अपने होने का अर्थ
कुछ रिश्ते
हिसाब नहीं रखते,
वे बस निभाए जाते हैं।
जैसे सुबह
बिना किसी से पूछे
सूरज खिड़की पर आ जाता है,
जैसे पेड़
अपनी छाँव का
किसी से मूल्य नहीं माँगता।
वैसे ही
अपने लोगों के लिए किया गया काम
कभी बोझ नहीं होता।
माँ रात भर जागती है,
तो उसे अपनी नींद का
हिसाब नहीं रहता।
भाई रास्ते में खड़ा होता है,
तो उसे अपनी थकान
याद नहीं रहती।
कोई अपना
चुपचाप तुम्हारे हिस्से का दुःख उठा ले,
तो वह एहसान नहीं करता—
वह बस
अपना होने का अर्थ निभाता है।
क्या कभी
एक हाथ दूसरे हाथ से कहता है—
"आज मैंने तेरा कितना काम किया?"
क्या आँख
चेहरे से पूछती है—
"तुझे देखने में
मैंने कितनी मेहनत की?"
क्या पैर
शरीर से कहते हैं—
"तुझे यहाँ तक लाने का
मेहनताना दो?"
नहीं...
क्योंकि शरीर के अंगों के बीच
लेन-देन नहीं होता,
एक-दूसरे में होना होता है।
शायद रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं।
जहाँ रिश्ता सच्चा हो,
वहाँ किसी के लिए किया गया काम
थकाता नहीं—
बल्कि भीतर कहीं
एक अजीब-सी शांति देता है।
इसलिए
अगर कभी किसी अपने के लिए
अपना समय दे दिया,
अपनी नींद छोड़ दी,
अपनी खुशी थोड़ी पीछे कर दी—
तो उसे बोझ मत समझना।
क्योंकि हर त्याग
त्याग नहीं होता...
कुछ त्याग
अपनेपन का दूसरा नाम होते हैं।
और शायद
अपने होने की सबसे बड़ी पहचान यही है—
जब किसी अपने के लिए
कुछ करने से पहले
मन यह नहीं पूछता—
"मुझे इससे क्या मिलेगा?"
बस भीतर से एक आवाज़ आती है—
"वो मेरा अपना है...
उसके लिए इतना तो बनता है......"

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