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🌟 Anant Sant 🌟

Anant Sant - YouTube Playlists

अनंत साहित्य

नये मास्टर जी....

जहाँ एक शिक्षक बच्चों को पढ़ाने आया था... 

और बच्चों ने उसे जीवन पढ़ा दिया...



भाग - 1

गाँव के बच्चे -  स्कूल की जान।

पहली घंटी


सुबह का समय। हल्की धूप खेतों पर उतर रही है। ओस की बूँदें अभी तक गेहूँ की बालियों से लिपटी हुई हैं। गाँव के बाहर पीपल के पेड़ पर बैठे तोते शोर मचा रहे हैं। दूर कहीं बैलों की घंटियाँ सुनाई देती हैं। और उसी कच्ची पगडंडी पर... एक युवक कंधे पर बैग टाँगे धीरे-धीरे गाँव की ओर बढ़ रहा है। वह है— नये मास्टरजी।

चेहरे पर उत्साह भी है... थोड़ी घबराहट भी। उन्होंने शहर में पढ़ाई की है। यह उनकी पहली नौकरी है।

वे मन ही मन सोचते हैं—

- आज से मैं बच्चों का भविष्य बनाऊँगा।

उधर... गाँव के स्कूल में बिल्कुल अलग माहौल है। बच्चे पढ़ाई से ज़्यादा इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि—

 - नए मास्टरजी कैसे होंगे?

कोई कहता है—बहुत सख़्त होंगे।

दूसरा कहता है—नहीं... डंडा लेकर आएँगे।

तभी पीछे से एक आवाज़ आती है—अरे... पहले आने तो दो!

यह आवाज़ है— गोपाल की। गोपाल के चेहरे पर ऐसी मुस्कान रहती है कि कोई समझ ही नहीं पाता... अभी यह क्या करने वाला है।

मुन्नी उसे देखते ही पूछती है—आज क्या सोच रहा है?

गोपाल धीरे से कान में कहता है—आज नए मास्टरजी की परीक्षा होगी...

मुन्नी घबरा जाती है।

- अरे... उनकी परीक्षा?

गोपाल हँस पड़ता है।

 - हाँ...

 - अगर वे हमारी शरारत सह गए...  तो हम भी उनकी पढ़ाई सह लेंगे।

इतने में... स्कूल के बाहर किसी के कदमों की आहट होती है। सभी बच्चे एक साथ अपनी जगह बैठ जाते हैं। मास्टरजी दरवाज़े पर पहुँचते हैं।

वे मुस्कुराकर कहते हैं—नमस्ते बच्चों।

पूरा विद्यालय एक साथ गूँज उठता है—नमस्ते मास्टरजी!

मास्टरजी कक्षा में प्रवेश करते हैं। उन्हें क्या पता... कि आज उनकी पहली कक्षा नहीं... पहली परीक्षा होने वाली है। और उस परीक्षा का सबसे बड़ा परीक्षक... दस साल का एक नन्हा-सा लडक़ा है— गोपाल।


भाग - 2

गुम हुई घंटी


सुबह का समय। सूरज अभी पूरी तरह निकला भी नहीं था। गाँव के स्कूल के सामने लगे नीम के पेड़ पर गौरैया चहचहा रही थीं। स्कूल की मिट्टी की दीवारें रात की नमी से अभी भी ठंडी थीं। हर दिन की तरह बच्चे धीरे-धीरे स्कूल पहुँचने लगे। लेकिन आज... कुछ अलग था। स्कूल की लोहे की घंटी... अपनी जगह पर नहीं थी। जहाँ वह बरसों से लटकी रहती थी... वहाँ केवल एक खाली हुक झूल रहा था।

मुन्नी सबसे पहले चिल्लाई—अरे... घंटी कहाँ गई?

बच्चे इधर-उधर दौडऩे लगे। कोई बरामदे में देखता। कोई पेड़ के नीचे। कोई पानी के घड़े के पास। पर घंटी कहीं नहीं थी। उधर... पीछे नीम के पेड़ की ओट में... गोपाल खड़ा था। उसकी आँखों में वही शरारती चमक थी। असल में... सुबह-सुबह वह घंटी उतारकर स्कूल के पुराने अनाज वाले मटके में छिपा आया था।

वह धीरे से बोला—आज देखता हूँ... बिना घंटी के स्कूल कैसे चलता है।

इतने में मास्टरजी आ गए। उन्होंने देखा... बच्चे पढ़ाई से ज़्यादा घंटी ढूँढ़ रहे हैं।

उन्होंने मुस्कुराकर पूछा—क्या हुआ?

मुन्नी बोली—मास्टरजी... घंटी चोरी हो गई।

एक बच्चा बोला—ज़रूर बंदर ले गया होगा।

दूसरा बोला—नहीं...कल रात भूत आया था।

पूरी कक्षा खिलखिलाकर हँस पड़ी। मास्टरजी भी मुस्कुरा दिए। उन्होंने किसी को डाँटा नहीं। कुछ पल चारों ओर देखा।

फिर बोले—अच्छा... अगर घंटी नहीं है... तो क्या पढ़ाई भी नहीं होगी?

बच्चे एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। मास्टरजी ने दोनों हथेलियाँ जोडक़र ज़ोर से ताली बजाई।

ठाक... ठाक... ठाक...पूरा स्कूल गूँज उठा। 

उन्होंने हँसते हुए कहा—आज से... जब तक घंटी नहीं मिलेगी... ताली ही घंटी होगी।

बच्चे खुशी से तालियाँ बजाने लगे। पूरा स्कूल तालियों की आवाज़ से भर गया। गोपाल दूर खड़ा सब देख रहा था। उसे उम्मीद थी.. मास्टरजी परेशान होंगे। लेकिन... वे तो खेल बना बैठे। उसकी पहली शरारत... सफल होकर भी असफल हो गई।

मध्याह्न अवकाश हुआ। बच्चे खाना खाने लगे। मास्टरजी अकेले बरामदे में घूम रहे थे। अचानक... उन्हें पुराने मटके के भीतर से हल्की-सी...

टन... की आवाज़ सुनाई दी। उन्होंने धीरे से ढक्कन हटाया। अंदर... स्कूल की घंटी रखी थी। मास्टरजी सब समझ गए। उन्होंने घंटी बाहर निकाली। पर... किसी से कुछ नहीं कहा। शाम की छुट्टी के समय... उन्होंने सभी बच्चों को बुलाया। घंटी फिर अपनी जगह टाँग दी।

फिर मुस्कुराकर बोले—देखो... घंटी भी शायद पढ़ाई करने चली गई थी। अब वापस आ गई है।

पूरी कक्षा हँस पड़ी। गोपाल चौंक गया। वह समझ गया... मास्टरजी को सब पता चल चुका है। फिर भी उन्होंने उसका नाम नहीं लिया। न डाँटा... न सज़ा दी। घर लौटते समय... गोपाल पहली बार चुप था।

मुन्नी ने पूछा—क्या हुआ?

गोपाल धीरे से बोला—आज... मुझे पहली बार किसी ने पकड़ा भी...और बचा भी लिया।

दूर बरामदे में खड़े मास्टरजी बच्चों को जाते हुए देख रहे थे। उन्होंने मन ही मन कहा—बच्चों को डर से नहीं...विश्वास से जीता जाता है।

हवा चली। नीम के पत्ते सरसराए। और बरसों पुरानी वह स्कूल की घंटी... पहले से भी मधुर स्वर में बज उठी।

टन... टन... टन...

जैसे वह भी नए मास्टरजी का स्वागत कर रही हो।


भाग -  3

आम का पेड़ और आधा सच


दोपहर का समय था। जेठ की धूप पूरे गाँव पर उतर आई थी। खेतों से लौटते किसान सिर पर गमछा रखे धीरे-धीरे घर जा रहे थे। कुएँ पर औरतों की लंबी कतार लगी थी। दूर कहीं बैलों की घंटियाँ सुनाई दे रही थीं। और स्कूल के पीछे... एक पुराना आम का पेड़ अपनी घनी छाया फैलाए खड़ा था। गाँव के बच्चों के लिए वह पेड़ किसी मेले से कम नहीं था। उसकी सबसे ऊँची डाल पर लगे आम... सबसे मीठे माने जाते थे। लेकिन...

उन तक पहुँचना आसान नहीं था। दोपहर की छुट्टी होते ही गोपाल धीरे-धीरे मुन्नी के पास आया।

 - चल...

 - कहाँ?

- आम तोडऩे।

मुन्नी ने तुरंत सिर हिलाया।

- नहीं... मालिक डाँटेंगे।

गोपाल मुस्कुराया।

 - डाँट तो तब पड़ेगी... जब पकड़ेंगे।

इतना कहकर वह पेड़ पर बंदर की तरह चढ़ गया। नीचे खड़े बच्चे तालियाँ बजाने लगे। गोपाल डाल तक पहुँचा ही था कि...

चर्र...

एक पतली डाल टूट गई। गोपाल किसी तरह दूसरी डाल पकडक़र बच गया। लेकिन... चार-पाँच कच्चे आम नीचे गिर पड़े। बच्चे उन्हें उठाकर भाग गए। उसी समय... बगीचे के मालिक हरिराम काका वहाँ पहुँच गए।

- अरे...कौन था?

सभी बच्चे भाग खड़े हुए। गोपाल भी कूदकर भागा। लेकिन जल्दी में... उसकी एक चप्पल वहीं रह गई।

अगली सुबह हरिराम काका वही चप्पल हाथ में लेकर स्कूल पहुँचे। पूरा विद्यालय शांत हो गया। उन्होंने चप्पल मेज़ पर रखी।

फिर बोले—मास्टरजी... कल किसी बहादुर ने मेरे आम तोड़े हैं। बस... यह चप्पल छोड़ गया।

बच्चों की नजऱ एक साथ चप्पल पर गई। गोपाल ने तुरंत अपने दोनों पैर बेंच के नीचे छिपा लिए।

मास्टरजी ने चप्पल उठाई। कुछ पल उसे देखते रहे।

फिर बोले—अच्छा... जिसकी होगी... वह ले जाएगा।

बस इतना ही। न कोई डाँट। न कोई पूछताछ। हरिराम काका भी हैरान रह गए।

उस दिन पढ़ाई समाप्त होने के बाद मास्टरजी बच्चों को लेकर उसी आम के पेड़ के नीचे पहुँचे।

उन्होंने कहा—आज किताबें बंद। आज यहीं कक्षा लगेगी। 

बच्चे खुश हो गए।

मास्टरजी ने पेड़ की ओर देखकर पूछा—बताओ... यह पेड़ हमें क्या देता है?

मुन्नी बोली—छाया।

एक बच्चा बोला—आम।

दूसरा बोला—चिडिय़ों का घर।

मास्टरजी मुस्कुराए।

- और बदले में... यह हमसे क्या माँगता है?

सब चुप। कुछ देर बाद गोपाल बोला—कुछ नहीं।

मास्टरजी ने सिर हिलाया।

- हाँ... कुछ नहीं। बस...इतना कि इसकी डालें यूँ ही बनी रहें।

गोपाल की आँखें झुक गईं। उसे टूटी हुई डाल याद आ गई।

मास्टरजी ने मिट्टी पर एक रेखा खींची।

फिर बोले—आज मैं किसी से नाम नहीं पूछूँगा। जिससे गलती हुई हो... वह इस रेखा के इस पार आ जाए। सज़ा नहीं मिलेगी। सिर्फ़ एक काम मिलेगा।

पूरा मैदान शांत हो गया। हवा भी जैसे रुक गई। कुछ पल बीते। फिर... गोपाल धीरे-धीरे आगे बढ़ा। उसके पीछे मुन्नी भी आ गई। फिर एक-एक करके बाकी बच्चे भी। मास्टरजी मुस्कुरा दिए।

- देखा...गलती कभी अकेली नहीं होती। और सच भी अकेला नहीं आता।

हरिराम काका, जो दूर खड़े सब देख रहे थे, पास आ गए। उन्होंने गोपाल के सिर पर हाथ रखा।

- अगर पहले ही बोल देता...तो मैं खुद आम तोडक़र देता।

सभी बच्चे हँस पड़े।

मास्टरजी ने बच्चों से कहा—चलो... आज एक नया काम करते हैं।

उन्होंने गाँव की नर्सरी से पाँच छोटे आम के पौधे मँगवाए। हर बच्चे ने एक-एक गड्ढा खोदा। गोपाल ने सबसे पहला पौधा लगाया।

मिट्टी डालते हुए उसने धीरे से कहा—जब यह बड़ा होगा... तब इसके आम... हम सब मिलकर खाएँगे।

हरिराम काका की आँखों में चमक आ गई। 

उन्होंने मुस्कुराकर कहा—और मैं तब तक जि़ंदा रहा... तो सबसे पहला आम... तुम्हें ही दूँगा।

पूरा मैदान हँसी से भर गया। पेड़ की पत्तियाँ हवा में झूम उठीं। मानो पुराना आम का पेड़ भी कह रहा हो—

- फल तोडऩे से बड़ा सुख...पेड़ लगाने में है।


भाग -  4

डाकिया काका की सीटी


सुबह के लगभग दस बजे थे। गाँव की पगडंडी पर धूप अब तेज़ होने लगी थी। कुएँ पर औरतें पानी भर रही थीं। लोहार की दुकान से ठन... ठन... की आवाज़ आ रही थी। दूर खेत में हल चलाते बैलों की घंटियाँ हवा के साथ घुल रही थीं। और तभी... पूरा गाँव एक परिचित आवाज़ सुनता है—फूँऽऽऽ...!

साइकिल की छोटी-सी सीटी।

- अरे... डाकिया आ गया!

यह आवाज़ न जाने किसने लगाई, लेकिन देखते ही देखते आधा गाँव चौपाल की ओर चल पड़ा।

डाकिया काका की उम्र लगभग साठ वर्ष रही होगी। सिर पर खाकी टोपी। कंधे पर चमड़े का पुराना थैला। चेहरे पर सफ़ेद मूँछें। और होंठों पर हमेशा मुस्कान। वे केवल चि_ियाँ नहीं बाँटते थे... वे लोगों की प्रतीक्षा बाँटते थे। किसी के बेटे की नौकरी की खबर। किसी की बेटी का पत्र। किसी सैनिक की कुशल-क्षेम। किसी विद्यार्थी का परीक्षा परिणाम। पूरा गाँव उनकी साइकिल की सीटी पहचानता था। स्कूल की खिडक़ी से गोपाल ने बाहर झाँका।

- मास्टरजी...

- जी?

- डाकिया काका आ गए।

मास्टरजी मुस्कुराए। 

-तो?

गोपाल बोला—आज पढ़ाई बाद में...पहले डाक।

पूरी कक्षा हँस पड़ी।

मास्टरजी ने भी हँसते हुए कहा—चलो... आज की कक्षा चौपाल में होगी।

बच्चे खुशी से उछल पड़े।

चौपाल पर पहुँचते ही डाकिया काका ने अपना थैला खोला। सब लोग उत्सुकता से खड़े थे।

- रामदयाल!

- जी...

- यह तुम्हारे बेटे की चिट्ठी

रामदयाल ने दोनों हाथों से पत्र लिया। आँखों में चमक आ गई।

- सरपंच जी!

- हाँ भाई?

- तहसील से कागज़ आए हैं।

- शांति बुआ!

- लो बहन... तुम्हारी बिटिया ने राखी भेजी है।

शांति बुआ ने लिफ़ाफ़ा माथे से लगा लिया। गोपाल यह सब पहली बार इतने ध्यान से देख रहा था।

उसने धीरे से मास्टरजी से पूछा—मास्टरजी... लोग चिट्ठी को माथे से क्यों लगाते हैं?

मास्टरजी ने मुस्कुराकर कहा—क्योंकि... कभी-कभी कागज़ पर लिखे शब्द... घर से भी ज़्यादा अपने लगते हैं।

इतने में डाकिया काका अचानक बोले—

- अरे...

उन्होंने थैले में फिर हाथ डाला। एक लिफ़ाफ़ा निकाला। भौंहें सिकोड़ लीं।

- अरे... यह किसका है?

लिफ़ाफ़े पर लिखा था—गाँव के सबसे ईमानदार आदमी के नाम।

पूरा चौपाल हँसी से गूँज उठा।

कोई बोला— यह तो सरपंच जी का होगा।

दूसरा बोला—नहीं... पटेल जी का।

तीसरा हँसकर बोला—अरे... कहीं मेरा तो नहीं!

डाकिया काका सिर खुजलाने लगे।

- नाम ही नहीं लिखा... अब दूँ किसे?

मास्टरजी ने बच्चों की ओर देखा। 

फिर बोले—अच्छा... आज एक खेल खेलते हैं।

उन्होंने गाँव वालों से कहा—जिसे लगता है कि यह चिट्ठी उसी की है... वह आगे आए।

पूरा चौपाल ठहाकों से भर गया। कोई आगे नहीं आया। सब एक-दूसरे को आगे करने लगे। आखिर में... एक दुबला-पतला बुज़ुर्ग आगे बढ़ा।

वह थे—भोलाराम काका।

उन्होंने मुस्कुराकर कहा—मास्टरजी... अगर मैं कह दूँ कि चिट्ठी मेरी है... तो सबसे पहले मैं ईमानदार नहीं रहूँगा।

पूरा चौपाल तालियों से गूँज उठा। मास्टरजी भी मुस्कुरा दिए। तभी डाकिया काका ज़ोर से हँसे।

उन्होंने लिफ़ाफ़ा पलटा।

पीछे छोटे अक्षरों में लिखा था—भोलाराम काका

सब लोग हँसते-हँसते लोटपोट हो गए। भोलाराम काका ने भी हँसते हुए सिर पकड़ लिया।

- अरे... मेरी आँखें ही अब पहले जैसी कहाँ रहीं!

चिट्ठी उनके पोते ने शहर से भेजी थी।

उसमें लिखा था—दादाजी...पिताजी कहते हैं कि गाँव में अगर किसी से ईमानदारी सीखनी हो...तो वह आपसे। मैं छुट्टियों में आकर आपके साथ खेत जाऊँगा।

भोलाराम काका चुप हो गए। उन्होंने चिट्ठी को आँखों से लगाया।

फिर धीरे से बोले—देखो... बच्चे शहर चले जाते हैं... लेकिन संस्कार... अगर गाँव से ले जाएँ... तो बूढ़ापा सफल हो जाता है।

मास्टरजी ने बच्चों की ओर देखा।

उन्होंने कहा— आज की पढ़ाई यहीं पूरी हुई।

गोपाल ने आश्चर्य से पूछा—लेकिन मास्टरजी... आज तो किताब खोली ही नहीं।

मास्टरजी मुस्कुराए।

- बेटा... हर पाठ किताब में नहीं होता। कुछ पाठ... लोगों के जीवन में लिखे होते हैं।

गोपाल ने पहली बार चौपाल को... एक कक्षा की तरह देखा।

डाकिया काका साइकिल पर बैठ गए। जाते-जाते उन्होंने फिर वही सीटी बजाई—

 - फूँऽऽऽ...!

आवाज़ दूर तक जाती रही। बच्चे हाथ हिलाते रहे। और गोपाल मन ही मन सोचता रहा—

- एक आदमी...पूरा गाँव खुश कैसे कर देता है?

नीम की डाल पर बैठी एक मैना चहकी। जैसे उसने भी उस प्रश्न का उत्तर सुन लिया हो।


भाग -  5

मेले का एक रुपया


सावन बीत चुका था। भादों का महीना अपने पूरे रंग में था। गाँव के बाहर वाले मैदान में सालाना मेला लगने वाला था। सुबह से ही बैलगाडिय़ाँ दूर-दूर के गाँवों से आने लगी थीं। कहीं मिट्टी के खिलौनों की दुकान सज रही थी। कहीं रंग-बिरंगी चूडय़िाँ धूप में चमक रही थीं। हलवाई बड़े कड़ाह में गरमागरम जलेबियाँ तल रहा था। भुने चनों और रेवडय़िों की खुशबू हवा में घुल गई थी। दूर से ढोल की थाप सुनाई दे रही थी। पूरा गाँव जैसे किसी त्योहार की साँस ले रहा था। स्कूल में उस दिन पढ़ाई से ज़्यादा चर्चा मेले की थी। गोपाल अपनी जेब बार-बार टटोल रहा था।

मुन्नी ने पूछा—क्या देख रहा है?

गोपाल ने मुस्कुराकर हथेली खोली। उसमें एक चमकता हुआ एक रुपया था।

- दादी ने दिया है।

उसकी आँखें चमक रही थीं।

- आज इससे मैं जलेबी खाऊँगा।

मुन्नी हँस पड़ी।

- एक रुपये में?

गोपाल बोला—अरे... जलेबी कम मिलेगी... खुशी पूरी मिलेगी।

मास्टरजी दूर खड़े यह सब सुन रहे थे।

उन्होंने मुस्कुराकर कहा—आज की छुट्टी जल्दी होगी। लेकिन एक बात याद रखना... मेले में सबसे बड़ी चीज़ खिलौना नहीं होती।

गोपाल ने तुरंत पूछा—तो क्या होती है?

मास्टरजी बोले—शाम को लौटकर बताना।

शाम ढलते-ढलते पूरा गाँव मेले में पहुँच गया। बच्चों की आँखें हर दुकान पर ठहर जातीं। किसी को बाँसुरी चाहिए थी। किसी को लकड़ी का घोड़ा। किसी को रंगीन गुब्बारा। गोपाल बार-बार अपनी जेब टटोलता। एक रुपया अभी भी सुरक्षित था। वह जलेबी वाले की दुकान तक पहुँचा ही था कि... उसे ज़मीन पर एक मुड़ा हुआ पाँच रुपये का नोट दिखाई दिया। उसने तुरंत उसे उठा लिया। चारों ओर देखा। कोई दिखाई नहीं दिया।

मुन्नी ने धीरे से कहा—अब तो पाँच रुपये और हो गए।

गोपाल की आँखें फैल गईं।

- अब तो जलेबी भी...और बाँसुरी भी!

दोनों कुछ क्षण चुप रहे। फिर... उसी समय पीछे से रोने की आवाज़ आई। एक छोटा-सा बच्चा अपनी माँ से कह रहा था—

- अम्मा... मेरा पैसा गिर गया।

माँ उसे समझा रही थी—बेटा... अब मिलना मुश्किल है।

गोपाल ने अपनी मुट्ठी कस ली। उसकी नजऱ पाँच रुपये के नोट पर गई। फिर उस रोते हुए बच्चे पर। फिर जलेबियों पर। उसके मन में जैसे दो बच्चे लड़ रहे थे।

एक कह रहा था—रख ले...

दूसरा कह रहा था—लौटा दे...

उसी समय... उसे मास्टरजी की बात याद आई—

- मेले में सबसे बड़ी चीज़ खिलौना नहीं होती...

गोपाल धीरे-धीरे उस बच्चे के पास गया।

- क्या यही पैसा था?

बच्चे की माँ ने नोट देखते ही कहा—हाँ बेटा... यही था।

बच्चे की आँखों में चमक लौट आई। उसने नोट पकड़ लिया। फिर अपनी जेब से आधी टूटी हुई रेवड़ी निकालकर गोपाल की ओर बढ़ा दी।

- भैया... यह तुम खा लो।

गोपाल हँस पड़ा।

- अरे... तू ही खा।

लेकिन बच्चे ने जि़द की।

-नहीं... माँ कहती हैं... जो खुशी लौटाए... उसे खाली हाथ नहीं जाने देना चाहिए।

गोपाल ने वह छोटी-सी रेवड़ी ले ली। उस दिन... वह रेवड़ी उसे किसी मिठाई से ज़्यादा मीठी लगी।

रात को गाँव लौटते समय सभी बच्चे अपने-अपने खिलौने दिखा रहे थे। किसी के हाथ में पिपिहरी थी। किसी के पास मिट्टी का हाथी। गोपाल के हाथ में कुछ नहीं था।

मुन्नी ने पूछा—तुझे दुख नहीं हुआ?

गोपाल मुस्कुराया।

- जलेबी तो अगले साल भी खा लूँगा।

लेकिन...आज... पहली बार समझ आया... किसी की मुस्कान खरीदने के लिए पैसे नहीं लगते।

अगले दिन स्कूल में मास्टरजी ने पूछा—

- तो बताओ... मेले की सबसे बड़ी चीज़ क्या थी?

बच्चे अलग-अलग उत्तर देने लगे।

- झूला!

- जलेबी!

- मौत का कुआँ!

- बाँसुरी!

मास्टरजी मुस्कुराए। फिर गोपाल की ओर देखा।

- और तुम?

गोपाल धीरे से बोला—सबसे बड़ी चीज़...

वह कुछ क्षण रुका।

फिर मुस्कुराकर बोला—वह पाँच रुपये का नोट नहीं था...बल्कि... उसे लौटाने के बाद जो खुशी मिली... वह थी।

मास्टरजी ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने केवल गोपाल के सिर पर हाथ रख दिया। क्योंकि... कुछ उत्तरों की प्रशंसा तालियों से नहीं... मौन से की जाती है।

दूर मंदिर की घंटी बजी। मेले की आखऱिी दुकानें भी अब सिमट रही थीं। लेकिन... गोपाल के मन में जो दीपक उस दिन जला था... वह बहुत वर्षों तक बुझने वाला नहीं था।


भाग - 6

दादी की अधूरी कहानी


शाम धीरे-धीरे गाँव पर उतर रही थी। गायें लौटकर अपने बाड़ों में बँध चुकी थीं। आँगनों से रोटी सिकने की खुशबू आ रही थी। कहीं दूर मंदिर की घंटी बज रही थी। आसमान में पक्षियों के झुंड अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे। गाँव की गलियों में अब शोर कम... और अपनापन ज़्यादा सुनाई देता था। गोपाल की दादी रोज़ की तरह घर के बाहर चौकी पर बैठी थीं। उनके पास एक पुरानी लालटेन जल रही थी। धीरे-धीरे बच्चे वहाँ इक_ा होने लगे। मुन्नी... कालू... बिट्टू... रानी... और सबसे आखिर में... गोपाल। दादी मुस्कुराईं।

- अरे... आज तो पूरी पंचायत आ गई।

बच्चे खिलखिला पड़े।

गोपाल बोला—दादी... आज नई कहानी सुनाना।

दादी ने हँसते हुए कहा—नई कहाँ से लाऊँ? कहानियाँ भी तो बूढ़ी हो गई हैं।

मुन्नी तुरंत बोली—तो बूढ़ी वाली ही सुना दो।

सब फिर हँस पड़े। दादी ने लालटेन की लौ थोड़ी ऊँची की।

फिर धीरे-धीरे कहना शुरू किया—बहुत साल पहले... हमारे गाँव के पास एक जंगल था। उस जंगल में एक बोलने वाला तोता रहता था... 

इतना सुनना था कि कालू बीच में बोल पड़ा—

- दादी... तोता सच में बोलता था?

दादी ने आँखें तरेरीं।

- अरे... कहानी में तोता नहीं बोलेगा... तो क्या पटवारी बोलेगा?

बच्चे ज़ोर से हँस पड़े। दादी फिर कहानी शुरू करतीं... और हर बार कोई न कोई बीच में सवाल पूछ देता।

- तोते का रंग कैसा था?

- जंगल कितना बड़ा था?

- उसका नाम क्या था?

दादी बार-बार कहानी भूल जातीं।

फिर कहतीं—अरे... तुम लोगों ने तो कहानी की ऐसी-तैसी कर दी।

गोपाल मुस्कुराकर बोला—दादी... कहानी नहीं... मज़ा आ रहा है।

उसी समय... मास्टरजी उधर से गुजर रहे थे। उन्होंने देखा... बच्चे किताब लेकर नहीं... दादी के पास बैठे हैं। वे भी चुपचाप आकर सबसे पीछे बैठ गए। दादी ने उन्हें देखा।

- अरे मास्टरजी... आप भी?

मास्टरजी मुस्कुराए।

- आज मैं भी विद्यार्थी हूँ।

दादी ने फिर कहानी शुरू की। इस बार सब बच्चों ने तय किया— बीच में कोई नहीं बोलेगा।

दादी बोलीं—वह तोता रोज़ एक पेड़ पर बैठता था... और जो बच्चा झूठ बोलता... उसे देखकर हँस देता था।

इतना सुनते ही... सबकी नजऱ गोपाल पर चली गई।

गोपाल तुरंत बोला—

- अरे... मुझे क्यों देख रहे हो?

पूरा आँगन हँसी से गूँज उठा। मास्टरजी भी अपनी हँसी नहीं रोक पाए।

कहानी आगे बढ़ती रही। धीरे-धीरे रात गहराने लगी। ठंडी हवा चलने लगी। लालटेन की लौ कभी तेज़... कभी धीमी होने लगी। एक-एक करके छोटे बच्चे दादी की गोद में सिर रखकर सो गए। मुन्नी की आँखें भी झुकने लगीं। गोपाल अभी भी जाग रहा था। वह कहानी का अंत सुनना चाहता था।

दादी बोलीं—और फिर...उस तोते ने...

इतना कहते-कहते... उन्होंने देखा... गोपाल भी सो चुका था। दादी मुस्कुराईं। उन्होंने धीरे से उसके सिर पर हाथ फेरा। फिर लालटेन की लौ थोड़ी कम कर दी।

मास्टरजी ने धीमे स्वर में पूछा—दादी... कहानी का अंत क्या था?

दादी मुस्कुराईं।

- अरे बेटा... कहानी का अंत सुनाने के लिए नहीं होता।

- तो?

- ताकि बच्चे अगली शाम फिर आ जाएँ।

मास्टरजी कुछ क्षण चुप रहे। फिर उन्होंने दादी के चरण छुए।

- आज आपने मुझे भी एक पाठ पढ़ा दिया।

दादी ने हँसते हुए कहा—

- मास्टरजी... बच्चे कहानी से नहीं... अपनापन सुनने आते हैं।

रात पूरी तरह उतर चुकी थी। आँगन में केवल लालटेन की पीली रोशनी थी। दादी धीरे-धीरे सोए हुए बच्चों को उनके घर पहुँचाने लगीं। मास्टरजी भी गोपाल को अपनी बाँहों में उठाकर उसके घर तक छोड़ आए। चलते-चलते उन्होंने आसमान की ओर देखा। तारों से भरा आकाश मुस्कुरा रहा था। और उनके मन में एक ही बात थी—

- जिस गाँव में दादी की कहानियाँ जीवित हैं...उस गाँव का भविष्य कभी अँधेरा नहीं हो सकता।

लालटेन की लौ अब भी जल रही थी। जैसे वह केवल आँगन ही नहीं... पूरे गाँव की स्मृतियों को रोशन कर रही हो।


भाग -  7

पहली बारिश


सुबह से ही आसमान में काले बादल छाए हुए थे। हवा में मिट्टी की सोंधी महक घुलने लगी थी। खेतों में खड़े किसान बार-बार आसमान की ओर देख रहे थे।

गाँव के बच्चे भी समझ गए थे—आज बारिश ज़रूर होगी।

स्कूल में पढ़ाई चल रही थी। मास्टरजी ब्लैकबोर्ड पर लिख रहे थे। इतने में... खिडक़ी से एक ठंडी हवा का झोंका आया। फिर... एक बूँद। फिर दूसरी। और देखते ही देखते... टप... टप... टप... बारिश शुरू हो गई। पूरे स्कूल में बच्चों की आँखें चमक उठीं। किसी का ध्यान अब किताब पर नहीं था। सभी की नजऱ खिडक़ी पर थी।

गोपाल धीरे से बोला—मास्टरजी...

- हाँ?

- बारिश आ गई...

मास्टरजी मुस्कुराए।

- तो?

गोपाल ने मासूमियत से कहा—

- पहली बारिश में... हमारी किताबें भी छुट्टी माँगती हैं।

पूरी कक्षा हँस पड़ी। बाहर बारिश अब तेज़ हो चुकी थी। आँगन में पानी भरने लगा। छप्पर से पानी की धार गिर रही थी। गोपाल खिडक़ी से बाहर देख रहा था। उसका मन कक्षा में नहीं... बारिश में था। मास्टरजी ने यह देख लिया। उन्होंने चॉक नीचे रखा। कुछ पल बच्चों को देखा। फिर मुस्कुराकर बोले—

- चलो...

बच्चे चौंक गए।

- कहाँ मास्टरजी?

- आज की कक्षा... बारिश पढ़ाएगी।

इतना सुनते ही पूरा विद्यालय खुशी से गूँज उठा।

सभी बच्चे आँगन में निकल आए। किसी ने चप्पल उतार दी। कोई नंगे पाँव पानी में कूद पड़ा।

छपाक...!

पानी चारों ओर उछल गया। मुन्नी ने जल्दी-जल्दी कॉपी का एक पन्ना फाड़ा। कागज़ की नाव बनाई। गोपाल ने भी एक नाव बनाई। दोनों ने उन्हें बहते पानी में छोड़ दिया।

- देखो... मेरी नाव आगे निकल गई!

- अरे नहीं... मेरी वाली तेज़ है!

पूरा आँगन बच्चों की हँसी से भर गया।

उसी समय... रामू चरवाहा अपनी भीगी हुई गायों को लेकर उधर से निकला। 

वह हँसते हुए बोला—अरे मास्टरजी! आज आप भी बच्चे बन गए क्या?

मास्टरजी ने हँसकर जवाब दिया—

- नहीं रामू... आज बच्चों ने मुझे बच्चा बना दिया।

रामू ठहाका लगाकर हँस पड़ा।

बारिश और तेज़ हो गई। बच्चों ने देखा— मास्टरजी भी भीग रहे हैं। गोपाल धीरे-धीरे उनके पास आया।

- मास्टरजी...

- हाँ?

- आपको डाँट नहीं पड़ेगी?

- किससे?

- अगर आप भी भीग गए तो?

मास्टरजी मुस्कुराए।

- जिस दिन शिक्षक बच्चों के साथ भीगना भूल जाए... उस दिन पढ़ाना भी भूल जाएगा।

गोपाल यह बात पूरी तरह समझ नहीं पाया। लेकिन... उसे यह वाक्य बहुत अच्छा लगा।

कुछ देर बाद

मास्टरजी ने बच्चों से कहा—चलो... अब एक काम करते हैं।

उन्होंने सबको स्कूल के पीछे खाली ज़मीन पर ले गए। वहाँ पहले से कुछ छोटे-छोटे पौधे रखे थे। नीम। आम। जामुन। इमली। हर बच्चे को एक पौधा मिला।

मास्टरजी बोले—पहली बारिश... पेड़ लगाने का सबसे अच्छा दिन होती है।

बच्चों ने अपने-अपने हाथों से पौधे लगाए।

गोपाल ने मिट्टी दबाते हुए पूछा—मास्टरजी... जब यह बड़ा होगा... तब हम कितने बड़े हो जाएँगे?

मास्टरजी मुस्कुराए।

- शायद... तुम्हारे बच्चे इसकी छाया में खेल रहे होंगे।

गोपाल कुछ पल उस छोटे-से पौधे को देखता रहा। उसने पहली बार... भविष्य की कल्पना की। बारिश अब हल्की हो गई थी। बच्चे फिर अपनी कक्षा में लौट आए। सबके कपड़े भीगे थे। बाल भीगे थे। लेकिन चेहरों पर जो खुशी थी... वह किसी किताब में नहीं मिल सकती थी।

मास्टरजी ने ब्लैकबोर्ड पर केवल एक वाक्य लिखा—

- पेड़ लगाने वाला इंसान...

अपने लिए नहीं,

आने वाली पीढय़िों के लिए जीता है।


पूरी कक्षा शांत थी।आज किसी ने शोर नहीं किया। क्योंकि... आज की पढ़ाई बारिश ने करवा दी थी। शाम को जब गाँव वाले स्कूल के पास से गुजऱे, तो उन्होंने देखा—स्कूल के पीछे मिट्टी में छोटी-छोटी लकडि़य़ाँ लगी थीं,

जिन पर बच्चों ने अपने नाम लिखे थे। गोपाल, मुन्नी, कालू , रानी...

हर पौधे के साथ... एक नाम। एक सपना। एक भविष्य। 

हवा चली।बारिश की आखिरी बूँदें पत्तियों से फिसलकर मिट्टी में समा गईं। 

और ऐसा लगा... मानो प्रकृति स्वयं उन नन्हे पौधों को आशीर्वाद दे रही हो।


भाग -  8

सबसे बड़ी शरारत


सुबह का समय था। गाँव में हल्की-हल्की ठंड शुरू हो चुकी थी।धान की कटाई लगभग पूरी हो गई थी। खेतों से भूसे की महक हवा में तैर रही थी। स्कूल के सामने खड़ा नीम का पेड़ पीले पत्ते गिरा रहा था। बच्चे रोज़ की तरह हँसते-खेलते स्कूल पहुँच रहे थे। लेकिन... आज गोपाल के चेहरे पर कुछ अलग ही चमक थी।

मुन्नी ने उसे देखते ही पूछा—अब क्या सोच रहा है?

गोपाल धीरे से बोला—आज... ऐसी शरारत करूँगा... जिसे मास्टरजी भी याद रखेंगे।

मुन्नी ने माथा पकड़ लिया।

- तू कभी नहीं सुधरेगा!

मास्टरजी उस दिन गाँव के सरपंच के साथ बैठक में गए थे।

उन्होंने जाते-जाते कहा—जब तक मैं लौटूँ... सब बच्चे अपनी-अपनी पसंद का चित्र बनाएँ।

बस... यही सुनना था कि गोपाल के दिमाग में एक योजना आ गई। उसने धीरे से सब बच्चों को बुलाया।

- सुनो... आज हम पूरी कक्षा बदल देंगे।

- कैसे?

- आज मास्टरजी जब आएँगे... तो उन्हें अपना कमरा पहचान में ही नहीं आएगा।

बच्चे हँस पड़े।

कुछ ही देर में कक्षा बदलने लगी। किसी ने मेज़ को खिडक़ी के पास रख दिया। बेंचों को गोल घेरा बना दिया गया। ब्लैकबोर्ड के नीचे फूलों की पत्तियाँ सजा दी गईं। दीवार पर बच्चों ने अपने हाथों से बनाए चित्र टाँग दिए। मुन्नी ने मिट्टी के छोटे-से घड़े में खेतों से लाए जंगली फूल रख दिए।

गोपाल ने ब्लैकबोर्ड पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा—

हमारी कक्षा... हमारा घर।

इतने में... मास्टरजी लौट आए। दरवाज़े पर पहुँचते ही वे ठिठक गए। उन्होंने इधर-उधर देखा।

फिर मुस्कुराकर बोले—

- अरे... यह मेरा स्कूल है... या किसी का नया घर?

पूरी कक्षा हँसी से गूँज उठी। गोपाल धीरे-धीरे आगे आया।

उसने सिर झुकाकर कहा—

- मास्टरजी... आज... हमने आपकी कक्षा चुरा ली।

मास्टरजी हँस पड़े।

- और बदले में?

गोपाल बोला—उसे थोड़ा सुंदर बना दिया।

मास्टरजी धीरे-धीरे पूरी कक्षा में घूमे। उन्होंने हर चित्र देखा। हर फूल देखा। हर बच्चे की मेहनत देखी। फिर कुछ क्षण चुप रहे। उन्होंने कुर्सी पर बैठने के बजाय... बच्चों के बीच ज़मीन पर बैठ गए।

- आज...

उन्होंने कहा,

- मैं तुम सबसे एक बात सीख रहा हूँ।

बच्चे आश्चर्य से उन्हें देखने लगे।

- स्कूल केवल दीवारों से नहीं बनता। जिस जगह बच्चों का मन लग जाए... वही सबसे अच्छी कक्षा होती है।

उसी समय... सरपंच जी भी अंदर आ गए। उन्होंने चारों ओर देखा।

- वाह!

यह तो हमारे गाँव का सबसे सुंदर कमरा लग रहा है।

फिर उन्होंने मुस्कुराकर कहा—अगर हर बच्चा अपने स्कूल को अपना घर समझे... तो गाँव का भविष्य अपने आप सुंदर हो जाएगा।

मास्टरजी ने ब्लैकबोर्ड से गोपाल की लिखी पंक्ति पढ़ी—

हमारी कक्षा... हमारा घर।

उन्होंने चॉक उठाया। और उसके नीचे एक पंक्ति और लिख दी—

और हमारा गाँव... हमारा परिवार।

पूरे कमरे में तालियाँ गूँज उठीं। गोपाल की आँखों में चमक थी। आज पहली बार... उसकी शरारत ने किसी को परेशान नहीं किया। बल्कि... सबके चेहरे पर मुस्कान ला दी।

छुट्टी की घंटी बजी। बच्चे घर जाने लगे। गोपाल सबसे आखिर में रुका। उसने मुडक़र कक्षा को देखा। फूल अब भी महक रहे थे। चित्र दीवारों पर मुस्कुरा रहे थे। मास्टरजी खिडक़ी के पास खड़े थे।

उन्होंने धीरे से कहा—

- गोपाल।

- जी मास्टरजी?

- आज की शरारत...

- जी?

- बार-बार करना।

गोपाल पहले तो चौंका... फिर दोनों ज़ोर से हँस पड़े।

बाहर हवा चली। नीम के कुछ पत्ते उडक़र आँगन में बिखर गए। 

और ऐसा लगा... मानो पूरा गाँव भी इस मुस्कान में शामिल हो गया हो।


भाग -  9

एक वादा


आज स्कूल का आँगन कुछ अलग लग रहा था। सुबह की धूप नीम के पत्तों से छनकर ज़मीन पर पड़ रही थी। स्कूल के पीछे बच्चों द्वारा लगाए गए छोटे-छोटे पौधे अब हरे हो चुके थे। हर पौधे के पास लकड़ी की एक छोटी पट्टी लगी थी—

गोपाल,  मुन्नी, रानी, कालू ...

बारिश के बाद वे सब थोड़ा और बड़े हो गए थे। मास्टरजी रोज़ की तरह सबसे पहले उन्हीं पौधों के पास गए। उन्होंने एक पौधे की मिट्टी ठीक की।

फिर मुस्कुराकर बोले—

- देखो... पेड़ भी बच्चों जैसे होते हैं। रोज़ थोड़ा-थोड़ा बढ़ते हैं।

उसी समय... डाकिया काका अपनी साइकिल से स्कूल पहुँचे। आज उनकी सीटी कुछ धीमी थी। उन्होंने एक सरकारी लिफ़ाफ़ा मास्टरजी को दिया। मास्टरजी ने उसे खोला। कुछ क्षण पढ़ते रहे। फिर मुस्कुरा दिए। गोपाल दूर से सब देख रहा था।

प्रार्थना के बाद... मास्टरजी बच्चों के सामने खड़े हुए।

- बच्चों...मुझे अगले महीने दूसरे गाँव के स्कूल में जाना होगा।

पूरा मैदान एकदम शांत हो गया। गोपाल का सिर झुक गया। मुन्नी की मुस्कान गायब हो गई। 

लेकिन... मास्टरजी ने तुरंत कहा—

- अरे... इतने उदास क्यों हो? 

शिक्षक बदलते हैं...सीख नहीं।

उन्होंने गोपाल को आगे बुलाया।

- याद है... पहले दिन तुमने स्कूल की घंटी छिपा दी थी?

पूरा मैदान हँस पड़ा। गोपाल भी मुस्कुरा दिया।

- और याद है... आम का पेड़?


गोपाल ने सिर हिलाया।

- और वह पाँच रुपये वाला मेला?

गोपाल की आँखों में चमक आ गई।

- और पहली बारिश?

अब तो सभी बच्चे मुस्कुरा रहे थे।

मास्टरजी ने कहा—तुम लोगों ने मुझे किताबों से ज़्यादा... जीवन सिखाया है। मैं पढ़ाने आया था... लेकिन सीखकर जा रहा हूँ।

तभी सरपंच जी आगे आए।

उन्होंने कहा—मास्टरजी... गाँव आपको खाली हाथ नहीं जाने देगा।

सभी बच्चे सोचने लगे— शायद कोई माला होगी। शायद कोई शॉल। शायद कोई स्मृति-चिह्न।

लेकिन... गोपाल अचानक दौड़ता हुआ स्कूल के पीछे गया।

कुछ देर बाद... वह अपने हाथों में एक छोटा-सा नीम का पौधा लेकर लौटा।

उसने वह पौधा मास्टरजी की ओर बढ़ाया।

 - मास्टरजी...

- यह क्या है?

- यह... हमारी तरफ़ से आपका इनाम है।

मास्टरजी ने आश्चर्य से पूछा—

- पौधा?

गोपाल मुस्कुराया।

- हाँ... आपने हमें सिखाया था... पेड़ लगाने वाला इंसान... अपने लिए नहीं... आने वाली पीढय़िों के लिए जीता है।

पूरा गाँव शांत हो गया। मास्टरजी ने दोनों हाथों से वह पौधा लिया। उनकी आँखों में हल्की-सी नमी थी। लेकिन होंठों पर मुस्कान।

उन्होंने कहा—

- मैं जहाँ भी जाऊँगा... इसे लगाऊँगा। और जब भी इसकी छाया देखूँगा... मुझे तुम्हारा गाँव याद आएगा।

फिर उन्होंने बच्चों से कहा—

- चलो... आज आखिऱी पाठ पढ़ते हैं।

उन्होंने ब्लैकबोर्ड पर बड़े अक्षरों में लिखा—

गाँव को बदलने के लिए...

पहले स्वयं अच्छा इंसान बनो।

फिर चॉक गोपाल को दे दिया।

- अब... आखिऱी पंक्ति तुम लिखो।

गोपाल कुछ क्षण सोचता रहा।

फिर उसने धीरे-धीरे लिखा—- हम गाँव को साफ़ रखेंगे।

मुन्नी ने आगे बढक़र लिखा—हम पेड़ लगाएंगे।

कालू ने लिखा—हम कभी झूठ नहीं बोलेंगे।

रानी ने लिखा—हम सबकी मदद करेंगे।

एक-एक करके सभी बच्चों ने अपनी-अपनी पंक्तियाँ लिख दीं। कुछ ही देर में... पूरा ब्लैकबोर्ड बच्चों के वादों से भर गया। मास्टरजी ने ब्लैकबोर्ड को देखा। फिर बच्चों को देखा।

उन्होंने धीरे से कहा—

- अब मुझे कोई चिंता नहीं है। यह गाँव... सही हाथों में है।

छुट्टी की घंटी बजी।

टन... टन... टन...

वही घंटी... जिसे कभी गोपाल ने छिपा दिया था। आज उसकी आवाज़ पहले से कहीं ज़्यादा मधुर लग रही थी। डाकिया काका मुस्कुराए।

रामू चरवाहा हाथ हिलाकर बोला—

- मास्टरजी... फिर कभी आइएगा।

दादी ने आशीर्वाद दिया। सरपंच जी ने हाथ जोड़ दिए। बच्चे दौडक़र मास्टरजी के पास आए। लेकिन... किसी ने रोया नहीं। सभी मुस्कुरा रहे थे।

क्योंकि... विदा एक शिक्षक की नहीं हो रही थी। एक रिश्ते की शुरुआत हो रही थी।


मास्टरजी ने अपना बैग उठाया। कुछ कदम चले। फिर पीछे मुडक़र देखा। स्कूल... नीम का पेड़... बरामदा... घंटी... और आँगन में खड़े बच्चे। उन्होंने हाथ हिलाया। बच्चों ने भी हाथ हिलाया।

हवा चली। नीम के पत्ते झूम उठे।

स्कूल के पीछे लगे छोटे-छोटे पौधे हवा में डोल रहे थे।

मानो कह रहे हों—

शिक्षक चले जाते हैं...

लेकिन उनके लगाए हुए संस्कार...

पीढिय़ों तक बढ़ते रहते हैं।


समापन


उस गाँव में आज भी एक पुराना स्कूल है। बरामदे में वही घंटी टँगी है। नीम का पेड़ अब और बड़ा हो चुका है। और स्कूल के पीछे... कुछ विशाल पेड़ खड़े हैं। 

गाँव वाले कहते हैं—

- ये पेड़ बच्चों से शिक्षक नेे लगाए थे।

लेकिन... 

एक बूढ़े डाकिया काका मुस्कुराकर कहते हैं—

- नहीं...ये पेड़ एक शिक्षक ने नहीं लगाए थे।

उन्होंने तो केवल बच्चों के मन में बीज बोए थे।

और सच यही है—

पेड़ मिट्टी में उगते हैं...लेकिन अच्छे इंसान..

एक अच्छे शिक्षक के विश्वास में उगते हैं......


— समाप्त —