चिट्ठी वाला डाकिया
वह बूढ़ा डाकिया
अब भी उसी पगडंडी पर चलता है,
बस उसके थैले में
चिट्ठियाँ कम
और स्मृतियाँ अधिक हैं।
कभी जेठ की जलती दोपहर में,
कभी सावन की भीगी साँझ में,
कभी काँपती सर्दियों के कुहासे में—
वह आता था।
उसके कदमों की आहट से
किसी माँ की धड़कन बढ़ जाती थी,
किसी पिता की आँखों में
दूर शहर का चेहरा उतर आता था।
किसी लिफाफे में
बेटे की नौकरी की खबर होती,
कहीं बेटी के आने का संदेश,
कहीं परदेस गए पति का प्रेम,
तो कहीं वर्षों से बिछड़े भाई का
एक छोटा-सा सलाम।
और कभी...
किसी लिफाफे में
स्याही नहीं,
किसी घर का दुःख बंद होता था।
तब वह दरवाज़े पर
कुछ देर ठहरता था।
उसे मालूम था—
कुछ खबरें शब्दों से नहीं,
आँखों से पढ़ी जाती हैं।
वह जानता था
किस माँ ने कितने दिनों से
दरवाज़े की ओर देखना नहीं छोड़ा,
किस बूढ़े पिता ने
हर आहट को बेटे की वापसी समझा,
किस पत्नी ने
चिट्ठी को पढ़कर नहीं,
सीने से लगाकर जवाब दिया।
वह केवल डाक नहीं बाँटता था—
वह दूरियों के बीच पुल था,
वह बिछड़े रिश्तों की आवाज़ था,
वह इंतज़ार को अर्थ देने वाला आदमी था।
उसे पूरे गाँव की खबर रहती थी।
किसके घर चूल्हा देर से जला,
किस आँगन में आज हँसी कम है,
किस घर की चौखट पर
किसी की राह अब भी बाकी है।
वह गाँव का डाकिया कम,
गाँव की धड़कनों का रखवाला अधिक था।
फिर समय बदला।
मोबाइल आया।
एक स्पर्श में आवाज़ पहुँचने लगी,
एक तस्वीर में चेहरा,
एक संदेश में समाचार।
इंतज़ार छोटा हो गया...
पर शायद
इंतज़ार की गहराई भी।
अब खबरें आती हैं,
पर उनके साथ
कागज़ की वह खुशबू नहीं आती
जिसे कोई माँ
अपनी आँखों से लगाकर रखती थी।
अब आवाज़ सुनाई देती है,
पर वह काँपता हुआ अक्षर नहीं
जिसमें किसी अपने का हाथ छिपा होता था।
आज वह बूढ़ा डाकिया
कभी-कभी खाली थैला लेकर लौटता है।
गाँव के बच्चे पूछते हैं—
"दादा, अब आपके पास चिट्ठियाँ क्यों नहीं आतीं?"
वह मुस्कुराकर कहता है—
"अब लोग खबर भेजते हैं बेटा...
यादें नहीं।"
और फिर
अपनी पुरानी साइकिल उठाकर
धीरे-धीरे आगे बढ़ जाता है।
पीछे रह जाती है
उसके कदमों की आवाज़...
और उस आवाज़ में
एक पूरा युग चलता रहता है।
एक ऐसा युग
जिसमें चिट्ठियाँ देर से आती थीं,
मगर रिश्ते
दिल तक पहुँचते थे।
क्योंकि वह बूढ़ा डाकिया
कभी सिर्फ़ चिट्ठियाँ नहीं लाया था—
वह किसी माँ के लिए बेटा लाया था,
किसी पिता के लिए उम्मीद,
किसी प्रेमी के लिए धड़कन,
किसी अकेले घर के लिए अपनापन।
आज उसके थैले में
भले ही कुछ नहीं होता...
लेकिन उसकी स्मृतियों में
अब भी पूरा गाँव रहता है।
और शायद इसीलिए—
जब वह बूढ़ा डाकिया
गाँव की आख़िरी पगडंडी से गुजरता है,
तो लगता है...
कोई आदमी नहीं जा रहा,
एक पूरा समय
धीरे-धीरे हमसे दूर जा रहा है।
