल चढ़ाकर दीवार की ओर मुस्कुराकर नहीं देखता था। वह आदत... रघुनाथ अपने साथ ले गए थे। चिंटू अब कॉलेज में पढऩे लगा था। चेहरे पर हल्की मूँछें उग आई थीं। बचपन की शरारतों की जगह अब जिम्मेदारियाँ दिखाई देने लगी थीं। उस दिन वह शहर से छुट्टियों में घर लौटा। आसमान में बादल थे। हवा में वही भीनी-भीनी गंध... जो हर सावन के साथ लौटती थी। बरामदे में कदम रखते ही उसकी नजऱ अनायास दीवार पर चली गई। पुराना छाता...
आज भी उसी कील पर टँगा था। धूल की एक पतली परत उस पर जम गई थी। किसी ने उसे छुआ तक नहीं था। चिंटू धीरे-धीरे उसके पास गया। हाथ बढ़ाया। धूल झाड़ी। और बहुत सावधानी से उसे उतार लिया। उसे ऐसा लगा... जैसे वह कोई छाता नहीं... दादाजी की हथेली पकड़ रहा हो। उसी समय बाहर तेज़ वर्षा शुरू हो गई। आँगन में कपड़े सूख रहे थे। तेज़ हवा चली। रस्सी झूलने लगी। चिंटू बिना कुछ सोचे बरामदे से बाहर निकल पड़ा। उसने पुराना छाता खोला। एक पल के लिए उसे लगा... शायद अब यह नहीं खुलेगा। लेकिन... हल्की-सी आवाज़ के साथ उसकी सारी सलाखें फैल गईं। छाता पहले की तरह तनकर खड़ा हो गया। चिंटू की आँखें अनायास भर आईं। उसे लगा... कुछ लोग सचमुच... जाने के बाद भी साथ निभाते रहते हैं। वह आँगन में पहुँचा। एक हाथ से कपड़े समेटे। दूसरे हाथ से छाता थामे रहा। बारिश तेज़ होती गई। अचानक उसकी नजऱ तुलसी पर पड़ी। हवा से उसका दीपक बुझ गया था। उसे बरबस दादाजी की बात याद आई—
- जिस घर ने हमें जीवन दिया हो...
- उसकी रक्षा करने में देर नहीं करनी चाहिए।
उसने पहले कपड़े नहीं उठाए। पहले तुलसी के चौरे को संभाला। फिर दीपक दोबारा जलाया। उसी क्षण... उसे पहली बार लगा... वह अब केवल चिंटू नहीं रहा। उसके भीतर... रघुनाथ का एक छोटा-सा अंश जाग उठा था। शाम को पूरा परिवार बरामदे में बैठा था। सुरेश शहर से आया हुआ था। महेश भी वहीं था। बहुएँ रसोई में थीं। बच्चे खेल रहे थे। बारिश अब भी हो रही थी। चिंटू चुपचाप उठा। दीवार से पुराना छाता उतारा। सबके सामने लाकर रख दिया।
सुरेश ने पूछा—क्या हुआ?
चिंटू ने धीरे से कहा—पिताजी... इसे साफ़ कर लेते हैं।
महेश मुस्कुरा दिया।
- अरे...अब इसका क्या काम?
चिंटू ने पहली बार दृढ़ स्वर में कहा—
- काम...
फिर कुछ क्षण रुककर बोला—
- दादाजी भी तो अब कोई काम नहीं करते... क्या इसलिए उन्हें भूल जाएँ?
पूरा बरामदा एकदम शांत हो गया। महेश की झुकी हुई आँखें धीरे-धीरे ऊपर उठीं। सुरेश ने पहली बार उस छाते को ध्यान से देखा। जानकी की आँखों से आँसू चुपचाप बह निकले। किसी ने कुछ नहीं कहा। क्योंकि... कुछ उत्तर शब्दों से नहीं... मौन से दिए जाते हैं।
रात को चिंटू ने एक साफ़ कपड़ा लिया। पुराने छाते की धूल पोंछी। उसका बाँस का हत्था तेल से चमकाया। ढीले धागे धीरे-धीरे भीतर कर दिए। फिर उसे उसी पुरानी कील पर टाँग दिया। अब वह पहले से अधिक सुंदर नहीं लगा। लेकिन... पहले से अधिक अपना लगने लगा। बरसात लगातार हो रही थी। हवा बरामदे में चली आई। छाता हल्का-सा हिला। चिंटू ने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा।
उसे लगा... जैसे दादाजी फिर कह रहे हों—
- बेटा...पुरानी चीज़ों को संभालकर रखना।
- वे एक दिन...तुम्हें तुम्हारी जड़ें लौटा देती हैं।
चिंटू ने दोनों हाथ जोडक़र दीवार की ओर देखा।
धीरे से बोला—दादाजी...अब यह छाता मैं संभालूँगा।
और...आपके बनाए हुए इस घर को भी।
बरामदे के बाहर बारिश अपनी ही लय में बरसती रही। तुलसी के पत्ते चमकते रहे। हवा चलती रही। दीवार पर टँगा पुराना छाता स्थिर था। लेकिन... अब वह केवल एक छाता नहीं था। वह उस घर की स्मृति था। उस घर का संस्कार था। उस घर का सबसे बूढ़ा सदस्य... जो आज भी चुपचाप सबके सिर पर अपनी छाया फैलाए खड़ा था।---
बरगद फल नहीं देता... फिर भी उसकी छाया में राहगीर विश्राम पाते हैं।
दीपक सूरज नहीं होता... फिर भी अँधेरे घर का रास्ता दिखा देता है।
और...घर का सबसे बुज़ुर्ग व्यक्ति...
शायद सबसे अधिक काम करता हुआ दिखाई नहीं देता।
लेकिन... जब वह चला जाता है...
तब पता चलता है— घर की छत तो दीवारों पर टिकी थी...
घर का आसमान तो उसी के कंधों पर था।
उस दिन के बाद...
जब भी सावन आता...
चिंटू सबसे पहले दीवार पर टँगे उस पुराने छाते की धूल साफ़ करता।
क्योंकि उसने समझ लिया था—
कुछ चीज़ें बारिश से बचाने के लिए नहीं होतीं...
वे मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने के लिए होती हैं।
"उस वर्ष भी सावन आया।
बरसात पहले जैसी ही थी।
बस...इस बार घर के सबसे पुराने छाते को किसी ने बेकार नहीं कहा।"
।। इतिश्री ।।
