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मेले का ढोल

 मेले का ढोल



गाँव में साल में केवल एक बार मेला लगता था।

साल भर गाँव वैसा ही रहता—सुबह होते ही खेतों की ओर जाते किसान, गलियों में घूमती गायें, कुएँ से पानी भरती औरतें, पेड़ों पर चहचहाते पक्षी, दोपहर की चुप्पी और शाम होते ही चौपाल पर जमती महफिल।

लेकिन मेले का महीना आते ही गाँव की हवा बदल जाती।

बच्चों के लिए तो जैसे पूरा साल इसी इंतज़ार में बीतता था।

वे दिन गिनते।

“मेला आने में कितने दिन हैं?”

कोई कहता—“सात।”

दूसरा तुरंत बोलता—“नहीं, छह।”

तीसरा अपनी उँगलियों पर गिनकर कहता—“बस पाँच!”

और फिर सबकी आँखें गाँव से बाहर जाने वाली उस पगडंडी पर टिक जातीं, जहाँ से एक दिन ढोल वाला आने वाला था।

क्योंकि गाँव में मेले के आने की पहली खबर किसी आदमी से नहीं मिलती थी।

ढोल से मिलती थी।

दूर खेतों के पार से जब—

ढम... ढम... ढम...

की आवाज़ सुनाई देती, तो बच्चे खेल छोड़कर दौड़ पड़ते।

कोई नंगे पैर।

कोई आधी पहनी हुई चप्पल में।

कोई अपनी माँ के हाथ से छूटकर।

ढोल की आवाज़ जैसे पूरे गाँव में किसी ने खुशियों का निमंत्रण बाँट दिया हो।

उसी गाँव में हरिराम रहते थे।

उम्र अस्सी साल से ऊपर थी।

चेहरे पर झुर्रियाँ थीं, बाल लगभग पूरे सफेद हो चुके थे और चलने के लिए अब उन्हें छड़ी का सहारा लेना पड़ता था।

लेकिन उनकी आँखों में एक चीज़ अब भी जवान थी—

मेले का इंतज़ार।

हर साल जब मेला आने वाला होता, वे पीपल के पुराने पेड़ के नीचे अपनी चारपाई डालकर बैठ जाते।

बच्चे उनके पास आकर पूछते—

“दादाजी, ढोल कब बजेगा?”

हरिराम मुस्कराकर कहते—

“जब तुम्हें सबसे ज्यादा इंतज़ार होगा, तभी बजेगा।”

बच्चे हँसते।

उन्हें लगता था दादाजी मज़ाक कर रहे हैं।

लेकिन हरिराम जानते थे कि इंतज़ार की आवाज़ सबसे पहले दिल सुनता है।

एक शाम गाँव के कुछ बच्चे उनके पास बैठे थे।

सूरज खेतों के पीछे उतर रहा था। गायों के गले की घंटियाँ सुनाई दे रही थीं। चूल्हों से उठता धुआँ हवा में घुल रहा था।

छोटे मोहन ने पूछा—

“दादाजी, आपको मेला कब से अच्छा लगता है?”

हरिराम ने उसकी ओर देखा।

कुछ देर चुप रहे।

फिर बोले—

“जब से मैं तुम्हारी उम्र का था।”

मोहन हँस पड़ा।

“इतने पुराने?”

हरिराम भी हँसे।

“हाँ, इतना पुराना कि तब हमारे गाँव में बिजली भी नहीं थी।”

बच्चे और पास आ गए।

“तब मेला कैसा लगता था?”

हरिराम ने सामने देखते हुए कहा—

“तब मेला भी यही था... बस मैं छोटा था।”

फिर उनकी आवाज़ थोड़ी धीमी हो गई।

“बहुत छोटा।”

उन्होंने अपनी छड़ी पर हाथ रखा।

“पहली बार जब मेले का ढोल सुना था ना, तो मैं भी तुम्हारी तरह दौड़कर घर गया था। मेरे पिता खेत से लौटे नहीं थे। मैं रास्ते में ही खड़ा उनका इंतज़ार करता रहा।”

“फिर?”

“फिर वे आए। मैंने उनका हाथ पकड़ लिया और कहा—बाबा, मेला आ गया।”

हरिराम मुस्कराए।

“उन्होंने मेरी हथेली में दो पैसे रखे थे।”

बच्चों की आँखें चमक उठीं।

“दो पैसे में क्या मिलता था?”

“बहुत कुछ।”

“क्या?”

हरिराम ने हँसते हुए कहा—

“तब हमारी खुशी छोटी चीज़ों में मिल जाती थी।”

चौपाल पर बैठे कुछ जवान भी अब उनकी बातें सुन रहे थे।

हरिराम ने आगे कहा—

“फिर मैं बड़ा हुआ। शादी हुई। मेरा बेटा हुआ।”

उन्होंने सामने बैठे रामू की ओर देखा।

रामू उनके बेटे थे।

“और एक दिन वही ढोल फिर बजा। इस बार मैं अकेला नहीं था।”

रामू मुस्करा दिए।

“मैंने अपने बेटे की उँगली पकड़ी और मेले में गया।”

कुछ पल के लिए हरिराम की आँखें चमक उठीं।

“वह भी बिल्कुल मोहन जैसा ही था। हर दुकान पर रुकता था। हर चीज़ चाहिए थी उसे। और मैं कहता था—सब नहीं मिलेगा।”

बच्चे हँस पड़े।

रामू ने धीरे से कहा—

“बाबा, मुझे आज भी याद है।”

हरिराम ने उसकी ओर देखा।

दोनों कुछ पल चुप रहे।

शायद दोनों को अपना-अपना बचपन याद आ गया था।

अगले ही दिन सुबह गाँव के बाहर से आवाज़ आई—

ढम... ढम... ढम...

एक बच्चा चिल्लाया—

“आ गया!”

दूसरा घर से बाहर निकला—

“मेले का ढोल!”

कुछ ही क्षणों में गलियाँ बच्चों से भर गईं।

ढोल वाला धूल भरी पगडंडी से गाँव में दाखिल हुआ।

बच्चे उसके पीछे-पीछे चलने लगे।

वह ढोल बजाता रहा।

ढम... ढम... ढम...

हरिराम पीपल के नीचे बैठे उस आवाज़ को सुनते रहे।

उन्होंने आँखें बंद कर लीं।

सालों पहले का वही रास्ता उनके सामने आ गया।

एक छोटा बच्चा...

अपने पिता की उँगली पकड़े...

फिर वही बच्चा जवान हुआ...

अपने बेटे की उँगली पकड़े...

और अब वही बूढ़ा...

अपने पोते का इंतज़ार कर रहा था।

उन्होंने आँखें खोलीं।

सामने मोहन खड़ा था।

“दादाजी, चलेंगे मेले?”

हरिराम ने मुस्कराकर पूछा—

“तुम मेरे साथ चलोगे?”

“हाँ।”

“फिर चलो।”

मेले का दिन गाँव के लिए किसी त्योहार से कम नहीं था।

सुबह से घरों में चहल-पहल थी।

बच्चों के नए कपड़े निकले।

औरतों ने बाल सँवारे।

जवानों ने बैलगाड़ी तैयार की।

बूढ़ों ने अपनी पुरानी धोती-कुर्ता निकाली।

गाँव की पगडंडी पर लोग मेले की ओर चल पड़े।

किसी के हाथ में बच्चे थे, किसी के सिर पर सामान।

कहीं हँसी थी, कहीं गीत।

और सबके बीच कहीं दूर—

ढम... ढम... ढम...

ढोल बज रहा था।

मोहन रास्ते भर दादाजी का हाथ पकड़े रहा।

अचानक उसने पूछा—

“दादाजी, जब आप छोटे थे, तब भी आप ऐसे ही मेरे साथ चलते थे?”

हरिराम कुछ क्षण चुप रहे।

फिर बोले—

“नहीं बेटा... तब मेरे साथ मेरे बाबा चलते थे।”

“अब वे कहाँ हैं?”

हरिराम की चाल कुछ धीमी हो गई।

उन्होंने सामने देखा।

“वहीं हैं... जहाँ हम सबको एक दिन जाना है।”

मोहन उनकी बात पूरी तरह समझ नहीं पाया।

उसने बस उनका हाथ और कसकर पकड़ लिया।

मेले में पहुँचते ही उसकी आँखों में चमक आ गई।

झूले घूम रहे थे।

गुब्बारे हवा में झूल रहे थे।

मिठाइयों की खुशबू चारों ओर फैली थी।

कहीं बाँसुरी बिक रही थी, कहीं लकड़ी के घोड़े।

मोहन एक दुकान से दूसरी दुकान भाग रहा था।

हरिराम धीरे-धीरे उसके पीछे चल रहे थे।

फिर अचानक उनकी नज़र एक पुराने लकड़ी के घोड़े पर पड़ी।

वह ठिठक गए।

“क्या हुआ दादाजी?”

हरिराम ने घोड़े को देखते हुए कहा—

“ऐसा ही घोड़ा मेरे बाबा ने मुझे भी दिलाया था।”

मोहन ने तुरंत कहा—

“मुझे भी चाहिए।”

हरिराम हँसे।

“ले लो।”

मोहन ने लकड़ी का घोड़ा हाथ में ले लिया।

उसके चेहरे पर वही खुशी थी, जो शायद कभी हरिराम के चेहरे पर थी।

कुछ देर बाद दोनों मेले के किनारे बैठ गए।

सूरज ढल रहा था।

दूर से ढोल बज रहा था।

ढम... ढम... ढम...

हरिराम उस आवाज़ को सुनते रहे।

मोहन ने पूछा—

“दादाजी, यह ढोल हर साल बजता है ना?”

“हाँ।”

“तो फिर इसमें नया क्या है?”

हरिराम मुस्कराए।

“ढोल में कुछ नया नहीं होता बेटा।”

उन्होंने मोहन के सिर पर हाथ रखा।

“नए तो हम होते जाते हैं।”

मोहन चुप हो गया।

हरिराम ने दूर जाते लोगों को देखा।

कितने चेहरे थे।

कुछ बूढ़े।

कुछ जवान।

कुछ बच्चे।

हर साल यही होता था।

बस चेहरे बदल जाते थे।

किसी बच्चे की जगह अगली बार उसका बच्चा खड़ा होता।

किसी जवान की जगह उसका बेटा बैलगाड़ी हाँकता।

और किसी बूढ़े की चारपाई एक दिन खाली रह जाती।

हरिराम ने मोहन को अपने पास खींच लिया।

“जानते हो मोहन, यह ढोल मुझे बहुत कुछ याद दिलाता है।”

“क्या?”

“मेरे बाबा।”

“आपके बाबा?”

“हाँ।”

उन्होंने धीमे से कहा—

“उनकी आवाज़ मुझे अब याद नहीं... उनका चेहरा भी पूरा याद नहीं। लेकिन उनके साथ मेले तक जाते हुए मैंने जो ढोल सुना था, वह आज भी याद है।”

मोहन उन्हें देखने लगा।

हरिराम की आँखें भीग गई थीं।

“कभी-कभी इंसान चला जाता है बेटा... उसकी आवाज़ चली जाती है... उसका चेहरा भी धीरे-धीरे धुँधला पड़ जाता है... लेकिन उसकी दी हुई कोई छोटी-सी याद हमारे अंदर रह जाती है।”

दूर ढोल फिर बजा।

ढम... ढम... ढम...

हरिराम ने आँखें बंद कर लीं।

“मेरे लिए वही ढोल मेरे बाबा की आखिरी याद है।”

मोहन ने कुछ नहीं कहा।

उसने बस अपना छोटा-सा हाथ दादाजी के हाथ पर रख दिया।

रात हो चुकी थी।

मेले की रोशनियाँ चमक रही थीं।

वापस लौटते समय मोहन थककर हरिराम के कंधे से लग गया।

गाँव की पगडंडी पर दोनों धीरे-धीरे चल रहे थे।

पीछे मेला दूर होता जा रहा था।

ढोल की आवाज़ भी धीमी पड़ रही थी।

ढम... ढम... ढम...

हरिराम ने पीछे मुड़कर देखा।

फिर सामने देखा।

मोहन सोते-सोते उनका हाथ पकड़े था।

हरिराम के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

उन्होंने धीरे से कहा—

“अगले साल फिर चलेंगे।”

मोहन ने आँखें खोले बिना कहा—

“हाँ दादाजी।”

हरिराम कुछ देर चुप रहे।

फिर आसमान की ओर देखा।

शायद वे जानते थे कि हर वादा अगले साल तक नहीं पहुँचता।

लेकिन उन्होंने यह बात मोहन से नहीं कही।

वे बस उसका हाथ पकड़े रहे।

रात और गहरी होती गई।

गाँव की गलियाँ फिर शांत हो गईं।

चूल्हों की आग बुझने लगी।

पीपल के पत्ते हवा में हिलने लगे।

और बहुत दूर मेले की ओर से ढोल की आखिरी आवाज़ आई—

ढम...

फिर कुछ देर बाद—

ढम...

और फिर...

खामोशी।

उस रात गाँव सो गया।

लेकिन हरिराम देर तक जागते रहे।

उन्हें अपना बचपन याद आता रहा।

अपने बाबा का हाथ।

उनकी हथेली में रखे दो पैसे।

मेले का लकड़ी का घोड़ा।

फिर अपना बेटा।

और अब मोहन।

तीन पीढ़ियाँ उनके सामने थीं।

तीनों के बीच बस एक चीज़ समान थी—

मेले का ढोल।

अगले साल जब फिर वही ढोल बजेगा, तो शायद मोहन फिर दौड़कर पीपल के पेड़ तक आएगा।

शायद वह पूछेगा—

“दादाजी, चलेंगे?”

लेकिन शायद उस बार पीपल के नीचे चारपाई खाली हो।

शायद कोई और उस चारपाई पर बैठा हो।

शायद मोहन किसी और का हाथ पकड़कर मेले की ओर जाए।

और जब दूर से ढोल बजे—

ढम... ढम... ढम...

तो उसे अचानक याद आएगा—

एक बूढ़ा आदमी कहा करता था—

“ढोल वही रहता है बेटा... बदलते हम हैं।”

और तब उसे समझ आएगा कि मेला केवल खिलौनों, झूलों और जलेबियों का नाम नहीं था।

मेला तो उन लोगों से बनता था,

जो हर साल उसके आने का इंतज़ार करते थे।

कुछ लोग मेला देखने आते थे।

कुछ लोग मेले की याद बन जाते थे।

और कुछ...

मेले के ढोल की आवाज़ बनकर हमेशा के लिए रह जाते थे।

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अध्याय  1 पीपल की छाँव गाँव के छोर पर एक पुराना पीपल का पेड़ था। इतना पुराना कि गाँव के सबसे बूढ़े आदमी भी उसकी उम्र ठीक-ठीक नहीं बता सकते थे। कोई कहता—मेरे दादा के समय से है।