👤

🌟 Anant Sant 🌟

Anant Sant - YouTube Playlists

अनंत साहित्य

पुरानी चौपाल

 


गाँव के बीचों-बीच

बरगद की छाँव में
एक चौपाल हुआ करती थी...

कुछ चारपाइयाँ,
एक पुराना हुक्का,
और शाम होते ही
पूरा गाँव वहाँ बैठ जाया करता था।

वहाँ सिर्फ़ बातें नहीं होती थीं,
रिश्ते बुने जाते थे।

किसी की बेटी का रिश्ता हो,
किसी बेटे की नौकरी,
किसी खेत की मेड़ का झगड़ा
या किसी घर की चिंता...

सबकी बात
सबकी होती थी।

किसी के घर रूठे लोग
चौपाल से हँसते हुए लौटते थे,
टूटे रिश्ते
वहीं बैठकर जुड़ जाते थे।

वहीं हँसी थी,
वहीं ठिठोली थी,
वहीं बुज़ुर्गों की सीख थी...

और वहीं
गाँव का आने वाला कल
बैठकर तय होता था।

चौपाल पर लोग
सिर्फ़ बैठते नहीं थे,
एक-दूसरे के लिए
खड़े होते थे।

फिर समय बदला...

घर पक्के हो गए,
सड़कें चमकने लगीं,
हर हाथ में मोबाइल आ गया।

और धीरे-धीरे...

बरगद की छाँव रह गई,
चौपाल खाली हो गई।

अब लोग
अपने-अपने घरों में हैं,
अपने-अपने कमरों में हैं...

और कभी-कभी
उसी कमरे में बैठे-बैठे
पूरी दुनिया से जुड़े हैं,

फिर भी...

अपने ही घर में अकेले हैं।

सैकड़ों "लाइक" मिलते हैं,
दर्जनों "कमेंट" आते हैं,

लेकिन जब दिल सच में भारी हो...

तो पूछने वाला कोई नहीं—

"क्या हुआ?"

ऑनलाइन दोस्त बहुत हैं,
पर पास बैठकर
चुप्पी समझने वाला
शायद कोई नहीं।

हँसी अब इमोजी में है,
अपनापन स्क्रीन पर है,

और रिश्ते...

धीरे-धीरे
उँगलियों के बीच से
फिसल रहे हैं।

कभी चौपाल पर
कोई चुप बैठा होता था,

तो पास बैठा आदमी
बिना पूछे समझ जाता था—

"आज मन ठीक नहीं है।"

आज कोई घंटों ऑनलाइन रहे,
फिर भी...

किसी को खबर नहीं
कि उसके भीतर
कितना शोर है।

आज भी वह पुराना बरगद
वहीं खड़ा है।

उसकी छाँव में
शायद अब भी
वही अपनापन इंतज़ार करता है।

चारपाइयाँ भी हैं...

बस लोग नहीं हैं।

कभी-कभी लगता है...

बरगद की पत्तियाँ
हवा में नहीं,

हमसे कह रही हैं—

"लौट आओ...

थोड़ी देर
फिर से पास बैठो।

किसी की बात सुनो,
किसी का हाथ पकड़ो,
किसी रूठे को मना लो...

क्योंकि
ज़िंदगी केवल
ऑनलाइन जुड़े रहने का नाम नहीं।"

चौपाल कोई जगह नहीं थी,
वह रिश्तों की धड़कन थी।

वह गाँव को गाँव बनाती थी।

और शायद...

आज हमें
नई सड़कों से पहले,

नई इमारतों से पहले,

एक नई चौपाल की ज़रूरत है।

जहाँ "लाइक" नहीं...

लोग हों।

जहाँ "कमेंट" नहीं...

बातें हों।

जहाँ "ऑनलाइन" नहीं...

अपनापन हो।

और जहाँ कोई
धीरे से पूछ सके—

"भाई...
तू सच में ठीक है ना?"