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दादी का संदूक

 दादी का संदूक



गाँव के उस पुराने घर में एक संदूक था। भारी-भरकम लकड़ी का संदूक। उस पर जगह-जगह लोहे की पट्टियाँ लगी थीं और सामने पीतल का एक पुराना ताला। संदूक दादी के कमरे के कोने में रखा रहता था। उस पर हमेशा एक सफेद कपड़ा पड़ा रहता। और उस कपड़े के ऊपर दादी की छोटी-सी पूजा की थाली। दादी हर सुबह पूजा करने के बाद संदूक के पास जातीं, कपड़ा ठीक करतीं, ताले पर हाथ फेरतीं और फिर अपनी चाबी साड़ी के पल्लू में बाँध लेतीं।

बस...

यही बात घरवालों के लिए सबसे बड़ा रहस्य थी।

आखिर उस संदूक में था क्या?


दादी के दो बेटे थे—मोहन और सोहन। दोनों की शादी हो चुकी थी। मोहन की पत्नी सुशीला और सोहन की पत्नी कमला। दोनों के बच्चे भी थे। घर बड़ा था, परिवार बड़ा था और उसी के साथ बढ़ती जा रही थीं घर की जरूरतें भी।

लेकिन एक चीज़ घर में हमेशा वैसी ही रही—

दादी का संदूक।

जब भी दादी कमरे से बाहर जातीं, ताला लगाकर जातीं। 

कभी कोई पूछता—

"अम्मा, इसमें ऐसा क्या रखा है जिसे हमेशा बंद रखना पड़ता है?"

दादी मुस्कुराकर कहतीं—

"तुम्हारे मतलब की चीज़ नहीं है।"

बस।

इतना ही जवाब।

और यही जवाब सबकी उत्सुकता और बढ़ा देता।

बड़ी बहू सुशीला को पूरा विश्वास था कि संदूक में दादी के पुराने गहने हैं।

वह एक दिन छोटी बहू कमला से बोली—

"देखना, अम्मा ने अपने मायके के गहने अब तक संभालकर रखे होंगे।"

कमला बोली—

"गहने होते तो बैंक में रखतीं।"

सुशीला ने धीरे से कहा—

"पुराने जमाने की औरतें बैंक पर भरोसा कहाँ करती थीं?"

दोनों हँस पड़ीं। बाहर बैठे मोहन ने उनकी बात सुन ली।

वह बोला—

"तुम दोनों को क्या लगता है, अम्मा के पास कितना सोना होगा?"

कमला बोली— "आपको भी यही चिंता है?"

मोहन मुस्कुराया।

"चिंता नहीं है। बस जिज्ञासा है।"

दादी दरवाज़े पर खड़ी सब सुन रही थीं।

उन्होंने कहा— "जिज्ञासा अच्छी चीज़ है बेटा... लेकिन हर बंद चीज़ खोलने के लिए नहीं होती।"

सब चुप हो गए। दादी अंदर चली गईं। घर के बच्चों के लिए तो वह संदूक किसी रहस्यमयी खजाने से कम नहीं था।

कोई कहता— "उसमें राजा के सिक्के हैं।"

कोई कहता— "नहीं, दादी के पास पुराने सोने के हार हैं।"

एक बार छोटा पोता बोला— "मुझे लगता है उसमें बंदूक है।"

सब बच्चे हँस पड़े। लेकिन एक बच्ची इन बातों पर कभी नहीं हँसती थी।

वह थी—

गुड़िया।

दादी की सबसे प्यारी पोती।

दादी उसे हमेशा "मेरी गुड़िया" कहकर बुलाती थीं। गुड़िया अक्सर दादी के पास बैठी रहती। दादी के बाल बनाती। उन्हें दवा देती। उनके पैर दबाती। और कभी-कभी देर रात तक उनके पास बातें करती।

इसीलिए घरवालों को शक था कि गुड़िया को संदूक का राज जरूर पता होगा।

एक दिन मोहन ने मज़ाक में पूछा—

"गुड़िया, तू तो दादी की जासूस है। बता, संदूक में क्या है?"

गुड़िया हँस दी।

"मुझे क्या पता?"

सोहन बोला— "झूठ बोल रही है। तू दादी के कमरे में सबसे ज्यादा रहती है।"

छोटी बहू ने कहा— "हाँ, अब हमें भी बता दे।"

गुड़िया ने दादी की तरफ देखा।

दादी चुपचाप मुस्कुरा रही थीं।

गुड़िया ने कहा—

"अगर मुझे पता भी होगा तो मैं नहीं बताऊँगी।"

सबने शोर मचा दिया—

"देखा! इसे पता है!"

गुड़िया हँसते हुए भाग गई।

पीछे से दादी की आवाज़ आई—

"मेरी गुड़िया है ही समझदार।"

उस दिन से घर में उसका नाम पड़ गया—

दादी की जासूस।

लेकिन एक रात... जब घर में सब सो चुके थे, दादी ने गुड़िया को धीरे से आवाज़ दी।

"गुड़िया..."

वह उठकर उनके पास गई। दादी ने दरवाज़ा बंद किया। फिर संदूक के पास जाकर बैठ गईं। उन्होंने अपनी चाबी निकाली। गुड़िया की धड़कन तेज हो गई। ताले में चाबी घूमी।

क्लिक।

संदूक खुला। गुड़िया ने अंदर देखा। उसके चेहरे पर पहले आश्चर्य आया। फिर आँखों में नमी। उसने दादी की ओर देखा।

"दादी..."

दादी ने उसके होंठों पर उँगली रख दी।

"श्श्श..."

फिर बोलीं—

"जो देखा है, उसे अपने सीने में रखना।"

गुड़िया ने सिर हिला दिया।

"लेकिन दादी..."

"किसी को नहीं बताना।"

"कभी भी नहीं?"

दादी ने मुस्कुराकर कहा—

"जब तक मैं हूँ—नहीं।"

गुड़िया ने उस रात संदूक में क्या देखा... यह बात फिर कभी किसी को पता नहीं चली। अगले दिन से घरवालों का शक और बढ़ गया।

मोहन ने पूछा— "गुड़िया, बता न।"

"क्या?"

"संदूक में क्या है?"

गुड़िया बोली— "कुछ नहीं।"

सोहन हँसा— "कुछ नहीं है तो दादी उसे ताला लगाकर क्यों रखती हैं?"

गुड़िया ने कहा— "दादी की चीज़ है। उन्हें जो करना है करने दो।"

सुशीला बोली— "तू बता दे। हम किसी से नहीं कहेंगे।"

गुड़िया मुस्कुरा दी।

"आपसे तो दादी पहले ही कह देंगी।"

सब हँस पड़े। लेकिन गुड़िया ने वादा निभाया।

साल बीतते गए। बच्चे बड़े होते गए। घर में शादियाँ हुईं। नौकरियाँ लगीं। नाती-पोते हुए। घर में नए टीवी आए।

फ्रिज आया। मोबाइल आए। पुरानी चीज़ें हटती गईं। लेकिन दादी का संदूक... वहीं रहा। उसी कोने में। उसी कपड़े के नीचे। उसी ताले के साथ। कभी-कभी घर के लोग मज़ाक करते—

"अम्मा, अब तो बता दो।"

दादी कहतीं— "समय आने दो।"

"कौन-सा समय?"

दादी कहतीं— "जब तुम्हें समझ आएगा कि असली धन क्या होता है।"

सब इसे दादी की पहेली समझकर हँस देते। सिर्फ़ गुड़िया नहीं हँसती थी। समय के साथ परिवार में भी बदलाव आया। मोहन और सोहन के बीच एक जमीन को लेकर विवाद हो गया। बात बढ़ती गई। दोनों भाइयों ने एक-दूसरे से बात करना कम कर दिया। बहुएँ भी अपने-अपने पक्ष में खड़ी हो गईं।

घर वही था। आँगन वही था। रसोई वही थी। लेकिन घर के भीतर जैसे दीवारें खड़ी हो गई थीं। दादी सब देखती रहीं।एक दिन उन्होंने दोनों बेटों को अपने पास बुलाया।

दोनों आए। दादी ने कुछ नहीं कहा। बस संदूक की ओर देखा।

फिर बोलीं—

"इसे खोल दूँ?"

दोनों चौंक गए।

मोहन बोला—

"अम्मा, रहने दो।"

सोहन भी चुप रहा। दादी मुस्कुराईं।

"तुम दोनों को कभी से जानना था न कि इसमें क्या है?"

दोनों एक-दूसरे को देखने लगे।

दादी ने कहा—

"आज भी जानना है?"

मोहन ने धीरे से कहा—

"नहीं अम्मा।"

दादी ने पूछा—

"क्यों?"

मोहन ने सिर झुका लिया।

"अब लगता है... कुछ चीज़ें न जानना ही अच्छा है।"

दादी मुस्कुराईं। शायद उन्हें पहली बार लगा कि उनके बेटे बड़े हो गए हैं।

उस रात गुड़िया दादी के पास बैठी थी। दादी ने उसका हाथ पकड़ा।

"गुड़िया..."

"जी।"

"अगर कभी मैं न रहूँ..."

गुड़िया की आँखें भर आईं।

"ऐसा मत कहो दादी।"

दादी ने उसके सिर पर हाथ रखा।

"हर किसी को जाना पड़ता है।"

फिर उन्होंने चाबी गुड़िया की हथेली में रख दी। गुड़िया काँप गई।

"दादी..."

"इसे संभालकर रखना।"

"क्या मैं...?"

दादी ने कहा—

"जिस दिन मेरा परिवार मेरे सामने एक साथ बैठा हो,
उसी दिन इसे खोलना।"

गुड़िया ने चाबी मुट्ठी में बंद कर ली।

कुछ महीने बाद...

घर की वह आवाज़ हमेशा के लिए शांत हो गई। दादी चली गईं। सुबह से घर में लोगों का आना-जाना लगा रहा।

रोने की आवाज़ें थीं। पुरानी यादें थीं।

और हर किसी की जुबान पर एक ही बात—

"दादी के जाने के बाद अब उस संदूक का क्या होगा?"

कोई कहता—

"शायद आज खोलना चाहिए।"

कोई कहता—

"देखना, अंदर क्या निकलेगा।"

मोहन और सोहन चुप थे। दोनों बहुएँ भी चुप थीं। शाम होते-होते पूरा परिवार दादी के कमरे में इकट्ठा हो गया।

संदूक सामने रखा था। सालों का रहस्य...

आज सबकी आँखों के सामने था। लेकिन ताला अब भी बंद था। मोहन ने गुड़िया की तरफ देखा।

"चाबी तेरे पास है न?"

गुड़िया ने सिर हिलाया।

सोहन बोला— "तू ही खोल।"

कमला बोली— "हाँ बेटा, दादी ने तुझे ही दी थी।"

गुड़िया कुछ देर संदूक को देखती रही। फिर धीरे से आगे बढ़ी। चाबी निकाली। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।

उसने ताले में चाबी लगाई। एक बार सबकी आँखें एक-दूसरे से मिलीं।

फिर...

क्लिक।

ताला खुल गया। गुड़िया ने दोनों हाथों से ढक्कन उठाया।

और...

पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया।

अंदर सोना नहीं था।

न चाँदी।

न पैसे।

न गहनों की कोई पोटली।

सबसे ऊपर था—

एक बहुत छोटा-सा ऊनी मोज़ा।

मोहन ने उसे देखा।

उसकी आँखें फैल गईं।

"ये..."

गुड़िया ने धीरे से कहा—

"पापा का है।"

मोहन ने काँपते हाथों से मोज़ा उठाया। उसे अपने बचपन की कोई बहुत दूर की तस्वीर याद आ गई।

उसकी आँखें भर आईं।

नीचे था—

एक टूटा हुआ लकड़ी का घोड़ा।

सोहन ने उसे देखते ही कहा—

"ये मेरा है..."

उसकी आवाज़ भर्रा गई।

फिर निकला—

एक पुराना लाल रुमाल। सुशीला ने उसे देखते ही मुँह पर हाथ रख लिया।

"ये... मेरी शादी के बाद का है।"

फिर एक छोटी-सी चप्पल। एक पुरानी स्लेट। एक टूटी हुई चूड़ी। स्कूल का फीता। पुरानी राखी। पहली नौकरी का कागज़। शादी का निमंत्रण। बच्चों की तस्वीरें। पहली बार लिखे गए अक्षर। एक बच्चे की टेढ़ी-मेढ़ी ड्राइंग। एक पुराना बटन। एक छोटी लकड़ी की सीटी।

और...

हर सामान के साथ किसी की कहानी थी। हर वस्तु के साथ किसी का बचपन। हर छोटी चीज़ के भीतर दादी का कोई दिन। कमरे में कोई अब संदूक नहीं देख रहा था। सब अपने-अपने अतीत को देख रहे थे। सबसे नीचे एक सफेद कपड़े में लिपटी चिट्ठी थी।

ऊपर लिखा था—

"मेरे परिवार के नाम"

गुड़िया ने चिट्ठी खोली।

और पढ़ना शुरू किया—

"मेरे बच्चों,

तुम सब सोचते रहे कि इस संदूक में मेरा धन छिपा है। तुम सही थे। इसमें मेरा सबसे बड़ा धन ही था। बस वह सोना नहीं था...

तुम सबका बचपन था।

तुम्हें जो चीज़ बेकार लगती थी, उसमें मुझे तुम्हारी एक मुस्कान दिखाई देती थी। तुम्हें जो टूटा हुआ खिलौना लगता था, उसमें मुझे तुम्हारे बचपन की आवाज़ सुनाई देती थी। तुम्हारा पहला मोज़ा,
पहली चप्पल, पहला स्कूल का फीता, पहली राखी, पहली नौकरी, पहली तस्वीर...तुम सब उन्हें भूलते गए, लेकिन मैं नहीं भूल पाई।

क्योंकि...

तुम्हारा बचपन मेरा जीवन था।

जब घर खाली लगता था, मैं यह संदूक खोलती थी। तुम सब फिर छोटे हो जाते थे। कोई मेरे आँगन में दौड़ता था, कोई रोता था, कोई रूठता था, कोई मेरी गोद में सो जाता था। और मेरा घर फिर भर जाता था। यही यादें थीं जो मुझे जीने का सहारा देती रहीं।

मेरे बच्चों,

मेरी आख़िरी इच्छा बस इतनी है—

मेरे जाने के बाद इस घर को
सिर्फ़ मकान मत बनने देना।

साथ रहना। मनमुटाव हों तो बात कर लेना। हिसाब-किताब हो तो कर लेना। लेकिन रिश्तों का हिसाब मत करना। जमीन बाँट लेना, सामान बाँट लेना, धन बाँट लेना...

मगर अपनेपन को मत बाँटना। और जब कभी लगे कि भाईचारा कम हो रहा है,

यह संदूक खोल लेना। इसमें अपना बचपन देख लेना।

            शायद तुम्हें याद आ जाए—

तुम बड़े होने से पहले
एक-दूसरे के बच्चे थे।

मेरे बाद मेरी सबसे बड़ी विरासत यह संदूक नहीं है।

तुम सबका एक रहना है।

अगर तुम साथ रहे, तो समझूँगी मेरा संदूक आज भी भरा हुआ है।

तुम्हारी दादी।"

चिट्ठी खत्म हुई। गुड़िया की आवाज़ रुक गई। कमरे में किसी के पास बोलने के लिए कुछ नहीं था। मोहन ने सोहन की ओर देखा। सोहन ने उसका हाथ पकड़ लिया। दोनों भाई गले लगकर रो पड़े। बहुएँ भी रो रही थीं।

बच्चे अपने माता-पिता को देख रहे थे। और कमरे के बीचोंबीच... वह पुराना संदूक खुला पड़ा था। जिसमें सोना नहीं था।

फिर भी उस दिन सबको लगा—

उन्होंने अपने जीवन का सबसे बड़ा खजाना पा लिया है।

रात को सब चले गए। गुड़िया अकेली दादी के कमरे में बैठी रही। उसने एक-एक चीज़ वापस संदूक में रखी। सबसे ऊपर दादी की चिट्ठी रखी। फिर कपड़ा बिछाया। ढक्कन बंद किया। ताला लगाया। कुछ देर संदूक पर हाथ रखे बैठी रही। उसकी आँखों के सामने दादी का चेहरा था।

उसे दादी की आवाज़ सुनाई दी—

"मेरी गुड़िया..."

गुड़िया मुस्कुराई।

फिर धीरे से बोली—

"दादी...
आपका खजाना मैंने संभाल लिया।"

उसने संदूक को देखा। अब वह रहस्य नहीं था। लेकिन उसकी कीमत... पहले से कहीं अधिक हो चुकी थी। क्योंकि उस संदूक में अब सिर्फ़ पुराने सामान नहीं थे।

उसमें था—

एक परिवार का बचपन।

एक माँ का जीवन।

एक दादी का प्रेम।

और... एक ऐसा रिश्ता, जिसे समय भी पुराना नहीं कर सकता।

— इति श्री —

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